‘‘सर" शब्द की इतनी ‘‘बेइज्जती" कभी हुई है क्या?
राजीव खण्डेलवाल (लेखक कर सलाहकार)
‘‘सर" शब्द की इतनी ‘‘बेइज्जती" कभी हुई है क्या?
"सर" मतलब ‘‘सम्मान" या?
देश का हर पढ़ा-लिखा वर्ग—चाहे वह स्कूल, कॉलेज या उच्च शिक्षा से जुड़ा हो—"सर" शब्द को जीवन भर सम्मान का प्रतीक मानता है। माता-पिता के बाद, शिक्षा देने वाला गुरु ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक होता है, जिसे हम सिर झुकाकर ‘‘सर" कहकर संबोधित करते हैं। भारतीय परंपरा में गुरु को ‘‘परब्रह्म" का दर्जा मिला है—जीवन की दिशा और परलोक की दशा तय करने वाला तत्वज्ञानी। गुरुकुल परंपरा में वरिष्ठ छात्र को भी आजीवन ‘‘सर" कहकर ही पुकारा जाता था। लेकिन इन दिनों देश में जिस ‘‘सर" (SIR – Special Intensive Revision, विशेष गहन पुनरावलोकन) की चर्चा है, वह सम्मान के बजाय विवाद और छीछालेदर का कारण बन गया है।
"विशेष गहन पुनरावलोकन"(सर)’’ कोई कानूनी बाध्यता नहीं।
निर्वाचन आयोग ने अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21 के अधीन प्राप्त पुनरावलोकन के अधिकार के तहत, बिहार में सटीक व पारदर्शी मतदाता सूची तैयार करने हेतु 24 जून 2025 से ‘‘सर" SIR एसआइआर मतलब "स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिवीजन" अर्थात "विशेष गहन पुनरावलोकन की कार्रवाई शुरू की है। इसका उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना है। बिहार में यह करवाई इसके पूर्व वर्ष 2003-04 में की गई थी।
गौरतलब है कि जनवरी 2025 में विशेष संक्षिप्त पुनरावलोकन (SSR 2025) पहले ही पूरा हो चुका था। स्कूल राहुल खान का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना था, जो एक नियमित प्रक्रिया है। कानूनी रूप से इस समय या कदापि ‘‘सर" की आवश्यकता नहीं थी, परंतु निर्वाचन आयोग ने अपनी ‘‘निष्पक्ष" छवि को मजबूत करने के उद्देश्य से निहित, इनबिल्ट सम्मान की भावना से "सर" की कार्रवाई शुरू की।
"विवाद और सवाल।"
कहा जाता है कि भाग्य दो कदम आगे चलता है, दुर्भाग्यवश प्रथम ग्रास मक्षिका पात: की युक्ति को चरितार्थ करते हुए दुर्भाग्य से, शुरुआत से ही ‘‘सर" विवादों में घिर गया। मीडिया और खासकर अजीत अंजुम की ग्राउंड रिपोर्टिंग ने इसे ‘‘विष घुला स्वर्ण कलश" की संज्ञा दी। राहुल गांधी ने जनता को आगाह करते हुए की "तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा" तथाकथित साक्ष्यों के साथ रिसर्च रिपोर्ट प्रस्तुत कर मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को पाँच श्रेणियों में सूचीबद्ध कर आयोग से जवाब माँगा। 300 सांसदों का आयोग की ओर मार्च और उस पर हुई पुलिस कार्रवाई ने मामले को और तूल दे दिया।
निष्पक्षता से सर की कार्रवाई की जरूरत।
भारतीय परंपरा में ‘‘सिर" झुकाना सम्मान है, लेकिन ‘‘सर" (गुरु) को झुकाना नहीं। आयोग पर यह आरोप है कि उसने आरोपों का निराकरण करने के बजाय उलटे ‘‘बे-सिर-पैर" के बयान दिए, जिससे ‘‘सर" शब्द का मान घटा। इसलिए हम चुनाव अलग से ही अनुरोध कर सकते हैं कि वह अरुण नहीं और एकलव्य की गुरु आरुणि और एकलव्य की गुरु भक्ति के परंपरा वाले इस देश में "सर" की ऐसी की तैसी न करें।आयोग को चाहिए कि ‘‘सर" के मूल उद्देश्य—निष्पक्ष मतदाता सूची—को ईमानदारी से धरातल पर उतारे।
‘हँड़िया मेँ एक चावल देखा जाता है’’।
चुनाव आयोग द्वारा त्रुटिहीन मतदाता सूची के उद्देश्य को लेकर व्यापक पैमाने पर ‘‘सर" की कार्रवाई की जा रही है, जहां प्रत्येक मतदाता को ‘‘गणना फॉर्म (Enumeration Form)’’अनिवार्य रूप से भरकर स्थानीय ‘‘बीएलओ" को देना है। वहीं ‘‘बीएलओ" का भी यही कार्य है कि, वे घर-घर जाकर प्रत्येक मतदाता से फार्म भरवायें। तब बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के मतदाता सूची में दो बार नाम कैसे आ जाता है? प्रश्न यह है? विजय सिन्हा का इस संबंध में स्पष्टीकरण की मैंने पहले अप्रैल 2024 में और अभी ‘‘सर" की कार्रवाई के बाद 1 अगस्त को मतदाता सूची प्रकाशित होने के पश्चात, 5 अगस्त को फिर से आवेदन एक जगह से नाम काटने के लिए दिया है, स्वयं को तो निर्दोष सिद्ध करते हैं, लेकिन चुनाव आयोग को ‘‘नहीं"। विपरीत इसके, विजय सिन्हा का स्पष्टीकरण चुनाव आयोग को ही कटघरे में डालता है, वह इसलिए कि वे यह नहीं कह रहे हैं कि मैंने दो गणना फॉर्म भरे हैं। विजय सिन्हा कोई सामान्य आदमी नहीं है, जिनको लेकर कोई लिपिकीय त्रुटि दो बार नाम आने की हो जाए?
बीएलओ पर कम समय में लक्ष्य पूरा करने का दबाव।
मतलब साफ है कि बीएलओ ने तय कम समय सीमा में उनके क्षेत्राधिकार में आने वाले समस्त मतदाताओं का निरीक्षण फॉर्म भरवाने के चुनाव आयोग के उच्च अधिकारियों के दबाव के चलते लक्षित उद्देश्य की पूर्ति हेतु उनिरीक्षण फॉर्म कई जगह घर बैठे भर कर अपलोड कर दिये जैसा की यू ट्यूबर अजीत अंजुम की ग्राउंड जीरो रिपोर्ट से लेकर सोशल मीडिया बीएलओ की ऐसी कार्रवाइयों के वीडियो से भरा पड़ा है। तब ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग द्वारा राजनैतिक पार्टियों से ‘‘चर्चा किये बिना" बिहार में होने वाले आम चुनाव के पूर्व अचानक ‘‘सर" का निर्णय लेने पर कहीं न कहीं प्रश्न चिन्ह लगना लाजमी है। जिन पवित्र उद्देश्यों को लेकर यह बड़ी कवायद "सर" की जा रही है, जिसमें लगभग 1500 से 2000 करोड़ रूपया खर्च हो होने का अनुमान है। बावजूद इसके मतदाता सूची की पुरानी कमियां, त्रुटियों की पुनर्रावृति, बीएलओ की गलती, अकर्मणता, कार्यप्रणाली व असावधानी के चलते ही असफल सिद्ध हो रही है। इससे विपक्ष को एक आरोप, लगाने के लिए धारदार हथियार मिल जाता है।
"सिर्फ केवल 30 सांसदों को अनुमति। आयोग का सही निर्णय।"
राहुल गांधी के नेतृत्व में 300 सांसदों को आयोग से मिलने की अनुमति नहीं दी गई, केवल 30 को बुलाया गया। 27 में से 6 दलों के कोई सांसद नहीं हैं, ऐसे में 21 दलों का प्रतिनिधित्व पर्याप्त था। इस प्रकार 21 नेताओं जो 300 साल प्रिंट करते हैं से 9000 शब्दों को निमंत्रित करना निर्वाचन आयोग की वैसे ही मेहरबानी है, जैसे पुराने जमाने में जब हम आम बाजार में खरीदने जाते थे तब 100 हम घर पर पांच पुरोनी मिलती थी। आयोग का यह निर्णय तार्किक था, परंतु विपक्ष ने इसे भी राजनीतिक मुद्दा बना दिया।
भविष्य के संकेत ठीक नहीं?
आयोग ने ‘‘सर" मामले में उच्चतम न्यायालय के सुझावों को भी गंभीरता से नहीं अपनाया, जिससे सरकार, विपक्ष और आयोग—तीनों के बीच संवाद के रास्ते बंद हो गए। डर यह है कि कहीं ‘‘सर" का अंजाम नोट बंदी की तरह विवादित और बेनतीजा न हो।
निष्कर्ष।
निर्वाचन आयोग के लिए यह समय अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता सिद्ध करने का है। ‘‘सर" शब्द को सम्मान लौटाने का एकमात्र तरीका है—त्रुटिहीन मतदाता सूची बनाना और जनता को यह भरोसा दिलाना कि ‘‘ये पब्लिक है, सब जानती है" कोई खोखला जुमला नहीं।
जेपी आंदोलन की उर्वरक भूमि बिहार की ही थी, कुछ लोगों की नजर में सांसदों के मार्च-पास्ट से जेपी आंदोलन समान आहट तो नहीं? जेपी आंदोलन से निकली भाजपा तथाकथित कोई भी आंदोलन की आहट को भांपने में सक्षम है। वैसे यह बहुत दूर की कौड़ी है। इसलिए है कि जेपी आंदोलन जैसे नेता आज है कहां? लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जेपी आंदोलन से पैदा नेता में जेपी की छाप कहीं बच गई है क्या?


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