अमृतलाल नागर जन्म -17-08-1916 - जयंती 17-08-2025
“रामचरितमानस के रचयिता महाकवि गोसाई तुलसीदास जी के जीवन पर आधारित एक क्लासिक उपन्यास ‘मानस का हंस’ – के लेखक नागर जी व्दारा अदभुत विशलेषण। ”“अमृतलाल नागर जी ऐसे लेखक थे जो इतिहास में होते थे और नजर उनकी वर्तमान पर होती थी । ”-- प्रभाकर क्षेत्रीय (हिंदी उपन्यास को प्रेमचंद जी के बाद व्यापक फलक देने में अमृतलाल जी का योगदान एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।) अमृतलाल नागर का जन्म 17 अगस्त 1916  को गोकुलपुरा, आगरा (उत्तर प्रदेश) में एक गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ। आपके पिता का नाम राजाराम नागर था। आपके पितामह पं. शिवराम नागर 1895 से लखनऊ आकर बस गए थे। आपकी पढ़ाई हाईस्कूल तक ही हुई। फिर स्वाध्याय द्वारा साहित्य, इतिहास, पुराण, पुरातत्व व समाजशास्त्र का अध्ययन। बाद में हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला, अंग्रेजी पर अधिकार। पहले नौकरी, फिर स्वतंत्र लेखन, फिल्म लेखन का खासा काम किया। 'चकल्लस' का संपादन भी किया। आकाशवाणी, लखनऊ में ड्रामा प्रोड्यूसर भी रहे। अमृतलाल नागर ने सन् 1932 से निरंतर साहित्य-लेखन आरंभ किया. शुरुआत में इन्होंने मेघराज इंद्र के नाम से कविताएं लिखीं, जबकि तस्लीम लखनवी के नाम से हास्य-व्यंग्यपूर्ण स्केच और निबंध लिखे. इन्होंने अपना पहला उपन्यास सन् 1947 में ‘महाकाल’ के नाम से लिखा, जबकि अंतिम उपन्यास सन् 1990 में ‘पीढ़ियां’. इनका पहला कहानी संग्रह सन् 1935 में ‘वाटिका’ के नाम से प्रकाशित हुआ. पाठकों के बीच इनका पहला व्यंग्य-संग्रह सन् 1939 में ‘नवाबी मसनद’ के नाम से आया. इन्होंने अपनी रचनाओं से बाल साहित्य को भी समृद्ध किया और अनेक रोचक बाल-कहानियों की रचना की जिनमें ‘नटखट चाची’, ‘निंदिया आजा’, ‘अक्ल बड़ी या भैंस’ मुख्य हैं.‘गदर के फूल’, ‘ये कोठेवालियां’ और ‘जिनके साथ जिया’ इनकी मुख्य संस्मरणात्मक रचनाएं हैं. इन्होंने नाटक विधा में भी अपनी छाप छोड़ी और अनेक कालजयी नाटकों की रचनाएं की जिनमें ‘युगावतार’, ‘चंदन वन’ और ‘उतार चढ़ाव’ प्रमुख हैं.इन्होंने अनुवाद के क्षेत्र में भी अपनी कलम चलाई. इन्होंने एंतोनचेखव की कहानियों का ‘काला पुरोहित’ के नाम से तो मोपासांकी कहानियों का ‘बिसाती’ के नाम से अनुवाद किया. अनुवाद के संबंध में नागर जी ने अपने विचार कुछ इस प्रकार व्यक्त किए हैं—“सन् 1935 से 37 तक मैंने अंग्रेजी के माध्यम से अनेक विदेशी कहानियों तथा गुस्ताव फ्लाबेर के एक उपन्यास ‘मादाम बोवेरी’ का हिंदी में अनुवाद भी किया. यह अनुवाद कार्य मैं छपाने की नीयत से उतना नहीं करता था, जितना कि अपना हाथ साधने की नीयत से अनुवाद करते हुए मुझे उपयुक्त हिंदी शब्दों की खोज करनी पड़ती थी. इससे मेरा शब्द-भंडार बढ़ा. वाक्यों का गठन भी पहले से अधिक निखरा.” नागर जी को अपनी कालजयी रचना ‘अमृत और विष’ के लिए दो अलग-अलग पुरस्कारों से सम्मानित किया गया— पहली बार सन् 1967 में साहित्य अकादमी से तो दूसरी बार सोवियतलैंड नेहरू पुरस्कार से. सन् 1970-71 में इन्हें हिंदी रंगमंच की विशिष्ट सेवा हेतु उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारसे सम्मानित किया गया, जबकि सन् 1985 में इन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के सर्वोच्च पुरस्कार भारत भारती से पुरस्कृत किया गया. इसके अलावा भी नगर जी को अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.हिंदी उपन्यास को प्रेमचंद जी के बाद व्यापक फलक देने में अमृतलाल जी का योगदान एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। विशेषता इस तरह उनके सात उपन्यासों में पारंपरिक भारतीय समाज अगर है तो साथ में आधुनिकता लिए समाज भी मौजूद है..मध्यवर्ग—इनके उपन्यासों का केन्द्र रहा। उनका एक अधूरा उपन्यास “”महावीर वर्ध्दमान  “”—भगवान महावीर के माध्यम से तत्कालीन समाज की विसंगतिय़ों एंव ऐतिहासिक छल-कपट से परिचित कराते हुए महावीर को सामाजिक ज्ञान का प्रतीक बताते है और उनकी छवि का यथार्थ चित्र उपस्थित करता है। इसके तीन परिच्छेद लिखे गए । 1940 से 1947 तक फिल्म सेनेरियो का लेखन कार्य किया। 1953 से 1956 तक आकाशवाणी लखनऊ में ड्रामा प्रोड्यूसर रहे।

                   

अमृतलाल नागर जितने ऊंचे दर्जे के कथाकार-उपन्यासकार थे, उतने ही ऊंचे दर्जे के जिंदादिल व्यंग्यकार भी थे. इनका हास्य-व्यंग्य लेखन भी कोई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। अमृतलाल नागर प्रथम पंक्ति के उपन्यासकारों में शामिल हैं. यूं तो इन्होंने अनेक कालजयी रचनाएं रचीं, लेकिन इन्हीं में से एक कालजयी रचना है ‘मानस का हंस’, जिसने अमृतलाल नागर को उपन्यास-सम्राट प्रेमचंद की पंक्ति का उपन्यासकार बना दिया है। यह उपन्यास महाकवि तुलसीदास को केंद्र में रखकर रचा गया है और मेरा विचार है कि यह हिंदी साहित्य का शायद वह पहला उपन्यास है, जो किसी महाकवि के जीवन पर आधारित है। इस उपन्यास के माध्यम से इन्होंने अपने जादुई शब्दों एवं रोचक शैली में महाकवि तुलसीदास के जीवन से परिचित कराया है। मानस का हंस इस बात के लिए भी इस उपन्यास को बहुत अधिक प्रसिध्दि मिली क्यों की यह गोसाई तुलसीदास के जीवन पर लिखी गई जो उस समय रामचरितमानस के कारण वे शिखर पर थे इस उपन्यास में तुलसीदास जी का स्वरूप चित्रित किया गया है, वह एक सहज मानव का रूप है और नागर जी ने इस उपन्यास को गहरे अध्ययन व मंथन के पश्चात अपने विशिष्ठ लखनवी अंदाज में लिखा है, वृहद होने पर भी यह अपनी रोचकता मे अप्रतिम है। ‘अमृत और विष’ भी इनका प्रसिद्ध उपन्यास है, जिसके लिए इन्हें 1967 में ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अमृतलाल नागर ने अपने उपन्यासों में स्त्री-जीवन की समस्याओं को सफलतापूर्वक उकेरकर अपनी लिखावट को और तेज करने का काम किया है. इन्होंने अपने उपन्यासों में स्त्री-शोषण से संबंधित समस्याओं, जैसे— दहेज प्रथा, यौन शोषण और बेमेल विवाह इत्यादि को चित्रित किया है. स्त्री-जीवन की समस्याओं को केंद्र में रखकर ही इन्होंने ‘अग्निगर्भा’ उपन्यास की रचना की. इस उपन्यास की कहानी सीता पांडे नामक स्त्री के इर्द-गिर्द घूमती है, जो सुशिक्षित होकर भी निरंतर अवहेलना झेलती रहती है. इस उपन्यास का एक अंश कुछ इस प्रकार है—“नारी युगों-युगों से प्रताड़ित रही है। कभी उसे चुराया गया तो कभी उसे बेचा गया। आज भी सूनी सड़कों पर नारी का अकेले निकलना कठिन है। इसी उपन्यास में आगे अमृतलाल नागर ने मुख्य पात्र सीता के माध्यम से मन-मस्तिष्क को झकझोरने वाली बातें कुछ इस प्रकार कहलवाई हैं—“आज स्त्री-पुरुष दोनों ही के समानाधिकार हैं—झूठ-मूठ, बिल्कुल झूठ. स्त्री भले ही पुरुष की बराबरी में अंतरिक्ष तक उठ गई हो, तीन-तीन लोकतांत्रिक देशों में प्रधानमंत्री बन चुकी हो, पर आधुनिक नारी आज भी पाषाण युग की तरह ही त्रस्त है।” इसी क्रम में इनकी एक कृति जो उस समय के राष्ट्रपति देशरत्न राजेन्द्रप्रसाद जी ने यह इच्छा प्रकट कर वेश्याओं से भेंट करके कोई लेखक इनके सुख-दुख का हाल लिखे। अवकाशाभाव के कारण वे स्वयं लिखना चाहते हुए भी नहीं लिख सके, इसके आगे का कार्य अमृतलाल नागर जी ने अपनी लेखनी में समेटा “ ये कोठेवालियाँ ।” इसका नतीजा बना और नागर जी कहते है, यह मैंने पाया की यह कृति बिना मेरी पत्नी “प्रतिभा” के सहयोग से पूरा न होगा उनका सहयोग भी रहा  और मैंने इसे उसे ही समर्पित किया है। इसी कृति की प्रस्तावना के कुछ अंश-“ वेश्याओं के बारे में उनकी निंदा के अतिरिक्त और कुछ भी लिखना आमतौर पर निंदा का विषय माना जाता रहा है। इस विषय पर अनेक लेखकों ने लिखा पर अपना असली नाम देने से संकोच करते रहे।” पुनः “ वेश्याओं के प्रति आकर्षण और वेश्यागामिता के प्रति संकोच-भाव दोनों साथ-ही-साथ मानव सभ्यता के इतिहास में चलते आ रहे है। ” जयशंकर प्रसाद का सान्निध्य और ‘निराला’ जी का साथ ,,अमृतलाल नागर को महान साहित्यकार जयशंकर प्रसाद का सान्निध्य भी मिला, जिससे नागर जी का न केवल बौद्धिक विकास हुआ, बल्कि उनसे एक हार्दिक संबंध भी स्थापित हुआ.इन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि इन्होंने महाकवि जयशंकरप्रसाद के चरणों में बैठकर साहित्यिक संस्कार तो पाए ही, साथ ही दुनियादारी का व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त किया. अपने और जयशंकर प्रसाद के संबंध को इन्होंने ‘प्रसाद : जैसा मैंने पाया’ में विस्तार से उल्लिखित किया है.महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ से नागर जी की मुलाकात सन् 1929 में हुई थी. पहली ही मुलाकात में ये निराला जी के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए. जब राष्ट्रीय आंदोलन में निराला जी ने अपने गांव के जमींदार के अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की तो इससे नागर जी की श्रद्धा निराला जी में और बढ़ गई. निराला जी के बारे में नागर जी ने ‘गढ़ाकोला में पहली निराला जयंती’ नामक लेख में विस्तार से लिखा है.इसके अलावा इन्होंने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘जिनके साथ जिया’ में उन महान साहित्यकारों का उल्लेख किया है, जिनके साथ नागर जी ने समय व्यतीत किया ।
निम्न कृतियों ने जो हर क्षेत्र विशेष में इनकी दखल देखी गई और, बहुत प्रभावित किया इसके अलावा इनका लेखन बहुत विशाल व विस्तार लिए हुए है ।
उपन्यास- मानस का हंस (1973), नाच्यौ बहुत गोपाल (1978), खंजन नयन (1981),
कहानी- एटम बम (1956), पीपल की परी (1963), कालदंड की चोरी (1963).
नाटक- उतार चढ़ाव (1977), नुक्कड़ पर (1981), चढ़त न दूजो रंग (1982)।
व्यंग्य- चकल्लस (1986) : उपलब्ध स्फुट हास्यँ-व्यंग्य रचनाओं का संकलन।
बाल साहित्य- बजरंगी पहलवान (1969), बाल महाभारत (1971), इतिहास झरोखे (1970).
अन्य कृतियाँ- गदर के फूल (1957 - 1857 की इतिहास-प्रसिद्ध क्रांति के संबंध में महत्त्वपूर्ण सर्वेक्षण), ये कोठेवालियाँ (1960 - वेश्याओं की समस्या पर एक मौलिक एवं अनूठा सामाजिक सर्वेक्षण), जिनके साथ जिया (1973 - साहित्यकारों के संस्मरण).
अनुवाद : बिसाती (1935 - मोपासाँ की कहानियाँ), दो फक्कंड़ (1955 - कन्हैकयालाल माणिकलाल मुन्शी के तीन गुजराती नाटक).
संपादन : सुनीति (1934), सिनेमा समाचार (1935-36), अल्ला कह दे (20 दिसंबर, 1937 से 3 जनवरी 1938, साप्ता्हिक), चकल्लस (फरवरी, 1938 से 3 अक्टूबर, 1938, साप्ताहिक), नया साहित्य (1945), सनीचर (1949), प्रसाद (1953-54) मासिक पत्रों का संपादन किया।।
संस्मरण : 'गदर के फूल', 'ये कोठेवालियां', 'जिनके साथ जिया।'
सम्मान-
* ‘बूँद और समुद्र’ पर काशी नागरी प्रचारिणी सभा का विक्रम संवत 2015 से 2018 तक का बटुक प्रसाद पुरस्का्र एवं सुधाकर पदक,
* ‘सुहाग के नूपुर’ पर उत्तर प्रदेश शासन का वर्ष 1962-63 का प्रेमचंद पुरस्कार,
* ‘अमृत और विष’ पर वर्ष 1970 का सेवियत लैंड नेहरू पुरस्कार,
* ‘अमृत और विष’ पर वर्ष 1967 का साहित्य अकादेमी पुरस्काकर,
* ‘मानस का हंस’ पर मध्य प्रदेश शासन साहित्य परिषद का वर्ष 1972 का अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार,
* ‘मानस का हंस’ पर उत्तर प्रदेश शासन का वर्ष 1973-74 का राज्य साहित्यिक पुरस्कार,
* हिंदी रंगमंच की विशिष्ट सेवा हेतु सन 1970-71 का उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्काार,
* ‘खंजन नयन’ पर भारतीय भाषा, कलकत्ता (कोलकाता) का वर्ष 1984 का नथमल भुवालका पुरस्कार,
* वर्ष 1985 का उ.प्र. हिंदी संस्थान का सर्वोच्च भारत भारती सम्मान (22 दिसंबर, 1989 को प्रदत्त),
* हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा 'साहित्य वाचस्पति' उपाधि से विभूषित।

जब इनकी जन्मशताब्दी समारोह (17 व 18-8-2015) 18-08-2015 को पहले दिन –लखनऊ विश्वविधालय का मंच –हिंदी विभागाध्यक्ष डाँ.सूर्यप्रसाद दिक्षित जी ने “”मानस का हँस ‘’और   “खंजन नयन“ को अमृलाल नागर जी की दो ऐतिहासिक जीवनियाँ बताई। उनके अनुसार नागर जी वास्तविक स्थान पर जाकर ठहर जाते थे और कल्पनाओं का संसार बुनते थे। मुख्य वक्ता प्रभाकर क्षेत्रीय जी ने कहा-नागर जी की भाषा शैली, अभिव्यक्ति अव्दितीय थी। वे ऐसे लेखक थे जो इतिहास में होते थे और नजर उनकी वर्तमान पर होती थी। इस समारोह में परिजनो ने भी अपने संस्मरण साझा किए । हिंदी साहित्य को अपनी लेखनी से हर विधा में समृद्ध करने वाले और 1981 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में अपने विशिष्ट योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित होने वाले जिंदादिल साहित्यकार अमृतलाल नागर 23 फरवरी, 1990 को इस दुनिया को अलविदा कह गए. इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले वे साहित्यप्रेमियों के लिए समृद्ध एवं विस्तृत रचना-संसार छोड़ गए.इसके साथ बहुत सी बातें जो आपने उनके व्यंग्यकार होने के बारे मे कहीं है।जी व्यंग्य ...लेखन की ऐसी विधा है जिसमें सवाल भी है,जवाब भी है..और समझने सोचने वालों के लिए सच्चाई का कडवा घुट तो है पर शहद सी मिठास लिए।।।महाप्रयाण- 23 फरवरी, 1990...कोटिशः नमन के साथ विनम्र  श्रध्दांजलि ।

चिरंजीव 
लिंगम चिरंजीव राव 
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)