"क्या नागरिकों की संवेदनाएं मृत, लुप्त, सुप्त, कुंद हो चुकी हैं?"
राजीव खंडेलवाल (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास)
"क्या नागरिकों की संवेदनाएं मृत, लुप्त, सुप्त, कुंद हो चुकी हैं?"
29 जून 2026. भूमिका। पिछले डेढ़ साल में देश ने तीन ऐसी घटनाएं देखीं, जिन्होंने हमारी "आन-बान-शान" को तार-तार कर दिया। एक तरफ देश की संप्रभुता पर चोट, दूसरी तरफ करोड़ों की धार्मिक आस्था पर संकट, और तीसरी तरफ शहीदों का _भूतों न भविष्यति "जिसकी मिसाल न मिले" ऐसा "अपमान"। आश्चर्य व विडंबना की बात_ यह सब उस दल के राज में हो रहा है, जो खुद को देश की अखंडता और संस्कृति का "इकलौता झंडाबरदार" बताता है।
"तीन घाव, एक सवाल।"
1. "स्वाभिमान पर हमला:" अमेरिका, खासकर राष्ट्रपति ट्रंप, पिछले 17 महीनों से भारत से कथित घोषित दोस्ताना व्यवहार के साथ अक्सर हमारी संप्रभुता व स्वाभिमान की _"धज्जियां उड़ा"_रहे हैं।
2. "आस्था पर चोट: विश्वास का संकट।" श्रीराम मंदिर में चढ़ावे और जमीन खरीद में घपला सामने आया। 1948 के जीप कांड से लेकर आज चढ़ावा गबन तक, क्या भारत "घोटालेबाजों का अड्डा" बन गया है? "व्यवस्था के नाम पर अव्यवस्था" ने "आस्था को लहूलुहान" कर दिया। विश्वास पर टिकी आस्था विश्वासघात के चलते कहां टिकेगी?
3. "शहीदों का अपमान:" ऑपरेशन सिंदूर में शहीद हुए 6 जवानों (5 सेना व 1 एयर फोर्स) की खबर 13 महीने तक "सात परदों में" छिपाई गई। "मुंह में दही जमा लेने" वाली चुप्पी तब तोड़ी गई, जब भारत सरकार ने 26 जून को अधिसूचना जारी कर अधिकृत रूप से शहीदों के नाम सार्वजनिक कर "नेशनल वॉर मेमोरियल स्कूल ऑफ़" के "रोल ऑफ ऑनर" में शामिल किए गए। द हिंदू के अनुसार यह देरी न होकर नाम जोड़ने की "मानक प्रक्रिया" का परिणाम है। तथापि इसके पूर्व ही महामहिम राष्ट्रपति ने 8 जून 2026 को मरणोपरांत दो शहीदों सुनील कुमार को "वीर चक्र" और सुरेंद्र कुमार को "वायु सेवक पदक" से सम्मानित कर चुकी थी।
"सिर शर्म से झुक जाता है।"
सबसे "कलेजा चीरने वाली" बात यह कि 28 जुलाई 2025 को लोकसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने "सीना ठोककर" चुनौती के अंदाज में कहा था – _"हमारा कोई जवान हताहत (casulties) नहीं हुआ"। पीछे बैठे सांसद मेजें "थपथपा" रहे थे। उसी समय शहीद सुरेंद्र सिंह की मां का गुस्सा जीभ काटने तक होकर दर्द छलका, जो आज वायरल है। विडंबना देखिए, 11 मई 2025 को सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO) ने प्रेस ब्रीफिंग के आखिर में "यूँ ही" पांच शहीदों को श्रद्धांजलि दे दी थी। शहीदों के अंतिम संस्कार की खबरें भी छपीं। फिर भी संसद के पवित्र पटल पर शहादत से इनकार करने का राजनाथ सिंह का बयान सिर्फ "विशेषाधिकार" का मामला न होकर क्या यह शहीदों और उनके परिवारों को "जलील"_व अपमानित करना नहीं है? _"बेशर्मी की हद" तो यह कि आज तक रक्षा मंत्री ने "माफी" का एक शब्द नहीं कहा और न ही "गलत बयानी" का खंडन अथवा "खेद व्यक्त" किया। ये 6 शहीद क्या देश के "अनमोल रत्न" नहीं ? अथवा "ऑपरेशन सिंदूर" का हिस्सा ही नहीं थे? भारत का चीन, पाकिस्तान से युद्ध, बांग्लादेश निर्माण एवं कारगिल युद्ध में भी इस तरह से शहादत को कभी नहीं छुपाया।
"विपक्ष भी कुंभकरणी नींद में"
"सवाल" सिर्फ सरकार से नहीं, विपक्ष से भी है। 28 जुलाई को संसद में "असत्य" बोला गया, जबकि 11 मई को ही डीजीएमओ ने श्रद्धांजलि देकर शहादत कबूल ली थी। तब विपक्ष ने "हंगामा क्यों नहीं बरपा"? क्या विपक्ष इस्तीफा मांगने के लिए सरकारी अधिसूचना का "मुंह ताक रहा था"? यद्यपि 2 दिन बाद ही 30 जुलाई को कांग्रेस ने अपने पटना के सदाकत आश्रम में पत्रकार वार्ता में दो शहीद परिवारों को बुलाकर प्रस्तुत किया था, तब यह समझ से परे हैं कि कांग्रेस ने तभी यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया?
8 जून को जब राष्ट्रपति ने वीरता के पदक दिए, तब भी विपक्ष के "होठ सिले हुए थे"। जंतर-मंतर पर पेपर लीक के लिए जिम्मेदार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगने के लिए 8 दिन से डटे "जेन-जी" युवाओं को अपने सीमित उद्देश्य के आगे सरकार से उक्त शहादत के अपमान का जवाब पूछने की "जुर्रत" नहीं की। मीडिया जिसे लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है, टीआरपी के चक्कर में सुशांत सिंह की आत्महत्या को सनसनी समाचार बनाकर पूरे देश में हंगामा खड़ा कर सनसनी पैदा कर देता है। लेकिन यहां पर तो उसकी भूमिका? ठन-ठन गोपाल?
उल्टी गंगा तो नहीं बह रही है?
इस देश में लाल बिहारी "मृतक" को जिंदा साबित करने केलिए 18 साल तक "दफ्तरों की धूल फांकनी" पड़ी। वोट नहीं डाल सका। जमीन नहीं बेच सकता था। उसने अपनी अंतिम संस्कार की भी तैयारी की थी। "मृतक संघ" बनाकर आंदोलन चलाया। अंतत: 1984 में जीवित घोषित हुआ। अलीगढ़ की सरोज देवी, त्रुटिवश पति की जगह उन्हें मृत लिख दिया, वर्ष 2022 से अभी तक रिकॉर्ड ठीक नहीं कर पाई। पर यहां तो गजब हुआ। मृतक (शहीद) को जिंदा घोषित कर दिया, वह भी लोकतंत्र के मंदिर लोकसभा के सदन में। "मुर्दे को जिंदा करना" तो सुना था, यहां तो जिंदा शहादत को मुर्दा बनाने की कोशिश हुई। शुक्र है, सांत्वना की बात है, "आंदोलन के बिना" ही 13 महीने बाद खुद सरकार ने अधिसूचना जारी कर उन्हें शहीद घोषित कर मृत माना। अधिसूचना सिर्फ शहीदों के सम्मान,पदक, या स्मारक तक सीमित नहीं; वह समय पर सत्य और संवेदनशीलता से भी जुड़ी होनी चाहिए।
"एक सैनिक का महत्व जानिए, सीखिए?"
अमेरिका ने 5 अप्रैल 2026 को "नो वन लेफ्ट बिहाइंड" नीति पर चलकर अपनी एक घायल एयरमैन को ईरान की धरती से 48 घंटे के भीतर ही निकालने का उसके इतिहास का अभी तक का सबसे बड़ा खतरनाक सफल रेस्क्यू ऑपरेशन 155 विमान एयरक्राफ्ट्स की मदद से किया। यह उस देश की अपने एक सैनिक के प्रति दृढ़ समर्पण को दर्शाता है।
राष्ट्र केवल शक्ति से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान से भी बड़ा, मजबूत बनता है
हर किसी देश के स्वाभिमान पर चलते-फिरते चोट करने वाला शक्तिशाली देश अमेरिका को जवाब कैसे देते हैं? यह दुनिया के कुछ देशों से सीखिए। ऑस्ट्रेलिया के टर्नबुल, कनाडा के ट्रूडो, डेनमार्क की मेटे फ्रेडरिकसन, स्वीडन के स्टीफन लोफवेन, जर्मनी की मर्केल, फ्रांस के मैक्रों, मेक्सिको के पेना नीटो और क्लाउडिया शीनबाम, तुर्की के एर्दोआन – सबने ट्रंप की धमकियों के सामने "आंख में आंख डालकर" बात की। किसी ने ग्रीनलैंड न बेचा, किसी ने दीवार का पैसा देने से मना किया, पत्र कूड़ेदान में फेंका...!
आखिरी सवाल?
जब "चढ़ावे का गबन" होकर आस्था की डकैती हो, "शहादत छिपाई" जाए और "संप्रभुता हताहत" हो रही हो, तब भी अगर हमारी रगों में खून न खौले, मतलब! क्या हमारी संवेदनाएं "मर" चुकी हैं? इससे पहले कि इतिहास हमें "बेजुबान, बेजमीर" कौम के तौर पर याद करे।
निष्कर्ष
क्या हम प्रतिक्रिया देना भूल रहे हैं? या हम इतने पत्थर दिल हो गए हैं कि राजनीतिक चश्मा पहनकर शहादत को तोड़ने लगे?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सरकार नहीं, जागरूक नागरिक होते हैं। इतिहास उन समाजों को याद रखता है, जो "प्रश्न" पूछते हैं — और उन समाजों को भी, जो "चुप" रह जाते हैं।
"अंत में अपनी बात।"
शहीदों के अपमान से "विचलित" होकर कलम दुखित, व्यथित मन को रेखांकित कर रही है? "राम नाम" से सत्तारूढ़ होने वाले, कहीं "राम नाम सत्य न" हो जाए, असली चिंता यही है, क्योंकि सुदृढ़ विकल्प आज भी नहीं है।


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