राजीव खंडेलवाल (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास)

उच्चतम न्यायालय का कथनः ‘‘आरटीआई एक्टिविज्म नया धंधा बन गया है’’-बेहद दुर्भाग्यपूर्ण?

‘‘ भूमिका ’’
लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था में प्रत्येक संस्था व तंत्र से यह अपेक्षा  रहती है कि वे निष्पक्षता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। किंतु जब व्यवस्था अपेक्षित परिणाम नहीं देती है, तब ‘‘नागरिक सक्रियता’’ को कैसे देखा जाए? यह लोकतंत्र की परिपक्वता की कसौटी भी बन जाता है। हाल में उच्चतम न्यायालय द्वारा दो पृथक मामलों में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर की गई लगभग ‘‘समान भाव’’ की ‘‘तंज’’ टिप्पणी ने बहस छेड़ दी है।

आखिर ’‘एक्टिविज्म’’ का मामला क्या है’ ?

कुछ समय पूर्व जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी, ‘‘कुछ बेरोजगार युवा कॉकरोच (तिलचट्टा) की तरह होते है, जिन्हें नौकरी न मिलने के कारण प्रोफेशन में जगह नहीं बना पाते हैं। ऐसे लोग ‘‘आरटीआई एक्टिविस्ट’’ बन कर हर किसी पर हमला शुरू कर देते है’’। इस टिप्पणी पर इतना ‘‘बवाल’’ मचा कि लगभग ढाई करोड़ अनुगामियों ने एक ऑनलाइन ‘‘कॉकरोच’’ (तिलचट्टा) राजनीतिक पार्टी को ही जन्म दे दिया’’। कुछ इसी तरह की एक मौखिक टिप्पणी हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एक आरटीआई एक्टिविस्ट (सक्रियतावादी) राजीव कुमार उर्फ मिंटू एवं राकेश कुमार बहल के अग्रिम जमानत के मामले में सुनवाई के दौरान की गई, ‘‘एक्टिविज्म नया धंधा बन गया है’’।

‘‘ घटना का विवरण ’’

मामला पंजाब के गुरदासपुर जिले में एक सड़क निर्माण कार्य से जुड़ा बताया गया, जिसमें एक आरटीआई कार्यकर्ता राजीव कुमार बहल ने निर्माण की गुणवत्ता और कथित अनियमितताओं के संबंध में जानकारी मांगी थी। इसके बाद निर्माण काल में बाधा, कार्यरत मजदूरों को धमकी, अपमानजनक टिप्पणियां तथा हमले के लिए उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न आपराधिक धाराओं 351(2) एवं (3), 304(2), 221, 132 एवं 121 तथा अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(1) के अंतर्गत प्रकरण दर्ज हुआ। फलतः अग्रिम जमानत का मामला अंततः उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हेतु पहुंचा। सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय की मौखिक टिप्पणियों ‘‘निगरानी करने वाले आप होते कौन हैं’’, ‘‘आपको यह अधिकार किसने दिया है’’? ‘‘केन्द्र सरकार ने फंड जारी किया है, वही ’’सड़क निर्माण का ध्यान रखेगी’’ ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया। क्या नागरिक निगरानी और संस्थागत जवाबदेही के बीच कोई स्पष्ट सीमा रेखा है? जिस व्यवस्था पर उंगली उठी हों, निगरानी का दायित्व उसी पर छोड़ देना कहां तक उचित है? न्याय का सिद्धांत है, ‘‘अपने ही मामलों में स्वयं न्यायाधीश नहीं हो सकता है।”

‘‘ एक व्यक्ति के कदाचरण से पूरे वर्ग का आकलन उचित नहीं ?’’

 यदि एक्टिविस्ट मिंटू ने निर्माण कार्य में बाधा पहुंचाई है, कानून हाथ में लिया हो, तो उस पर कानूनन आपराधिक कार्रवाई होना ही चाहिए। लेकिन क्या कोई एक मामला जो फिलहाल जांच के अधीन है, के आधार पर समस्त ‘‘आरटीआई एक्टिविज्म’’ को यह कहकर कि ‘‘एक्टिविज्म नया धंधा बन गया है,’’ संदेह की दृष्टि से देखना क्या उचित होगा? कानून के ‘‘दुरुपयोग’’ और ‘‘उपयोग’’ दोनों में अंतर है। जिस प्रकार न्यायालय में भ्रष्टाचार है व किसी न्यायाधीश के भ्रष्ट आचरण होने से पूरी न्यायपालिका पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार किसी एक एक्टिविस्ट के ‘‘कदाचरण’’ से संपूर्ण नागरिक सक्रियता को कटघरे में खड़ा करना भी संतुलित दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता।

‘‘ दो समान मामलों में भिन्न संकेत ’’

एनसीईआरटी ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में ‘‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’’ विषय रखने पर उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए, न्यायपालिका को बदनाम करने वाला कदम बताते हुए पूरी किताब पर ‘‘पूर्ण प्रतिबंध’’ ही लगा दिया था। तब वही न्यायपालिका द्वारा दूसरी संस्था पूरी आरटीआई एक्टिविस्टों (जो ‘‘लोकतंत्र को जिंदा रखने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं’’), पर पूर्ण व्यापक आरोप लगा देने को कहां तक उचित कहा जा सकता है? कम से कम न्यायपालिका के दो ‘‘विपरीत मानक’’ नहीं हो सकते हैं। सूचना का अधिकार कानून, 2005 इसी सोच के साथ अस्तित्व में आया कि नागरिक, शासन से प्रश्न पूछेगा, जानकारी मांगी जायेगी, ताकि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग पर नजर रखी जा सके।

‘‘ अनावश्यक एवं दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी ’’

निश्चित रूप से उच्चतम न्यायालय की उक्त टिप्पणी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होकर कई प्रश्न उत्पन्न कर गई। जब ‘‘तंत्र’’ ‘‘असफल’’ होता है, तभी एक नागरिक उसकी ‘‘असफलता’’ को ‘‘सुधारने’’ के लिए न्यायालय के पास ‘‘सुधार’’ के लिए जाता है, तब उसे प्रशंसा मिलने की बजाए न्यायालय से फटकार सुनने को मिले जिससे न्याय व्यवस्था की न्याय का ‘‘परसेप्शन’’ भी खंडित होता है। मिंटू समान ‘‘जागरूकता’’ (निर्मल भाव की) यदि समस्त नागरिकों में आ जाए, अपने आस-पास चल रहे निर्माण कार्यो की जांच और देखरेख स्वयं करने लग जाये, तब निर्माण की गुणवत्ता में कमी नहीं आयेगी व भ्रष्टाचार पर भी रोक लगेगी। कुछ एक लोगों के कानून के दुरुपयोग से न तो कानून गलत हो जाता है और न ही कानून का ‘‘दुरुपयोग’’ करने वाला संपूर्ण वर्ग गलत हो जाता है। एक नागरिक के ‘‘नागरिक’’ होना का ‘‘जीवंत’’ उदाहरण ‘‘नागरिक कर्तव्य’’ निभाना है, जो संवैधानिक कर्तव्य (दायित्व) भी है।    

‘‘ जागृत नागरिक! नागरिक निगरानी ’ ’

एक स्थानीय उदाहरण याद आता है। मेरे निवास के सामने सड़क निर्माण के दौरान पार्षद अरूण चैबे न केवल स्वयं कार्य की निगरानी कर गुणवत्ता सुनिश्चित करने का प्रयास करते थे, बल्कि सुबह पानी से तराई भी करते थे। यह संविधान में दिए गए मौलिक कर्तव्य के अनुरूप भी है। लेकिन यदि जनप्रतिनिधि, प्रशासन और स्थानीय तंत्र समय रहते सजग रहें, तो नागरिकों को बार-बार हस्तक्षेप कारी भूमिका निभाने की आवश्यकता ही न पड़े। यह सही है कि नागरिक निगरानी, प्रशासनिक कार्य में बाधा या आत्मघोषित निरीक्षण में परिवर्तित नहीं होनी चाहिए; परंतु यह भी उतना ही सही है कि जागरूक नागरिक लोकतंत्र की आंख और कान होते हैं। ‘‘सोया हुआ तंत्र अक्सर जागे हुए नागरिक से ही जागता है’’।

‘‘ न्यायिक व प्रशासनिक हस्तक्षेप का प्रश्न? ’’

उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उस निर्माण कार्य में कथित भ्रष्टाचार हुआ या गुणवत्ता में कोई कमी है? क्योंकि तभी तो एक्टिविस्ट को तथाकथित भ्रष्टाचार व ब्लैकमेलिंग करने का मौका मिलता? हालांकि ये आरोप कही भी अथवा ‘‘प्राथमिकी’’ में नहीं लगाए गए हैं। उच्चतम न्यायालय से यह अपेक्षा थी कि याचिकाकर्ता के विरूद्ध आपराधिक कार्य करने लिए कार्रवाई किये जाने के साथ ही उस निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच के लिए सरकार को निर्देश भी जारी करती? एक ही मामले में जुड़े दो परस्पर मुद्दों में से सिर्फ एक को ‘‘उपचारित’’ करना सही नहीं?    

‘‘ अर्द्ध न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप ?

इसी संदर्भ में पुलिस विभाग की लगभग 120 एकड़ जमीन पर एक कुख्यात माफिया के कब्जे को लेकर हाल में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से यह कहकर कि  ‘‘माफिया का सफाया करना मेरा प्रिय विषय है’’, राजस्व मंडल जो एक अर्ध-न्यायिक निकाय है, के अध्यक्ष को स्थगन आदेश जारी करने का सीधा निर्देश न्याय व्यवस्था में हस्तक्षेप है। अर्ध-न्यायिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में प्रशासनिक हस्तक्षेप, न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत पर आघात है।

‘‘ निष्कर्ष ’’

स्पष्ट है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका व कार्यपालिका दोनों का दायित्व है, निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ कार्य करें। केवल न्याय होना पर्याप्त नहीं न्याय होता हुआ दिखना भी उतना ही आवश्यक है। संस्थाएं सम्मान से चलती हैं, पर विश्वास से टिकती हैं और विश्वास तभी बनता है, जब ‘‘परसेप्शन’’ और ‘‘एक्शन’’ (कथन और कर्म) दोनों में संतुलन दिखाई दे। लोकतंत्र में कार्यपालिका कानून लागू करना, न्यायपालिका उसकी वैधानिकता की समीक्षा करें और नागरिक सजग प्रहरी की भूमिका निभाए इसी संतुलन पर लोकतंत्र की इमारत खड़ी रहती है।