हरिशंकर परसाई जन्म- 22-08-1924 - जयंती 22-08-2025

“कलम जिनकी किसी से ड़री नहीं, कभी झुकी नहीं, ऐसे रचनाकारों में हरिशंकर परसाई का नाम साहित्य के इतिहास में अमिट अक्षरों में लिखा गया है।” “व्यंग्य को आधुनिकता के पाठ के साथ शब्दों का ताना बाना बुनते-चुभते व्यंग्य भाषा के सहज व्यंग्कार हरिशंकर परसाई” हरिशंकर परसाई 22-08-1924  हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार थे। उनका जन्म जमानी, होशंगाबाद मध्यप्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य के माध्यम से उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती है, जिनसे किसी भी और राजनैतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन–मूल्यों के अलावा जीवन पर्यन्त साहित्य सृर्जन की भी अपनी अलग पहचान बनायी है।  उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा–शैली में खास किस्म का अपनापन महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है। ठिठुरता हुआ गणतंत्र की रचना हरिशंकर परसाई ने किया जीवन 11 की उम्र में वन विभाग में नौकरी की।  खंडवा में 6 महीने अध्यापन।  1941-1943 जबलपुर में स्पेस ट्रेनिंग कॉलेज में शिक्षण की उपाधि ली। 1942 से वहीं माडल हाई स्कूल में अध्यापन किया । 1952 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी। 1953 से 1957  तक प्राइवेट स्कूलों में नौकरी। 1957 में नौकरी छोड़कर स्वतन्त्र लेखन की शुरूआत। जबलपुर से 'वसुधा' नाम की साहित्यिक मासिकी निकाली, नई दुनिया में 'सुनो भइ साधो', नयी कहानियों में 'पाँचवाँ कालम' और 'उलझी–उलझी' तथा कल्पना में 'और अन्त में' इत्यादि कहानियाँ, उपन्यास एवं निबन्ध–लेखन के बावजूद मुख्यतः लेखक है-व्यंग्यकार के रूप में विख्यात है. परसाई का व्यंग्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं है। उन्होंने अपने व्यंग्य के द्वारा बार-बार पाठकों का घ्यान व्यक्ति और समाज की उन कमजोरियों और विसंगतियों की ओर आकृष्ट किया है जो हमारे जीवन को दूभर बना रही है। न्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन मे व्याप्त भ्रष्टाचार एवं शोषण पर करारा व्यंग्य किया है। जो हिन्दी व्यंग -साहित्य में अनूठा है। परसाई जी अपने लेखन को एक सामाजिक कर्म के रूप में परिभाषित करते है। उनकी मान्यता है कि सामाजिक अनुभव के बिना सच्चा और वास्तविक साहित्य लिखा ही नही जा सकता। परसाई जी मूलतः एक व्यंगकार है। सामाजिक विसंगतियो के प्रति गहरा सरोकार रखने वाला ही लेखक सच्चा व्यंगकार हो सकता है। परसाई जी सामायिक समय का रचनात्मक उपयोग करते है। उनका समूचा साहित्य वर्तमान से मुठभेड़ करता हुआ दिखाई देता है। परसाई जी हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा को एक नई पहचान दी और उसे एक अलग रूप प्रदान किया, इसके लिए हिन्दी साहित्य उनका ऋणी रहेगा।
•    कहानी–संग्रह: हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, भोलाराम का जीव।
•    उपन्यास: रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, ज्वाला और जल।
•    संस्मरण: तिरछी रेखाएँ।
•    लेख संग्रह: तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेइमानी की परत, अपनी अपनी बीमारी,प्रेमचंद के फटे जूते , माटी कहे कुम्हार से, काग भगोड़ा, आवारा भीड़ के खतरे, ऐसा भी सोचा जाता है, वैष्णव की फिसलन, पगडण्डियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, उखड़े खंभे , सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रद्धा का दौर, तुलसीदास चंदन घिसैं, हम एक उम्र से वाकिफ हैं, ।बस की यात्रा
•    परसाई रचनावली (सजिल्द तथा पेपरबैक, छह खण्डों में; राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित ।
पुछिए परसाई से---परसाई जबलपुर व रायपुर से प्रकाशित अखबार देशबंधु में पाठको के प्रश्नों के उतर देते थे उस कालम का नाम पुछिए परसाई से था। इश्किया और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे ।धीरे-धीरे परसाई जी ने लोगों को राजनैतिक प्रश्नों भी उठाए । दायरा अंतर्राष्ट्रीय हो गया । उनकी कृतियों में उपन्यास- रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, ज्वाला और जल; कहानी-संग्रह- हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे; व्यंग्य निबंध संग्रह- तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, ‘पगडण्डियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, प्रेमचंद के फटे जूते, आवारा भीड़ के खतरे, सदाचार का ताबीज, अपनी अपनी बीमारी, दो नाक वाले लोग, काग भगोड़ा, माटी कहे कुम्हार से, ऐसा भी सोचा जाता है, विकलांग श्रद्धा का दौर, तिरछी रेखाएँ और संस्मरणात्मक निबंध- हम एक उम्र से वाकिफ हैं, जाने पहचाने लोग शामिल है। हरिशंकर परसाई के लेखन की यह विशेषता है कि वे केवल विनोद या परिहास के लिए नहीं लिखते. उनका सारा लेखन सोद्देश्य है और सभी रचनाओं के पीछे एक साफ-सुलझी हुई वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि है, जो समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार, ढोंग, अवसरवादिता, अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता आदि कुप्रवृत्तियों पर तेज रोशनी डालने के लिए हर समय सतर्क रहती है. उनके कहने का ढंग चाहे जितना हल्का-फुल्का हो, किन्तु हर निबंध आज की जटिल परिस्थितियों को समझने के लिए एक अन्तर्दृष्टि प्रदान करता है। सच्चा व्यंग्य जीवन की समीक्षा होता है। यह मनुष्य को सोचने के लिए बाध्य करता है। चेतना में हलचल पैदा करता है और जीवन मे व्याप्त मिथ्याचार, पाखंड, असामंजस्य और अन्याय से लड़ने के लिए तैयार करता है. व्यंग्य मानव सहानुभूति से पैदा होता है। वह मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाना चाहता है। ‘पगडंडियों का जमाना’ पुस्तक मे हिंदी के सबसे सशक्त और लोकप्रिय व्यंगेयकार हरिशंकर परसाई जी के लगभग दो दर्जन निबंध संगृहित है। ऩई कहानियाँ, धर्मयुग, ज्ञानोदय आदि प्रमुख पत्रिकाओं मे प्रकाशित हो चुके है। शीर्षक निबंध, जिसके आधार पर पूरी पुस्तक का नामाकरण किया गया है। आज के इस ज्वलंत सत्य को उदघाटित करता है कि सभी लोग की वास्तविकता के किसी पक्ष पर चुटीला व्यंग्य करता है। हरिशंकर परसाई देश में सियासत पर व्यंग्य के जागरूक प्रहरी रहे है। ऐसे प्रहरी जो खाने सोने वाले तृप्त आदमियों की जमात मे हमेशा जागते और रोते रहे उनकी रचनाओं मे जो व्यंग्य है। उसके उत्प्रेरक तत्व यही रोना है कहते है रोने से ही,, रोनेवाले हमारे बीच बहुत है । उनका मानस झरना बन जाता है उनका जी हल्का हो जाता है,, करते है और फिर रोते है,,हल्का होता है। शोकमग्नता आत्घाती भी है। 

                                                                                                             

इनके कुछ व्यंग्य बाण—

()वोट देने वाले से लेकर साहित्य-मर्मज्ञ तक जाति का पता पहले लगाते है।
() कुछ के जिंदा होने का एहसास सिर्फ जन्म-दिन पर होता है।
()आदमी की शक्ल में कुते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चे कुत्ते से बहुत डर लगता हूँ ।
()जिस दिन घूसखोरो की आस्था भगवान से उठ जाएगी,उस दिन भगवान को पूछनेवाला कोई नहीं रहेगा ।
()कलह से सस्ता मंनोरजन और क्या होगा।
()दुनिया में सब लड़ाई को बुरा बोलते है। सब शांति की इच्छा रखते है, पर सब हथियार बनाते जा रहे है।
()पाठ्यपुस्तक से कुंजी ज्यादा बिकती है।
() अच्छा उदाहरण एक बार बन जाने पर आदमी अच्छाई का गुलाम बन जाता है।
()भूखमरी और भ्रष्टाचार हमारी राष्ट्रीय एकता के सबसे ताकतवर तत्व बन गये है। धर्म, संस्कृति और दर्शन कमजोर पड़ गये है।
()युध्द सफलता से तभी लडा जा सकता है जब उसके सही कारण जनता को मालूम न हो ।
() धर्म का उपयोग तो अब दंगा कराने के लिए ही रह गया है।
()दूसरे के मामले में हर चोर मजिस्ट्रेट हो जाता है ।
() सार्वजनिक जीवन में हर वह मौका जहाँ कैमेरा हो, उत्सव होता है और उत्सव के नायक हंसने लगते है।
()कुकर्मों का एक खाता बंद करके नया खाता खोलना ही सन्यास है ।
()सरकार मौसम के मुताबिक रोल अदा करती है ।
()राजनीति में शर्म केवल मूर्खो को आती है । 
()ईमानदारी कितनी  दुर्लभ है ,कभी कभी अखबार का शीर्षक बन जाती है ।
()पुलिस गुण्डों की सगी मां और भले नागरिकों की सौतेली मां होती है ।
()असल अनाथ तो वह है जो अनाथालय चलाते है ।
()मनुष्य एक सीमा तक किसी के उत्कर्ष से ईर्ष्या करता है, उसके बाद वे उसके लिए श्रध्दा की वस्तु बन जाता है।
()आप अगर पुस्तकों की भूमिका देखें, तो आपको यह आभास होगा कि हर लेखक स4वश्रेष्ट है, हर कृति उत्तम और युगांतरकारिणी है। सफेद झूठ और काले झूठ के साथ भूमिका झूठ भी होता है।
() पुरस्कार देनेवालों को अच्छी लगनेवाली बात लिखने के लोभ में कितनी बार आत्मा की आवाज दबानी पड़ती है।
()अच्छा व्यंग्य सहानुभूति का सबसे उत्कृष्ट रूप होता है।
हिंदी साहित्य में व्यंग्य को व्यापक स्वीकृति एवं साहित्यिक दर्जा दिलाने वाले हरिशंकर परसाई हमारे ग्रेट मास्टर्स में से एक है। गद्य लेखन के व्दारा उन्होंने जो रचनात्मक लड़ाई लड़ी, वह उन्हें दुनिया के उन चुनिंदा रचनाकारों में प्रतिष्ठित करती है, जिन्होंने एक विषम तथा बंधे हुए समाज को आमुल बदलने के लक्ष्य को कभी नहीं छोड़ा। कथाकार, उपन्यासकार , स्तंभकार एवं संपादक के रूप में ऊँचाइयाँ छूने वाले परसाई की भाषा वहीं है जिसमें वे बोलते थे। उनकी भाषा कबीर-शैली की बेबाकी से तथा प्रेमचंद की सर्वकालिकता से जुड़ी हुई है। उन्होंने लोक-शिक्षण का अतुलनीय काम अपनी कलम से किया। उनके लिखे व्यंग्यों का नाटय-रूपांतरण खूब हुआ है और यह आज भी जारी है। परसाई किसी विशिष्ठ हास्य के कायल नहीं है क्योंकि वे जानते है कि शिष्ठ हास्य में शोषक शक्तियाँ सुरक्षित रहती है। भ्रष्टाचारी तो यही चाहेगा कि आप पत्नी, साला, नौकर, मुशीं और अन्य कमजोरों का उपहास करते हुए शिष्ट हास्य लिखते रहें। मनष्युता-विरोधी विसंगति और विद्रूपताओं पर घ्यान न दें। व्यंग्य में चोट होती है, जिन पर यह होती है, वे कहते है- इसमें कटुता आ गई है, शिष्ट हास्य लिखा करिए। उनकी कथा-दृष्टि समकालीन भारतीय समाज और मनुष्य जीवन की विसंगतियों और अंतर्विरोधों तक पहुँचती है और हिंदी के साहित्यिक इतिहास में एक सकारात्मक भूमिका निभाती है। कोई भी विचार तभी अस्तित्व पाता है या आता है जब वह वाणी ग्रहण करता है। प्रत्येक शब्द के पीछे एक विचार होता है. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, सही या गलत, विभिन्न अर्थो में और विषयों में, घ्वनियों और गंधों में एक शब्द अपने मे हमारी तमाम भावनाओं को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है। साहित्यिक भाषा विचार-वहन का एक सशक्त माध्यम है। परसाई जी के व्यंग्य की शिष्टता का संबंध उच्चवर्गीय मनोरंजन से न होकर समाज मे सर्वहारा की इस लड़ाई से अधिक है । जो आगे जाकर मनुष्य की मुक्ति से जुड़ती है।  
इस जीवनी को लिखने के दौरान एक महान साहित्यकार व व्यंग्कार कालजयी “राग दरबारी” के लेखक महोदय के साथ उनके स्मरण के कुछ अंश आप सभी की नजर करना चाहता हूँ जिससे सदी को दो व्यंग्कार के विषय में स्पष्टता आएगी । श्रीलाल शुक्ल जी कहते है उनको हमने पहली बार 1956-57 में देखा था। उसके पश्चात उनसे पूछे गये प्रश्न में हरिशंकर परसाई के व्यक्तिगत और उनकी रचनाओं के अंतर्संबंध पर आपके विचार? स्पष्ट रूप से उन्होंने जो कहा निजी तौर पर विगत 20-25 वर्षों में परसाई जी से मुलाकात का अवसर नहीं मिला। मुझे नहीं मालूम बोलने के मामले मे वे मेरी तरह है या अज्ञेय की तरह। हँसते अश्क की तरह है या कुँवर नारायण की तरह। रहन-सहन, खान-पान में मंटों या निराला के नजदीक है या पंत और बच्चन के। इस तरह निजी बातों से अपने अंजान होने की बात स्वीकारते है। और यह प्रमाण है कि कोई निजी जन-संपर्क एवं सूचना-प्रसारण नहीं है। परसाई के मन में भी आदर्श समाज की एक कल्पनाहै। जो भी हो, परसाई को एब्सर्ड को पकड़ने की आश्चर्यजनक क्षमता है कुछ उदाहरणों से इसे स्पष्ट भी करते है(मरते हुए कवि से दवा के तौर पर काव्य-पाठ कराके कवि को जिला देते है)। अगला प्रश्न राग दरबारी की लोकप्रियता बहुत अधिक रही, हिंदी साहित्य मे प्रेमचंद के बाद सबसे अधिक पढ़े जाने वाले परसाई है? जवाब में परसाई-साहित्य का एक विशाल खंड उनके व्यंग्य-निबंधों और टिप्पणियों का है, जिससे उनके अनगिनत पाठक पैदा किए है। पुरातन जर्जर मुल्यों को निर्दयता से तोड़ने वाले इस लेकक का यह पुरातन रवैया सचमुच अनोखा है। वह पाठकों तक सिर्फ अपने लेखन की मार्फत पहुँचना चाहते है। अपने निबंधों में “मैं” नामक पात्र को बार-बार बहुरंगी स्थितियों में डालते हुए भी वह असली ‘मैं’ को पाठकों के सामने बराबर गोपनीय बनाए रखते है। इसी क्रम में अनेक प्रश्न थे पर एक प्रश्न हरिशंकर परसाई ने किस रचनात्मक दबाव के तहत विधाओं के परंपरागत ढाँचे को तोड़ा? उनके व्यंग्य लेखन को ध्यान में रखते हुए क्या आप व्यंग्य को एक विधा मानते है ?  जवाब में श्रीलाल जी ने जो कुछ कहा वह इस प्रकार है –व्यंग्य के बारे में परसाई की दृष्टि साफ-सुथरी है। वे बेशुमार अर्ध्दशिक्षित लेखकों और पाठकों की तरह हास्य-व्यंग्य को एक ही पदार्थ मानने की भूल नहीं करते। यह सही है कि ‘सदाचार की तावीज ’ की  ‘कैफियत ’ नामक भूमिका में उन्होंने व्यंग्य के बारे मे अपना रूख स्पष्ट करते हुए कही-कहीं उसे हास्य से जोड़ने का का भ्रम पैदा किया है, पर यह बारह-तेरह वर्ष अर्थात शुरूआती दौर में, पहले की बात है। इधर “मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं” की भूमिका में परसाई ने व्यंग्य के क्लासिकी स्वरूप की बड़ी स्पष्ट व्याख्या की है। वे उसके उद्देश्य और रचनात्मक विधा की हैसियत से उसकी अनिवार्यता के प्रति पूर्णतः आश्वस्त है। व्यंग्य के सारे उपकरणों से लैस होकर एक सचेत कलाकार की हैसियत से वे अब तक उस मंजिल तक पहुँच गये है, जहाँ रानी नागपनी एक प्रायमरी हेल्थ सेंटर के मरीज की तरह पीछे छूट गई है। व्यंग्य लेखन के लिए उनके पास अनेक किस्म के अमोध अस्त्र-शस्त्र है, अनेक पैंतरे भी । किसी स्थिति पर वे किसी भी कोण से प्रकट होकर अचानक हमला कर सकते है और जब तक वे उसे दबोच नहीं लेते, तब तक नकी कहानी बालकथा की-सी सरलता और निर्दोष्ता से चलती रहती है। इस स्मरण में श्रीलाल जी नें कहा कि परसाई साहित्य के सूक्ष्म अध्ययन करने पर मुझे ज्ञात हुआ कि वे स्थूल राजनीति में भले ही वांमपंथी हो, नैतिक मूल्यों की दृष्टि से वस्तुतः गाँधीवादी है।
हरिशंकर परसाई जी के व्यंग्य अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लगातर छपते रहे है। उनको व्यंग्य सामान्यतः मुल्यगत विसंगतियों से संबंध्द होते है- मूल्य चाहे राजनीतिक हो, चाहे सांस्कृतिक या पीढ़ीगत. उनका लक्ष्य प्रहार करना नही होता है। वे धीरे से किंतु मूल्य के दलालो को नंगा कर देते है । संस्कारधानी जबलपुर(म.प्र.) का उनका यह शहर हरिशंकर परसाई के जीवन और लेखन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उन्होंने जबलपुर से "वसुधा" नामक पत्रिका का संपादन किया, जो उस समय की एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका थी.। परसाई जी का जबलपुर से गहरा नाता था। वे जबलपुर में ही रहते थे और यहीं से उन्होंने अपनी रचनाएँ लिखीं। उनका निधन भी 10 अगस्त, 1995 को जबलपुर में ही हुआ था.। इस शहर से मेरा लगभग 18 वर्षो का नाता रहा इसी दौरान यही पर मेरे एक साहित्यकार मित्र जो उनके शिष्य है। उनके माध्यम से बहुत कुछ जानने का सौभाग्य मिलता रहा जो मेरे लिए बहुत ही विशिष्ट और अविस्मरणीय है। महाप्रयाण-10-08-1995 हमारा उनको नमन के साथ श्रध्दाजंलि

चिरंजीव 
लिंगम चिरंजीव राव 
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)