सुभद्राकुमारी चौहान जन्म 16-08-1904 - जयंती 16-08-2025

1-बुढे भारत में भी आयी फिर से नई जवानी थी।
2-यह कदम का पेड अगर माँ होता जमुना तीरे,।
(ये दोनों रचना मेरे मन मष्तिष्क में आज भी राज करती है )
उनका जन्म 16-08-1904 को नागपंचमी के दिन इलाहाबाद  के निकट निहालपुर नामक गांव में रामनाथसिंह के जमींदार परिवार में हुआ था। आपकी शिक्षा क्रास्थबेट गर्ल्स स्कूल में शिक्षा पाई। बाल्यकाल से ही सुभ्रद्राकुमारी जी में देशभक्ती और राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी थी वे कविताएँ रचने लगी थीं। उनकी रचनाएँ राष्ट्रीयता की भावना से परिपूर्ण हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान, चार बहनें और दो भाई थे। उनके पिता ठाकुर रामनाथ सिंह शिक्षा के प्रेमी थे और उन्हीं की देख-रेख में उनकी प्रारम्भिक शिक्षा भी हुई। 1919 में खंडवा के ठाकुर लक्षमण सिंह जी वकील  के साथ विवाह के बाद वे जबलपुर आ गई थीं। 1920 में गांघीजी के असहयोग आंदोलन  में भाग लेने वाली वह प्रथम महिला थीं। वे दो बार जेल भी गई थीं। सुभद्रा कुमारी चौहान विवाह के पश्चात सक्रिय राजनीति में भाग लेने लगीं। सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। इसेहंस प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है। वे एक रचनाकार होने के साथ-साथ स्वाधीनता संग्राम की सेनानी भी थीं। डॉo मंगला अनुजा की पुस्तक सुभद्रा कुमारी चौहान उनके साहित्यिक व स्वाधीनता संघर्ष के जीवन पर प्रकाश डालती है। साथ ही स्वाधीनता आंदोलन में उनके कविता के जरिए नेतृत्व को भी रेखांकित करती है। देशभक्ति के लिए एक मील का पत्थर बन चुके झांसी की रानी कविता को किसने नहीं पढ़ा होगा, हमारा बचपन इसे पढ़कर जोश से भर जाता था, आज इसी देशभक्ति की कविता की रचयिता सुभद्रा कुमार चौहान की जयंती है। जिनके संरक्षक माखनलाल चतुर्वेदी जैसे को पाकर इनकी राष्ट्रभक्ति की भावना को लगातार बल मिलता रहा । 
उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था और एक से बढ़कर एक राष्ट्रवादी कविताएं लिखीं। हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी प्रसिद्धि झाँसी की रानी(कविता) के कारण है। ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं, किन्तु इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया। वातावरण चित्रण-प्रधान शैली की भाषा सरल तथा काव्यात्मक है, इस कारण इनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है। भारत में प्रथम महिला कवि सम्मेलन मे सुभद्रा कुमारी चौहान जी अध्यक्ष रहीं उसमें अन्य कवित्रियों मे महादेवी वर्मा जी भी थी। इस महान विभूती की मृत्यू के पश्चात स्मारक बनाए जाने पर इस बचपन की सहेली महादेवी वर्मा जी ने अपनी भरी आँखों से..बोली ”कि नदियों के स्मारक नहीं होते ।दीपक की लौ सोने से नहीं मढी जाती । सुभद्रा जी की यशगाथा भी शब्दो में नहीं समेटी जा सकती।” इसी प्रकार से महादेवी जी ने सुभद्रा कुमारी चौहान को याद करते हुए न्होंने लिखा है-“अजगर की कुंडली के समान स्त्री के व्यक्तित्व को कस-कसकर चर-चर कर देनेवाले अनेक समाजिक बंधनों को तोड़ फेंकने में उनका जो प्रयास लगा होगा , उसका मूल्यांकन संभव नहीं है।” इस लंबें वाक्य-विन्यास पर विचार करने पर , अजगर की कुंडली, कस-कसकर और चर-चर के प्रतीकों की घ्वनि-बिंबों के सहारे तत्कालीन नारी  की जिस स्थिति को उजागर किया गया है. उसमें महादेवी का अपना आक्रोश है। यह भाषा का आक्रोश नहीं , आक्रोश की भाषा है। सुभद्रा जी के जीवन काल में 1904 से 1948 तक जिस परिवेश मे कविता का सृजन हो रहा था वह निश्चित ही अग्निवर्षा तथा उथल-पुथल मचाने वाले कवियों का रहा। परंतु सके बावजूद बी सुभद्रा जी की कविताओं में सहज-सरल पारिवारिक और राष्ट्रीय कविताएं डूबती-उतरती रही। सुभद्रा जी ने कुछ एक कविताओं को उस दौर का हम छोड़ दे तो पारिवारिक कविताओं के लेखन का प्रथम प्रयास सुभद्रा जी के व्दारा ही किया गया साथ ही राष्ट्रीय कविताएं भी अपने ढ़ग की अलग और बेजोड़ है। इनकी विशेषताओं में राष्ट्रीय संग्राम में कुदकर भी परिवार से बंधी रही। इसलीए नमें गहन मानवीय प्रेम है, संयम है, व्यवस्था है। प्रणय-कविताएं भी पारिवारिक बंधन के कारण एक अलग स्वाद रखती है। उनकी कविताओं में वात्सल्य-सुख स्त्री का सबसे बड़ा सुख होता है । स्वयं उनकी अनुभूति है। अतः उनकी ऋजुता हृदय को सीधे प्रभावित करती हैः-
मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी
नन्दनवन-सी फूल उठी, यह छोटी सी कुटिया मेरी
‘माँ ओ’ कह कर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी,
कुछ मुँह में, कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने आई थी
मैंने पूछा ‘यह क्या लाई?’ बोल उठी वह ‘माँ, खाओ !’
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैंने कहा ‘तुम्हीं खाओ !’   
दुर्भाग्यवश मात्र 43 वर्ष की अवस्था में एक हादसे में इनकी मृत्यु हो गई। उनकी प्रमुख रचनाओं में कविता-संग्रह ‘मुकुल’, कहानी संग्रह ‘बिखरे मोती’, ‘सीधे-सादे चित्र और ‘चित्रारा शामिल है। ‘झाँसी की रानी’ उनकी इतनी बहुचर्चित रचना रही कि उसने समय और देश की सीमाओं को लांघ दिया। इस रचना को हमेशा अन्क्षकीरी में बहुत स्थान मिलता था। राष्ट्रीयता की भावना का ऐसा समावेश था की सबके रोंगटे खड़े कर देता था। “वीरों का बसंत” और “बालपन” शीर्षक की कविता भी अत्यंत मधुर और मर्मस्पर्शी हैः-
‘भूषण अथवा कवि चन्द्र नहीं,
बिजली भर दे वह छंद नहीं ।
है कलम बंधी, स्वछन्द नहीं,
फिर हमें बतावे कौन हन्त ।
बीरों का कैसा हो बसंत ।‘ 
सुभ्रद्रा जी की कविताएँ, परिवार और देश को लेकर चली हैः-
‘जो कहते रूकती है जवान, मैं कैसे तुमसे कहूँ रहो ।‘
‘खूनी भाव उसके प्रति, जो हो प्रिय का प्यारा,
 उसके लिए हृदय यह मेरा बन जाता हत्यारा ।‘
“पूजा और पुजापा प्रभु इसी पुजारन को समझो ” मे कैसी भारतीय नारी के आत्म समर्पण की भावना है।
सुभ्रद्रा जी की कविता में माधुर्य है। हृदय को मंत्र-मुग्ध कर अलौकिक आनंद की प्राप्ति कराता है। इसमें भाषा की स्वछन्दता है। उनकी भाषा अलंकारों से मुक्त है। उन्होंने नवीन छंदों को ही अपनाया है। राष्ट्रीयता का संदेश ही सुभ्रद्रा जी की कविता का लक्ष्य रहा है। 

                                                                                                         

कथा साहित्य—‘बिखरे मोती’ उनका पहला कहानी संग्रह है। इसमें भग्नावशेष, होली, पापीपेट, मंझलीरानी, परिवर्तन, दृष्टिकोण, कदम के फूल, किस्मत, मछुये की बेटी, एकादशी, आहुति, थाती, अमराई, अनुरोध, व ग्रामीणा कुल 15 कहानियां हैं। इन कहानियों की भाषा सरल बोलचाल की भाषा है। अधिकांश कहानियां नारी विमर्श पर केंद्रित हैं।उन्मादिनी शीर्षक से उनका दूसरा कथा संग्रह1934 में छपा। इस में उन्मादिनी, असमंजस, अभियुक्त, सोने की कंठी, नारी हृदय, पवित्र ईर्ष्या, अंगूठी की खोज, चढ़ा दिमाग, व वेश्या की लड़की कुल 9 कहानियां हैं। इन सब कहानियों का मुख्य स्वर पारिवारिक सामाजिक परिदृश्य ही है। 'सीधे साधे चित्र' सुभद्रा कुमारी चौहान का तीसरा व अंतिम कथा संग्रह है। इसमें कुल 14 कहानियां हैं। रूपा, कैलाशी नानी, बिआल्हा, कल्याणी, दो साथी, प्रोफेसर मित्रा, दुराचारी व मंगला -8 कहानियों की कथावस्तु नारी प्रधान पारिवारिक सामाजिक समस्यायें हैं। हींगवाला, राही, तांगे वाला, एवं गुलाबसिंह राष्ट्रवादी भावनाओं से ओत-प्रोत सुभद्रा कुमारी चौहान ने लगभग 88 कविताएँ और 46 कहानियाँ लिखी हैं। अपनी व्यापक कथा दृष्टि से वे एक अति लोकप्रिय कथाकार के रूप में हिन्दी साहित्य जगत में सुप्रतिष्ठित हैं। उनकी कविताएँ ‘मुकुल’ और ‘त्रिधारा’ में संग्रहीत हैं। ‘बिखरे मोती’, ‘उन्मादिनी’ और ‘सीधे-सादे चित्र’ उनके कहानी-संग्रह हैं। ‘झाँसी की रानी’, ‘वीरों का कैसा हो वसंत’, ‘यह कदंब का पेड़’ आदि उनकी प्रसिद्ध कविताएँ हैं जो युगीन सीमा को पार कर आज भी अत्यंत लोकप्रिय बनी हुई हैं।

•    सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
 दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। 

•    यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥ 

•    मुझे छोड़ कर तुम्हें प्राणधन
सुख या शान्ति नहीं होगी 
यही बात तुम भी कहते थे 
सोचो, भ्रान्ति नहीं होगी।
सुभद्राकुमारी चौहान के संबंध में मुक्तिबोध ने कहा है-‘‘सुभद्राकुमारी चौहान के साहित्य में जो स्वाभाविक प्रवाहमयी सरलता है और जो अहेतुक गंभीर मुद्रा का खटकता सा लगनेवाला अभाव है, उसका कारण है जीवन के उस मौलिक उद्वेग का राग, जिसने समाज में भिन्न-भिन्न रूप धारण किए। राष्ट्रीय आंदोलन उसका एक रूप था, उसकी एक अभिव्यक्ति थी। स्त्रियों की स्वाधीनता का प्रश्न उसका दूसरा रूप था और पतित जातियों का उत्थान तीसरा। ...कुछ विशेष अर्थों में सुभद्रा जी का राष्ट्रीय काव्य हिंदी में बेजोड़ है। क्योंकि उन्होंने उस राष्ट्रीय आदर्श को जीवन में समाया हुआ देखा है, उसकी प्रवृत्ति अपने अंतःकरण में पाई है, अतः वह अपने समस्त जीवन-संबंधों को उसी प्रवृत्ति की प्रधानता पर आश्रित कर देती हैं, उन जीवन संबंधों को उस प्रवृत्ति के प्रकाश में चमका देती हैं। ...सुभद्रा कुमारी चौहान नारी के रूप में ही रहकर साधारण नारियों की आकांक्षाओं और भावों को व्यक्त करती हैं। बहन, माता, पत्नी के साथ-साथ एक सच्ची देश सेविका के भाव उन्होंने व्यक्त किए हैं। उनकी शैली में वही सरलता है, वही अकृत्रिमता और स्पष्टता है जो उनके जीवन में है।''

सम्मान— सेकसरिया पारितोषिक (1931) 'मुकुल' (कविता-संग्रह) के लिए
सेकसरिया पारितोषिक (1932) 'बिखरे मोती' (कहानी-संग्रह) के लिए (दूसरी बार) 
भारतीय डाकतार विभाग ने  6 अगस्त1976 को सुभद्रा कुमारी चौहान के सम्मान में 25 पैसे का एक डाक-टिकट जारी किया है।
भारतीय तटरक्षक सेना ने28 अपैल2006 को सुभद्राकुमारी चौहान की राष्ट्रप्रेम की भावना को सम्मानित करने के लिए नए नियुक्त एक तटरक्षक जहाज़ को सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम दिया है। महाप्रयाण 15-02-1948 (मात्र 44 वर्ष की आयु) एक कार दुर्घटना में मध्यप्रदेश की सिवनी के पास उनका आकस्मिक निधन हो गया था। कोटिशः नमन के साथ विनम्र श्रध्दांजलि।

चिरंजीव 
लिंगम चिरंजीव राव 
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)