त्रिलोचन शास्त्री  जन्म 20-08-1917 -  जयंती 20-08-2025
“हिंदी सॉनेट काव्य के साधक इनकी एक विशेष पहचान भारतीय हिंदी साहित्य में रही ।” त्रिलोचन शास्त्री जी का जन्म 20 अगस्त1917 को गांव कटघरापट्टी-चिरानीपट्टी, जिला सुल्तानपुर( उत्तर प्रदेश) के एक प्रतिष्ठित ठाकुर परिवार में हुआ था। इनका नाम वासुदेव रखा गया पिता बाबू जगदेव सिंह जो बैरागी बाबू के नाम से जाने जाते थे, कुश्ती के शौकीन थे, और ये लगभग 7 फीट 3 इंच की ऊचाँई के थे। और माता मनवरता देवी की ये पाँचवीं संतान थी। वासुदेव को त्रिलोचन नाम दिया संस्कृत के गुरु देवदत्त जी ने। अपने नाम के साथ गुरु देवदत्त जी तिवारी नहीं लिखते थे , उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को भी जाति-सूचक सिंह अपने नाम के साथ लिखने से मना किया। गुरु की आज्ञा मानकर त्रिलोचन अपने नाम के साथ सिंह कभी नहीं लगाते थे। शिक्षा अरबी-फारसी शिक्षा, साहित्य रत्न, शास्त्री, अंग्रेजी साहित्य में एस.ए.(पूर्वार्ध्द), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणासी,, कर्म भूमि भारत विद्यालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय शिक्षा एम.ए. (अंग्रेज़ी) एवं संस्कृत में 'शास्त्री' की डिग्री । अन्य जानकारी त्रिलोचन शास्त्री हिन्दी के अतिरिक्त अरबी और फ़ारसी भाषाओं के निष्णात ज्ञाता माने जाते थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी वे ख़ासे सक्रिय रहे। त्रिलोचन शास्त्री हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्य धारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाते है। वे आधुनिक हिन्दी कविता की प्रगतिशील 'त्रयी' के तीन स्तंभों में से एक थे। इस 'त्रयी' के अन्य दो स्तम्भ नागार्जुन व शमशेर बहादुर सिंह थे। त्रिलोचन शास्त्री काशी (आधुनिक वाराणसी) की साहित्यिक परम्परा के मुरीद कवि थे। प्रगतिशील कवियों में इनको सबसे अधिक आत्मसजग कह सकते है।उनकी कवि-प्रकृति-शास्त्र और लोक के सामंजस्य से सृजित है ।यायावर त्रिलोचन जी के काव्य में आँखन देखी की प्राथमिकता है,समुद्र के विस्तार से लेकर हिमशिखरों की ऊँचाई तक-सुदूर दक्षिण भारत से लेकर राँचीं तक उनका प्रवास काव्यानुभूति को समृध्द करता है ।
त्रिलोचन मुख्यतः आत्मविश्लेशण के कवि है। इसके माध्यम से उन्होंने किसानी जीवन और परिवेश का चित्रण किया है। उसमें किसान जीवन की रीति-नीति, आस्था, विश्वास, आशा, निराशा, गरीबी, मुक्ति-कामना आदि के अनगिनत चित्र उरेहे गये है। त्रिलोचन को जानने के लिए उनकी कविताओं से गुजरना होगा। कवि को कविता बनाती है। ऐसा देखा गया है कि शायद ही कोई कविता हो जिसमें त्रिलोचन न हों। ‘जीवन का एक लधु प्रसंग’ उनके जीवन का एक बुनियादी बिन्दु है। अपने बारे में उनकी अनेक कविताएँ लिखी है- ‘वही त्रिलोचन है’,,”चीर भरा पाजामा’, ‘भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल ।‘ इस यथार्थ के भीतर उनके व्यक्तित्व का बनना होता हैः-
उठा  हुआ सिर, चौड़ी  छाती , लंबी  बांहें / सधे  कदम, तेजी , वे  टेढ़ी – मेढ़ी  राहें   
जीवन इसका जो कुछ है पथ पर बिखरा है, / तप-तप कर  ही  भट्ठी मे सोना निखरा है।
कुछ यह भी शिकायत है की त्रिलोचन में संवेदना नहीं है, और कुछ की शिकायत यह कि उनमें धूम-धड़ाम नहीं है। इस नाराजगी को झेलते हुए भी त्रिलोचन ने समझौता नहीं किया विशेषतः कट्टर मार्क्सवादियों से।इनकी रचनाओं में तीन सॉनेट है जो एक माओ पर, दूसरा सुभाषचंद्र बोस पर और तीसरा महात्मा गांधी पर लिखे सॉनेट “शब्द’ कृति में है। इनका कहना है कि कट्टरपंथियों को त्रिलोचन का सबके साथ और सबसे अलग व्यक्तित्व कैसे भा सकता है। इन कविताओं में विचारधारा नहीं, भारतीय गाँवों का स्वर मुखरित है। कवि को देश के नब्ज की सही पहचान है। कवि कट्टरता के पोषकों के संबंध में वे अपने काव्य-संग्रह “फूल नाम है एक’ में लिखते हैः-
साम्यवाद के पथ में लीद किया करते है  /  मानवता  का  पोस्टर देखा  लगें रेंकने। त्रिलोचन की कविताओं में दो गाँव हमेशा ही दिखाई पड़ते है। एक वह गाँव जो स्मृतिशेष हो गये है, दूसरे ऐसे गाँव जो आज की मार-धाड़, स्वार्थ और अर्थोपार्जन की दौड़-धूप मे अतीत से कट गये है। इनकी कविताएँ एक तरह से अपने कालांकन करने में सक्षम होती है। एक तरफ पत्नी अपने पति को परदेस जाने से रोकती है और उस जगह को नष्ट हो जाने की बात कहती है जहाँ पति जाने की तैयारी कर रहा होता है।  तो दूसरी तरफ पत्नी का पति परदेसी हो गया है। पत्र-व्यवहार पत्नी की उलाहना का शिकार कि पति गाँव को भूल गया है . असहाय व दयनीय वेदना से भरा पति का उत्तर हैः-
         

                                             

  सचमुच इधर तुम्हारी याद तो नहीं आती
    झूठ क्या कहूँ पूरे दिन मशीन में खटना
    बासे पर  आकर पड़  जाना और कमाई
    का हिसाब जोड़ना, बराबर चित्त उचटना
    इस-उस पर मन दौड़ाना,फिर उठकर रोटी
    करना, कभी नमक से कभी साग से खाना
    धीरज  धरो  आजकल करते तब आऊँगा 
    जब देखूँगा  अपना घर  कुछ कर पाऊँगा 
त्रिलोचन की भाषा की सरलता व सादगी पर तो बहुत लोग मुग्ध रहते है। यह भाषा उन्हें गाँव से मिली है जो उनके छंदों में रच-बस गयी है। त्रिलोचन ने उसे संस्कारित किया है। शब्दसंग्रह का एक उदाहरण जिसमे निराला और गोस्वामी तुलसीदास के वाक्य विन्यास से प्रभावित लगते हैः—विषम  शिलासंकुला   पर्वतोभूता  गंगा  /  शशि तारक हारा अभिद्रुता अतिशय पूता। 
रचनाएँ~~शास्त्री जी को 'हिन्दी सॉनेट' का साधक माना जाता है। उन्होंने इस छंद को भारतीय परिवेश में ढाला और लगभग 550 सॉनेट की रचना की। इसके अतिरिक्त कहानी, गीत, ग़ज़ल और आलोचना से भी उन्होंने हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। सॉनेट उनका सधा हुआ छंद है- आगरे के किले में जड़े हुए उस नग की तरह जिसमें ताजमहल प्रतिबिम्बित हो उठता है। मतलब यह कि उसके स्थापत्य में जोड़ नहीं है फिर भी सॉनेटों का धरातल विषम है-ऊँचा-नीचा। उनमें सूक्तियाँ, उपदेशात्मकता और सपाटबयानी भी है। पूरा वाक्य लिखने का हठ भी उनकी कविता को जगह-जगह इतिवृत्तात्मक बना देता है। शैली मे उनकी बतकही का रंग-ढ़ग है जिससे पाठक सहज मे ही ससे अपनापा जोड़ लेता हैः-  ‘’मैं तुमसे बात किया करता हूँ/ और यही मेरी कविता है।”’ गद्य कविता के वे पहले लेखक है। सॉनेट (चतुर्दशपदी) के विषय में वे स्वयं लिखते है कि यह चीज किराए की है–( स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपीयर, मिल्टन,वर्डसवर्थ,कीट्स आदि की भी चर्चा करते है) पाश्चात्य साहित्य में सॉनेट का का इतिहास काफी पुराना है। तेरहवीं सदी में टकसेन कवि ग्येतोन द रेस्तो और ग्वेदो ग्वी नित्सेली के अतिरिक्त दाँते, कवलकांति और पिस्तोवा आदि सॉनेट के शिल्प-प्रयोग कर रहे थे। सिडनी और शेक्सपीयर ने सॉनेट को शिखर पर पंहुचाया । लेकिन सॉनेट (चतुष्पदी) के कारण वह ज्यादा जाने गए। वह आधुनिक हिंदी कविता में सॉनेट के जन्मदाता थे। हिंदी में सॉनेट को विजातीय माना जाता था। लेकिन त्रिलोचन ने इसका भारतीयकरण किया। इसके लिए उन्होंने रोला छंद को आधार बनाया तथा बोलचाल की भाषा और लय का प्रयोग करते हुए चतुष्पदी को लोकरंग में रंगने का काम किया। इस छंद में उन्होंने जितनी रचनाएं कीं, संभवत: स्पेंसर, मिल्टन और शेक्सपीयर जैसे कवियों ने भी नहीं कीं। सॉनेट के जितने भी रूप-भेद साहित्य में किए गए हैं, उन सभी को त्रिलोचन ने आजमाया।

(एक सॉनेट का उदाहरण)-

प्यारः प्यार जब भौंरे ने आकर पहले पहले गाया
कली मौन थी। नहीं जानती थी वह भाषा 
इस दुनिया की, कैसी होती है अभिलाषा
इस से भी अनजान पड़ी थी। तो भी आया

जीवन का यह अतिथि, ज्ञान का सहज सलोना
शिशु, जिस को दुनिया में प्यार कहा जाता है,
स्वाभिमान-मानवता का पाया जाता है 
जिस से नाता। उस में कुछ ऐसा है
 
टोना जिस से यह सारी दुनिया फिर राई
रत्ती और दिखाई देने लगती है। क्या 
जाने कौन राग छाती से लगता है 


अकुलाने, इंद्रधनुष सी लहराती है पत्ती पत्ती।
बिना बुलाए जो आता है प्यार वही है। 
प्राणों की धारा उस में चुपचाप बही है। 
इनके व्दारा विष्णुचन्द्र शर्मा (संपादक- ‘सर्वनाम’) जी को कई पत्र 1995 से 1997 तक लिखे  जब वे मुक्तिबोध सृजन पीठ (अध्यक्ष), हरिसिंह गौर विश्वविदयालय, सागर (म.प्र.) से जुड़े थे कुछ अंश जिनमें उन्होंने अपने लेखन के विषय पर अपने बारे मे लिखते है कि “मुंबई मे पैसे की प्यास बहुत है” मुंबई की चर्चा के साथ, बाद में उन्होंने यह भी लिखा की मैं लिखने की सोच रहा हूँ. कब लिखना शुरू होगा कह नहीं सकता। इन पत्रों मे विभिन्न किताबों के विषय में अनेक बातों का पता चलता है। साथ ही बिना किताब देखे समीक्षा का विषय भी आया। इनके विचार मे “” सामूहिक संगठनों से बहुत-सी योजनाओं को कार्यन्वित होते देखना सम्भव नहीं है। फिर भी एक दो कार्य में आ जाएँ तो अकर्णात मन्दकरणम् श्रेयः। अपनी ही बातों को जोर लगा कर कहने और कार्य-परिणत करने या करवाने का आग्रही होना अहम् की संतान है।“’बहुत से पत्रों का अवलोकन व उनकी साफगोई हमेशा बहुत अच्छी लगी। त्रिलोचन ने लोक भाषा अवधी और प्राचीन संस्कृत से प्रेरणा ली, इसलिए उनकी विशिष्टता हिंदी कविता की परंपरागत धारा से जुड़ी हुई है। मजेदार बात यह है कि अपनी परंपरा से इतने नजदीक से जुड़े रहने के कारण ही उनमें आधुनिकता की सुंदरता और सुवास थी। प्रगतिशील धारा के कवि होने के कारण त्रिलोचन मार्क्सवादी चेतना से संपन्न कवि थे, लेकिन इस चेतना का उपयोग उन्होंने अपने ढंग से किया। प्रकट रूप में उनकी कविताएं वाम विचारधारा के बारे में उस तरह नहीं कहतीं, जिस तरह नागार्जुन या केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं कहती हैं। त्रिलोचन के भीतर विचारों को लेकर कोई बड़बोलापन भी नहीं था। उनके लेखन में एक विश्वास हर जगह तैरता था कि परिवर्तन की क्रांतिकारी भूमिका जनता ही निभाएगी। वैसे तो उन्होंने गीत, गजल, सॉनेट, कुंडलियां, बरवै, मुक्त छंद जैसे कविता के तमाम माध्यमों में लिखा। 

बाज़ारवाद के विरोधी~~उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव से 'बनारस विश्वविद्यालय' तक अपने सफर में त्रिलोचन शास्त्री ने दर्जनों पुस्तकें लिखीं और हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। शास्त्री जी बाज़ारवाद के प्रबल विरोधी थे। हालांकि उन्होंने हिन्दी में प्रयोगधर्मिता का समर्थन किया। उनका मानना था कि- "भाषा में जितने प्रयोग होंगे, वह उतनी ही समृद्ध होगी।" त्रिलोचन शास्त्री ने हमेशा ही नवसृजन को बढ़ावा दिया। वह नए लेखकों के लिए उत्प्रेरक थे।
कार्यक्षेत्र~~~~त्रिलोचन शास्त्री हिन्दी के अतिरिक्त अरबी और फ़ारसी भाषाओं के निष्णात ज्ञाता माने जाते थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी वे ख़ासे सक्रिय रहे। उन्होंने 'प्रभाकर', 'वानर', 'हंस', 'आज' और 'समाज' जैसी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया।
राष्ट्रीय अध्यक्ष~~त्रिलोचन शास्त्री वर्ष1995 से 2001 तक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा वाराणसी के 'ज्ञानमंडल प्रकाशन संस्था' में भी काम करते रहे और हिन्दी व उर्दू के कई शब्दकोषों की योजना से भी जुडे़ रहे।
उनका पहला कविता संग्रह 'धरती' 1945 में प्रकाशित हुआ था। 'गुलाब और बुलबुल', 'उस जनपद का कवि हूं' और 'ताप के ताये हुए दिन' उनके चर्चित कविता संग्रह थे। 'दिगंत' और 'धरती' जैसी रचनाओं को कलमबद्ध करने वाले त्रिलोचन शास्त्री के 17 कविता संग्रह प्रकाशित हुए।
कविता संग्रह~~धरती (1945),गुलाब और बुलबुल (1956),दिगंत (1957),ताप के ताए हुए दिन (1980),शब्द (1980),उस जनपद का कवि हूँ (1981),अरधान (1984),तुम्हें सौंपता हूँ (1985),मेरा घर, चैती, अनकहनी भी, जीने की कला (2004),मुक्तिबोध की कविताएँ,कहानी संग्रह,देशकाल ।
पुरस्कार व सम्मान~~~त्रिलोचन शास्त्री को 1989-1990 में 'हिन्दी अकादमी' ने 'शलाका सम्मान' से सम्मानित किया था। हिन्दी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हे 'शास्त्री' और 'साहित्य रत्न' जैसे उपाधियों से सम्मानित भी किया जा चुका है। 1982 में 'ताप के ताए हुए दिन' के लिए उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' भी मिला था।
त्रिलोचन शास्त्री जी की कुछ कविताओं के अंस के माध्यम से मैं नके जीवन की कुच पर्ते खोलने का प्रयास करना चाहता हूँ ।
मरने का दुख नहीः- (शब्दों से मेरा संबंध छूट जाएगा)
रवि, सोम भौ, बुध्द / गुरु, शुक्र, और शनि-/ इन्हीं सात दिनों से से / किसी एक दिन मैं भी /
मर जाऊंगा / मैनें करने जैसा /कोई काम किया/ शब्द ही तो थे केवल/ खेलता रहा जिनसे /
मैं जी भर / कुछ होंगे आगे भी/ जिनका नाता होगा शब्दों से/ वे ही शब्दों को /देखेंगे / 
जिन्हें मैंने / बांधा है / मुझे अपने मरने का / थोड़ा भी दुःख नहीं / मेरे मर जाने पर / 
शब्दो से/  मेरा संबंध / छूट जाएगा ।।
विषयांतर के आचार्यः—(त्रिलोचन जी जीवित होने के साथ किवदंती पुरूष बन गये थे।) यह संस्मरण नीराला जी के घर पर घटा है, उनके घर पर जाने पर निराला जी दीवार पर लगी तुलसीदास जी की तस्वीर को पीट रहे थे । उनसे कहा गया “महाराज आप ये क्या कर रहे है” पसीने से लथपथ , बेचैन निराला ने कहा कि जब भी कुछ अच्छा लिखने की खेशिश करता हूँ  तब यह कवि सामने आकर खड़ा हो जाता है।” तुलसी बाबा, भाषा मैंनें तुमसे सीखी / मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो यज्ञ रहा, तप रहा तुम्हारा जीवन भू पर। / भक्त हुए, उठ गये राम से भी, यो ऊपर। इस तरह लंबा समय रात का गुजरता रहा और त्रिलोचन बोलते रहेः थकान कहीं नही। जिस तरह से तुलसी के बिना निराला की कल्पना असंभव है उसी तरह से त्रिलोचन की भीः तुलसी बाबा, भाषा मैंनें तुमसे सीखी / मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो कह सकते थे तुम सब कड़वी, मीठी तीखी।/ प्रखर काल की धारा पार तुम जमे हुए हो। और वृक्ष गीर गए, तुम थमे हुए हो। यज्ञ रहा, तप रहा तुम्हारा जीवन भू पर। / भक्त हुए, उठ गये राम से भी, यों ऊपर। आत्म-गाथा में उपस्थित त्रिलोचनः- निराला के बाद त्रिलोचन एसे कवि है जिन्होंने कविता में आत्म गाथा कहने का उद्धम किया है। यह भोगने और रचने के पार्थक्य की धारणा को तोड़ दिया है, भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल / जिसको समझे था है तो यह फैलादी कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम / धुन कहां वह संभल के आई है।
खोज लोः- त्रिलोचन के काव्य में प्राकृतिक दृष्यों के अनुभूत चित्र अपना स्वतंत्र महत्व रखते है। उसमें क्रिया पद से युक्त सम्पूर्ण वाक्य अभिप्राय को अंतरंग चेतना को उदार विस्तार देते है। महत्वपूर्ण वह शिल्प है जहां कवि अहं से मुक्त हो जाता है। त्रिलोचन को त्रिलोचन की तरह पढ़े-मैं बहुत अलग कहीं और हूः खोज लो मैं कहा हूँ/ मुझे शब्द शब्द देखो/ मैं कहा हूँ। 

निधन~~जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने अपने सुपुत्र अमित प्रकाश सिंह के परिवार के साथ हरिद्वार के पास ज्वालापुर में बिताए थे। अंतिम वर्षों में भी वे काफ़ी जीवंत रहे। वार्धक्य ने शरीर पर भले ही असर डाला था, पर उनकी स्मृति या रचनात्मकता मंद नहीं पड़ी थी। 
महाप्रयाण--9 दिसम्बर, 2007 मृत्यु स्थान गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश इनको हमारे नमन के साथ विनम्र श्रध्दाजंलि . 

चिरंजीव 
लिंगम चिरंजीव राव 
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)