कैसे मुक्ति मिलेगी डंडा बैंकों से 

आलोक एम इन्दौरिया (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है)

भारत जैसे विकासशील देश में जहां बैंकिंग नेटवर्क ग्रामीण स्तर तक फैला हुआ है, राष्ट्रीयकृत बैंकों के अलावा ग्रामीण अंचल में बैंकिंग सुविधा देने के लिए ग्रामीण बैंक बनाए गए हैं उस स्थिति में अनाप-शनाप ब्याज वसूल करने वाले जिन्हें डंडा बैंक के नाम से जाना जाता है न केवल गरीब निम्न वर्ग के बीच वल्कि जरुरतमंद काम काजी लोगों के गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं क्योंकि वक्त जरूरत पर वे आंसू कर्ज लेने की गल्तीकर बैठते हैं। इन डंडा बैंकों की करगुजारियों,दहशत और गुंडई के चलते देश में  हजारों लोग आत्महत्या तक कर चुके हैं। हाल ही में यूपी के सहारनपुर के सर्राफा कारोबारी सौरभ का पत्नी समेत नदी में कूद कर जान दे देना और मध्य प्रदेश के गंजबासोदा मै सूद खोरी के चर्चित कारोबार के चलते डंडा बैंक की प्रताड़ना से तंग आकर एक व्यक्ति के द्वारा आत्महत्या का प्रयास किया जाना जैसे ऐसे सैकड़ो मामले आप सभी की नजरों में होंगे जो रूह कंपाने के लिए काफी हैं।

देश में बैंकिंग सेवाओं के नेटवर्क की सुदूर क्षेत्र तक पहुंचाने के बाद भी सूदखोरी एक नासूर बन गयु है जिसका स्थाई इलाज दिखाई नहीं दे रहा। बेशक बैंक अपनी जटिल  रिण प्रक्रिया को सरल बनाने का दावा करती हों, क्रेडिट कार्ड जैसी चीजें अब आम हो गई है ।बाबजूद आज भी बैंक से रिण और क्रेडिट कार्ड हासिल करना आज भी उतना आसान नहीं है जितना बैंक के विज्ञापनों में दिखाई देता है। बैंक से रिण हासिल करने की सभी नियम और प्रक्रिया उन लोगों के लिए बेहद आसान  होती है जो यह तो नौकरी पेशा हैं  ये फिर स्थापित मंझले और बड़े व्यापारी है। सवाल यह है की जो इन दोनों श्रेणियां में नहीं आता वह धन की आवश्यकता पड़ने पर जाएं कहां? आज भी  आम आदमी या उस बिना पढ़े-लिखे ग्रामीण के लिए बैंक से कर्ज लेना बहुत मुश्किल होता है ।अपनी घरेलू जरूरत और छोटे-मोटे व्यापारों के लिये ऐसी स्थिति में आम आदमी मजबूरन सूदखोर के पास चला जाता है जहां उसे बहुत ही आसानी से कर्ज मिल जाता है ।मगर बदले में उसे सूदखोर की मनमानी शर्तें माननी पड़ती है। एक बार फंसने के बाद इन सूदखोरों के पंजे से निकलना नामुमकिन ही हो जाता है जिसके चलते कर्ज में फंसने वालों कीआत्महत्या का ग्राफ बहुत तेजी से बड़ा है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस एनएसएसओ के मुताबिक 2012 और 2018 के सर्वे के आंकड़ों में बताया गया है कि 2012 में देश के शहरी इलाकों में 22.4% परिवारों पर कर्ज था जो 2018 में लगभग इतना ही रहा था। लेकिन 2012 में ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 31% था जो 2018 में 35% से अधिक पहुंच गया यानी इससे साफ होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज के जाल में लोग अधिक फस रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की आंकड़े बताते हैं कि भारत में कर्ज कितना जानलेवा बनता जा रहा है एजेंसी पर आत्महत्या के 2022 तक के आंकड़े मौजूद है जिससे ज्ञात होता है कि भारत में होने वाली 100 में से हर चौथी आत्महत्या कर्ज या आर्थिक परेशानी के कारण होती है 2022 में देश भर में 170000 लोगों ने खुदकुशी की थी जिसमें से 7000 से ज्यादा लोग ऐसे थे जिन्होंने कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या की थी ।इस हिसाब से हर दिन औसतन 19 लोगों ने सुसाइड किया ।आंकड़े यह भी बताते हैं कि 2018 से 2022 के बीच 5 साल में कर्ज से परेशान होकर 29000 से अधिक लोग आत्महत्या कर चुके हैं। हर राज्य में अपने-अपने साहूकारी अधिनियम लागू है जिन्हें अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है जैसे की मध्य प्रदेश मे ट्राइबल क्षेत्र को छोड़कर साहूकारी अधिनियम लागू है। जिसमें शहरी क्षेत्र में नगर निगम और नगर पालिका और ग्रामीण क्षेत्रों में नगर परिषद को मनी लैंडिंग का लाइसेंस जारी करने का अधिकार है। बिना लाइसेंस सूदखोरी करना और वसूली करने के लिए किसी को प्रताड़ित करना गंभीर अपराध है ।ऐसे मामले में दोषियों को मध्य प्रदेश रन संरक्षण अधिनियम 1937 की धारा 4 के तहत ऋण वसूली के लिए उत्पीड़न पर सिर्फ तीन माह की सजा या ₹500 का जुर्माना अथवा दोनों सजा एक साथ देने का अधिकार है। आप खुद अंदाज लगा ले की क्या इतने बड़े अपराध में इतनी छोटी सी सजा काफी है ? पूरे मामले में मार्के की बात यह है  कि कार्रवाई के नियम तो है लेकिन निगरानी का कोई ऐसा तंत्र नहीं है जो यह देखें कि कर्ज देने वाला सूदखोरी तो नहीं कर रहा ?  यह सच है कि ब्याज पर पैसा चलने वाले लोग 5 से लेकर और 30%  ब्याज पर पैसा उधार देते हैं और हालात से मजबूर इसे लेते भी हैं और मन मानी शर्तें तथा पैनाल्टी बसूलते हैं। उधार में ली गई ऐसी राशियों का ब्याज इतना ज्यादा होता है कि कई बार मूलधन के बराबर राशि चुकाने के बाद भी कर्ज तो दूर ब्याज खत्म नहीं होता। यही वजह है कि ब्याज चुकाते चुकाते कर्ज लेने वालों का जीवन बीत जाता है और इसी के चलते कर्ज लेने वाले तमाम लोग आत्महत्या कर लेते हैं ।और मजे की चीज है कि कई बार कर्ज लेने वालों को प्रतिदिन 8 से 15% के हिसाब से ब्याज देना पड़ता है आसानी से उधार मिलने के चक्कर में अधिकतर लोग गुंडो के कर्ज में फंस जाते हैं और उन गुंडो का आतंक कभी खत्म नहीं होता। अधिकतर सूदखोर जरूरतमंद से ब्लैंक चेक पर हस्ताक्षर करवा कर अपने पास रख लेते हैं और कई बार पूरा पैसा लौटा देने के बाद भी कर्ज देने वाले को यह चेक नहीं लौटते और उसे बैंक में लगाकर बाउंस की धमकी देते हैं और वसूली करते हैं। हैरत की बात यह हे कि वसूली हुए ब्याज के पावती की कोई रसीद भी नहीं देते।कई बार प्रॉपर्टी के दस्तावेज ,गहने तक ये सूदखोर गिरवी रख लेते हैं और प्रॉपर्टीयों पर कब्जा कर लेते हैं ।इसके चलते सैकड़ो लोग आत्महत्या कर चुके हैं लेकिन किसी सूदखोर के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई हुई हो ऐसा देखने में नहीं आता। बरहाल अब समय है कि गरीब लोगों का खून चूस रहे इन डंडा बैंकों की कमर तोड़ी जाए। इसके लिए आवश्यक है कि उन लोगों का नियमन किया जाए जो बिना साहूकारी लाइसेंस पर इस काम को करते हैं। जितने भी डंडा बैंक है उनके पास कोई भी साहूकारी लाइसेंस नहीं है लेकिन उनके पास राजनीतिक रसूख जरूर होता है जिसकी दम पर वह अपने कारोबार को इस तरीके से खड़ा करते हैं कि उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर पाता। इसके अतिरिक्त हर जिले में पुलिस प्रशासन सूद खोरी के खिलाफ डुगडुगी पिटवा कर अभियान चलाए ताकि पीड़ित उन तक आकर अपनी बात कर सके और उसे न्याय मिल सके। साहूकारी लाइसेंस नगर पालिका और नगर निगमन से हटकर जिला कलेक्टर के अधीन होना चाहिए और लाइसेंस जारी करने से पूर्व पुलिस अधीक्षक के अनुशंसा अतिआवश्यक होना चाहिए और हर थाने में इन सूद के काम करने वाले का रिकॉर्ड भी होना चाहिए। इसके अतिरिक्त एक ऐसी व्यवस्था होना चाहिए जो हर 3 महीने में इन साहूकारों के काम की चेकिंग कर सके। इसके अतिरिक्त डंडा बैंक के सूदखोरों के खिलाफ गैर जमानती कड़े कानून का प्रावधान भी होना चाहिए ताकि सख्ती के चलते यह अवैध वसूली न कर सके। सरकारी स्तर पर ऐसे इंतजाम भी हो की मुश्किल के वक्त में हर जरूरतमंद को आसानी से बैंक का लोन मिल सके इसके लिए बैंकों को थोड़ी उदारता दिखानी होगी और नियमों का सरल बनाकर हर जरूरतमंद को रिण उपलब्ध कराने की राह खोलनी होगी। यदि सरकार ऐसा करने में सफल रही तो हजारों लोग जो सूदखोरों के आतंक के कारण आत्महत्या करते हैं उनके जीवन के साथ-साथ उनके परिवारों को बचाया जा सकेगा और इसके लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे।