विशाखापटनम।  आज अपने मासिक कार्यक्रम के अंतर्गत विशाखापटनम की सक्रिय हिंदी साहित्य संस्था सृजन ने अपने 169 वें  कार्यक्रम के रूप में सदस्यों की काव्य रचनाओं पर साहित्य चर्चा का ऑनलाइन कार्यक्रम  का आयोजन किया। सृजन के रचनाकारों ने अपनी स्वरचित कविताएं प्रस्तुत की जिस पर सदस्यों द्वारा विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम का आरंभ सृजन की वरिष्ठ सदस्या सीमा वर्मा के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने सभी उपस्थित रचनाकारों का स्वगत किया और कहा सृजन संस्था केवल काव्य-पाठ और विमर्श का मंच नहीं, बल्कि वह सृजनात्मक यात्रा है जहाँ शब्दों को संस्कार मिलते हैं, विचारों को दिशा मिलती है और साहित्य सामाजिक उत्तरदायित्व का स्वरूप ग्रहण करता है। इस मंच से अनेक रचनाकार साहित्य के मूल्यों को आत्मसात करते हुए संवेदनशील समाज के निर्माण में अपना सृजनात्मक योगदान दे रहे हैं। कार्यक्रम का संचालन सृजन के अध्यक्ष डॉ नीरव वर्मा ने अपनी विशेष शैली में सफलतापूर्वक किया। कार्यक्रम की शुरुआत हुई सरस्वती वंदना से हुई जिसे  प्रस्तुत किया एल चिरंजीव राव ने। पिछले एक माह से हुई सृजन के साथियों की रचनात्मक गतिविधियों का ब्यौरा  प्रस्तुत करते हुये संस्था से सचिव डॉ टी महादेव राव ने नीरव कुमार वर्मा को सृजन की ओर से उन्हें मानदेय डॉक्टरेट उपाधि मिलने पर बधाई दी। एल चिरंजीव राव को उनकी पुस्तक जलियाँवाला बाग प्रकाशित होने पर हर्ष व्यक्त किया गया। सभी रचनाकारों से  लगातार लिखने की बात कहते हुये सभी को सक्रिय रहने का आह्वान किया। 
 
सबसे पहले सृजन के वरिष्ठतम सदस्य राम प्रसाद यादव (विशाखापटनम) ने ढपोरशंख शीर्षक कविता प्रस्तुत किया जिसमें वर्तमान में एकाकी  होती मानवीय संवेदना की साथ सारी बातें जो मानवीयता और शांति को समाप्त करने पर कटाक्ष था। डॉ वंदना काले (रायपुर छत्तीसगढ़) ने प्रभावी कविता चेहरा क्यों देखें दर्पण में सुनाई जिसमें मन की कुंठा, द्वेष और ईर्ष्या जैसे भावों को अंदर लिए बाहर मुसकुराते चेहरों  पर बात कही गई। डॉ के अनीता (विशाखापटनम) की आशावादी कविता हंसी की ताकत अँधेरों, मुश्किलों और अवरोधों से न डरते हुये आगे बढ्ने की बात सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया।  

कोरोना काल में मनावीय सम्बन्धों और अकेले व्यक्ति की भयभीत वातावरण का जिक्र अपनी कविता बता क्या मैं इस धरा पर हूँ में बखूबी प्रस्तुत किया एल चिरंजीवी राव (इच्छापुरम आंध्र प्रदेश)) ने। डॉ शकुंतला बेहुरा (भुबनेश्वर ओड़ीशा) की सामयिक और सशक्त कविता हे कवि में समाज को बनाने में  कवि के सकारात्मक भूमिका का आह्वान था।

आत्मनिर्भर व्यक्ति शीर्षक की सकारात्मक भावनापूर्ण कविता लेकर प्रस्तुत हुये डॉ एम विजयगोपाल (विशाखापटनम) जिसमें हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा थी। सकारात्मक सोच कविता में गुलाब और काँटों को प्रतीक बनाकर रचना लिए सीमा वर्मा (हैदराबाद) प्रस्तुत हुईं। जिनके पास राज है उनके पास नीति नही और जिनके पास नीति है उनके पास राज नहीं इस मूल भाव को सामयिक स्थितियों के साथ जोड़ते हुए जयप्रकाश झा (दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल) ने अपनी कविता राज और नीति का पाठ किया। वाराणसी रमणी ( हैदराबाद तेलंगाना) ने क्या लिखूँ मैं कविता में वर्तमान परिस्थितियों में कवि की न लिखने और लिखने के बीच की विवशता को रेखांकित किया। अपनी ग़ज़ल रो दिया बहुत मुस्कुराने के बाद में बिछोह के दर्द को दार्शनिक पुट देते हुए वीरेंद्र राय (चंडीगढ़ पंजाब) ने पेश किया।  

पारसनाथ यादव (भरूच गुजरात) ने मौसम शीर्षक रचना में मौसम पर परिवर्तित धरती जीवन पर अपनी बार रखी। डॉ मधुबाला कुशवाहा (विशाखापटनम) आशावादी दृष्टिकोण और सोच को विकसित करने को प्रेरित सकारात्मक विचारों की कविता नज़रिया पढ़ा। सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव (विशाखापटनम) ने "एक शाम : समुद्र और मैं" कविता में एक अभिन्न मित्र के रूप में समुद्र और उसकी गतिविधियों तथा खुद को उससे आत्मीय रूप से जुडने वाली संवेदना को बखूबी प्रस्तुत किया। सृजन के अध्यक्ष डॉ नीरव वर्मा ने बस एक चाह में सामाजिक स्थितियों और सोच को सकारात्मक रूप से बदलने की अपनी चाह को बिंबों के माध्यम से प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया। रचनाकारों ने सभी कविताओं पर चर्चा किया, अपनी बात रखी। 
कार्यक्रम के अंत में डॉ  के अनीता ने पूरे कार्यक्रम का सार संक्षेप प्रस्तुत किया और सभी का आभार माना। सूचना दी गई की सृजन का अगला कार्यक्रम 14 जून को होगा।

डॉ टी महादेव राव, सचिव सृजन , विशाखापटनम