भीष्म साहनी जन्म- 08-08-1915 - जयंती 08-08-2025
भीष्म साहनी जन्म- 08-08-1915 - जयंती 08-08-2025
जीवन की वास्तविकता के रचनाकार भीष्म साहनी।
“एक यथार्थवादी अभिनेता कहते है, आज साहित्यकार का दायित्व बढ़ गया है। य़थार्थचेता और मूल्यदृष्टा कहानीकार।“ रावलपिंडी पाकिस्तान में जन्मे भीष्म साहनी 08-08-1915 आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से थे। 1937में लाहौर गवर्नमेन्ट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में एम ए करने के बाद साहनी ने 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हासिल की। भारत पाकिस्तान विभाजन के पूर्व अवैतनिक शिक्षक होने के साथ-साथ ये व्यापार भी करते थे। विभाजन के बाद उन्होंने भारत आकर समाचारपत्रों में लिखने का काम किया। बाद में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जा मिले। इसके पश्चात अंबाला और अमृतसर में भी अध्यापक रहने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में साहित्य के प्रोफेसर बने। 1957 से 1963 तक मास्को में विदेशी भाषा प्रकाशन गृह (फॉरेन लॅग्वेजेस पब्लिकेशन हाउस) में अनुवादक के काम में कार्यरत रहे। यहां उन्होंने करीब दो दर्जन रूसी किताबें जैसे टालस्टॉय आस्ट्रोवस्की इत्यादि लेखकों की किताबों का हिंदी में रूपांतर किया। 1965 से 1967 तक दो सालों में उन्होंने नयी कहानियां नामक पात्रिका का सम्पादन किया। वे प्रगतिशील लेखक संघ और अफ्रो-एशियायी लेखक संघ (एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन) से भी जुड़े रहे। 1993 से 1997 तक वे साहित्य अकादमी के कार्यकारी समीति के सदस्य रहे। भीष्म साहनी को हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है।वे मानवीय मूल्यों के लिए हिमायती रहे और उन्होंने विचारधारा को अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया। वामपंथी विचारधारा के साथ जुड़े होने के साथ-साथ वे मानवीय मूल्यों को कभी आंखो से ओझल नहीं करते थे। आपाधापी और उठापटक के युग में भीष्म साहनी का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था। उन्हें उनके लेखन के लिए तो स्मरण किया ही जाएगा लेकिन अपनी सहृदयता के लिए वे चिरस्मरणीय रहेंगे। भीष्म साहनी हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे। उन्हें 1975 में तमस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1975 में शिरोमणि लेखक अवार्ड (पंजाब सरकार), 1980 में एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन का लोटस अवार्ड, 1983 में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड तथा 1998 में भारत सरकार के पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित किया गया। उनके उपन्यास तमस पर 1986 में एक फिल्म का निर्माण भी किया गया था।”आधुनिक बोध की जिस कसौटी पर कहानी को परखा जाने लगा है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ । जहाँ कहानी जीवन से साक्षात्कार कराती है, उसके भीतर पाये जाने वाले अन्तर्विरोधों से साक्षात कराती है, वहाँ वह अपने आप ही समय और युग का बोध भी कराती है। पर यदि आधुनिक “भाव बोध’’ को साहित्य का विशिष्ठ गुण मान लिया जाए तो हम दिग्भ्रमित ही होंगे ।यदि कहानी में अवसाद है, मूल्यहीनता का भाव है, अनास्था है तो वह कहानी आधुनिक, और..चूँकि आधुनिक है, इसलिए उत्कृष्ट है-इस प्रकार का तर्क मुझे प्रभावित नहीं करता ।अपना भाग्य ढोते हुए इन्सान का चित्र असंगत है; अनास्था आधुनिक है, आस्था असंगत है , मृत्युबोध आधुनिक है, जीवनबोध असंगत और निरर्थक है, इस प्रकार के तर्क के आधार पर साहित्य को परखना और उसके गुण-दोष निकालना जिन्दगी को भी और साहित्य को भी टेढे शीशे में से देखने की कोशिश है ।[‘’भीष्म साहनी”.मेरी प्रिय काहानियाँ की भुमिका से साभार ] प्रसंगवश कुछ इनसे जुडी बाते..।
भीष्म साहनी : पंजाब से निकला अंग्रेजी का अध्यापक जिसने हिंदी साहित्य में नई लीक बनाई प्रेमचंद की तरह भीष्म साहनी ने भी समाज को उसी बारीकी से देखा-समझा था लेकिन, यह प्रेमचंद से आगे का समाज था इसलिए उनकी लेखनी ने विरोधाभासों को ज्यादा पकड़ा आजकल महानगरों के कुछ ‘अतिकुलीन’ परिवारों में चलन शुरू हुआ है कि बच्चे अपने अभिभावकों को मम्मी-पापा कहने के बजाय उनका नाम लेते हैं. इस चलन के पीछे तर्क है कि एक उम्र के बाद मां-बाप बच्चों के दोस्त हो जाने चाहिए और वे जब दोस्त होंगे तो संबोधन भी बदल जाएगा. हो सकता है यही तर्क हो या इससे आगे की बात लेकिन, यह जानकारी आम पाठकों को हैरान करती है कि भीष्म साहनी की बेटी कल्पना अपने पिता को हमेशा भीष्म जी कहती थीं और इसपर कभी भीष्म साहनी को ऐतराज नहीं हुआ. दरअसल यही सहजता इस महान लेखक की काबिलियत थी और इसी ने उन्हें अपने और दूसरे इंसानों के अंतर्मन में छिपी कुरूपताओं और विरोधाभासों से नजर मिलाने की समझ दी थी. ऐसा न होता तो ‘तमस’ जैसी कृति कभी न रची जाती. बात जब उनकी रचनाओं की आती है तो कहा जा सकता है कि देश के विभाजन के दर्द को जिस बेहतरीन ढंग से उन्होंने उपन्यास "तमस" में और कहानी "अमृतसर आ गया है" में। चित्रित किया है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं उन रचनाओं को पढ़कर। उस दर्द को जिसने महसूस किया उसे उससे भी बेहतर प्रस्तुति दी। भीष्म साहनी लाहौर से विभाजन के बाद आ गए थे। उपन्यास "तमस"और कहानी "अमृतसर आ गया है", सहादत हसन मंटो की "टोबा टेक सिंह" और "झूठा सच" के साथ रखी जा सकती है कि इन सभी में विभाजन की पीड़ा मर्म को को छूकर अनुभूतियों को झकझोरने वाली बन पड़ी हैं।


भीष्म साहनी को 1975 में तमस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. तमस विभाजन के समय सांप्रदायिक दंगों को लेकर लिखा गया उपन्यास है। विभाजन पर आधारित अन्य उपन्यासों की तरह इन दंगों का काऱम अंग्रेजी सरकार व उलके समर्थको ने करवाया। इसमें हिंदुओं, मुसलमानों की अच्छाइयो-बुराइयों में संतुलन स्थापित किया गया है। कहीं कहीं पर मजहब से ऊपर मानवीयता की भी बातें है। इसी वर्ष वे पंजाब सरकार के शिरोमणि लेखक पुरस्कार से सम्मानित किए गए . उन्हें 1980 में एफ्रो-एशिया राइटर्स एसोसिएशन का लोटस अवॉर्ड और 1983 में सोवियत लैंड नेहरु अवॉर्ड दिया गया था. 1986 में भीष्म साहनी को पद्मभूषण अलंकरण से भी विभूषित किया गया। इन बड़े पुरस्कारों और सम्मानों की सूची बस यह बताने के लिए है कि पाठकों की तारीफें मिलने के साथ-साथ बतौर लेखक समाज-सरकार भी उन्हें सराहते रहे हैं फिर भी उनकी सहजता-सरलता कभी कम नहीं हुई। शायद इसी कारण उन्होंने जिस भी विधा को छुआ, कुछ अनमोल उसके लिए छोड़ ही गए. कहानियों में चाहे वह ‘चीफ की दावत’, हो या फिर ‘साग मीट’, उपन्यास में ‘तमस’ और नाटकों में ‘हानूश’ और ‘कबिरा खड़ा बजार में’ जैसी अनमोल कृतियां।
इनका एक नाटक बहुत ही सुंदर लगा “हानूश”। इस नाटक "हानूश"में एक कलाकार की समर्पित भावना अपनी कृति के प्रति बरबस हमें अंदर तक पर पिघला देती है। हानूश पहला व्यक्ति था जिसने घड़ी बनाई। उस राज्य का राजा पहली घड़ी अपने राज्य में पाकर बेहद प्रसन्न होता है। इनाम के नाम पर हानूश को भले ही संपन्न बनने के लिए धन और सुविधाएं देता है, पर वह दूसरी घड़ी न बना सके इसके लिए उसकी आंखें फोड़वा देता है। हानूश अपने आप में सिमट जाता है और अपनी कलाकृति के प्रति घृणा पाल लेता है। संपन्नता उसे जरा भी सुकून नहीं देती। एक दिन घड़ी खराब हो जाती है। उसको उसकी पत्नी और बेटी के साथ घंटाघर के मीनार के भीतर घड़ी सुधारने भेजा जाता है। हानूश पूरा मन बना कर जाता है कि जिस घड़ी ने मेरी आंखें छीन ली और मुझे अंधकार में धकेल दिया उसे तहस-नहस कर दूंगा, लेकिन जब अंदर जाकर अपनी घड़ी के पुर्जों को छूता है, उसके अंदर का कलाकार अभिभूत होकर अपनी कृति के प्रति जो वात्सल्य है, उसे फिर से जीवित पाता है। और अंत में घड़ी को सुधार कर वापस लौट जाता है। इस नाटक के पात्र हानूश में हम वे सारे गुण देखते हैं जो संवेदनशील कलाकार में होते हैं। अंधा होने के बाद घड़ी सुधारने जब जाता है वह सहारा लेकर, उस समय की उसकी मन:स्थिति पाठक को द्रवित कर देती है। एक अद्वितीय रचना कही जा सकती है "हानूश" इस नाटक कई मंचन हुए और बहुत ही सराहनीय रहे। इनके नाटकों के क्रम में एक और नाटक “मुआवजे “ यह नाटक ने सांप्रदायिक दंगों और उसके बाद मिलने वाले मुआवजे के इर्द-गिर्द रहता है। इसमें इसल सभी की पुलिस ,प्रशासन, राजनेता और व्यावसायिक वर्ग संवेदनहीनता और स्वार्थ को उजागर किया जाता है। यह नाटक वर्ताम स्थिति के साथ दंगे के बाद मुआवजें की अंधी दौड़ मे लोग किस तरह मानवीय संवेदनाएं खो देते है, यह मूल में इस नाटक के रहा है। इनकी लिखी एक कहानी “सेमिनार” होने वाली गोष्ठियों के सच को उजागर करती है जो बहुत ही प्रसंगिक लगती है। लेखक ने इस कहानी में सेमिनार के दौरान होने वाली घटनाओं और विङिन्न पात्रों के माध्यम से समाज में व्याप्त दिखावे, अवसरवादिता और खोखलेपन को उजागर किया है। इस सेमिनार में शामिल होने वाले प्रतिष्टित लोग एक दूसरे की प्रशंसा और चापलूसी में लगे रहते है। युना लेखक और वरिष्ठ लेखक के व्दारा अपनी बात कहने से रोक दिया जाता है, क्योंकि वह वास्तविक बात कहना चाहता है दिखावे की जगह. अंत में उन लोगों पर व्यंग्य से समाप्त होती हौ जो दिखावे के लिए सेमिनार में भाग लेते है और वास्तविक संम्सयाओं पर भघ्यान नहीं दिया जाता। कहानी बहुत ही अच्छी है। यह कहना कि वे प्रगतिशील विचारधारा से प्रेरित समकालीन मानव जीवन के सशक्त लेखक थे, पाठकों के लिए कोई नई बात नहीं होगी। अपने भाई स्वर्गीय बलराज साहनी और भतीजे परीक्षित साहनी की तरह नाटकों के निर्देशन और अभिनय में विशेष रूचि रही है। प्रगतिशील नाटकों के मंच इपटा के वे सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने "तमस"के साथ-साथ "मोहन जोशी हाजिर हो" और "मिस्टर मिसेस अय्यर" जैसी फिल्मों में भी अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को चकित कर दिया।

भीष्म साहनी की बेटी कल्पना बताती हैं, ‘वो जो कुछ भी लिखते थे सबसे पहले मेरी मां को सुनाते थे. मेरी मां उनकी सबसे पहली पाठक और सबसे बड़ी आलोचक थीं। भीष्म साहनी के व्यक्तित्व की सहजता-सरलता वाले आयाम पर उनकी बेटी कल्पना साहनी की वह बात बेहद दिलचस्प है जो उन्होंने अपने पिता के आखिरी उपन्यास ‘नीलू, नीलिमा, नीलोफर’ के विमोचन के मौके पर कही थी. यहां उन्होंने बताया, ‘वो जो कुछ भी लिखते थे सबसे पहले मेरी मां को सुनाते थे। मेरी मां उनकी सबसे पहली पाठक और सबसे बड़ी आलोचक थीं। इस उपन्यास को भी मां को सौंपकर भीष्म जी किसी बच्चे की तरह उत्सुकता और बेचैनी से उनकी राय की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब मां ने किताब के ठीक होने की हामी भरी तब जाकर उन्होंने चैन की सांस ली थी। ’‘नीलू, नीलिमा, नीलोफर’ सन 2000 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था और यह एक अद्भुत संयोग है कि उसी वक़्त इस प्रकाशन से दो और बड़े लेखकों के उपन्यास प्रकाशित हुए, निर्मल वर्मा का ‘अंतिम अरण्य’ और कृष्णा सोबती का ‘समय सरगम’. ध्यान देने वाली बात यह थी कि जहां अन्य दो लेखकों के उपन्यास के केंद्र में उनकी वृद्धावस्था और उसके एकांतिक अनुभव थे, वहीं भीष्म जी की किताब के केंद्र में एक प्रेमकथा थी। तब अंतर्धार्मिक प्रेम और विवाह के लिए ‘ऑनर किलिंग’ पहली बार किसी उपन्यास या कहें कि एक बड़े कद के लेखक की किताब का केंद्रबिंदु बनी थी। भीष्म जी के आखिरी उपन्यास में तमस वाली वही साम्प्रदायिकता थी और उससे लड़ते हुए कुछ असहाय और गिनेचुने लोग, पर कथा के विमर्श का फलक कुछ नया सा था. यहां न सोबती जी के उपन्यास का केंद्र - मृत्यु से लड़ने का वह महान दर्शन स्थापित हो रहा था, न निर्मल जी के लेखन में पाया जाने वाला आत्मचिंतन. ‘नीलू, नीलिमा, नीलोफर’ के केंद्र में तत्कालीन समाज और उसकी जटिलताएं और उनसे पैदा होने वाली समस्याएं थीं। दरअसल यह भीष्म जी के लेखन की विशेषता थी जहां वे जीवन की सच्चाई से आंख मिलाते थे और उनके माध्यम से पाठक भी ऐसा कर पाते थे। आलोचक नामवर सिंह भीष्म साहनी के लिए कहते हैं, ‘हैरानी होती है यह देख कर कि रावलपिंडी से आया हुआ आदमी जो पेशे से अंग्रेज़ी का अध्यापक था और जिसकी भाषा पंजाबी थी, वह हिंदी साहित्य में एक प्रतिमान स्थापित कर रहा था’ समाज को इस तरह देखने का काम मुंशी प्रेमचंद ने भी अपनी रचनाओं में किया लेकिन भीष्म साहनी का देखा-समझा समाज प्रेमचंद के आगे के समय का समाज है. साथ ही भीष्म जी ने अपनी भाषा में वैसी ही सादगी और सहजता रखी जो रचनाओं को बौद्धिकों के दायरे निकालकर आम लोगों तक पहुंचा देती है। यदि विष्णु प्रभाकर की अद्भुत रचना ‘आवारा मसीहा’ के बजाय तमस को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो इसकी एक वजह इस उपन्यास की वह भाषा भी होगी जिससे विषय की मार्मिकता लोगों को दिलों तक पहुंच जाती है। आलोचक नामवर सिंह भीष्म साहनी के लिए कहते हैं, “ मुझे उनकी प्रतिभा पर आश्चर्य होता है कि कॉलेज में पढ़ते हुए वे लिखने, प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़ने का समय निकाल लेते थे। मैं यह नहीं कहता कि उनकी सभी रचनाओं का स्तर ऊंचा है लेकिन अपनी हर रचना में उन्होंने एक स्तर बनाए रखा... हैरानी होती है यह देख कर कि रावलपिंडी से आया हुआ आदमी जो पेशे से अंग्रेज़ी का अध्यापक था और जिसकी भाषा पंजाबी थी, वह हिंदी साहित्य में एक प्रतिमान स्थापित कर रहा था।“ भीष्म जी ने अपनी कहानियों मे कभी कोई चमत्कार करने की कोशिश नहीं की। वह जिंदगी से अपने सच्चे लगाव को व्यक्त करते है। उन्होंने पात्रों को अपने कथा साहित्य के केन्द्र मे रखा जो गरीब है, शोषित है, वंचित है। अपने पात्रों के बारे में भीष्म जी ने लिखा है कि “ मैं विश्वास के साथ तो नहीं कह सकता पर मुझे लगता है कि बाद मे जो पात्र मेरे उपन्यासों-कहानियों मे आए, उनमें अक्सर दो गुण थे-वे गरीब भी ते और निर्भीक भी। जैसे तमस का जरनैल। उनके चरित्र के पीछे मेरी पनी मानसिकता ही रही होगी, बहुत साल बाद जब कांग्रेस मे काम करने लगा जो वहां भी एसे ही लोगों के संपर्क मे या जो अपने तई महत्वाकांक्षी नहीं थे, अपने लिए कुछ नहीं मांगते थे, न पद, न पैसा, पर जो स्वतंत्रता संग्राम में जान की बाजी लगाकर उतरे हुए थे|” एसे ही पात्र उनकी कहानियों के केन्द्र मे रहे है। समाज की संस्कृति पर उनकी टिप्पणीः- “ हमारे देश की संस्कृति, मेल-मिलाप की ही संस्कृति रही है। गाँवों, कस्बों मे तो विशे, रूप से। जीपावली के अवसर पर तो परिवार-मिलन एक अनिवार्य सर्त होती है. सबी त्यौहारों का आधार ही मेल-मिलाप है, शादी-गमी पर उपस्थिति होने की अनिवार्यता पर जरूरत से ज्यादा बल दिया जाता है। फिर भी, इसके संबंधो से जो अपने पन की गर्माहट, स्निघ्धता मिलती है, उसका की मुल्य नही।“ परंतु यह कहना न होगा कि अब मिल-बैठने की वह संस्कृति क्षीण हो रही है. निराला के शब्दों में कहें तो ‘ बोलते है लोग ज्यों मुँह फेर कर।‘ डर है, कहीं साहित्य की दुनिया से भीष्म जी के साथ संस्कृति विदा न हो जाए! सचमुच ही वे इस संस्कृति के साक्षात विग्रह थे। महाप्रयाण-11-07-2003. कोटिशः नमन व उनको हमारी विनम्र श्रध्दांजलि.।
चिरंजीव
लिंगम चिरंजीव राव
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)


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