नन्ददुलारे वाजपेयी जन्म -27 अगस्त 1906 - जयंती 27-08-2025
नन्ददुलारे वाजपेयी जन्म -27 अगस्त 1906 - जयंती 27-08-2025
“नंददुलारे वाजपेयी छायावादी हिंदी काव्य के सूक्ष्म विश्लेषण करने वाले समीक्षक थे। वे साहित्य को किसी वाद में रखने के पक्षधर नहीं थे। उनका कहना था कि युग चेतना के साथ ही समकालीन साहित्य की रचना हो सकती है।” वाजपेयी जी हिंदी के साहित्यकार,पत्रकार,संपादक,आलोचक और अंत में प्रशासक भी रहे। इनको छायावादी कविता के शीर्षस्थ आलोचक के रूप में मान्यता प्राप्त है। हिंदी साहित्य: बींसवीं शताब्दी, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचन्द : साहित्यिक विवेचन, आधुनिक साहित्य, नया साहित्य: नये प्रश्न आदि इनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें हैं। वे शुक्लोत्तर युग के प्रख्यात समालोचक थे। नंददुलारे वाजपेयी का जन्म उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले के मगरायर नामक ग्राम में 27अगस्तर सन्1906 ई॰ को हुआ था। उनके पिता का नाम गोवर्धनलाल वाजपेयी तथा माता का नाम जनकदुलारी था। विद्यारंभ पिता की देखरेख में हुआ। आर्यसमाज विश्वास रखने वाले पिता ने बालक नंददुलारे को सात वर्ष की अवस्था में पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' कंठस्थ करा दी थी और फिर अमरकोश के मुख्य अंश भी याद करा दिये थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हजारीबाग में संपन्न हुई। सातवें वर्ष में वे हजारीबाग के मिशन हाई स्कूल में नियमित शिक्षा के लिए भर्ती हुए थे और पन्द्रहवें वर्ष में वहीं से मैट्रिकुलेशन की परीक्षा अच्छे अंको से उत्तीर्ण की थी। सन1922 में हजारीबाग के संत कोलंबस कॉलेज में विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में प्रवेश लिया और साल भर पढ़ने के बाद, कला के विषयों को भी समन्वित कर लिया1925 में वहीं से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की और आगे की पढ़ाई के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय आ गये। 1927 में बी॰ए॰ की परीक्षा में संपूर्ण विश्वविद्यालय में चौथे स्थान पर आये लेकिन एम॰ए॰ की परीक्षा में,1929 में, द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्णता प्राप्त की। काशी विश्वविद्यालय में अध्धयन काल, विश्वविद्यालय और शिक्षकों खासकर बाबू श्याम सुंदर दास का सन्निध्य और प्रभाव, शोध, विश्वविद्यालय में अध्यापन, ‘भारत’ का संपादन, सुर-तुलसी का सम्पादन, निराला, प्रसाद, पन्त से उनके सम्बन्ध और लेखन, निराला साहित्य के लिए उनका संघर्ष, सागर विश्विद्यालय में अध्यापन से लेकर उज्जैन विश्व विद्यालय में उनके कुलपति होने तथा और उनके निधन(1967) तक के जीवन प्रवाह बहुत ही सराहनीय रहा। उनका विवाह श्रीमती सावित्री देवी से1925 के जनवरी माह में हुआ था। सन्1936 में उनके प्रथम पुत्र स्वस्ति कुमार वाजपेयी का जन्म हुआ। इसके बाद1941 में पुत्री पद्मा व1945 में दूसरे पुत्र सुनृत कुमार का जन्म हुआ। नंददुलारे जी (1930-32) वे अर्ध साप्ताहिक ‘भारत’ के सम्पादक रहें। निराला से उनका परिचय सन 24 से था,इसके पूर्व भी वे उनकी रचनाएं पत्रिकाओं में पढ़ चुके थे। धीरे-धीरे यह मैत्री प्रगाढ़ होती गई। इसी तरह प्रसाद और पंत से भी उनका परिचय बढ़ता गया। शुक्ल जी से उनके मतभेद का मुख्य आधार जीवनीकार श्री विजय बहादुर सिंह के अनुसार “छायावाद एक नए काव्य-युग की शुरुआत है, इसे रामचंद्र शुक्ल जी जैसे महान साहित्याचार्य स्वीकार करने को तैयार न थे। भक्तिकाल के महान कवियों से अंतर्दृष्टि ग्रहण करने वाले, प्रबंध काव्य शैली को श्रेष्ठ मनाने वाले ‘आचार्य’ को प्रसाद-निराला आदि की रहस्योन्मुख गीति(प्रगीत) कविता का परिदृश्य उतना गंभीर, विशिष्ट और प्रस्थानकारी नहीं जान पड़ता था। कभी-कभी तो वे उसे एक अनूठी काव्य-शैली मात्र ही मानते । नंददुलारे वाजपेयी शुक्लोत्तर समीक्षा को संचालित करने वाले प्रमुख आलोचक माने जाते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपने युग की मुख्य काव्य-धारा 'छायावाद' को अपेक्षित सहानुभूति नहीं दे सके थे। अनेक पुराणपंथी लेखक भी छायावाद के खिलाफ थे। ऐसे समय में वाजपेयी जी ने आगे बढ़कर छायावाद को प्रतिष्ठित करने में अग्रणी भूमिका निभायी। प्रसाद-निराला-पंत को उन्होंने हिन्दी कवियों की वृहत्त्रयी के रूप में स्थापित किया। वाजपेयी जी अवध प्रान्त (गांव मगरायर, जिला उन्नाव,उ.प्र.) के थे। अवध क्षेत्र के साहित्यकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला तथा डॉ रामविलास शर्मा प्रमुख हैं। संयोग से तीनो से वाजपेयी जी का सम्बन्ध रहा। निराला से मित्रता और आलोचक का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा।निराला के लिए जो आलोचनात्मक संघर्ष रामविलास जी ने बाद के दशकों में किया, उसकी शुरुआत वाजपेयी जी ने की थी। तीस के दशक में छायावाद को स्थापित करने में उनका महत्वपूर्ण आलोचनात्मक योगदान है। उन्होंने उस समय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे विद्वानों से वैचारिक बहस किया। यह बात स्प्ष्ट है कि शुक्ल जी ने छायावाद का विरोध किया। अवश्य इसमे उनके अपने कुछ लोकादर्श थे, कुछ उसको सीमित अर्थ में लेने के कारण भी। लेकिन उनका मुख्य विरोध उसके रहस्यवादी प्रवृत्ति से था। इस सम्बन्ध में डॉ रामविलास शर्मा ने ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिंदी आलोचना में लिखा है “शुक्ल जी ने छायावाद का विरोध किया, इसके पीछे भी यथार्थ मानव जीवन से उनका प्रेम था। वह साहित्य को परोक्ष-चिंतन, रहस्यवाद, अटपटी और दुरूह शैली से बचाना चाहते थे; भाग्यवाद, निराशावाद और पच्छिमी कविता के पतनशील रुझानों से हिंदी साहित्य के जातीय परंपरा की रक्षा करना चाहते थे। जहां छायावादी कवि रहस्यवाद और निराशावाद से बचकर यथार्थ जीवन का चित्रण कर सके हैं, वहाँ शुक्ल जी ने बराबर उन्हें सराहा है, जहाँ वे इन गलत रुझानों से प्रभावित हुए हैं, वहाँ बराबर उनका विरोध किया है, अपने इतिहास के अंतिम संस्करण में यह विरोध कायम रखा है।” इसके बाद लगभग चार वर्षों तक उन्होंने काशी नागरप्रचारणी सभा में "सूरसागर" का तथा बाद में गीता प्रेस, गोरखपुर में रामचरितमानस का संपादन किया। वाजपेयी जी जुलाई1941 से फरवरी1947 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक रहे तथा मार्च1947 से सितंबर1965 तक सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। 1 अक्टूबर 1965 से वे विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के उपकुलपति नियुक्त हुए। 

लेखन-कार्य--वाजपेयी जी ने अनेक आलोचनात्मक कृतियों की रचना की है; हालाँकि उन्होंने एकमात्र प्रेमचन्द पर केंद्रित पुस्तक 'प्रेमचन्द : साहित्यिक विवेचन', जो कि छात्रोपयोगी लेखन है, को छोड़कर व्यवस्थित रूप से अन्य किसी पुस्तक का लेखन नहीं किया है। उनके लेखन में निबंधों की प्रधानता है जिन्हें संकलित कर उन्होंने पुस्तकों का रूप दिया है। विभिन्न समय में स्वतंत्र रूप से लिखे गये जो निबंध किन्ही विशिष्ट साहित्यकार पर केंद्रित थे उन्हें बाद में एकत्र कर उस साहित्यकार के नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित किये गये। 'जयशंकर प्रसाद', 'महाकवि सूरदास', 'कवि निराला' एवं 'सुमित्रानंदन पंत' आदि पुस्तकें इसी तरह के संकलन हैं। 'महाकवि सूरदास' नामक पुस्तक में तो आरंभिक तीन निबंध उनके ही निर्देशानुसार उनके प्रिय छात्र श्री मधुसूदन वाखले के द्वारा लिखे गये थे ताकि वाजपेयी जी लिखित अन्य निबंधों के साथ उन्हें मिलाकर एक उचित पुस्तकीय रूप दिया जा सके। इसके अतिरिक्त विभिन्न साहित्यकारों पर समय-समय पर लिखे गये कुछ निबंध तथा विभिन्न मुद्दों पर लिखे गये निबंधों के संकलन आरंभ में 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी' के नाम से और बाद में 'आधुनिक साहित्य', 'नया साहित्य : नये प्रश्न' आदि नामों से पुस्तक रूप में संकलित किये गये हैं।1967 में उनके निधन के उपरांत भी इसी ढंग पर उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें से अधिकांश का संपादन डॉ॰ शिवकुमार मिश्र ने किया है। प्रायः इन सबमें कुछ अप्रकाशित सामग्री है और कुछ पूर्व प्रकाशित। सबको मिलाकर पुस्तक को एक नया व्यक्तित्व देने का प्रयत्न किया गया है। उनका सर्वाधिक महत्व आधुनिक साहित्य के मूल्यांकन के लिए दृष्टि के नवोन्मेष के कारण है। इस दृष्टि से उनकी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी' को युगान्तरकारी पुस्तक के रूप में स्मरण किया जाता है। बाद के समय में विवेच्य सामग्री की दृष्टि से 'आधुनिक साहित्य' नामक पुस्तक भरी-पूरी थी, परंतु पूर्वोक्त दृष्टि के अनुरूप 'नया साहित्य : नये प्रश्न' को उसकी भूमिका 'निकष' के साथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समीक्षा-पुस्तक के रूप में स्वीकार किया गया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक ग्रंथों का संपादन किया है। इन संपादित ग्रंथों की भूमिका मात्र से उनकी सूक्ष्म एवं तार्किक दृष्टि का सहज ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है। प्रकाशित कृतियाँ---जयशंकर प्रसाद –(1939),हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी –(1942),आधुनिक साहित्य –(1950),महाकवि सूरदास –(1953),प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन –(1954),नया साहित्य : नये प्रश्न –(1955),राष्ट्रभाषा की कुछ समस्याएँ –(1961),कवि निराला –(1965),राष्ट्रीय साहित्य तथा अन्य निबंध-(1965),प्रकीर्णिका –(1965),हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास,आधुनिक काव्य : रचना और विचार,नई कविता –(1976),कवि सुमित्रानन्दन पंत –(1976),रस सिद्धांत : नये संदर्भ –(1977),आधुनिक साहित्य : सृजन और समीक्षा –(1978),हिन्दी साहित्य का आधुनिक युग –(1979),रीति और शैली –(1979), नंददुलारे वाजपेयी रचनावली (आठ खंडों में, संपादक- विजयबहादुर सिंह) –(2008) (अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली से प्रकाशित) वाजपेयी जी पर केन्द्रित कृतियाँ-(1) नन्ददुलारे वाजपेयी (विनिबन्ध) - प्रेमशंकर (१९८३) [साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से प्रकाशित](2) आलोचक का स्वदेश (जीवनी) - विजयबहादुर सिंह (२००८) [अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली से प्रकाशित; यह जीवनी 'नंददुलारे वाजपेयी रचनावली' के प्रथम खंड में भी यथावत् संकलित है।] मृत्युपरांत ‘कवि सुमित्रानन्दन पन्त'(1997), रस सिद्धांत नए संदर्भ(1997), नयी कविता(1997) प्रमुख हैं। 1928 में ‘माधुरी’ में छपा ‘सत्समालोचना’ को उनका प्रथम समीक्षात्मक लेख माना जाता है। हिंदी आलोचना में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ( 1906-1967)का स्थान आचार्य रामचन्द्र के बाद की पीढ़ी में आता है। वे काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में उनके छात्र भी रहे हैं। वाजपेयी जी की प्रतिष्ठा मुख्यतः छायावाद को प्रतिष्ठित करने करने में माना जाता है। छायावाद को मान्यता दिलाने, उसके पक्ष समर्थन में लिखने के कारण एक तरह से उन्हें ‘स्वच्छंदतावादी आलोचक’ भी कहा जाता है। छायावाद की ‘वृहत्त्रयी’ का सर्वप्रथम उन्होंने ही प्रयोग किया और उसमे निराला, पंत और जयशंकर प्रसाद जी को रखा, जो बाद में काफ़ी चर्चित हुआ। 1927-28 से 1966-67 तक के लगभग चालीस वर्षों के उनके लेखन में छायावाद के अलावा प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता के अलावा सूरसागर, रामचरित मानस का सम्पादन, प्रेमचंद, निराला, पंत, रस सिद्धांत पर किताब के अलावा अपने समय के अधिकांश लेखकों, वैचारिक बहसों पर उनके समीक्षात्मक निबन्ध हैं जो किताबों में संग्रहित हैं।

वाजपेयी जी और शुक्ल जी के इस वैचारिक मुठभेड़ में कुछ तल्खियां अवश्य रही होंगी, इसलिए जब जीवनीकार इस बात को प्रश्नांकित करता है कि शुक्ल जी ‘हिंदी साहित्य के इतिहास’ में वाजपेयी जी का नामोन्नलेख क्यों नहीं किया; तो यह उचित जान पड़ता है, क्योंकि सन चालीस तक वाजपेयी जी की आलोचक के रूप में अच्छी पहचान बन चुकी थी। बाबजूद इसके वाजपेयी जी ने शुक्ल जी के ऐतिहासिक योगदान को स्वीकारा और सराहा है; और उन्हें युग-प्रवर्तक कहा है। ‘भारत’ के सम्पादन काल में ही वाजपेयी जी की प्रेमचंद से वैचारिक बहस हुई। एक तो हंस के आत्मकथांक के संदर्भ में हुई। इसका कारण वाजपेयी जी के ही शब्दों में “मेरी मान्यता थी कि आज साहित्य में आत्मकथा की नहीं साधना की आवश्यकता है। जबकि प्रेमचंद जी कहते थे लेखक ही नहीं, एक सामान्य मजदूर के जीवन की भी एक प्रेरणात्मक कथा हो सकती है।” इसी तरह वाजपेयी जी प्रारम्भ में प्रेमचंद की रचनाओं में स्थूल यथार्थ अथवा उपदेशात्मकता देखते थे, लेकिन बाद में उनके विचारों में बदलाव आया। खासकर गोदान के प्रकाशन के बाद। आगे उन्होंने प्रेमचंद पर पुस्तक भी लिखी। जहां तक जानकारी है यह सही है कि वाजपेयी जी के लेखन पर पर्याप्त काम नहीं हुआ है, जो कि होना चाहिए। वाजपेयी जी के जीवन के अलावा उनके सरोकारों, प्राथमिकताओं, आलोचनात्मक दृष्टकोण को रेखांकित किया जाना भी जरूरी है। उनके योगदान को रेखांकित कर सकते हैं। मगर इसके लिए पूर्ववर्ती अथवा आज के आलोचकों पर दोष मढ़ना उचित नहीं जान पड़ता। हर लेखक अपनी दृष्टि और पसन्द की सीमा में कार्य करता है। हम उसकी सीमा को तो रेखांकित कर सकते हैं मगर उससे ‘हर कार्य’ करने की अपेक्षा नहीं रख सकते। इस सम्बन्ध में हमे लगता है कि “उनसे असहमत और उनके विरुद्ध षड्यंत्र में लगे और कुप्रचार करने वाले आलोचक भी अब तक यह हिम्मत नहीं जुटा सकते हैं कि ‘वृहतत्त्रयी’ की इस स्थापना को चुनौती दें और खंडित करें।” यदि कोई आलोचक इस स्थापना को सही मानता है तो उसे चुनौती क्यों देगा ? “आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को छोड़कर तत्काल बाद और और काफी बाद आने वाले लोकविदित आलोचकों में न तो ऐसी विवेक प्रखरता दिखाई देती है, न सम्यक तटस्थता ही। वे सब या तो अपने वरिष्ठों का सामना करने से बचते हैं या उनकी हां में हां मिलाते और हुंकारी भरते दिखाई देते हैं।” वाजपेयी जी के तत्काल बाद और काफी बाद आने वाले आलोचकों में डॉ रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, रांगेय राघव, नामवर सिंह आदि हैं। रामविलास जी तो समय की दृष्टि से वाजपेयी जी के काफी निकट पड़ते हैं। एक घटना नामवर जी के संबंध में, नामवर जी काशी विश्वविद्यालय से निष्कासित होने पर 1959 में सागर विश्वविद्यालय में नियुक्त हुए थे। वाजपेयी जी विभागाध्यक्ष थे। अपने आत्मकथात्मक आलेख ‘जीवन क्या जिया’ में नामवर जी लिखते है कि “सचमुच वाजपेयी जी ने विरोध किया था। चयन समिति में पंडित जी के अलावा धीरेंद्र वर्मा जी थे, उन्होंने और द्वारिका प्रसाद मिश्र जी ने मुझे वाजपेयी जी के घोर विरोध के बावजूद चुन लिया”। आगे वे भोपाल प्रगतिशील लेखक संघ के विशेष सम्मेलन का जिक्र करते हैं जहां हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की अनुपस्थिति में उन्हें अध्यक्षता का दायित्व सौंप दिया गया। नामवर जी के अनुसार “वाजपेयी जी को यह बात बहुत ही नागवार लगी। उनके ही विभाग का एक लेक्चरर, रीडर भी नहीं, अध्यक्षता करे और और उनकी बातों का खंडन भी करे, यह गुस्ताखी!” फिर अगले दिन की घटना का जिक्र करते हैं जिससे प्रतीत होता है फिर नामवर जी का व्यक्तव्य वाजपेयी जी को चुभ गई होगी और “तमतमाया चेहरा लिए वाजपेयी जी दोपहर को ही लौट गये।” नामवर जी के कथनों से ऐसा प्रतीत होता है कि वाजपेयी जी उनके आक्रमक मार्क्सवादी दृष्टिकोण को पसंद नहीं करते रहे होंगे ;और आगे नामवर जी के अनुसार वाजपेयी जी ने उनकी पदस्थापना को कन्फर्म नहीं किया “वाजपेयी जी ने रिपोर्ट में लिख दिया कि कन्फर्म न किया जाय।” और इस तरह सागर से भी उनका निष्कासन हो गया। एक आलोचक के रूप में वाजपेयी जी की वैचारिकता कहां पर हैः- “वे न तो पश्चिम के अन्धविरोधी हैं, न अन्धानुगामी। एक लेखक के रूप में उनका स्वदेश उस ‘राष्ट्रीयता’ का है जिसके मूल में सामूहिकता और मानववादी चेतना सक्रिय है। यह वही भूमि है जिसका आग्रह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अपने निबंधों और नन्ददुलारे वाजपेयी अपनी इन आलोचनाओं में करते चल रहे हैं।” 21 अगस्त 1967 को उज्जैन में हिंदी के वरिष्ठ आलोचक आचार्य वाजपेयी जी का हृदयाघात के कारण अचानक निधन हो गया जिससे हिंदी संसार की दुर्भाग्यपूर्ण क्षति हुई। महाप्रयाण. 21 अगस्त 1967 .नमन के साथ विनम्र श्रध्दांजलि ।
चिरंजीव
लिंगम चिरंजीव राव
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)


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