भगवतीचरण वर्मा  जन्म-30-08-1903 - जयंती 30-08-2025
“जीवन और साहित्य दोनों में नियतिवाद को दर्शन के रूप में अपनाने वाले साहित्यकार भगवती बाबू । भगवती चरण वर्मा का जन्म 30अगस्त1903 को उत्तर प्रदेश के  उन्नाव जिले के शफीपुर गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक समपन्न मध्यवर्गीय परिवार मे हुआ था जब वे पाँच वर्ष के थे तब पिताजी का देहांत हो गया सारा बोझ माँ के सर पर आ गया यह पाँच वर्ष और चला उसके पश्चात माता जी भी देहांत पर उनकी 10 वर्ष की आयु थी। इस सदमे को सहते हुए एकनाथ की जिंदगी का अनुभव मिला फिर भी मैं अनेको कठिनाईयों का सामना करते हे अपनी पढ़ाई जारी रखी प्रारंभिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए वर्माजी ने प्रयागराज का रूख किया वहाँ से बी॰ए॰, एल॰एल॰बी॰ की डिग्री प्राप्त की और वकालत का पेशा उस समय बहुत ही अच्छा माना जाता था, वकालत के लिए कानपुर आ गए वहाँ उन्होंने दो वर्ष तक वकालत की पर मन नहीं लगा साहित्यकार हृदय साहित्य जीवन को अपना लक्ष्य बना लिय़ा। प्रारम्भ में कविता लेखन किया। फिर उपन्यासकार के रूप में विख्यात हुए। 1933 के करीब प्रतापगढ़  के राजा साहब भदरी के साथ रहे। 1936 के लगभग फिल्म कारपोरेशन, कलकत्ता  में कार्य किया। 1936 में फ़िल्म कारपोरेशन कलकत्ता में कार्य कई कहानियाँ लिखी जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और सराही गई। इनकी लिखी कहानियों पर कई फिल्में बनी।  “विचार” नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन संपादन। कुछ दिनों ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन संपादन किया  इसके बाद बंबई में फिल्म कथा लेखन व “दैनिक नवजीवन” का संपादन इस प्रकार उन्होंने लेखन में ही पत्रकारिता में भी प्रमुख कार्य किया है। फिर आकाशवाणी के कई केन्द्रों मे कार्य। आकाशवाणी के कई केन्द्रों में कार्य।1957 से स्वतंत्र लेखन। 'चित्रलेखा' उपन्यास पर दो बार फ़िल्म निर्माण और भूले बिसरे चित्र पर साहित्य अकादमी पुरस्कार। पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त। हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना के साथ-साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ उसके बाद गद्य साहित्य का भी विकास होने लगा आधुनिक हिंदी गद्य का विकास केवल हिंदी भाषी क्षेत्रों तक सिमित नहीं रहा। इसका क्रमिक विकास पूरे देश में और हर प्रदेश में होने लगा जिससे हिंदी की लोकप्रियता बढ़ने लगी। जिसके कारण अन्य भाषी लेखकों ने हिंदी में साहित्य रचना करके इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने मे भगवती के लेखन का प्रभाव भी रहा। इसके अलावा कवि के रूप में भगवतीचरण वर्मा के रेडियो रूपक 'महाकाल', 'द्रोपदी'' और कर्ण' 1956 ई. 'त्रिपथगा' में छपे। 'त्रिपथगा' उनकी कृतियों का एक संकलन है। हालांकि उनकी प्रसिद्ध कविताओं में  'भैंसागाड़ी' का खास महत्व है। इस कविता का आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में अपना महत्त्व है। 'भैंसागाड़ी' कविता में मानववादी दृष्टिकोण उभर कर समाने आता है। साथ ही इस कविता में काव्य के प्रगतिवादी तत्व नजर आते हैं।  इन कविता संग्रह के माध्यम से प्रगतिवादी प्रसिद्ध हो गयीं। साथ ही भगवती चरण वर्मा का पहला कविता संग्रह 'मधुकण' नाम से 1932 ई. में प्रकाशित हुआ। उसके बाद दो और काव्य संग्रह 'प्रेम संगीत' और 'मानव' निकले। इन कविता संग्रह को किसी 'वाद' विशेष के तहत नहीं माना जाता है। इन कविताओं की विशेषता में नियतिवाद, रूमानियत, प्रगतिवाद और मानववाद प्रमुख है। रचनाकार के साथ संगीतकार भी थे भगवती चरण वर्मा 
उपन्यास—पतन (1928),चित्रलेखा (1934),तीन वर्ष, -टेढे मेढ़े रास्ते) (1946) – इसमें मार्क्सवाद  की आलोचना की गई थी।अपने खिलौने (1957),भूले बिसरे चित्र (1959),वह फिर नहीं आई,सामर्थ्य और सीमा )1962),थके पाँव, रेखा,सीधी सच्ची बातें,युवराज चूण्डा,सबहिं नचावत राम गोसाईं, (1970)प्रश्न और मरीचिका, (1973)धुप्पल, चाणक्यक्या निराश हुआ जाए ।खास बात-- उन्होंने उपन्यासों की परम्परागत शैली से हटकर नए विधि विकसित की। आकाशवाणी के कुछ केन्द्र पर कार्य करते रहे। उनके उपन्यास चित्रलेखा पर दो बार फिल्म भी बनायी गयी है।
कहानी-संग्रह—मोर्चाबंदी, एक कहानी ‘’दो बाकें’’ से ली गई कुछ बाते....””शायद ही कोई ऐसा अभागा हो जिसने लखनऊ का नाम न सुना हो---हिन्दुस्तान में ही नहीं सारी दुनिया में लखनऊ की शोहरत है ,यहाँ का सफेदा आम,खरबूजे,लखनऊ का चिकन कुर्ते और रेवडियां यहाँ जो भी आता है वापस जाते समय इन्हें लेकर जाता है...इसके अलावा जो नहीं ले जायी जा सकती उसमें लखनऊ की जिंदादिली और लखनऊ की नफासत विशेष रूप से आती है ..इसी में एक विशेष बात जो लखनऊ वाले भी नहीं जानते इनमें आती ही लखनऊ के बांके““” मेरे विचार से अगर दुनिया से बांका शब्द उठ जाए,तो कुछ दलचले लोग खुदखुशी करने को आमदा हो जाए. इसलिए मैं तो यहाँ तक कहूंगा कि लखनऊ बांका शहर है,और बांके शहर में कुछ बांके रहते है,उनमें गजब का बांकापन है। “’ इनकी लेखनी को हमारे साहित्य के विशेष लखनऊ अंदाज का पुट मिला।
कविता-संग्रह--मधुकण (1932) [तदन्तर दो और काव्यसंग्रह- 'प्रेम-संगीत' और 'मानव' निकले। नाटक—वसीहत ,रुपया तुम्हें खा गया,सबसे बड़ा आदमी,तारा
संस्मरण--अतीत के गर्भ से ।साहित्यालोचन--साहित्य के सिद्घान्त,रुपबाद में, 1957 से मृत्यु पर्यंत स्वतंत्र साहित्यकार के रूप में लेखन। भगवती चरण वर्मा की कुछ रचनाओं मे प्रमुख....चित्रलेखा न केवल भगवतीचरण वर्मा को एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने वाला पहला उपन्यास है बल्कि हिन्दी के उन विरले उपन्यासों में भी गणनीय है, जिनकी लोकप्रियता बराबर काल की सीमा को लाँघती रही है। चित्रलेखा की कथा पाप और पुण्य की समस्या पर आधारि-पाप क्या है? उसका निवास कहाँ है ? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए महाप्रभु रत्नांबर के दो शिष्य, श्वेतांक और विशालदेव, क्रमश: सामंत बीजगुप्त और योगी कुमारगिरि की शरण में जाते हैं। और उनके निष्कर्षों पर महाप्रभु रत्नांबर की टिप्पणी है, ‘‘संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते जो हमें करना पडता है। उनके प्रसिध्द उपन्यास चित्रलेखा पर कई बार फिल्में बनी। आखरी बार चित्रलेखा मे स्वर्गीय मीनाकुमारी और स्वर्गीय राजकुमार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्मी दुनिया के विख्यात और जाने-माने निर्देशक केदार शर्मा ने इस फिल्म का निर्देशन किया था। फिल्म में कहानी के साथ पूरा न्याय किया गया था । इस फिल्म को भारतीय फिल्म जगत की बहुत बड़ी उपलब्धि है। दोनों ही मुख्य कलाकारो का अभिनय सराहनीय था। ‘ जीवन और साहित्य दोनों में नियतिवाद को दर्शन के रूप में अपना चुके है। पर कुछ उपन्यासों में वे जाने-अनजाने इसके परे भी जाते है। यह साहित्य की अपनी महिमा और शक्ति है कि लेखक की अपनी अवधारणाओं के आर-पार भी वह झाँकती चलती है। लेकिन नियतीवाद की वकालत कर वह दूसरी रूढ़ि का समर्थन करने लगते है। सच ऐसा प्रतीत होता है कि इसका औपन्यासिक ढ़ाचाँ ही नियतीवादी है-सब कुछ पूर्व निश्चित। इस ढ़ांचे के अन्तर्गत पात्र वही करेगा जो ढ़ाँचे में सही लगता हो। फिर भी चित्रलेखा और बीजगुप्त स्वतंत्र निर्णय लेते है। घ्यान देने वाली बात यह भी है कि यौन-संबंधों के आधार पर पाप-पुण्य की कोटियों बनाना कोटियों का ही सरलीकरण है। इसी प्रकार इनकी दो और उपन्यास ‘टेढे मेढे रास्ते’ और ‘भूले बिसरे चित्र’ जिसमें क्रमशः तीन राजनीतिक रास्तो का वर्णन किया है गांधीवाद, क्रांतिवाद और साम्यवाद । इसमें गांधीवाद के प्रति सहानुभूति , क्रांतिवाद के प्रति माखौल और साम्यवाद की विदूषकीय भर्त्सना करने के प्रति व मूल में लेखक का अपना पूर्वाग्रह है। इसी प्रकार दूसरे उपन्यास भूले बिसरे चित्र में आजादी से पहले के लंबे समय के राजनीतिक उथल-पुथल और आर्थिक परिवर्तनों का औपन्यासिक आलेख है। इसमें चार पीढ़ियों की कथाएँ ली गयी है, हर पीढ़ी का रंग-ढ़ग, आचार-विचार, रीति-नीति एक दूसरे से अलग है व समयानुकूल परिवर्तित होती रहती है क्रमशः पहली सामंतवाद के टूटने के संबंध मे, दूसरी मध्यवर्ग के उदय से, तीसरी व्यक्ति बनाम समाज का व्दन्व्द और चौथी राष्ट्रीय कांग्रेस आंदोलन के प्रति समर्पित । सभी पात्रों के पचास वर्षों का राजनीतिक-सांस्कृतिक-आर्थिक बदलाव दृष्य एक चल चित्र की तरह चलता है। भगवती बाबू का एक अच्छा उपन्यास है। वर्मा जी का मुख्य क्षेत्र कथा-साहित्य है,कविताएँ उन्होंने कम लिखी है। पर उनमें भी नवीन की मस्ती और दिवानगी है-

हम दीवनों की क्या हस्ती
हैं आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चले
हम धूल उड़ाते जहआं चले

                                                                                                  

मधुकंण, प्रेमसंगीत में उनके प्रणय-गीत संगृहित है। मानव की रचनाएँ प्रगतिवाद से प्रभावित है। चली आ रही भैसागाड़ी जैसी प्रसिध्द कविता इसी संग्रह में है।अन्य साहित्यकारो में माखनलाल चतुर्वेदी की बलिदानी प्रवृति, नवीन की शहीदाना मस्ती, वर्मा की दीवानगी और बच्चन के अग्निहत में एक प्रकार की सहधर्मिता है, याराना है। यह नव्यस्वच्छदतावादी है। टेढे-मेढे रास्तेः-  सन् 1948 में प्रकाशित उनका प्रथम वृहत उपन्यास था जिसे हिन्दी साहित्य के प्रथम राजनीतिक उपन्यास का दर्जा मिला। टेढ़े-मेढ़े रास्ते को उन्होंने अपनी प्रथम शुद्ध बौद्धिक गद्य-रचना माना है। इसमें मार्क्सवाद की आलोचना की गयी  भगवती चरण वर्मा हिन्दी के जाने माने उपन्यासकार हैं। उन्होंने मनोविज्ञान, दर्शन और समाज पर  भी किताबें लिखीं। इसके अलावा वह छायावादी कवि और व्यंगकार भी थे। भगवती चरण वर्मा जिन्हें लोग प्यार से भगवती बाबू के नाम से पुकारते थे, सचमुच बहुत ही अनोखे साहित्यकार थे। उन्हें बड़े ही स्पष्ट वक्ता के रूप से जाना जाता था, उन्हें जिससे भी जो कुछ कहना होता था, वह बड़ी सहजता से उसके मुख पर ही कह देते थे। वह राष्ट्र-भाषा के बड़े हिमायती थे। हिंदी की सेवा के सात लखनवी तहजीब के भी वे मर्मज्ञ थे। एक लेख कभी पढ़ने का मौका मिला जो एक पत्रकार के साथ मुलाकात में पने जीवन के बहुत से आयामों के साथ जुड़े थे , उसके कुछ अंश आप सभी के लिए आज मैं रखने की कोशिश कर रहा हूँ। पत्रकार महोदय जी भगवती बाबू जी से मुलाकात के बाद उनके प्रशंसक हो गये और वो बताते है की भगवती बाबू में बहुत सारी खूबियाँ थी और मैं जीवन भर उनके साथ रहा। मेरे एक पत्रकार होने के नाते बहुत सी बांतों को कुरेद कुरेद कर पूछने की आदत मेरी हो गई थी मैं कुछ न कुछ जान ही लेता था ।  उनसे वार्ता के समय भगवती बाबू ने अपने जीवन के कुछ संस्मरण साझा करते हुए बताया कि सुमित्रानंदन पंत से मेरे बड़े स्नेह वाले संबंध रहे। चंद्रगुप्त विद्यालंकार से मुझे जीवन में प्रेरणा मिली , और उनसे उत्साहवर्धक शब्दों का दान हमेशा मिलता रहा, जो उन्हें सक्रिय ही नहीं प्रेरित भी करता रहा। यह कहने मे जरा भी संकोच नहीं की भगवती बाबू पहले एक अच्छे कवि भी थे। पहले वे कहानियाँ लिखने लगे फिर पन्यास की ओर अपने कदम रखे। डॉ. हरिवंशराय बच्चन से भी नके काफी अच्छे संबंद थे। और बच्चन जी के सुझाव से भी मुझे प्रेरणा मिलती थी। पत्रकार महोदय जी को को एक दिन हँसते हुए भगवती जी कहते है कि कभी पत्रकारिता का मुझे भी बड़ा शौक था मैंनें भी पत्रकारिता की है। मैंनें “विचार” नामक एक साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन स्वयं किय़ा( इसका मुद्रक, प्रकाशक और संपादक) सब कुछ मैं जब तक जो चाहा “विचार” मे अपने विचार व्यक्त करता रहा , उस दौर मे अंग्रेजी शासन का था और अखबार निकालना बहुत कठिन होता था जब तक अखबार पर प्रतिबंध होने से पहले ही संपादक अपने विचार व्यक्त कर ही लेता था और वह लोगों तक पहुँच भी जाता था,। आगे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी और जवाहरलाल नेहरू जी के सरंक्षण में हिंदी के विख्यात स्वदेशी समाचार-पत्र “दैनिक नवजीवन” के संपादक का कार्य संभाला। भगवती बाबू यह अच्ची तरह जानते थे कि राजनैतिक विचार धाराएँ साहित्य को प्रभावित करती है, और किसी तरह का समझौता नहीं किया, इसके बावजूद दोनों स्थानों पर सम्मान अर्जित किया। भगवती चरण वर्मा केवल रचनाकार ही नहीं थे बल्कि संगीतकार भी थे। उन्हें संगीत, वीणा या सितार का शौक नहीं था बल्कि उन्हें हारमोनियम बजाना पसंद था। हिंदी साहित्य के प्रमुख साहित्यकार भगवती चरण वर्मा ने हिन्दी साहित्य की बहुत सेवा की। उनकी कालजयी रचनाओं के लिए हिंदी साहित्य हमेशा ऋणी रहेगा। 
पुरस्कार -उनकी रचना भूले बिसरे चित्र के लिए साहित्य अकादमी से पुरस्कृत किया गया। इसके अलावा पद्मभूषण और राज्यसभा से मानद सदस्यता प्राप्त थी। उनकी रचना भूले बिसरे चित्र में स्वतंत्रता आंदोलन के तीन पीढ़ियों का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। भगवती बाबू यह अच्छी तरह जानते थे कि राजनीतिक विचार धाराएँ साहित्य को प्रभावित करती है, परंतु उन्होंने अपने मूल्यों को तरजीह दी और कभी भी झुककर समझौते नहीं किए। फिर भी उन्हें साहित्यिक संसार और राजनीति दोनों जगह सम्मान प्राप्त था। उनकी साहित्यिक सेवाओं को घ्यान में रखते हुए उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया तथा राष्ट्रपति जी ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया इस तरह उनके अधिकारी होने का सम्मान करते हुए राष्ट्रपति ने उनका मान बढ़ाया था। इसी के साथ उनको उनकी कृति भूले बिसरे चित्र पर साहित्य कादमी के पुरस्कार से भी नवाजा गया।   

भगवती बाबू की दो रचनाओं के कुछ अंशः-

1-(तुम अपनी हो, जग अपना है)
तुम अपनी हो, जग अपना है/ किसका किस पर अधिकार प्रिये
फिर दुविधा का क्या काम यहाँ/ इस पार या कि उस पार प्रिये ।
देखो वियोग की शिशिर रात /  आँसू का हिमजल छोड़ चली
ज्योत्स्ना की वह ठण्डी उसाँस/  दिन का रक्तांचल छोड़ चली ।
2-(छिप सकी हृदय की आग कहीं ?)छिप सकी हृदय की आग कहीं ?/ छिप सका प्यार का पागलपन ?
तुम व्यर्थ लाज की सीमा में/  हो बाँध रही प्यासा जीवन।।
भगवतीचरण वर्मा का निधन 5 अक्टूबर, 1981 . के दिन भगवतीचरण वर्म भले ही इस दुनिया में हमारे साथ नहीं हैं लेकिन वे उनकी रचनाएं उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व की याद दिलाते रहेंगी। उनकी स्मृतियां हमेशा हमारे मन में मौजूद रहेंगी। आज भगवती बाबू नहीं है , लेकिन उनकी अनमोल रचनायें उन्हें सदा याद रखेगी, किसी ने सच कहा है साहित्यकार जीवन त्याग देता है परंतु उसकी रचनाएँ सदैव ही जीवित रखती है। बहुमुखी साहित्यकार को नमन के साथ विनम्र श्रध्दाजंलि ।

चिरंजीव 
लिंगम चिरंजीव राव 
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)