अमृता प्रीतम जन्म –31-08-1919 - जयंती 31-08-2025

“अदम्य साहसी और गजब की विद्रोहणी नारी उन्होंने हर उस रूढि और वर्जना का विरोध ही नही किया बल्कि उसको तोड़ा भी, जो औरत को हथकड़ी-बेड़ी की तरह लंबे समय से जकड़े हुए थे।” (अमृता प्रीतम की कविताओं ने न केवल हिंदी बल्कि अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं के पाठको के बीच प्रयाप्त लोकप्रीयता हासिल की है।) अमृता प्रीतम जी विश्व स्तर की लेखक होने के साथ गजब की विद्रोहणी नारी भी थी । उन्होंने हर उस रूढि और वर्जना का विरोध ही नही किया बल्कि उसको तोड़ा भी, जो औरत को हथकड़ी-बेड़ी की तरह लंबे समय से जकड़े हुए थे। उन्होंने कारामुक्त होती हुई औरत के लिए न सिर्फ नारेबाजी या दिखावटी कोरी झंड़ाबरदारी नहीं की, वरन् खुद को पहले इस जकड़न से मुक्त किया और मिसाल बन समाज के सामने प्रस्तुत हुई। पंजाबी सिक्ख होने के बावजूद बाल कटवाया, सिगरेट-शराब पीना, पति को छोड़ अपने से कम, उम्र में छोटे, बगैर शादी किए मर्द के साथ रहना, यह सब विद्रोह के तेवर उस युग मेँ बवाल या हड़कंप मचाने के लिए काफी ही नहीं उससे भी बहुत आगे थे। वे अपने वक्त से बहुत आगे थी। उनके लेखन और जीवन के बीच कोई फाँक या संशय नहीं थी । विचार मे स्वतंत्रता, पर आचरण में मर्यादित थी। उनका जन्म 31 अगस्त 1919 को अविभाजित ब्रिटिश भारत के पंजाब के गुजरांवाला में अमृता कौर के रूप में हुआ था। वह सिख दंपत्ति करतार सिंह और राज बीबी की इकलौती संतान थीं। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक और कवि थे। उनका पालन-पोषण आध्यात्मिक वातावरण में हुआ उनका परिवार बहुत धार्मिक था क्योंकि उनके पिता भी एक "प्रचारक" थे - यानी सिख धर्म के प्रचारक। उनकी रूढ़िवादी दादी हिंदुओं और मुसलमानों को परोसने के लिए अलग-अलग बर्तनों का इस्तेमाल करती थीं। छोटी उम्र से ही अमृता एक आलोचनात्मक विचारक थीं और ऐसी प्रथाओं का विरोध करती थीं। और उन्हें लेखन का शौक अपने पिता से विरासत में मिला। अमृता प्रीतम पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है। अमृता जब सिर्फ़ 11 साल की थीं, तब उनकी माँ का देहांत हो गया और उनके परिवार पर विपत्ति आ पड़ी। उस छोटी बच्ची ने अपनी माँ की रक्षा के लिए ईश्वर से बहुत प्रार्थना की थी, लेकिन जब उसकी प्रार्थनाओं के बावजूद उसकी माँ चल बसीं, तो उसने प्रार्थना करना छोड़ दिया। वह अपने पिता के साथ लाहौर चली गईं और घर के कामों के बोझ तले दब गईं। वह बहुत उदास और अकेला महसूस करती थीं और लेखन में सांत्वना ढूँढ़ती थीं। जब वह 16 साल की थीं। इसी दौरान उनकी शादी भी हुई और उन्होंने अपना नाम बदलकर अमृता प्रीतम रख लिया। बचपन में ही उनकी सगाई एक होजरी व्यापारी के बेटे प्रीतम सिंह से तय हो गई थी। बड़े होकर वे संपादक बने और 1936 में उनका विवाह हुआ। एक अर्थहीन विवाह में फँसी, थकी हुई और गर्भवती, उन्होंने 1948 में सूफ़ी कवि वारिस शाह याद करते हुए 'अज्ज आखाँ वारिस शाह नू' कविता के रूप में अपनी भावनाएँ व्यक्त कीं। उनके दो बच्चे हुए। यह विवाह काफी कष्टदायक रहा और 1960 में उन्होंने अपने पति को छोड़ दिया। कहा जाता है कि वह कवि साहिर लुधियानवी से प्रेम करती थीं। साहिर लुधियाना. बेहद क्रांतिकारी मिजाज के साहिर लुधियानवी को अमृता का रूमानी मिजाज जैसे भा गया. वहीं, अमृता भी पहली ही मुलाकात में साहिर को दिल दे बैठी थीं. शादी के सालों बाद अमृता के जीवन में आए साहिर लुधियानवी. दोनों में प्रेम ऐसे खिला कि महक दूर तक फैली और आज भी दोनों के प्रेम के किस्सों की वो महक आपके दिल को प्रफुल्लित कर सकती है। खामोश नजरों से शुरू हुए प्रेम की जो चीख दोनों के दिलों से वह विरह में तब बदली जब बंटवारे के बाद अमृता अपने पति के साथ दिल्लीो चली आईं. साहिर भी काम की तलाश में मुंबई की ओर कूंच किया. यहां फिल्मों  में साहिर के गीत खूब पॉपुलर हुए. बदले हालात के बीच दोनों के बीच खतो-किताबत का सिलसिला चलता रहा. अमृता ने 1960 तक अपनी शादी को निभाया. लेकिन अब अमृता के लिए ये मुश्किल हो रहा था और उन्होंने फैसला लिया कि वे पति का घर छोड़कर दिल्लीे में ही एक किराए के घर में अकेले रहेंगी। उधर, फिल्मी दुनिया की चमक-दमक के बीच साहिर की जिंदगी में एक दूसरी महिला सुधा मल्होेत्रा का आना हुआ. इसी के बाद साहिर और अमृता के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. साहिर के साथ साथ साहिर के खतों के इंतजार का समय भी धीरे-धीरे बढ़ने लगा. पहले साहिर का आना कम हुआ, फिर खतों की गिनती कम हुई और धीरे-धीरे सब कुछ शांत सा हो गया... इसी शांति के दौर के बारे में अमृता ने अपनी आत्मकथा में कुछ इस तरह बताया है: “एक सपना था कि एक बहुत बड़ा किला है और लोग मुझे उसमें बंद कर देते हैं। बाहर पहरा होता है। भीतर कोई दरवाजा नहीं मिलता। मैं किले की दीवारों को उंगलियों से टटोलती रहती हूं पर पत्थर की दीवारों का कोई हिस्सा भी नहीं पिघलता. सारा किला टटोल–टटोलकर जब कोई दरवाजा नहीं मिलता, तो मैं सारा जोर लगाकर उड़ने की कोशिश करने लगती हूं. मेरी बांहों का इतना जोर लगता है कि मेरी सांस चढ़ जाती है।” और इस शांति के बाद...इसी शांत संन्नटे में अमृता के जीवन में एक बेहद ही धीमा सा कंपन हुआ, जिसने प्रेम के इस महाकाव्य में एक और चरित्र को बेहद खुबसूरती से गढ़ा। अकेलेपन के उस दौर में अमृता को मिले इमरोज। एक ऐसा इंसान जिसने अमृता से एक शांत वादा किया कि वह हर हालात में अमृता के साथ रहेगा. यह जानते हुए कि वह किसी और से प्रेम करती हैं. साये की तरह उसके साथ रहना और जीना स्वीकार किया. बिना किसी शिकायत के, बिना किसी मांग के और बिना किसी लालच के इमजोर ने अमृता को अपना आप दे दिया. ठीक वैसे जैसे कभी अमृता दे बैठी थीं खुद को साहिर के नाम. इमरोज ने अमृता पर हक नहीं जताया बल्कि बिना किसी शर्त उन्हें खुद पर पूरा हक दे दिया। इमरोज अमृता के घर ही रहने लगे. एक ही छत के नीचे रहने वाले दो अजनबी प्रेमी, वे अमृता के लिए हर समय उपलब्ध होते। इमरोज के साथ अक्सर अमृता स्कूटर पर उनके पीछे बैठी होती थीं, तो उनकी कमर पर उंगलियों से साहिर का नाम तराशती थीं... अमृता के प्रति इमरोज के प्रेम में वो आदर का भाव ही शायद सबसे मजबूत रहा होगा, जिसने कभी इस पर आपत्ति या जिरह नहीं किया. और यूं अमृता प्रीतम के जीवन में आए इमरोज अमृता को शायद इमरोज में 'राजन' मिला. लेकिन उन्हें दुख था कि राजन के मिलने में समय बहुत लगा. वे अक्सर इमरोज से शिकायत करतीं कि “तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते”. इमरोज एक बेहद मशहूर चित्रकार थे. दिल्ली में रहते हुए अमृता ने ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) में काम किया. इसी दौरान एक एक किताब के कवर डिजाइन के सिलसिले में अमृता और इमरोज की मुलाकात हुई. इसी कवर पेज के डिजाइन के पूरे होते होते दोनों पूरी तरह एक दूसरे के हो चले थे। अमृता इमरोज से पूरे 10 साल बड़ी थीं. पहले से विवाहिता थीं और साहिर के साथ अपने प्रेम को स्वीकारती थीं। ऐसे में इमरोज का प्रेम उनके प्रति कैसे हो सकता था... दोनों के रिश्ते की एक मशहूर घटना है। इमरोज के प्यार पर शक करते हुए अमृता ने इमरोज से कहा था। जाओ दुनिया घूमकर आओ. अगर पूरी दुनिया घूमकर भी तुम मुझे चाहोगे, तो मैं तुम्हारा इंतजार करती मिलूंगी'। जवाब में इमरोज ने अमृता के चारों और उसी तरह चक्कर लगा लिए जिस तरह गणेश ने शिव-पार्वती के चक्कर लगाए और कहा कि लगा लिए मैंने दुनिया के चक्कर, मैं अब भी तुम्हें चाहता हूं। और शायद इमरोज के आने के बाद अमृता को किसी और 'राजन' की तलाश न रही। (अमृता प्रीतम , इमरोज को ‘मेरे सब कुछ’ बुलाती थी। ‘मैं तेनू फिर मिलांगी’ उनकी आखरी कविता थी।) 1936 में जब उन्होंने लिखना शुरू किया तो उन्होंने लगातार कविताएं लिखनी जारी रखीं उनकी पहली कविता संग्रह "अमृत लहरें" 1936 में प्रकाशित हुई। और 1943 तक उनके छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। शुरुआत में वह रोमांटिक कविताएं लिखा करती थीं, हालांकि धीरे-धीरे वह प्रगतिशील लेखक आंदोलन की ओर आकर्षित हुईं, जो विभाजन-पूर्व ब्रिटिश भारत में एक साहित्यिक आंदोलन था और इसका हिस्सा बन गईं। 1944 में, उनका कविता संग्रह 'लोक पीड़ा' (लोगों की पीड़ा) प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने 1943 के बंगाल अकाल के बाद युद्ध से तबाह अर्थव्यवस्था की आलोचना की थी। वह एक साहसी लेखिका के रूप में विकसित हो रही थीं, जो परिणामों की परवाह किए बिना अपनी बात खुलकर व्यक्त करती थीं। 1940 के दशक के मध्य में वह सामाजिक कार्यों में शामिल हो गईं और कुछ समय तक लाहौर रेडियो स्टेशन के साथ काम किया। 1947-48 में भारत के विभाजन के दौरान उन्होंने अपनी आँखों के सामने अकथनीय भयावहता देखी। सांप्रदायिक दंगों में दस लाख से ज़्यादा लोग—मुस्लिम, सिख और हिंदू—भयानक मौत के मुँह में समा गए। 28 साल की एक युवती अमृता किसी तरह मारे जाने से बच गई, लेकिन इस अनुभव ने उसकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया। एक पंजाबी शरणार्थी होने के नाते, वह लाहौर से नई दिल्ली आ गईं और अपनी ज़िंदगी को फिर से बनाने के लिए संघर्ष किया। 1950 में, उन्होंने 'पिंजर' (कंकाल) उपन्यास लिखा, जिसमें उन्होंने विभाजन के दौरान महिलाओं की दुर्दशा का वर्णन किया। यह उपन्यास उस दौर की महिलाओं की लाचारी का वर्णन करता है जब उन्हें अपने ही परिवारों के हाथों उपेक्षा का सामना करना पड़ा। इस उपन्यास पर बाद में इसी नाम से एक पुरस्कार विजेता हिंदी फिल्म भी बनी। उन्होंने 1961 तक दिल्ली स्थित आकाशवाणी की पंजाबी सेवा में काम किया। 1960 के दशक में ही उनकी लेखनी में नारीवाद का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। जिन्होंने अपनी सबसे प्रसिद्ध कविता 'अज्ज आखां वारिस शाह नू' में वारिस शाह का भावनात्मक रूप से आह्वान किया, 20वीं सदी के भारत की अग्रणी महिला लेखिकाओं में से एक थीं। पंजाबी और हिंदी में लिखने वाली प्रीतम एक साहसी और बहादुर महिला थीं, जिन्होंने अपने समय की अधिक पराधीन महिलाओं के विपरीत अपनी शर्तों पर जीवन जिया। एक विपुल लेखिका के रूप में, उन्होंने कविता संग्रह, कथा साहित्य, आत्मकथाएँ और निबंधों सहित 100 से अधिक पुस्तकों की रचना की। 1919 में अविभाजित भारत में जन्मी, उन्होंने एक युवा महिला के रूप में विभाजन की भयावहता देखी, एक ऐसा अनुभव जिसने उन्हें अंदर तक हिला दिया और उनकी आत्मा को चकनाचूर कर दिया। यह भयानक अनुभव के बाद था कि उन्होंने 'अज्ज आखां वारिस शाह नू' कविता में अपनी पीड़ा व्यक्त की, विभाजन के दौरान उनके अनुभवों ने उन्हें 'पिंजर' उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया, जिसमें उन्होंने अपने समय की महिलाओं की बेबसी को दर्शाया। अपनी मार्मिक रचनाओं के माध्यम से, वह पंजाबी साहित्य में महिलाओं की आवाज़ और पंजाबी भाषा की 20वीं सदी की अग्रणी कवयित्री बन गईं। 

                                                    

'अज्ज आखां वारिस शाह नू'
(ये कविता की आरंभिक पंक्तियाँ हैं )
आज मैं वारिस शाह से कहती हूँ, अपनी क़ब्र से बोल,
और इश्क़ की किताब का कोई नया पन्ना खोल,
पंजाब की एक ही बेटी (हीर) के रोने पर तूने पूरी गाथा लिख डाली थी,
देख, आज पंजाब की लाखों रोती बेटियाँ तुझे बुला रहीं हैं,
उठ! दर्दमंदों को आवाज़ देने वाले! और अपना पंजाब देख,
खेतों में लाशें बिछी हुईं हैं और चेनाब लहू से भरी बहती है।
जिनमें उनकी चर्चीत आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है। उनकी रचनाओं का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। बचपन बीता लाहौर में शिक्षा भी वहीं हुई। किशोरावस्था से लिखना शुरू किया कविता,कहानी और निबंध। प्रकाशित पुस्तकों में पचास से भी अधिक किताबों का अनुवाद देशी विदेशी भाषाओं मे हुआ। पंजाबी की शीर्षस्थ रचनाकार अमृता प्रीतम की कविताओं ने न केवल हिंदी परंतु अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं के पाठकों के बीच पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित की है इसका प्रमाम इससे मिलता है कि उनकी किताबों का अनुवाद भारतीय भाषाओं के अलावा विदेशी भाषाओं में भी हुआ है । उनकी कविताओं मे जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को जितनी आत्मीयता और लगाव के साथ ग्रहण किया गया है, यह निश्चित ही उनके रचनाकार की महत्ती उपलब्धि है। समुद्र के समान हिलौरें खाती विराटच जिजीविषा ने अमृता प्रीतम की कविताओं को गहरे लौकिक संदर्भ प्रदान किये है। स्मृतियों के नीले आकाश मे घुमड़ते बादलों-सी इन कविताओं मे नारी की मुक्ति-आकांक्षा और उसके संधर्ष की बड़ी मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। 
                                                     

उपन्यास- पांच बरस लंबी सड़क, पिंजर, अदालत, कोरे कागज़, उन्चास दिन, सागर और सीपियांआत्मकथा-रसीदी टिकट ,,।कहानी संग्रह- कहानियाँ जो कहानियाँ नहीं हैं, कहानियों के आँगन में
संस्मरण- कच्चा आंगन, एक थी सारा, डॉक्टर देव (1949)- (हिन्दी, गुजराती, मलयालम और अंग्रेज़ी में अनूदित), पिंजर (1950) - (हिन्दी, उर्दू, गुजराती, मलयालम, मराठी, अंग्रेज़ी और सर्बोकरोट में अनूदित),आह्लणा (1952) (हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में अनूदित),आशू (1958) - हिन्दी और उर्दू में अनूदित, इक सिनोही (1959) हिन्दी और उर्दू में अनूदित, बुलावा (1960) हिन्दी और उर्दू में अनूदित, बंद दरवाज़ा (1961) हिन्दी, कन्नड़, सिंधी, मराठी और उर्दू में अनूदित,रंग दा पत्ता (1963) हिन्दी और उर्दू में अनूदित,इक सी अनीता (1964) हिन्दी, अंग्रेज़ी और उर्दू में अनूदित,चक्क नम्बर छत्ती (1964) हिन्दी, अंग्रेजी, सिंधी और उर्दू में अनूदित,धरती सागर ते सीपियाँ (1965) हिन्दी और उर्दू में अनूदित, दिल्ली दियाँ गलियाँ (1968) हिन्दी में अनूदित,एकते एरियल (1969) हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनूदित,जलावतन (1670)- हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनूदित,यात्री (1971) हिन्दी, कन्नड़, अंग्रेज़ी बांग्ला और सर्बोकरोट में अनूदित,जेबकतरे (1971), हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी, मलयालम और कन्नड़ में अनूदित,अग दा बूटा (1972) हिन्दी, कन्नड़ और अंग्रेज़ी में अनूदित,,पक्की हवेली (1972) हिन्दी में अनूदित,अग दी लकीर (1974) हिन्दी में अनूदित,कच्ची सड़क (1975) हिन्दी में अनूदित,कोई नहीं जानदाँ (1975) हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनूदित,उनहाँ दी कहानी (1976) हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनूदित,इह सच है (1977) हिन्दी, बुल्गारियन और अंग्रेज़ी में अनूदित,दूसरी मंज़िल (1977) हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनूदित,तेहरवाँ सूरज (1978) हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में अनूदित,उनींजा दिन (1979) हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनूदित, कोरे कागज़ (1982) हिन्दी में अनूदित,हरदत्त दा ज़िंदगीनामा (1982) हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनूदित ।
                                        

आत्मकथा- रसीदी टिकट (1976) ,, 
कहानी संग्रह--हीरे दी कनी, लातियाँ दी छोकरी, पंज वरा लंबी सड़क, इक शहर दी मौत, तीसरी औरत सभी हिन्दी में अनूदित । 
कविता संग्रहः लोक पीड़ (1944), मैं जमा तू (1977), लामियाँ वतन, कस्तूरी, सुनहुड़े (साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह तथा कागज़ ते कैनवस ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह सहित १८ कविता संग्रह। गद्य कृतियाँ--किरमिची लकीरें, काला गुलाब, अग दियाँ लकीराँ (1969),इकी पत्तियाँ दा गुलाब, सफ़रनामा (1973),औरतः इक दृष्टिकोण (1975), इक उदास किताब (1976),अपने-अपने चार वरे (1978), केड़ी ज़िंदगी केड़ा साहित्य (1979),कच्चे अखर (1979), इक हथ मेहन्दी इक हथ छल्ला (1980),मुहब्बतनामा (1980), मेरे काल मुकट समकाली (1980),शौक़ सुरेही (1981), कड़ी धुप्प दा सफ़र (1982),अज्ज दे काफ़िर (1982) सभी हिन्दी में अनूदित। वह लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय की प्रबल समर्थक थीं तथा अपने मंच का उपयोग महिलाओं और हाशिए पर पड़े समुदायों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए करती थीं। एक थीं अमृता, जो साहिर की सिगरेट का टुकड़ा सुलगाकर इमरोज़ की पीठ पर लिखती थीं साहिर का नाम, और एक था इमरोज़, जिसने खुद को सौंप दिया अमृता को...मुझे लगता है अमृता अपने आप में प्रेम का महाकाव्य हैं. मां बचपन में चली गईं, पिता से अपेक्षित नेह नहीं मिला, 16 साल की उम्र में विवाह हुआ. ये विवाह अपनी पराकाष्ठा पर नहीं पहुंच पाया और यहां अलाव को पनपने का मौका मिला. अमृता अपने पति प्रीतम सिंह के साथ तो नहीं रह सकीं, लेकिन उनका नाम आज तक अमृता से जुड़ा है. अपने अंतिम दिनों मे अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान 1982 में पद्मविभूषण भी प्राप्त हुआ। 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विज्ञान ऴ्दारा पुरस्कृत, 1988 मे बुल्गारिया वैरोव पुरस्कार(अंतरराष्ट्रीय) और 1982 में सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 1957 में,पहले ही अलंकृत किया जा चुका था। न्हें अपनी पंजाबी कविता ‘’अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ’’ के प्रसिध्दी प्राप्त हुई । इस कविता मे भारत विभाजन के समय पंजाब मे हुई भयानक घटनाओं का अत्यंत दुखद वर्णन किया गया है और यह भारत और पाकिस्तान दोनों देशों मे सराही गयी।  (अमृता प्रीतम जी की एक रचना- उनकी प्रतिनिधि कविताएं से)  एक दर्द था जो सिगरेट की तरह/ मैंने चुपचाप पिया है/ सिर्फ कुछ नज्में है...जो सिगरेट से मैनें / राख की तरह झाड़ी है। महाप्रयाण -31-10-2005(86 वर्ष) के संधर्ष भरे उम्र के कठिन वर्ष। इनकी लेखनी और इनके विचारों को नमन के साथ विनम्र श्रध्दांजलि।

चिरंजीव (लिंगम चिरंजीव राव) 
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)