अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 08 मार्च2026  

(नारी के अस्तित्व का सम्मान ही उसकी प्रगति के मार्ग प्रशस्त करने की पहली सीढ़ी है।)

“आधी आबादी की वर्तमान चुनौतियों से लड़ रहा समाज कितना न्याय करने में सक्षम हो पाया है, यह विषय आधुनिकता के इस वैज्ञानिक साधनों की दौड़ में कहा तक सुरक्षा, कैसी सुरक्षा बस और केवल असमर्थता ही या जो कुछ हो रहा है उसे ही स्वीकार कर जीने को बाध्य करता महिलाओं के अस्तित्व के सम्मान के प्रश्न अभी भी क्या अनुत्तरित नहीं लगते?”

(स्वामी विवेकानंद के कथनानुसार कोई राष्ट्र तब तक अपना पूर्ण विकास नहीं कर सकता जब तक उसका प्रत्येक नागरिक राष्ट्र के विकास का भागीदार नहीं बनता।)

हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री पंड़ित जवाहर लाल नेहरू जी ने निम्न कथन को एक भाषण में दोहराया थाः-

“शिक्षित स्त्री के बिना शिक्षित पुरूष हो नहीं सकता। यदि पुरूषों और स्त्रियों में से केवल किसी एक के लिए सामान्य शिक्षा का प्रावधान करना हो तो यह अवसर स्त्रियों को दिया जाना चाहिए क्योंकि यह शिक्षा स्वयंएमेव अगली पीढ़ी को प्राप्त हो जाएगी।”

किसी भी समाज को अगर हमे जानना व समझना हो तो उस समाज की महिलाओं की स्थिति से उस समाज को जानने के रास्ते हमें मिलने लगते है। इस तरह जब हम यह जानने लगते है तो हमें हमारे देश भारत के सैकड़ो वर्षो की गुलामी के जो बीज हमारे समाज ने देखे है.। उसके पेड़ व टहनियों पर उसका जो असर दिखाई देने लगा शायद यह पुरूषो की तुलना में महिलाओ पर अधिक दिखाई देना स्वभाविक था। क्योंकि पुरूषसत्तात्मक समाज ने असहाय महिलाओं के उपर सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षणिक एंव अन्य कई प्रकार के कार्यो का दायित्व लाद दिया गया जिसके कारण उन्हें जीवन में आगे बढ़ने एवं व्यक्तित्व के समुचित विकास करने के अवसरों का आभाव ही रहा। और उन्होंने इससे अलग प्रतिरोधात्मक रवैय्या अपनाकर अपने अधिकार के प्रति सजग रहते हुए समानता की लड़ाई में संविधान में दिए अधिकारो के प्रति कोशीश करने में सक्षम तो हो सकी पर फिर भी विकास के मार्ग तलाशती रही पर फिर भी  उन्हें पुरूष की तुलना में धिकार की समानता कम ही मिली आगे बी संधर्ष जारी रखना पड़ा। और यही सब अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन याद दिलाता है, जिसके साथ हर वर्ष हमे कुछ नयी चुनौतियों के साथ आगे बढ़ते हुए महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता व सजगता को बनाए रखने के हर प्रयास को उचित दिशा मिलते रहे और आने वाले व्रर्षो में उन सभी चुनौतियों का निराकरण होकर महिलाओं को हर प्रकार से समानता के अधिकार के साथ राष्ट्र निर्माण और प्रगति में आधी आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दिखाई देता रहे । भारतीय सनातन संस्कृति के हर एक पड़ाव में हमारे सामने नारी के प्रति सम्मान की जो परंपरा है वह केवल कहने मात्र के ले नहीं वरन् हमारे वेद-पुराण आदि में इनका वर्णन मिलता है जो हमारे लिए नारी का एक विशेष स्थान समाज में है और नारी पूज्यनीय है-एक श्लोक के माध्यम से जिसे मनु-स्मृति से लिया गया है हम इसे समझ सकते हैः

             यत्र नार्ययस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।

             यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।। (मनु स्मृति)

अर्थात-जहाँ नारियों की पूजा(सम्मान) होती है वहाँ देवता निवास करते है। और

      जहाँ इनका सम्मान नहीं होता, वहां की गई सभी क्रियाएं(कार्य) निष्फल हो जाती है।।

              रजतिम ओ गुरू तिय मित्रतियाहू जान।           

              निज माता और सासु ये पाँचों मातृ समान।।

इसी प्रकार हमारे समाज में पिता के रूप में हमें पाँच पिता का वर्णन मिलता है(1)जन्म देने वाले जनिता (2)उपनयन संस्कार/जनेऊ कराने वाले- उपनेता(3) जो गुरू हमें शिक्षा देकर अंधकार दूर कराता है-विध्यादाता(4) जो हमें भोजनकराता है और पालन पोषण करता है-अन्नदाता (5) जो प्रमों की रक्षा करता है विपत्ति मे बचाता है- भयत्राता । सी प्रकार पाँच प्रकार की माता सभी नारी के रूप है (1)राजा की पत्नी,(2)गुरू की पत्नी,(3)मित्र की पत्नी,(4)अपनी स्त्री की माता और(5) अपनी मूल जननीमाता। इस प्रकार नारी सम्मान सर्वोपरि है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस जो हर वर्ष 8 मार्च को मनाया जाता है इसके मनाने की शुरूआत 90 के दशक से हो गई थी । जो एक तरह से महिलाओ के ले समान अधिकारों के संधर्ष का एक प्रतीक है। इसकी शुरूआत की कई बाते हमारे सामने रही जो 1900 के दशकसे चली आ रही है। महिलाओ को पुरूषों की तुलना में अधिकारों की  . असमानता 1906 के आसपास महिलाओं ने बेहतर वेतन, कार्य के घंटे और मतदान के अधिकार की माँग करते हुए जागरूकता का परिचय दियाऔर प्रदर्शन किया। इसी क्रम में कोपनहेगन में 1910 में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जर्मन समाजवादी क्लारा जेटकिन ने इस दिन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने का एक प्रस्ताव रखा जो 1911 में इस दिन पहली बार ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड मे इसकी शुरूआत हुई पश्चात लंबे समय तक संधर्ष करने के बाद 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने इसे अधिकारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की मान्यता दी.। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र व्दारा मान्यता प्राप्त होने के पश्चात हर वर्ष 8 मार्च को महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाने और लैंगिक समानता के संधर्ष को एक नई दिशा मिलती है और यह दिन महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्म अवसर है। विज्ञान और कानून ने हमें जिस प्रकार के साधनों से समपन्नता प्रदान की ठीक विपरीत उसकी विपन्नता से भी हमारा परिचय कराने में कोई चूक नहीं की है. आज विज्ञान के अविष्कारों ने उसके अभिशाप के सरल रास्तो ने महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों से जूझ रही महिला को लगातार बेबसी सहन करती जा रही महिलाओं को कानून के दाँवपेंच से जूझते हुए है अस्तित्व की लड़ाई में पूरा विश्व जिस तरह युध्द क्षेत्र बन गया है चाहे वह सैनिकों वाली एक अलग लड़ाई ही नही वरन् राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक रूप में हम जो देख रहे है उसकी दिशा में नारी का सम्मान व अधिकारों में असमानता के कारण उनकी वर्तमान स्थिति पहले से अच्छी तो जरूर हुई है पर आज भी उन पर हो रहे अत्याचारो का ग्राफ हर साल कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। इस दिन को प्राप्त करने के अनेको संधर्ष के उदाहरण हमारे सामने विश्व स्तर पर उपस्थित थे, जिनके उचित रूप से व्दार खोलने के दिनों का इंतजार आज भी कर रही नारी जिसे हम जानते है कि विश्व का कोई भी देश नारी की स्वतंत्रता का सम्मान सही रूप में नहीं कर रहा या नहीं करता, नारी के प्रति हमेशा हीन भावना से ग्रसित रहता, नारी को मात्र भोग्या समझता, नारी को केवल सन्तान्नोत्पत्ति का साधन मानता । इस तरह नारी को लगातार अपमानित होकर जीने के लिए मजबूर करता समाज आज जागरूकता दिखाने की कवायद करने में लगा है। पर क्या वह इसमें कितना सफल हो पाया है।   

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हमारे सामने महिलाओं के लिए कुछ लक्ष्य होते है। जिन्हें पूरा करने के संकल्प में पूरे समाज को उसका दायित्व निर्वाह करने के लिए तैयार किया जाता है। महिलाओं को जो सम्मान वैदिक काल में समानता के अधिकार के साथ मिलते रहे उन सभी अधिकारों के दरवाजों को पुरूष प्रधान समाज ने मध्यकाल में ही बंद कर दिए थे . आज उन बंद दरवाजो को खोलने का समय आ गया है, यहीं से नारी के संधर्ष के लिए रास्ते खुलने लगे है। जो निश्चित ही आधुनिक व वर्तमान काल में यही महिला दिवस उन दरवाजों पर दस्तक देने का दिन माना जाता है।यह दिन महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों का आनंन्द मनाने के लिए पूरी तरह से सक्षम होते हे भी आज भी लैगिंक समानता के लिए जागरूकता की आज भी क्यों इसमें कमी दिखाई देती है। इस तरह इस रूकावट को दूर करने के लिए आज का दिन इस असमानता वाले भेदभावपूर्ण रवैय्ये वाले मुद्दों के प्रति सजगता का परिचय महिलाओं के अधिकारों के प्रति सजग होने के लिए एक संगठित स्वरूप को सुनिश्चित करने का दिन होता है विश्व महिला दिवस जिसके प्रति सभी को अपनी बात कहते हुए आने वाले समय में इस तरह की भोगी परिस्थितियों से क्रमवार छुटकारा मिलना ही उसका उदेश्य होता है। वर्ष 2025 में महिलाओं के अधिकारो को उनको दिलाने कार्य में तेजी लाना , ताकि महिलाओं की प्रगति को गति मिल सके और उनकी समाज में भूमिका को और अधिक मजबूत बनाना है। महिलाओं के लिए समान अधिकार, समान अवसर और सशक्तीकरण के रास्ते बनाने के कार्य का संकल्प लेने के प्रति सभी को इस दिशा के प्रति सजग बनाना है। विश्व के हर देश इस सम्मान को महिलाओं को प्रदान करने के अलग-अलग तरीकों से इस दिवस का चयन भी करते है और महिलाओं के प्रति अपना सहयोग प्रदर्शित करते हुए उन्हें आश्वस्त भी करते है आज तक जो हुआ अब उसमें जल्द बदलाव लाने की कोशिश में हम आपके साथ रहेगें। आज हमारे सामने विश्व के अन्य राष्ट्रो की स्थिति का आंकलन करने पर यह पता चलता है कि यह दिन महिलाओं के अधिकारो और समानता के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है, जो हमें याद दिलाता है कि हमें महिलाओं के प्रति सम्मान और समानता को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास करते रहने की आश्यकता है। हमारे सामने जो आंकड़े उपलब्ध है जो उनकी आर्थिक भागीदारी के प्रति रूझान व उसकी तुलना की जाए तो पाते है 2017-18 की 23.3 प्रतिशतसे बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है और यह अच्छे संकेत है। और 2025-26 में नीतिगत कार्रवाई का आग्रह आर्थिक सर्वेक्षणों में किया गया है। भारतीय नारी ने शिक्षा तकनीक, राजनीति और रक्षा के क्षेत्रों में भी अपनी अहम भूमिका के साथ देश की प्रगति को एक नई दिशा दी है जो उनके योगदान का एक अहम व राष्ट्र के लिए कितना महत्वपूण है आजकल हम समझने लगे है। आज महिलाओं की उपस्थिति का हर क्षेत्र उनकी उपलब्धियों के साथ पूरे सम्मान का उदाहरण प्रस्तुत करता है चाहे वह शिक्षा, खेल, राजनीति, विज्ञान, तकनीकि जैसे कोई भी क्षेत्र क्यों न हो। लगातार हम इनके अनेक कार्यक्षेत्रो मे जो उनकी पहुंच के साथ उन्होंने आत्मनिर्भरता के अनेक उदाहरण हमारे लिए मिसाल के तौर पर रखते रहे है जो यह दर्शाता है कि महिलाओं ने अपनी नेतृत्व क्षमता और आत्म निर्भरता के माध्यम से यह सर्वविदित करवा दिया है कि बीना महिलाओं के योगदान के बहुत से कार्य पूरे नहीं हो सकते । पहले विज्ञान का क्षेत्र पुरूषो के लिए माना जाता ता परंतु आज यह धारणा महिलाओं ने गलत साबित कर दिया है। शिक्षा और कौशल उच्च शिक्षा में नामांकन का प्रतिसत 50 प्रतिशत से पार होने लगा है जो नकी बढती साक्षरता व क्षमता को प्रदर्शित करता है। उनके सामने समाज में सुरक्षा और कानूनी सशक्तिकरण के लिए उन्हें सरकार ने स्वच्छता और सुरक्षा के प्रति अनेक तरीके से सहयोग करती आ रही है।

आजकल हमारे सामने अनेक बाधाएँ नारी के जीवन में आगे बढने के लिए लगातार आ रही है जिसमें अगर कोई लड़की खेल में, रक्षा में और व्यवसाय में जाना चाहती है तो पारिवारिक परंपराओं व लैगिंक रूढ़ियों की जकड़न से खुद को बाहर लाने का संधर्ष करना पड़ता है जब हमारे सामने ऐसे उदाहरण बहुत मौजूद है जिन्होंने यह कर दिखाया। इस बार विश्व-कप क्रिकेट 2025 को जब महिलाओ ने जीता उस समय दल के प्रायः सभी खिलाड़ियों को अपने इस खेल की इच्छा को पूरा करने के लिए बहुत से पारिवारिक और समाजिक प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा। अब पहले की तुलना में समाज व रूढिवादी परिवार भी कुछ रियायत बरत रही है।पर फिर भी और बहुत कुछ करना बाकी है। उत्साह इतना की उनके सामने समस्याओं का हर दिन सामना करते हुए, दोहरे कार्य के बोझ को भी साथ लेकर अपने घर और बाहर के साथ समन्वय बनाकर चलने का साहस केवल और केवल महिलाओं के पास ही है। महिलाओं को अनेक बाधाओं का सामना करते हुए बहुत कुछ आजकल वो पाकर बहुत खुश भी है.। इतना सब होने के बावजूद आज की नारी को दोहरी मार सहना पढ रहा है घर पर व बाहर उनका जितना भी सहयोग मिलता है पर आर्थिक रूप से अभी भी स्वतंत्र नहीं है। इस प्रकार हमारे समाज में नारी का जो स्थान वैदिक काल में समानता के अधिकार के साथ हर तरह से सुरक्षित व सम्मानित रह. शैने-शैने प्राचीन काल , मध्यकाल तक आते आते उनके जीवन में जो कुच उस समाज में पुरूषसत्तात्मक समाज ने नारी को अपने आधीन रखकर एक कठपुतली बना कर रख छोड़ा और यह दौर 1900 वी सदीं के पूर्वाध्द तक जारी रहा । अनेक राजाओं के देश में आकर अपने तरीके से राज-काज संभलते रहे और महिलाओं पर त्याचार का दौर चलता रहा। अंग्रेजो के शासन काल में इनके कुछ अधिकारों के प्रति नरम रवैय्या अपना कर बहुत से छूट के प्रवधान आने लगे जिसमें मुलतः सती-प्रथा में रोक और बाल विवाह को पूरी तरह बंद करना आदि। महिलाओं पर इतने सारे संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद लगातार हो रहे अपराधों की दरों में लगातार बढ़ोतरी का होना हमारे लिए सोच का विषय बनता जा रहा है। जब बहन-बेटियों के साथ अत्याचार( इज्जत लूटने) जैसे घिनौने कृत्य होते है , तब मात्र एक परिवार नहीं बल्कि पूरा समाज शर्मसार होता है। यहां पर सवाल केवल कानून का नहीं बल्कि नीयत का भी उभरने लगता है । हमारे कानून में क्यों नहीं ऐसी सजा का प्रावधान रखा जाए ताकि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने वाले को कड़ी सजा की मांग का उठना लाजमी है परंतु उसकी कार्यवाही में ढिलाई और अपराधी छूट जाते है और बेखौफ घूमने लगते है।

क्या हमारी संसद में महिलों की सुरक्षा सबसे ऊपर है ?

क्या हम सच में ऐसा भारत बनाना चाहते है जहाँ अपराधी कानून से डरें ----न कि पीड़ित न्याय के लिए तरसें ?

अब समय आ गया है कि हर नागरिक आवाज उठाए राजनीति से ऊपर उठकर, सिर्फ न्याय के लिए। बहन, बेटियों की सुरक्षा कोई बहस का मुद्दा नहीं , यह राष्ट्र की आत्मा की आवाज का प्रश्न है? अगर हम माने की महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कड़ा और प्रभावी कानून होना चाहिए तो हम सभी को जागृत होकर आवाज बुलंद करना होगा। हजारो लाखों की संख्या में अदालतो में मुकदमें कई सालो से लटके हुए है और निर्णय का इंतजार कर रहे है। नारी लगातार पितृसत्तात्मक मानसिकता का शिकार के कारण लैंगिक भेदभाव, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, असमान वेतन, कम स्वास्थ्य सुविदा और सुरक्षा जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। इसके साथ-साथ शिक्षा और शिक्षा के अवसरों में कमी, कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह और हर जगह कार्य स्थलो पर सुरक्षा उनकी प्रगति के लिए एक रूकावट बनती रही है। आज समाज सें संधर्ष करते हुए इस तरह की परिस्थितियों से जूझती हमारी आधी आबादी ने अनेक मुकाम हासिल तो किए है पर ये अभी केवल एक संख्या व आंकडों के रूप में हमारे सामने मिलते तो है पर वास्तविकता कुछ अलग ही लगती है,आज भी इस ओर हमें और अधिक ध्यान देने की जरूरत है। लौंगिक असमानता और भेदभाव- लड़कों की तुलना में लड़कियों को हर तरह से कम प्राथमिकता देना, हिंसा और सुरक्षा- घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न,दहेज प्रथा, एसिड अटैक और आजकल मानव तस्करी जैसे मामले बहुतायत में हमारे सामने समाचारों के माध्यम से पढ़ने और सुनने में रहे इससे नारी का आत्मविश्वास दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है। और जहाँ इसका प्रतिशत कम है वहाँ प्रगति का प्रतिशत निश्चित ही कुछ अधिक है,। पितृसतात्मक मानसिकता का आज भी परिवार में सुरक्षा आदि का बहाना करते हुए महिलाओं को केवल घर के कामों के लिए ही(खाना बनाना, बच्चे संभालना) से अलग कुछ करने की छूट नहीं है और शिक्षित होने के बावजूद किसी प्रकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया में नारी को दूर रखा जाता है परंतु आजकल कुछ अपवाद के रूप में और बहुत जगहों पर उनका वर्चस्व देखने को मिल रहा है यह सब अच्छे संकेत है, क्रमशः 60,70, 80 और 90 के दशक तक आते आते महिलों की स्तिति मे अनेक सुधारों से इसकी प्रगति दिखाई दे रही है। यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण धीरे धीरे समाज की लैंगिक असमानता को भरने के प्रयास में सहयोग प्रदान कर रहे है। इसी क्रम में आर्थिक और रोजगार चुनौतियां कामकाजी महिलाओं को समान कार्य के लिए पुरूषों से कम वेतन मिलना व असुरक्षा की स्थिति में आजकल बहुत सुधार हो गये है महिलों को भी समान वेतन मिलने लगा है। आज हमारे सामने क्रिकेट खेल की महिला खिलाड़ियों व पुरूष खिलाड़ियों को समान राशि मिलने लगी है। उसी प्रकार अन्य जगहों पर भी जागरूकता का आना स्वभाविक है। महिलाओं में स्वास्थ्य व पोषण को लेकर कुछ समस्याएं है जैसे कुपोषण व एनीमिया (खून की कमी) से पीडित है। आधुनिकता की दौड़ में डिजिटलीकरण के अनेक साधनों व उसकी उपयोगिता का व साइबर-उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ रहा है।  

                          

आज हमारे सामने समाज में हर दिन स्त्रियो पर हो रहे अत्याचारो का ग्राफ वर्ष दर वर्ष कुछ  इस तरह उठान की ओर जाता चला जा रहा गर हम इसके इस ग्राफ को समय रहते रोकने में सक्षम नहीं हो सकेगें तो आने वाले समय में हमारी स्थिति का आंकलन करना बहुत कठिन ही नहीं असंभव सा प्रतीत होने लगेगा। हमारे सामने अनेक महिलआं के नाम है जो अपने अपने क्षैत्र के शीर्ष पर रहे जिसमें कला, खेल, विज्ञान, राजनीति, साहित्य और वाण्जिय जैसे हर क्षेत्र में  भारतीय नारी ने अपने संधर्ष के दम पर उस मुकाम को पाया है और जो राष्ट्र का ही नहीं विश्व का गौरव बनकर उभरा उनमें कुछ प्रमुख नाम इस प्रकार हैः-कला और मंनोरंजन-एम.एस.सुब्बालक्ष्मी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले । खेलः- पी.टी.उषा, कुंजरानी देवी, डायना इडलजी, साइना नेहवाल, कर्णम मलेश्वरी। राजनीतिः-सरोजनी नायडू, इंदिरा गांधी। साहित्यः महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, आशा पूर्णा देवी आदि लंबी सूची है। हमारे सामने महिला जागरूकता के प्रश्न उनके जीवन में आत्मनिर्भरता के जो विचार है उसमें वो कुछ अपने लिए और उसमें कहीं पर उनकी आर्थिक विवशता के कारण काम करना जरूरी हो जाता है। वहीं कुछ आर्थिक स्वतंत्रता और विशिष्ठ पहचान के लिए काम करती है। इस तरह. कामकाजी महिला का परिवार में और कार्यालय में दोहरी मार सहती परिवार और राष्ट्र के विकास में सहयोग प्रदान करते हुए। समानता के अधिकारों के प्रति जागरूकता के लिए आजकल दोनों पक्ष इस ओर अपना पूरा सहयोग करता है। अनेक कठिनाईयों के साथ-साथ नारी हर प्रकार से इस जंग में सहयोग करती  रही है, और अपने अस्तित्व के प्रति सजग रहते हुए हर तरह से

मजबूती प्रदान करती है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं को एक सजगता प्रदान करने की एक पहल है।

संधर्षरत सभी महिलाओं को उनके उदेश्य की पूर्ति जल्द से जल्द होती रहे इसी शुभकामना के साथ साधुवाद। 

चिरंजीव

लिंगम चिरंजीव राव

(संकलन व स्वतंत्र लेखन)

म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग

इच्छापुरम, श्रीकाकुलम(आन्ध्रप्रदेश) --पिन 532 312 मों.न. 8639945892.