अदम गोंडवी जन्म-22-10-1947 - जयंती 22-10-2025
अदम गोंडवी जन्म-22-10-1947 - जयंती 22-10-2025
‘’कबीर परंपरा के कवि और आम आदमी का शायर’’ “अदम गोंडवी ने अपनी कविताओं में जीवन के करारे सच का बड़ी बेबाकी से वर्णन किया है एक विद्रोही कवि।”
अदम गोंडवी 22 अक्तूबर 1947-मूल नाम रामनाथ सिंह का जन्म आटा ग्राम, परसपुर, गोंडा (उत्तर प्रदेश) में देवी कलि सिंह और मांडवी सिंह के घर हुआ । एक भारतीय कवि थे। उन्होंने हिंदी में कविता लिखी, जो हाशिए की जातियों, दलितों, गरीब लोगों की दुर्दशा को उजागर करती है. उन्होंने हिंदी में कविता लिखी, जो हाशिए की जातियों, दलितों, गरीब लोगों की दुर्दशा को उजागर करती है। एक गरीब किसान परिवार में जन्मे, हालाँकि, उनके पास काफी कृषि योग्य भूमि थी। गोंडवी की कविता सामाजिक टिप्पणी के लिए जानी जाती थी, जो भ्रष्ट राजनेताओं और प्रकृति में क्रांतिकारी विचारों के प्रति घृणा करती थी। 1998 में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार ने दुष्यंत कुमार पुरस्कार दिया।2001 में उन्हें अवधी / हिंदी में उनके योगदान के लिए शहीद शोभा संस्थान द्वारा माटी रतन सम्मान से सम्मानित किया गया। 'अदम गोंडवी ने आम आदमी की परेशानियां आत्मसात की और उन्हें कलमबद्ध कर अपने अंदाज़ और तेवर में एक मशाल रोशन की। समाज में फैली अव्यवस्थाओं के विरुद्ध अंतिम सांस तक वे अपनी रचना रूपी शमशीर के सहारे एक योद्धा की तरह लड़ते रहे।'एक भारतीय कवि जिनके कपड़े अक्सर बहुत साफ नहीं होते थे. धोती-कुर्ते के अलावा गले में सफेद गमछा डालकर वह श्रोताओं के सामने हाजिर होते थे. बात कहने का अंदाज भी ठेठ था, लेकिन वह बात लोगों के दिल तक पहुंचती थी. ऐसा नहीं कि लोगों को लुभाने के लिए उन्होंने कोई खास शैली विकसित की थी. सरल, सहज, बिल्कुल आम आदमी की तरह मुखातिब होने वाली यह शख्सियत थी अदम गोंडवी सिर्फ वेश भूषा में आम आदमी नहीं थे, बल्कि यह उनके अंदर का व्यक्तित्व था जो आम लोगों से स्वाभाविक ही जुड़ा था. वह समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज थे और जुबान में वैसा ही फक्कड़ अंदाज था. इसलिए कबीर परंपरा का उन पर गहरा प्रभाव रहा. वे गांव के लोगों की जिंदगी के बारे में बहुत अच्छी तरह से लिखते थे. जैसी लेखनी थी, वैसी ही उनकी आवाज, जिसके बारे में कहा जाता है कि सुनने वाले का कलेजा चीर देती थी. अदम गोंडवी मुशायरे के मंच पर रंग जमाते थे. उनकी आवाज में आम जन की पीड़ा की अभिव्यक्ति थी और व्यवस्था के खिलाफ गुर्राहट थी. कहा जाता है उनकी शायरी मंच पर न वाह करने देती थी न ही आह लेने देती थी. वह बस चुभन की तरह चुभ जाती थी जिसमें दर्द भी था और आक्रोश भी. इसलिए एक बार अपने गांव का पता बताते हुए अदम गोंडवी ने लिखा है, मेरा गांव वहीं है जहां, “फटे कपड़ों में तन ढ़ाके गुजरता है जहां को।.” राजनीति और राजनेताओं पर वह खासकर मुखर थे. ऐसे ही उन्होंने एक बार लिखा है, “सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे, ये अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंग ” ऐसे ही नौकरशाही पर भी वह निर्मम थे, “ हजारों रास्ते हैं सिन्हा साहब की कमाई के मिसेज सिन्हा के हाथों में जो बेमौसम खनकते हैं, पिछली बाढ़ के तोहफे हैं ये कंगन कलाई के.” ऐसे ही विधायक के घर का वर्णन उन्होंने कुछ इस तरह से किया है, “काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत, इतना असर है खादी के उजले लिबास में…यह बात कर रहा हूं मैं होशो-हवास में.” नेताओं और अधिकारियों की सांठगांठ, सरकारी मशीनरी में लगा भ्रष्टाचार का जंग और इन सबसे त्रस्त आम इंसान. वह आम इंसान किस चीज को अपना आदर्श मानेगा, जिसकी सुबह-शाम जिंदगी की बुनियादी जरूरतों को तलाशते हुए डूब जाती हों. ऐसे लोगों के दर्द के कुछ इस तरह के शब्दों से अदम गोंडवी ने व्यक्त किया है, “……शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून, पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को.” आठवीं कक्षा में पढ़ते हुए एक गीतनुमा तुकहंदी की कोशिश की थी। उसकी शीर्षक पंक्ति थी “जब मेरे मानस-पट पर स्मृतियाँ करवट लेती” । उसे छपाया कभी नहीं । भ्रम था कि उसमें गति-भंग है। एक लेखक के अनुभव व मुलाकत के सहारे कुछ बातें उनकी एक गजल ‘’सौ में सत्तर आदमी जब नाशाद है,/ दिल में रखकर हाथ कहिए देश आजाद है।” विषय पहली पंक्ति काव्यशास्त्र के अनुकूल सही नहीं है परंतु कथ्य की व विषयवस्तु की है, और इसके कथ्य ने ही अदम के प्रति दिलचस्पी पैदा होती है। नकी गजलों का प्रकाशन एक पत्रिका मे मंगलेश डबराल जी की टिप्पणी के साथ छपी थी। और मगलेश डबराल जदी के पास अदम जी की कई गजलों की पांडुलिपि उपलब्ध है। इसे छपवाने के लिए कर्ज लेकर मुक्ति प्रकाशन के बैनर पर छापी गयी पर बहुत कटिन दौर रहा। उन्ही के कथनानुसार कि बहुत प्रशंसा रचनाशीलता के लिए घातक होती है. परोक्ष में जो सुनने में आया, अदम के बारे में, वह न सिर्फ उनकी रचनाशीलता की, बल्कि उनकी जीवन-शैली की दृष्टि से भी दुखी और उदास करने वाला था। निम्न मध्य वर्गीय सीधा-सरल ग्रामीण बहकावे में जल्दी आता है, दुश्मन सक्तियाँ उसे आखेट बनाने में जल्दी कामयाब होती है। अदम गोंडवी के साथ यही हादसा हुआ। उनके चंद शेरः
तर्क कर तन्कीद के जज्बे को मर जाती हौ कौम
जुर्म है ठहराव, अब रफ्तार की बांते करो।
कहने को कह रहे है, मुबारक हो नया साल
खंजर भी आस्तीं में चुपाये हुए है लोग।
मैं यहाँ आया तो मिलने को लोग दौड़ पड़े
कोई सलीब, कोई गुल, कोई पत्थर लेकर।
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं; कविता संग्रह :
धरती की सतह पर, समय से मुठभेड़, गर्म रोटी की महक एक पहल छात्रो व्दारा ..एक रचनाकार के लिए ..।इलाहाबाद की घटना वायर के साभार..छात्रो के व्दारा राशि जमा कर हमने विद्यार्थियों, अध्यापकों और इलाहाबाद में दुकानदारों से चंदा मांगा. 18 दिसंबर तक हमारे पास चार हज़ार रुपये इकट्ठे हो चुके थे । एलनगंज की मिठाई की एक दुकान पर जब हमारे साथी अखिलेश लड्डू खरीदने गए तो दुकानदार ने पूछा कि क्या आपकी नौकरी लग गई है?नहीं, हम तो निकट के एनी बेसेंट कॉलेज में एक कवि की पुण्यतिथि मनाने जा रहे हैं. इससे वे बहुत खुश हुए और चंदे के रूप में आधा किलो लड्डू दिया.एक कवि की रचनाओ को 125 श्रोताओं के सामने ऊंचे स्वर में पाठ किया था. कहने का आशय है कि कवि हो या शायर, यदि समाज को उसके रचनाकर्म की सार्थकता बताई जाए तो वह उसे बहुत प्यार से अपना लेता है. इस आयोजन में लगभग 125 लोग आए थे । इस देश की जनता ही है जिसने गोरखनाथ, चंडीदास, कबीर, जायसी, तुलसी, घनानंद, सुब्रमण्यम भारती, रबींद्रनाथ टैगोर, निराला, नागार्जुन और त्रिलोचन की रचनाओं को बहुत प्यार से सहेज कर रखा है. वह अपने सुख-दुख में इनकी कविताएं गाती है। एक संस्मरण-( अदम गोंडवी से डा. विजय बहादुर सिंह की लंबी बातचीत से लिया गया) अदम के व्यक्तित्व-कृतित्व और उनकी रचना प्रक्रिया को समझने के लिए बहुत उपादेय है। इसमें अदम ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व पर पड़ने वाले प्रभावों की विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने बताया है कि ग़ज़ल की तरह उनके रूझान का एक मात्र कारण अपने गांव के बगल के एक आश्रम के महंत रघुनाथ दास थे, जो उर्दू-फारसी के बहुत बडे़ विद्वान थे और वे खुद अच्छे ग़ज़लगो थे। उन्होंने बताया है कि ‘चमारों की गली’ कविता/नज्म, जो अपने गाँव की एक सच्ची घटना पर आधारित थी, उसमें उन्होंने गांव के ठाकुरों के खिलाफ लिखा, तो एक स्थानीय जागीरदार ने उनसे नाराज होकर कई बार परेशान किया और अनेक बार झूठे मुकदमों में फँसाने की कोशिश की। इस बातचीत में उन्होंने बताया, ‘हम जन संगठन में पहले आ गए और कविता हमने बाद में लिखना शुरू किया। तो इस तरह से संघर्ष से बिल्कुल जुड़े रहे। दुष्यंत ने अपनी गजलों से शायरी की जिस नयी राजनीति की शुरुआत की थी, अदम ने उसे उस मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश की है, जहां से एक-एक चीज बगैर किसी धुंधलके के पहचानी जा सके। यह अजीब इत्तफ़ाक भी है कि दोनों ने अपने-अपने जज़्बातों के इजहार के लिए ग़ज़ल का रास्ता चुना। अदम का असली नाम रामनाथ सिंह था। उनकी निपट गंवई अंदाज में महानगरीय चकाचौंध और चमकीली कविताई को हैरान कर देने वाली अदा सबसे जुदा और विलक्षण है।लोकप्रिय कवि अदम गोंडवी ने अपनी कविताओं में जीवन के करारे सच का बड़ी बेबाकी से वर्णन किया है।अदम ख्वाब, चांद तारे इश्क़ के आशियाने और आसमान की बातें नहीं करते हैं और ना ही इश्क़ की खुमारी भी उनकी कविताओं में है।उनकी कविताओं में भय, भूख, गरीबी और भ्रष्टाचार का बेखौफ रूप झलकता है ।
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये
जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये
मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है...
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है
लगी है होड़ - सी देखो अमीरी और गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है...
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो...
भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो
जो ग़ज़ल माशूक के जल्वों से वाक़िफ़ हो गयी
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो
मुझको नज़्मो-ज़ब्त की तालीम देना बाद में
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो
गंगाजल अब बूर्जुआ तहज़ीब की पहचान है
तिशनगी को वोदका के आचमन तक ले चलो
ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धिखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो
अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है...
न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से
कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर मेंकोठी के ज़ीने से
अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से
बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से
बज़ाहिर प्यार की दुनिया में जो नाकाम होता है
कोई रूसो कोई हिटलर कोई खय्याम होता है
चार दिन फुटपाथ के साये में रहकर देखिए
डूबना आसान है आँखों के सागर में जनाब
कुछ बेहतरीन रचनाओं के माध्यम से इनका परिचय दे रहा हूँ..समाज के संधर्ष का कवि ..।
गाँव-गलि का कवि..
ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी,
फिर कहां से बीच में मस्जिद औ मंदर आ गए.
जिनके चेहरे पर लिखी है, जेल की ऊंची फसील,
रामनामी ओढ़कर संसद के अंदर आ गए.
आदम का देश...।
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़र ग़लतियां बाबर की थीं जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर ग़रीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मज़हबी नग़मात को मत छेड़िए
उनकी ग़ज़लों की ताक़त थी कि वे गोंडा से लेकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू), लखनऊ से लेकर भोपाल तक सुने जाते थे. हर बड़े रचनाकार की तरह उनकी ग़ज़लें लोगों को संवेदनशील बनाती थीं. अपने जीवन के अंतिम दौर में वे किंवदंती बन गए थे. महाप्रयाण - दिसंबर 18, 2011 को गोंडवी की मृत्यु लीवर सिरोसिस पेट के रोगों के कारण, आयुर्विज्ञान संजय गांधी स्नातकोत्तर संस्थान, लखनऊ में हो गई। हमारी ओर से ऐसे विद्रोही कवि और आम आदमी के शायर/गजलकार को नमन के साथ विनम्र श्रध्दाजंलि
चिरंजीव(लिंगम चिरंजीव राव)
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग, इच्छापुरम
श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश) पिन 532-312
स्वतंत्र लेखन(संकलन व लेखन)
मों न. 8639945892


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