सोनम वांगचुक! द्रोही, विद्रोही या राष्ट्रद्रोही? नायक से खलनायक?
राजीव खंडेलवाल (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास)
सोनम वांगचुक! द्रोही, विद्रोही या राष्ट्रद्रोही?
नायक से खलनायक?
भूमिका
जंतर-मंतर पर चल रहे सोनम वांगचुक के के चलते अनशन जहां उन्हें सफरगंज हास्पिटल में शिफ्ट कर दिया गया। सोशल मीडिया में उनके विरोधियों द्वारा जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दिनांक 28 फरवरी 2007 का सोनम को लिखा एक पत्र वायरल किया जा रहा है। जहां यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि कांग्रेस की सरकार ने ही सोनम वांगचुक को उक्त नोटिस के द्वारा चीन और अन्य दूसरी जगह पर उन्हें राष्ट्र विरोधियों के साथ संबंध के आरोप लगाये थे। मतलब यह आरोप भाजपा का नहीं बल्कि कांग्रेस का था। यह केवल अर्द्ध सत्य ही है। अर्द्ध सत्य झूठ से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। मैने अक्टूबर 2025 में उनकी गिरफ्तारी (राष्ट्रद्रोही/नजरबंदी) होने पर लेख लिखा था जो आज बिलकुल सामयिक है जिसमें सोनम वांगचुक की स्थिति क्या है? आईने के समान साफ हो जायेगी।
द्रोही-विद्रोही अथवा देशद्रोही ?
‘‘द्रोही’’ वह है, जो सत्य और न्याय का विरोध करता है
‘‘विद्रोही’’ वह है, जो ‘‘कुशासन और अन्याय’’ के विरुद्ध ‘‘संगठित प्रतिरोध’’ करता है। भले ही उसमें अस्थिरता या हिंसा की आशंका क्यों न हो।
‘‘देशद्रोही’’ वह है, जो राष्ट्र के प्रति गद्दारी और ‘‘विश्वासघात’’ करे
सोनम वांगचुक को सरकार या लद्दाख के आंदोलनकारी किस ‘‘श्रेणी’’ में रखती है, यह अलग बात है। लेकिन सही श्रेणी ‘‘कौन’’ सी है- इसका निर्णय जरूर तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। आखिर तथ्य क्या कहते हैं?
‘‘ सोनम वांगचुक ‘‘अनमोल रत्न’’ से ‘‘देशद्रोही’’ तक का सफर ?
सोनम वांगचुक सिर्फ एक आंदोलनकारी ही नहीं, बल्कि शिक्षक, इंजीनियर, पर्यावरणविद् और समाज सुधारक भी हैं। लद्दाख की शिक्षा, ऊर्जा और जलवायु संरक्षण के क्षेत्रों में उनके नवाचारों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनका व्यक्तित्व प्रेरणादायक और सामाजिक बदलाव के प्रति समर्पित है। संक्षिप्त प्रमुख विशेषताएं निम्न है।
1. नवाचारः लद्दाख में पानी की कमी को दूर करने के लिए ‘‘आइस स्टूपा’’ तकनीक विकसित की। सौर ऊर्जा से संचालित सोलर हीट टेंट (सेना को ठंड से बचाने हेतु क्रांतिकारी कदम)।
2. शिक्षा सुधारकः SECMOL (स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख), ऑपरेशन न्यू होप-लद्दाख की “शिक्षा क्रांति” का प्रतीक।
3. पर्यावरणविदः जलवायु परिवर्तन पर गहन निरंतर कार्य।
4. सामाजिक नेतृत्व: लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (LAHDC) , लेह एपेक्स बॉडी (स्।ठ) और स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर ‘‘स्वायत्तता’’ व संविधान की छठवीं सूची में शामिल करने की मांग। उनकी सादगी, करिश्माई नेतृत्व और अहिंसावादी गांधीवादी दृष्टिकोण ने उन्हें प्रेरणादायी व्यक्तित्व बनाया। उन्हें 17 राष्ट्रीय (जिसमें राज्य व केंद्रीय सरकार के पुरस्कार भी शामिल है) और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं, जिनमें प्रमुख हैं।:- रैमन मैग्सेसे पुरस्कार (2018)ः सामुदायिक विकास व शिक्षा सुधार। इ रोलेक्स अवार्ड फॉर एंटरप्राइज (2016)ः आइस स्टूपा परियोजना। किंतु, जैसा कहा गया है-“मोर के सुंदर ‘‘पंख’’ ही उसकी मौत का कारण बनते हैं।” वांगचुक की ये उपलब्धियाँ व प्रभामंडल ही आज उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की राह के सबसे बड़ा ‘‘रोड़ा’’ बनती साबित हो रही हैं।
‘ प्रशासन के प्रमुख आरोप एवं प्रत्युत्तर ’’
1. 24 सितम्बर 2025 को लेह में प्रदर्शन हिंसक हो उठे। बीजेपी कार्यालय और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया, चार मौतें हुईं, 80 घायल हुए। प्रशासन ने आरोप लगाया कि सोनम के उत्तेजक वक्तव्य जो नेपाल आंदोलन, अरब स्प्रिंग, तिब्बती आत्मदाह के संदर्भ में थे, ने युवाओं (ळमद ळ) को उकसाया, जिससे हिंसा भड़की। दरअसल ‘‘सच कहना ही आधी लड़ाई मोल लेना है’’। सोनम ने सिर्फ तथ्य कहकर उजागर किया।
2 .शांति बहाली में विफलताः प्रशासन के अनुसार, हिंसा के समय वे भीड़ को शांत करने में असफल रहे। जबकि तथ्य यह है कि सोनम के भाषणों में हिंसा भड़काने का एक भी प्रमाण नहीं मिला। उलटे, उन्होंने हिंसा की निंदा करते हुए वीडियो जारी कर शांति की अपील के साथ अनशन तुरंत समाप्त किया। वैसे देश में कितने हिंसक आंदोलन हुए हैं, उनके नेताओं के विरुद्ध ‘‘एनएसए’’ के अंतर्गत कार्रवाई की गई? यहां पर तो वर्ष 2019 से शांतिपूर्ण आंदोलन चल रहा था जिसमें दिल्ली तक की पदयात्रा की जाकर दिल्ली में सभा करने की भी अनुमति नहीं मिली थी।
3. लेह जिला दंडाधिकारी द्वारा जारी सूचना पत्र के पॉइंट नम्बर 04 में यह आरोप लगाया गया कि आप चीन व अन्य स्थानों में राष्ट्र-विरोधी संबंध रहे है जिनका उपयोग राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए किया गया है। जवाब में इसे मनगंढत बतला जाकर तथाकथित कोई हानिकारक गतिविधियों का एक भी विवरण पेश नहीं किया जाना कथन किया गया। वर्ष 2013 में न्यायालय ने सोनम के आरोपों से मुक्त कर दिया था। 2020 में गलवान घाटी की झड़प के बाद सोनम ने ‘‘चीनी उत्पाद के बहिष्कार’’ की अपील की थी।
4. विदेश संबंधः लद्दाख डीजीपी ने सोनम की पाकिस्तान यात्रा को संदिग्ध बताकर जांच चलने की बात कही। जबकि तथ्य यह है कि पाकिस्तान की मीडिया हाउस ‘‘डॉन ग्रुप’’ द्वारा ‘‘जलवायु परिवर्तन सम्मेलन’’ में सोनम वांगचुक को फरवरी 2025 में बुलाया गया था। सरकार से अनुमति ‘‘वीजा’’ प्राप्त करके ही सोनम पाकिस्तान गये थे। जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जलवायु पहलों की सराहना की थी। सोनम की पत्नी ने पाकिस्तान अधिकारी से संपर्क से स्पष्ट इंकार किया है।
5. ‘‘वित्तीय अनियमितताओं के आरोप।‘‘असत्य व तथ्यहीन’’।’ SECMOL का FCRA लाइसेंस रद्द किया गया। आरोप-विदेशी फंड का दुरुपयोग और रिपोर्टिंग उल्लंघन। परंतु वास्तविकता यह है कि ‘‘खाद्य संप्रभुता’’ और सुरक्षा पर अध्ययन हेतु प्राप्त स्वीडिश फंड को गृह मंत्रालय ने “राष्ट्रीय संप्रभुता” से जोड़कर ‘‘एफआरसीए’’ की धारा 12(4) के अंतर्गत उसे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध मानकर झूठा रंग दे दिया गया। सीबीआई जांच जारी है। कहते हैं कि ‘‘झूठ के पाँव नहीं होते’’ और ‘‘सच की जड़ पाताल तक गहरी होती है’’। वैसे सोनम की पत्नी ने सोशल मीडिया में प्रत्येक आरोप का विस्तृत जवाब दिया है और गिरफ्तारी को उच्चतम न्यायालय में चुनौती भी दी है।
इसी प्रकार सोशल मीडिया पर चल रहे गंदी व झूठे प्रचार की ‘‘सत्यता’’ को भी जान लीजिये-
1. रेबेका नॉर्मन उनकी पत्नी नहीं, बल्कि छळव् की सह-संस्थापक हैं। वांगचुक की पत्नी का नाम ‘‘गीतांजलि के अंग्मो’’ है, जो लद्दाख की मूल निवासी हैं व हिमालयन इंस्टीट्यूट आफ अल्टरनेटिव लद्दाख संस्था की को-फाउंडर है।
2. यह आरोप भी असत्य है कि उन्हें अधिकांश पुरस्कार मनमोहन सिंह सरकार के समय मिले। वास्तविकता यह है कि कुल 17 पुरस्कार में से 12 पुरस्कारों 2014 के बाद प्राप्त हुए।
‘‘ भाजपा को आत्मावलोकन की आवश्यकता ’’
सबसे महत्वपूर्ण चिंताजनक पहलू यह है कि सोनम वांगचुक की ‘‘एनएसए’’ में गिरफ्तारी उस पार्टी की सरकार ने की है, जिसने जयप्रकाश नारायण के ‘‘संपूर्ण क्रांति’’ के आंदोलन के ‘‘तप’’ से निकलकर अपनी आंदोलनात्मक पहचान बनाई है। वर्ष 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस ने ऑल इंडिया रेलवे मेंस यूनियन के बैनर तहत देश के इतिहास की सबसे लंबी देशव्यापी हड़ताल की थी और जयप्रकाश नारायण ने ‘‘संपूर्ण क्रांति’’ के आंदोलन के दौरान पुलिस व सेना तक से सरकार के गलत, गैर कानूनी आदेशों को न मानने का आह्वान किया था। बावजूद तत्कालीन सरकार ने उन्हें “देशद्रोही” नहीं कहा। स्वयं न्यायपालिका की स्वतंत्रता तक कुचली गई। आपातकाल के दौर में हजारों जनसंघ कार्यकर्ता काले कानून ‘‘मीसा’’ में बंद रहने के कारण व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार के हनन के भूक्त-भोगी रहे। मैं स्वयं भी भुगतमान मीसा बंदी परिवार का सदस्य हूं। तब ‘‘जनसंघ’’ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। आज वही पार्टी (जनसंघ से जनता पार्टी होते हुए भाजपा) यदि स्वयं एक नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अनावश्यक प्रहार करती दिखे, तो यह आत्मघाती कदम होगा।
‘‘ आपातकाल की ज्यादतियां ’’
आपातकाल में ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को कुचला गया था, जिससे जनसंघ लड़ी। ‘‘कमिटेड जुडीशियल’’ मतलब ‘‘हाकिम वही जो सरकार के मन भाये’’ यानी ‘‘ठकुर सुहाती’’ के लिये प्रतिबद्ध हो’’, का नारा लगाने वाले वाली ज्यूडिशरी की हालात आपातकाल के समय इतनी खराब थी कि, ‘‘मीसा व डीआईआर’’ के अंतर्गत गिरफ्तारी से बाहर आने के लिए ‘‘बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका’’ (हैबियस कॉरपस) को एडीएम जबलपुर वि. शिवाकांत शुक्ला में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 4-1 के बहुमत से जस्टिस खन्ना के ‘‘असहमति स्वर’’ के साथ ‘‘वैध’’ तक घोषित कर दिया था। इस कारण सरकार ने उन्हें ‘‘सुपरसीड’’ कर उनके कनिष्ठ सहयोगी एम एच बेग को चीफ जस्टिस बना दिया था। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संवैधानिक पीठ, जिसमें जस्टिस डी वाय चंद्रचूड़ शामिल थे (जिनके पिता जस्टिस वाय वी चंद्रचूड़ जो उच्च न्यायालय के बहुमत के निर्णय में शामिल थे) ने ‘‘के एस पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ’’ के मामले में उच्च न्यायालय के 1976 के निर्णय को पलट कर यह ऐतिहासिक रूप से निर्णीत किया कि आपातकाल में मौलिक अधिकारों के निलम्बन के बावजूद व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बिना उचित प्रक्रिया के छीना नहीं जा सकता है।
‘‘ भुगतमान’’ भाजपा! ज्यादतियां भूली ’?’
कहने का मतलब यह है कि ‘‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’’ का मूल्य क्या होता है, और ‘‘हथकड़ी सोने की हो तो भी बुरी है’’, यह बात भारतीय जनता पार्टी से अच्छा कौन जान- समझ सकता है? इसलिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की ‘‘रक्षक’’ भाजपा, ‘‘भक्षक’’ कांग्रेस से बेहतर है, भाजपा को हमेशा यह सिद्ध करते रहना ही होगा। अन्यथा ‘‘खुदा न खास्ता’’ धोखे से भी ‘‘हंसा थे सो उड़ गये, कागा भये दीवान’’ की स्थिति आ गयी। यानी, यदि कांग्रेस कभी सत्ता में आ गई तो, वह किस तरह का बदला हमारे आने वाली ‘‘निर्दोष’’ पीढ़ी से लेगी, इसकी कल्पना आपातकाल के अत्याचार को देखकर आसानी से की जा सकती है। सतर्कता बरतने के साथ आत्मावलोकन करने वाला है।
‘‘ निष्कर्ष’ ’
सोनम वांगचुक एक ‘‘शांतिप्रिय विद्रोही राष्ट्रवादी’’ है, जो अपने क्षेत्र और पर्यावरण के अधिकारों के लिए पिछले कई सालों से संघर्षरत है। वांगचुक का मामला भाजपा के लिए चेतावनी नहीं, बल्कि ‘‘देशहित’’ में गंभीर सतर्कता बरतने वाला है। कहीं वह “गले की हड्डी” न बन जाए? अन्यथा यह पार्टी के सिद्धांतों और भविष्य दोनों को ‘‘मर्माहत’’ कर सकता है। एक ‘‘परसेप्शन’’ बनाने का जो प्रयास किया जा रहा है कि देश में ‘‘अघोषित आपातकाल’’ चल रहा है, जो यद्यपि गलत है, तथापि भाजपा को उसे कार्यो से रोकना होगा। चलते-चलते. सोनम वांगचुक ने 19 तारीख की रात्रि को एक लिखित पत्र लिखा जो आज सुबह सार्वजनिक हुआ, में तीन बातों के साथ मुख्य हड़ताल समाप्त करने की बात कही है। प्रदर्शनकारियों की सुबह 11.50 बजे सीजेपी डेलिगेशन से जे पी नड्डा से मुलाकात हुई और आज 4.30 बजे मांग की लिखित याचिका दी गई जिसमें जवाब में धर्मेन्द्र प्रधान की इस्तीफे की बात दोहराई गई है। देखिये आगे क्या होता है......।


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