बिहार में गठबंधन की नई चुनौती, राहुल-खरगे का बार्गेनिंग पावर बढ़ाने का प्रयोग कहीं संकट न बन जाए
बिहार में कांग्रेस का आरजेडी के साथ गठबंधन है. लोकसभा चुनाव में बिहार की तीन सीटें जीतने के बाद कांग्रेस को एक उम्मीद की किरण नजर आई. इसके चलते ही कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से पहले जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी के साथ-साथ संगठन को धार देना शुरू कर दिया है. बिहार अध्यक्ष-प्रभारी बदलकर कांग्रेस ने अपनी पुरानी सियासी जमीन को तलाशने की पहल शुरू कर दी है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी मंगलवार को बिहार के पार्टी नेताओं के साथ बैठक कर मिशन-2025 को फतह करने की रूपरेखा तैयार करेंगे.
कांग्रेस सियासत बदलने के भरोसे और नए तेवरों के साथ राज्यों के चुनावी मैदान में उतरने के प्लान के तहत कसरत करती दिख रही है. कांग्रेस अपने संगठनात्मक ढांचे को दुरुस्त करने की पहल शुरू कर चुकी है और इसे आगे बढ़ाने के लिए पार्टी हाईकमान ने खुद चुनावी राज्यों के कांग्रेस नेताओं के साथ चुनाव की तैयारियों और रणनीति पर मंत्रणाओं का सिलसिला शुरू कर दिया है. दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद बीते एक महीने के दौरान पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल से लेकर मणिपुर जैसे राज्यों के पार्टी नेताओं के साथ बैठक कर शीर्ष नेतृत्व ने चुनावी चर्चा करने के बाद अब बिहार नेताओं के साथ सियासी मंथन करने का फैसला किया है.
बिहार नेताओं के साथ राहुल-खरगे की बैठक
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपनी सियासी एक्सरसाइज शुरू कर दी है. मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी की मौजूदगी में मंगलवार को दिल्ली के इंदिरा भवन में बिहार कांग्रेस नेताओं के साथ दोपहर में बैठक होनी है. इस बैठक में 2025 के विधानसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा होगी. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी बदलने के बाद बैठक होने जा रही है. माना जा रहा है कि इस बैठक में बिहार में किन मुद्दों को जोर से उठाने की जरूरत है और महागठबंधन का आकार और संरचना बिहार में कैसी होगी ? इन सारी बातों पर कांग्रेस की बैठक में चर्चा हो सकती है.
पटना में जब कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा से आरजेडी के साथ गठबंधन पर सवाल पूछा गया तो दोनों ने कहा कि समय आने पर इस सवाल का जवाब मिल जाएगा, जबकि बिहार में फिलहाल कांग्रेस और आरजेडी का गठबंधन है. यही नहीं सोमवार को लालू प्रसाद यादव की रोजा इफ्तार पार्टी में किसी बड़े कांग्रेसी नेता ने शिरकत नहीं की, जिसके बाद आरजेडी के साथ रिश्ते को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
बिहार में कांग्रेस की नई रणनीति
बिहार में कांग्रेस अपने दम पर खड़े होने की कवायद में है. इसी कड़ी में भूमिहार समाज से आने वाले अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर दलित समाज से आने वाले राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी है. इससे ही बिहार पर राहुल गांधी के फोकस को समझा जा सकता है. इसका महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि युवा नेता कृष्णा अलावरू को प्रभारी बनाया गया है, जो राहुल गांधी के भरोसेमंद माने जाते हैं.
राहुल गांधी जिस तरह से देश में जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय के मुद्दे को लेकर मुहिम छेड़े हुए हैं, उस दिशा में एक दलित के हाथ में बिहार जैसे अहम प्रदेश की कमान देना एक बेहतर रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि राजेश कुमार के सहारे कांग्रेस दलित समाज को साधने की कवायद में है.
दिल्ली के प्रयोग पर चलने का संयोग
पश्चिम बंगाल के नेताओं के साथ पिछले दिनों राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने बैठक की थी. इस दौरान शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश नेताओं को मजबूती से लड़ने और अपने सियासी आधार को मजबूत करने की दिशा में काम करने का दिशा-निर्देश दिया था. खरगे ने साफ कहा था कि बेशक राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी मुख्य प्रतिद्वंदी है मगर बंगाल में टीएमसी की सरकार है और राज्य इकाई को उसकी गलत नीतियों-फैसलों के खिलाफ आवाज उठाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए. बंगाल कांग्रेस के नेताओं को यह स्पष्ट कर दिया गया कि संसद में आपसी सहयोग-समन्वय का मसला राज्य के चुनाव से बिल्कुल अलग है.
हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में हार के बाद राज्यों के चुनाव को लेकर कांग्रेस के दृष्टिकोण में बदलाव आया है. दिल्ली चुनाव में पहली झलक देखने को मिली थी, जब कांग्रेस ने विपक्षी खेमे के तमाम दबावों को नकारते हुए आम आदमी पार्टी के खिलाफ मजबूती से चुनाव लड़ा था. कांग्रेस को भले ही एक सीट पर जीत नहीं मिली, लेकिन उसका वोट प्रतिशत बढ़ा और 14 सीट पर आम आदमी पार्टी की हार का कारण बना. दिल्ली के सियासी प्रयोग का संयोग कांग्रेस के लिए बंगाल से लेकर बिहार तक बन रहा है. इसीलिए कांग्रेस बिहार में आरजेडी की परवाह किए बगैर खुद को मजबूत करने में जुट गई है.
कन्हैया-पप्पू यादव बिहार में एक्टिव
राहुल गांधी ने अपने भरोसेमंद लोगों को जमीन पर उतारा है. युवा नेता कन्हैया कुमार बिहार से आते हैं. राहुल गांधी ने बाकायदा रणनीति के तहत कन्हैया कुमार को बिहार की सियासी पिच पर उतारा है, वो इन दिनों युवाओं से जुड़े मुद्दे रोजगार को लेकर पदयात्रा कर रहे हैं. बिहार में ‘पलायन रोको, रोजगार दो’ नाम से पदयात्रा कर सियासी माहौल बनाने की कवायद कर रहे हैं. अखिलेश प्रसाद सिंह नहीं चाहते थे कि कन्हैया कुमार को बिहार में एक्टिव किया जाए, क्योंकि आरजेडी के साथ रिश्ते खराब हो सकते हैं. इसके बाद भी कांग्रेस ने कन्हैया को एक्टिव किया और लालू यादव के करीबी माने जाने वाले अखिलेश प्रसाद की प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी कर दी.
माना जा रहा है कि कांग्रेस पुर्णिया से सांसद पप्पू यादव को भी अहम जिम्मेदारी दे सकती है. इसके पीछे कांग्रेस की राज्य में अपने बल पर मजबूत होने की रणनीति मानी जा रही है. पप्पू यादव को भी लालू यादव फूंटी आंख नहीं देखना चाहते हैं. लालू की परवाह किए बगैर कांग्रेस में जिस तरह से कन्हैया कुमार के बाद पप्पू यादव को एक्टिव करने की रूपरेखा बनाई जा रही है, उससे साफ है कि कांग्रेस अब आरजेडी की पिछलग्गू बनकर बिहार में नहीं चलेगी.
दिल्ली के बाद कांग्रेस बिहार में भी आत्मनिर्भर बनने का प्रयोग करने की दिशा में कदम बढ़ा रही. कांग्रेस मान रही है कि बिहार में आरजेडी के साथ वो गठबंधन में है, ऐसे में वो अपनी बार्गेनिंग पावर बढ़ाने के स्ट्रैटेजी है. इसीलिए जमीन पर अपनी मजबूत मौजूदगी के भरोसे आने वाले वक्त में आरजेडी के साथ सम्मानजनक सीटों का बंटवारा चाहती है.


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