जैसलमेर। उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ा एक अहम मामला सामने आया है, जहां जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अंतरराष्ट्रीय पेय पदार्थ कंपनी पर कड़ा रुख अपनाते हुए 2.50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई ‘माजा’ कोल्ड ड्रिंक की एक सीलबंद बोतल में प्लास्टिक का टुकड़ा मिलने के मामले में की गई। मिली जानकारी के अनुसार, शहर के ढिब्बा पाड़ा निवासी तुषार पुरोहित ने 16 जुलाई 2025 को ‘शिवम मार्केटिंग’ से 810 रुपये में माजा कोल्ड ड्रिंक का एक कैरेट खरीदा था। जब उन्होंने बोतलों का उपयोग करना शुरू किया, तो एक सीलबंद बोतल के अंदर प्लास्टिक पॉलिथीन का टुकड़ा दिखाई दिया। यह देखकर उन्होंने गंभीर आपत्ति जताई और 20 अगस्त 2025 को जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करवाई।

जांच में क्या सामने आया?

मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित बोतल आयोग के समक्ष पेश की गई। निरीक्षण में स्पष्ट रूप से प्लास्टिक का टुकड़ा पाया गया, जिससे यह साबित हुआ कि पेय पदार्थ दूषित था। जांच में यह भी सामने आया कि बोतल की पैकिंग 16 मार्च 2025 की थी, यानी करीब चार महीने तक वह दूषित अवस्था में ही बाजार में उपलब्ध रही।

कंपनी का पक्ष और आयोग का फैसला

कंपनी की ओर से दलील दी गई कि पूरी बॉटलिंग प्रक्रिया ऑटोमैटिक होती है और इस तरह की शिकायत कंपनी की छवि खराब करने के उद्देश्य से की गई हो सकती है। हालांकि, आयोग ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट कहा कि इतनी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी से इस तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं है और यह उपभोक्ता की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

45 दिन का मिला समय, देरी पर देना होगा न ब्याज

आयोग ने अपने आदेश में कंपनी और संबंधित पक्षों को दोषी मानते हुए दो लाख रुपये राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराने का आदेश दिया। परिवादी को मानसिक एवं आर्थिक क्षति के रूप में 40 हजार रुपये देने के निर्देश दिए। साथ ही 10 हजार रुपये परिवाद व्यय (कानूनी खर्च) के रूप में देने को कहा गया। कुल मिलाकर 2.50 लाख रुपये का अर्थदंड तय किया गया है। साथ ही यह राशि 45 दिनों के भीतर जमा करने का समय दिया गया है। तय समय सीमा में भुगतान नहीं करने पर 9 प्रतिशत ब्याज भी देना होगा।

आयोग की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष पवन कुमार ओझा और सदस्य रमेश कुमार गौड़ ने कहा कि खाद्य एवं पेय पदार्थों की गुणवत्ता में इस प्रकार की चूक बेहद गंभीर है। उन्होंने इसे उपभोक्ता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करार दिया और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कड़े दंड की आवश्यकता पर जोर दिया। यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी कंपनी, चाहे वह कितनी ही बड़ी क्यों न हो, को गुणवत्ता मानकों से समझौता करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह मामला उन उपभोक्ताओं के लिए भी प्रेरणा है, जो अक्सर छोटी समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं। सही समय पर शिकायत करने से न केवल न्याय मिलता है, बल्कि कंपनियों की जवाबदेही भी तय होती है।