सावित्रीबाई फुले जन्म-03-01-1831 जयंती-03-01-2025
सावित्रीबाई फुले जन्म-03-01-1831 जयंती-03-01-2025
“मैनें लड़की बन किताब उठाई तो धर्म कांप गया परंपरा चिल्लाई मैं चुप नहीं रही मैनें कहा तुम्हारा डर मेरी ताकत बनेगा।”
“किसी समाज या देश की प्रगति तब तक संभव नहीं जब तक कि यहाँ कि महिलाएं शिक्षित न हो।” “स्त्रियां केवल घर और खेत पर काम करने के लिए नहीं बनी है वह पुरूषों से बेहत्तर कार्य कर सकती है।” सावित्रीबाई फुले देश की आजादी के 116 साल पहले जन्म लेने वाली महिला के विचारों मे जिन दूरदर्शिता के गुणों का समावेश रहा वह उनकी उक्त बातों से अवगत हो जाती है, साथ ही महिला के ऐसे विचारों का संधर्ष जिन्होंने देखा होगा वह समय निश्चित ही कैसा रहा होगा कल्पना मात्र से सिहरन होती है। ऐसी प्रखर महिला का जन्म उस दौर की एक महान उपलब्धि रही। सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सातारा जिले के नायगांव में पिता खन्दोजी नैवसे पाटिल और माता लक्ष्मीबाई के घर मे दिनाँक 03-01-1831 को हुआ था। बचपन से ही बहुत जिज्ञासु और महत्वाकांक्षी थी। जीवन के संधर्ष के व उस समय की सामाजिक परिस्थियों के विषय में हम सभी जानते है। जब जाति, धर्म के मामले में जिस तरह से हमारी सामाजिक व्यवस्था के कारण समाज के ऐसे वर्ग ने कठिनाईयों का सामना करते हुए अपना जीवन जिया। सावित्रीबाई फुले के जीवन में बचपन से ही संधर्ष जारी रहा , वह दौर नारी के प्रति जिस तरह क भेदभाव से गुजर रहा था। वह सब कुछ सावित्रीबाई के जीवन के अनुभवों को एक असहनीय पीड़ा से भरता जा रहा था। उनके साथ भी वह सब कुछ होता रहा जो उस दौर की बालिकाओं के साथ चल रहा था। बालिका का स्कूल जाना समाज में प्रचलन में नहीं था जिस कारण उनको भी स्कूल जाने में इतना विरोध सहना पड़ा की बहुत बार बहुत अपमानित व कटु वचनों का सामना घर व घर के बाहर के लोगों से सुनने पड़ते थे। मात्र 9से10 वर्ष की आयु के मध्य में उनका विवाह 1841 में ज्योतिराव फुले जी से हो गया जो एक स्वतंत्र विचारो के व्यक्ति थे उस समय उनकी उम्र भी मात्र 13 वर्ष की थी। इस विवाह का असर यह हुआ की ज्योतिराव फूले जी एक सुलझे विचारों के व्यक्ति थे और स्वयं एक महान समाज सुधारक थे उन्होंने अपने जीवन में समाजसुधार के कई आंदोलनो में महाराष्ट्र और देश में अग्रणी रहते हुए संधर्षरत होने के कारण सावित्री जी भी उनके साथ कंधे से कधा मिलाकर साथ देती रहती थी। इस के पश्चात ज्योतिराव फुले के सहयोग से उनकी शिक्षा को आगे बढ़ाने में सरलता हुई और यह जारी रहा वे न सिर्फ उनकी शिक्षा के प्रति सावित्रीबाई को प्रेरित करते बल्कि उनके माध्यम से अन्य महिलाओं को भी शिक्षा ग्रहण करने की बात कहा करते थे इस कार्य में वे सावित्रीबाई का सहयोग लेते रहे। उनके जीवन में उनकी सबसे बहुमूल्य चीज उन्हें एक ईसाई धर्मप्रचारक व्दारा दी गई पुस्तक थी। उनके सीखने की चाह से प्रभावित होकर ज्योतिराव फुले ने सावित्रीबाई के पड़ना-लिखना सिखाया । सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणें में शिक्षक बनने का प्रशिक्षण लिया । वह 1847 में अपनी चौथी परीक्षा उतीर्ण करने के बाद एक योग्य शिक्षक बनीं। कष्टकारी वैवाहिक जीवन के हर दौर को सहजता के साथ जीते हुए उनके जीवन में गोद लिए पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम यशवंत फुले था जो एक विधवा का पूत्र था बाद में वह डॉक्टर बना जिसे उन्होंने गोद लिया था । इस तरह इनके वैवाहिक जीवन के साथ उनके सामाजिक उदेश्य का दौर जारी रहा। स्त्रियों के लिएः-
स्त्रियों को
न देवी मानने की जरूरत और न पूजने की ,
बल्कि स्त्री का सम्मान करना और
बराबरी का अधिकार देना जरूरी है। ----- सावित्रीबाई फुले


सावित्रीबाई फुले जी को उनके पति के रूप में एक गुरू, संरक्षक और समर्थक का मिलना उनके जीवन में अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने के उनके संधर्ष के कई आयामों में समाज सुधारक की भूमिका का निर्वाह करने के लिए प्रेरित होती रही। उनकी यात्रा की कठिनाईयों पर नजर डाले तो बहुत से असहनीय बर्ताव से जूझते हुए देखा गया, विद्यालय जाते समय उन्हें गालियां दी जाती थी और उन पर गोबर फेंका जाता था. लेकिन सावित्रीबाई कभी विचलित न होते हुए उसके लिए अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जाया करती थी. उसे पहनकर अपने मार्ग पर आगे बढ जाती थी। इसी क्रम में उनको पिछड़े वर्गो को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह जीया जिसमें उन्होंने विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और महिलाओं को शिक्षित बनाना आदि। पढाई व जाति बंधन के महत्व के प्रति
भावना-
स्वाभीमान से जाने के लिए पढ़ाई करो। ----- सावित्रीबाई फुले
जाओ जाकर पढ़ो –लिखो
बनो आत्मनिर्भर बनो मेहनती
काम करो और ज्ञान इकटठा करो
ज्ञान के बिना सब खो जाता है
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है
इसलिए खाली न बैठो और जाकर शिक्षा लो
तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है
इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ो।--------- सावित्रीबाई फुले
इसके लिए उन्होंने अपने जीवन को शिक्षा को समर्पित करते हुए पहली बालिका विद्यालय की प्राचार्या बनी और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थी। सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों और समाज के बहिष्कृत हिस्सों के लोगों को शिक्षा प्रदान करने में अग्रणी भूमिका निभाई। वह भारत की पहली अध्यापिका बनीं(1848) और उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले जी के साथ मिलकर लड़कियों के लिए पुणे के विजयवाड़ा में पहला स्कूल खोला। यह स्कूल बहुत कठिन दौर से गुजरते हुए अपना कार्य जारी रखा, वहाँ की परिस्थितियों से संधर्ष करते हुए 10 वर्ष में एक स्कूल बंद करना पड़ता तो दूसरा खुलता यह क्रम 18 स्कूल खुलने बंद होने तक चलता रहा। इस स्कूल की पहली महार जाति की बालिका मुक्ता सालवे 14 वर्ष (15 फरवरी 1855) का एक निबंध प्रसंग-“ ब्रह्मण लोग कहते है कि अन्य जाति के लोगों को वेद नहीं पड़ना चाहिए। सका मतलब ये हुआ कि हमारे लिए कोई धर्मग्रंथ नहीं है. तो क्या फिर हम धर्म-रहित है? हे भगवान हमें बतलाओं हमारा धर्म कौन सा है? अंग्रेजों के ने पहले ये ऊँची जाति के लोग हमसे जरा सा अपराध होने पर हम महार-माँग जाति के लोगों की गरदन छाँट देते थे। हमें गुलटेकड़ी के बाजार में घुमने की आजादी भी नहीं थी वो जादी हमें मिल गई है। ” जैसी सशक्त महिलाओं को तैयार किया यह फुले दंपत्ति की देन थी उनकी शिक्षा के प्रति एक अंग्रेज के विचार से यहाँ तो ब्राहमणों व अंगेजों के स्कूलो से भी अच्छी शिक्षा दी जाती है एक खुली प्रतियोगिता के धार पर मेजर कैंड़ी के विचार । भारत में विधवाओं की दूर्दशा से सहानुभूति रखते हुए सावित्रीबाई ने 1854 को उनके लिए एक आश्रय स्थल खोला,जो बेसहारा स्त्रियों, विधवाओं और बालिका वधुओं इसके बाद उन्होंने परिवार से निकाली गई बेसहारा स्त्रियों के लिए एक आश्रय स्थल की स्थापना(1864) की सभी को शिक्षित भी किया। सभी वर्गो की समानता के लिए संधर्ष करने वाले अपने पति ज्योतिराव फुले के धर्मसुधारक संस्थान सत्यशोधक समाज(1873)का विकास करने मे अहम भूमिका निभाते हुए अपने मिशन को बनाए रखा। गाँवों में दलित वर्गो के लिए सार्वजनिक कुएं से पानी पीने की मनाही का परिणाम स्वरूप पने घर के पिछे एक कुआँ खोदा। इस कदम से 1868 में एक भयानक आक्रोश उत्पन्न हो गया। यह सब यहीं तक नहीं रूका समाज के साथ लगातार ऐसे संधर्ष का चरम उनके पति की मृत्यु पर उनकी चिता को उन्होंने स्वयं अग्नि दी। सभी तरह से समाज के प्रति समर्पित रहते हुए बहुत कुछ नारी के जीवन में सुधार के अनेक पहलुओं पर उनका योगदान आज भी याद किया जाता है। उनका जीवन भारत में स्त्रियों के अधिकारों का प्रकाश स्तंम्भ माना जाता है और उन्हें अक्सर भारतीय नारी आंदोलन की जननी के रूप में जाना जाता है और निश्चित ही यह पूर्णतः सही भी है। एक कवियत्री के रूप में इनका साहित्य के प्रति रूचि का परिचय उनके दो काव्य संग्रहों से मिलता है ये क्रमशः
(1)काव्य फुले(18540
(2)बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर(1891)
दोनों ही कविता संग्रह मूलतः ज्योतिबा फुले संदर्भित है जिनमें प्रथम मे अपने पति ज्योति जी के प्रति अपना प्रमपूर्वक कृतज्ञता का विवरण मिलता है। दूसरी को जीवनी का एक सार्थक प्रमाणिक प्रयोग सत्य व काल की कसौटी खो घ्यान में रखकर लिखा गया कहा जा सकता है जो कविता के माध्यम से जीवनी का लेखन है। संक्षेप में पहली कविता संग्रह-(काव्य फुले) में 41 कविताएँ ,,विषयवार इन कविताओं को मराठी के प्रसिध्द लेखक डॉ मा.गो.माली ने अपने सावित्रीबाई फुले समग्र वाङमय(मराठी) में सात वर्गो में रखा हैः-
(1) निसर्ग विषयक- कुल सात कविताएँ
(2) समाज विषयक-ग्यारह कविताएँ
(3) प्रार्थना विषयक-छःकविताएँ
(4) आत्मपरक-पाँच कविताएँ
(5) काव्य विषयक-दो कविताएँ
(6) बोधपरक-आट कविताएँ
(7) इतिहास विषयक-दो कविताएँ
इनका दूसरा काव्यसंग्रह बावन्नकशी का अर्थ बावन तोले खरा, बावन संख्या वास्तव में इस संग्रह में सम्मलित बावन पदों के सूचक है, ये पद छः शीर्षको के अन्तर्गत रखे गए है- उपोध्दात, सिध्दांत, पेशवाई, आंग्लाई, ज्योतिबा और उपसंहार। सावित्रीबाई फुले की कविताएँ औपनिवेशिक भारत में सामाजिक-धार्मिक जागरण की भूमिका की सूत्रधार का कार्य कर रही थी - गरीबो,दलितो और महिलाओं की आवाज बनी उनके अपने विचार अपनी लिखी कविताओं के प्रति लोगों का मत जानने के लिए लिखती हैः-
मेरी कविता को पढ-सुनकर यदि
थोड़ा भी ज्ञान हो जाए प्राप्त
मैं समझूगी मेरा परिश्रम सार्थक हो गया।
फिर पूछती है-
मुझे बताओ सत्य निडर होकर कि कैसी है मेरी कविताएँ
ज्ञानपरक, यथार्थ मनभावन या धभुत तुम ही बताओ ।.... सावित्रीबाई फुले
सावित्रीबाई फुले एक कवि के रूप में उनकी चिंताएं तात्कालिक से अधिक दूरगामी स्वरूप लिए रहती है. कल्पनाजीवी कविता के प्रति उनका मोह बिल्कुल भी नहीं। वे कहती है ये अघटित घटना का सर्जक बन जाता है। वास्तविकता के प्रति सजगता रखती है। पर दृष्टा कवि की प्रशंसा करती है,। मेरी जन्मभूमि-
मेरी जन्मभूमि
मुझे वंदनीय और दिल से प्यारी
मैं उसका गौरव गीत गाती हूँ।
बागों में कुएँ और लुभावने फल-फूल पौधे
पंछी गाते गीत मधुर
रंग-बिरंगी तितलियाँ मंडराती पूल-पौधो पर
साक्षात पकृति
चहल-पहल करती हर पल। (माझी जन्मभूमि)
उनके जीवन में अनेक प्रसंगो के साथ कटिनाईयों में बीता जीवन के प्रति कभी दुखी नहीं होती पर उस जीवन में जिनका सहयोग म्ला नके प्रति कृतज्ञता-बोध सावित्रीबाई के कवि-व्यक्तित्व का उल्लेकनीय पक्ष है। यह बोध न्हें पंपरा से जोड़ता भी है और लगाता बी है.। वे पुरखों का स्मरण करती है और बलिराजा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है। उन्होंनें सबसे ज्यादा कृतज्ञता ज्ञापित की वह है ज्योतिबा फुले,, यह नके लिके तीन पत्रों में है। पहले संग्रह की अर्पणिका में लिखती हैः- यह अर्पणिका ज्योतिबा के सभी सृजन हितकारियों के प्रति है-भावार्थ-
“मुझ पर सबका असीम स्नेह
महसूस कर हृदय भर आता
इतने अगाध स्नेह की मैं हकदार नहीं
आपके उपकारों और सहृदयता को पाकर
अर्पण करती हूँ अपनी काव्यमाला,.”
जिस दिन गुलामी का इतिहास लिखा जाना आरंभ होता है उस दिन गुलामी इतिहास बन जाती है। बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर संग्रहके उपोध्दात की तिम पंक्ति है-
“ कुलाची कथा गीत ग्रंथी लिही मी
गुलामी जनाचा इतिहास नामी ”
“अपने गीतों में
शुद्रों की गुलामी का इतिहास लिख रही हूँ “
एक कविता जिसका शीर्षक नवस(मन्नत)इसमें अंधविश्वास में जकड़ी जनता को देखकर दुःख व्यक्त किया है और इससे मुक्ति के लिए विवेकसंपन्न होने की आवश्यकता बतायी है-
“यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे
तो फिर नर नारी
नाहक शादी क्यों रचते
सावित्री कहे
विचार करो
जीवन सार्थक करो
विवेक संपन्न होकर।”
इनके जीवन को विस्तार से जानने के लिए उपलब्ध कुछ किताबों का अध्ययन उनके संधर्षो का इतिहास व अन्य बातों के लिए हमें आज बी जानने की जरूरत है। क्यों कि उनके जीवन ने आज भी लगभग 130 वर्षो के गुजर जाने के बाद भी प्रासंगिकता कम होने की बजाय रोज बढ़ती जा रही है। इस महान महिला का जीवन भारतीय स्त्रीवाद की भी पहली आवाज है। स्त्रीवादी होने का आशय है कि उस शोषणतंत्र को पहचानना जो स्त्री समुदाय को कमतर, हीनतर बनाए रखता है। इसका जवाब जब स्त्री मनसा-वाचा-कर्मणा से देकर निरस्त करती है। सावित्रीबाई के समय पति को नाम लेकर पुकारना, प्रेम का इजहार करना वर्जीत था। तब इस महिला ने अपनी अलग राह बनाकर सब कुछ किया।
एक लंबी सहनशील यात्रा का अंतिम पड़ाव वर्ष 1897 के दौरान पूरे महाराष्ट्र में आये बोबोनिया अर्थात गुल्टी प्लेग ने सभी के जीवन को कष्टदायक कर दिया इस दौरान सावित्रीबाई केवल दर्शक न बन कर उनके साथ मिलकर पिडितो के लिए पुणे के हड़पसर में एक अस्पताल का निर्माण करवा कर उनकी सहायता में जुट गई। इसी दौरान एक 10 वर्ष के बच्चे को अस्पताल ले जाने के समय वह खुद भी इस प्लेग का शिकार हो गई और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। इतना सब कुछ जीवन संधर्ष के साथ उनका जीवन और उनके समर्पण भाव से भारतीय समाज में जो सामाजिक सुधार के बीज उन्होंने बोये थे। आज उनके वृक्ष फलदार होने लगे है । महिला सशक्तिकरण के रूप में जिसका पूर्णतः अनुसरण आधुनिक युग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गया है और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा बनी है। ऐसी महान व्यक्तित्व और महिला जागरण के प्रति , स्त्री शिक्षा की अलख जगाने वाली भारतीय प्रथम महिला शिक्षिका को हमारा नमन के साथ विनम्र श्रध्दांजलि।
चिरंजीव
लिंगम चिरंजीव राव
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम , श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिन 532 312 मों.न. 8639945892


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