डॉ टी महादेव राव, सचिव सृजन , विशाखापटनम

सृजन की विविध विधाओं की ऑनलाइन साहित्य चर्चा संपन्न

हिंदी साहित्य की विविध विधाओं की रचनाओं पर सृजन ने आज अपने 168वें कार्यक्रम के रूप में साहित्य चर्चा का आयोजन ऑनलाइन किया। सृजन के रचनाकारों ने अपनी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की जिस पर सदस्यों द्वारा विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम का आरंभ सृजन के वरिष्ठ सदस्य एल चिरंजीव राव  के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने बताया सृजन न  केवल साहित्य के प्रति प्रतिबद्ध संस्था है बल्कि नए और पुराने रचनाकारों को साहित्य सृजन के लिए निरंतर प्रेरित करता रहता है। हिंदीतर क्षेत्र में हिंदी साहित्य की अलख जगाने को प्रतिबद्ध यह संस्था लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रही है। कार्यक्रम का संचालन सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव ने सफलतापूर्वक किया। आरंभ में सरस्वती वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत हुई जिसे प्रस्तुत किया सीमा वर्मा ने। साहित्य चर्चा में डॉ शकुंतला बेहुरा (भुवनेशवर, ओड़ीशा) ने सड़क शीर्षक से सड़क और उसके आसपास की परिस्थितियों और लोगों को प्रतीक बनाकर हृदयस्पर्शी कविता प्रस्तुत की। मुहावरों का अच्छा प्रयोग करते हुये  मीना गुप्ता (बेंगलूरु) ने अपनी लघुनाटिका पढ़ी दो सहेलियाँ। सीमा वर्मा (हैदराबाद, तेलंगाना)की कहानी का शीर्षक था साइकल और ठहाके। स्त्री विमर्श की इस कथा में समकालीन नारी और उसके आसपास के हालातों का  मर्मस्पर्शी चित्रण प्रभावी था। जयप्रकाश झा (दुर्गापुर पश्चिम बंगाल) ने अपनी लघुकथा समांतर गाँव में शहर से लौटकर अजनबी बने व्यक्ति मनोवेदना का सुंदर प्रस्तुतीकरण था।  रामप्रसाद यादव (विशाखापटनम) की कवितायें मौसम की पहली किताब, नाकामी में विविध प्रतीकों का भली भांति प्रयोग था जो की कविता की महत्ता विशेष रूप से बता रही थीं। डॉ मधुबाला कुशवाहा (विशाखापटनम) की कहानी सड़क पर बेरोजगार, मर्माहत एकाकी व्यक्ति की मार्मिक कहानी आज के युग की परिस्थितियों को रेखांकित करती है। डॉ वंदना काले (रायपुर छत्तीसगढ़) ने अपनी लघुकथा सारी सर में बैक के कर्मचारी को केंद्र में रखकर बुनी गई स्थितियों का खुलासा था। वाराणासी रमणी (हैदराबाद, तेलंगाना) की कविता अपनापन भविष्य के प्रति सजग रहने और कार्य करने का संदेश देती है। उन्होने एक लेख के माध्यम  से बड़े बड़े शिक्षण  संस्थानों की कमियों की ओर इंगित किया। डॉ एम विजय गोपाल (विशाखापटनम), सेवा निवृत्त मनोचिकित्सक ने वर्तमान में लोगों में पनपती हीं भावना, नकारात्मक सोच के कार्न होने वालदुष्परिणामोंऔर उनसे बचने के उपायों की जानकारी अपने लेख मनोरोग और हमारी सोच में दी। एस वी आर नायड़ू (हैदराबाद, तेलंगाना) ने हास्य और व्यंग्य में अंतर को रेखांकित करता अपना लेख हास्य और व्यंग्य पढ़ा, साथ ही एक कविता एक पत्नी का विलाप प्रस्तुत किया। एल चिरंजीव राव (इच्छापुरम आन्ध्रप्रदेश) ने यात्रा वृतांत में विस्तार से दो धामों की यात्रा और उपयोगिता विषय पर अपनेम विचार रखे। यात्राओं से होने वाली लाभों का वर्णन किया। गर्मी के मौसम पर अपनी कविता ग्रीष्म प्रस्तुत किया पारस नाथ यादव (भरूच, गुजरात) ने। अपनी रचना आओ फैला हुआ रायता समेटें में डॉ टी महादेव राव (विशाखापटनम) ने वर्तमान स्थितियों पर करारा मारक व्यंग्य सुनाया। सारी रचनाओं पर चर्चा हुई और सभी ने इस विविध विधाओं की साहित्य चर्चा को उपयोगी, प्रेरणास्पद बताया। कार्यक्रम का समापन जयप्रकाश झा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।