मन्नू भंडारी जन्म 03-04-1931 - जयंती 03-04-2026

“मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती दोनों लेखिकाओं ने, विशेष रूप से घरेलू भूमिकाओं से बाहर निकलकर शिक्षा और रोजगार में महिलाओं की भागीदारी से उत्पन्न संधर्षो को अपने लेखन में बहुत ही सुंदर तरह से दर्शाया है, उन्होंने पंरपरा और आधुनिकता के बीच तनाव, आर्थिक स्वतंत्रता की चाह और व्यक्तिगत स्वायत्तता की भावना को चित्रित किया है।” और 'उन्होंने हिंदी साहित्य जगत को व्यावहारिक, साहसी नायिकाएँ दीं ।”
मन्नू भंडारी के शब्दः- “”कवयित्री की अपेक्षा नारी-कथाकार के साथ यह कठिनाई और भी बढ़ जाती है कि उसे बिना लाक्षणिक भाषा का साहारा लिए अधिक खुलकर सामने आना पड़ता है। वह घिसे-पिटे कथानकों और भाव-धरातलों को ही लेती रहे, तब तक तो ठीक है, लेकिन जहाँ जीवन और जगत के व्यापक क्षेत्रों को छूने का साहस उसमें किया कि प्रत्यक्ष या परोक्ष वर्जनाएँ उसकी ओर अँगुली उठाती सामने आ खड़ी होती है।“” (मन्नू भंडारी जैसी एक महान लेखिका का जीवन पुरूष सत्तात्मक अहम की भेंट चढ़ गयी महिला सा प्रतीत होता है, जहाँ पुरूष महिला से पिछड़ना बर्दाश्त नहीं करता शायद यही एक वजह उनके जीवन की कहानी लगती है और उनके दुखों का संसार बन रह गया।) मन्नू भंडारी जैसी महान लेखिका से मेरा पहला परिचय अपनी युवा अवस्था में वर्ष 1975 के आसपास बासु भट्टाचार्य जी की इतनी स्वस्थ्य प्रेम प्रसंग वाली फिल्म रजनीगंधा के माध्यम से हुई व यह जो मन्नू भंडारी जी की लधु कहानी ‘’यही सच है’’(1966-तीसरी कहानी संग्रह पर आधारित थी) से बहुत प्रभावित हुआ । ऐसे महान निर्देशक की फिल्म में कलाकारों का जो उपयोग हुआ है और कलाकारों ने जो अभिनय किया है वह अत्यंत ही प्रशंनसनीय है, वैसी फिल्मों को देखने का सौभाग्य और उसमें स्त्री मन के उहापोह में उलझी स्त्री मानसिकता बहुत बारीकी से दिखाया गया है जो स्त्री मनोविज्ञान पर सुंदर फिल्म लगी। उसके पश्चात उनके लिखे साहित्य से आज तक मैं उनके लेखन में महिलाओं के संधर्ष को ढूंढता आ रहा हूँ। हिंदी कथा साहित्य के इतिहास में महिला साहित्यकारों में मन्नू भंडारी का नाम विशेष महत्व रखता है। वे उस पीढ़ी की प्रतिनिधि लेखिका मानी जाती है, जिसने प्रेमचंदोत्तर युग में नई कहानी आंदोलन को जन्म दिया है। उनकी कहानियों में साधारण मनुष्य के जीवन, उसकी समस्याओं और विशेषकर स्त्री-पुरूष संबंधों की नयी संवेदना को व्यक्त करती है। मन्नू भंडारी के लेखन में बदलते सामाजिक, आर्थिक एवं सास्कृतिक परिवर्तन का प्रतिबिंब दिखाई देता है। और इसी कारण यह सामाजिक परिवर्तन के जीवंत दस्तावेज लगते है। एक स्त्री के लिए उनके संधर्ष का विशेष महत्व व उनकी लेखनी में यह पक्ष अत्याधिक प्रबल और स्त्री की स्वतंत्र पहचान और अस्मिता के प्रति सजगता होती है। यही कारण है की उनकी लेखनी मे परंपरागत हिंदी साहित्य में जो स्वरूप स्त्री के लिए निर्धारित कर दिया था प्रायः त्याग, सहनशील और समर्पण की प्रतिमूर्ति के रूप मे उसके बंधन तोड़ते हुए मन्नू भंडारी जी ने स्त्री को अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं और अधिकारों के प्रति सजग रखा है और इसी रूप में प्रस्तुत भी किया है। महिला संधर्ष के प्रति अपनी लेखनी के माध्यम से मन्नू जी के विषय में यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि उनकी कहानियां लैगिक असमानता से जुड़ी है। यह उनका भोगा हुआ यथार्थ ही है जो पठकों को झकझोरने का काम करती है। जो उनकी आत्मकथ्य “एक कहानी यह भी” के माध्यम से हम देख सकते है। अपनी लेखनी के प्रति उनके ऐसे सुलझे विचारों के कारण व स्त्री के अधिकारों के प्रति सजगता उनके कई कथा साहित्य में हमें पढने को मिलता है। ऐसी महान लेखिका का जन्म भानपुरा, मंदसौर(मध्यप्रदेश) में दिनाँक 03-04-21931 को एक ऐसे परिवार मे हुआ जहाँ पहले से ही साहित्य के साथ जुड़े विव्दवान पिता नाम सुखसम्पतराय भंडारी था जो एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और अंग्रेजी से हिंदी और अंग्रेजी से मराठी के पहले शब्दकोशों के निर्माता थे। जिन्होंने हिंदी साहित्य को “”हिंदी पारिभाषिक कोष”” (आठ खंड़ों में) और पश्चात “विश्व कोष” का कार्य पूर्ण किया। मन्नू जी का वास्तविक नाम महेन्द्र कुमारी था परंतु उन्होंने मन्नू नाम लेखन के लिए अपनाया। इस तरह मन्नू जी को साहित्यिक संस्कार तथा उनके व्यक्तित्व के निर्माण व विकास का श्रेय उनके पिता को जाता है। माता श्रीमती अनूप कुमारी उदार हृदय वाली धैर्य , सहनशील घरेलू महिला थी। इनके परिवार मे उनके दो भाई क्रमशः प्रसन्न कुमार भंडारी और बसंत कुमार भंडारी दो बहने शुशीला और स्नेहलता थी। प्रायः सभी का जुडाव किसी न किसी तरह शिक्षा और साहित्य से रहा। इस तरह मन्नू जी के जीवन को उनके परिवार के वातावरण ने निखारा जिसके कारण उनकी प्रखर लेखनी के साथ हमनें उनके हर तरह के लेखन का स्वाद चखने को मिलता रहा है। अगर हम उनकी शिक्षा आदि के विषय पर जाते है तो पाते है कि उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अजमेर शहर के सावित्री गर्ल्स हाईस्कूल से हुई यही पर उन्होंने इन्टरमीडियट तक शिक्षा  हासिल की । उनकी शिक्षा को अपने देश के अलग अलग स्थानों पर उनके पिता के बार-बार  तबादले के कारण अनेक शहरो को समझने का और वहां पढाई का सौभाग्य मिला अजमेर में उन्हें बी.ए. में दाखिला न देने के काऱण कॉलेज के खिलाफ आंदोलन भी कर दिया इस तरह उनके गलत बातों के विरोध करने की क्षमता का परिचय हमें मिला इस तरह के अनेक उदाहरण उनके जीवन में हमें मिलते है। आजादी के बाद वहाँ, जिसके काऱण उन्हें वहाँ दाखिला तो मिला  परंतु वहाँ पर पढ़ाई बीच में छोड़कर पश्चिम बंगाल के कोलकता विश्वविद्यालय. से 1949 में बी.ए. स्नातक की उपाधि प्राप्त की। यही पर उनकी शिक्षा की कहानी और हिंदी में उनके लेखन की यात्रा समाप्त नहीं होती संधर्ष के कुछ पहलूओं मे चुंकि उनका स्नातक हिंदी विषय नहीं था तो उन्हें कोलकता में एक वर्ष आध्यापन का कार्य करना पड़ा उसके बाद उन्हें बहिस्थ विद्यार्थी के तौर पर बनारस विश्वविद्यालय में दाखिला मिला और उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा और साहित्य में स्नात्कोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उनका विवाह 22 नवंबर 1959 कोलकत्ता मे हिंदी के एक जाने माने सुप्रतिष्ठित प्रसिध्द साहित्यकार राजेन्द्र यादव जी से हुआ था. इनके विवाह के विषय में व उनकी मुलाकात के विषय में बहुत सी बाते है। इनका परिचय कलकत्ता के बालीगंज शिक्षा सदन के पुस्तकालय जहाँ मन्नू जी अध्यापिका थी वहाँ पर राजेन्द्र यादव जी को उस पुस्तकालय को व्यवस्थित करने के उदेश्य से श्री भगवती सप्ताह खेतानजी व्दारा निमंत्रित किया गया था। फिर पुस्तको, लेखकों व साहित्य चर्चाएँ बाद मे धीरे-धीरे व्यक्तिगत चर्चाओं की दिशा पकडने लगी जो विवाह में परिणित हुई। पर ऐसा कहा जाता है कि इस विवाह के लिए पिता सुखसम्पतराय की स्वीकृति नहीं रही ऐसी अवस्था मे और राष्ट्रीय विचारों व माहौल के सात जुड़ाव के कारण इनके जीवन में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव न रहा पाना ऐसी स्वतंत्र चेत्ता युवती के लिए बहुत कठिन ही नहीं असंभव था, लिखती है 1946-47 के दिनों मे प्रभात फेरियां, हड़ताले, जुलूस, भाषण हर शहर का चरित्र बना था। यह एक प्रकार से उनके स्वभाव के अनुकूल रहा क्यों कि उनका मानना था कि किसी की दी हुई आजादी के दायरे में चलना मेरे लिए, जब रगो में लहू की जगह लावा बहता हो तो सारे निषेध, सारी वर्जनाएँ और सारा भय कैसे ध्वस्त हो जाता है, यह तभी जाना और अपने क्रोध से सबको थरथरा देने वाले पिता से टक्कर लेने का सिलसिला तब शुरू हुआ था, और वह राजेन्द्र जी से शादी की तब तक चलता ही रहा। इस तरह उनके महाभोज के लेखन की जड़ों का सूत्रपात हुआ। जिसके विषय में आगे विवरण है। वे इस अन्तरजातीय विवाह के खिलाफ थे। पश्चात उनका विवाह उनकी बडी बहन शुशीला और उनके जीजा की पहल से कलकत्ता में ही समपन्न कराया गया। ऐसा प्रायः देखा गया है जब वैवाहिक जीवन में कटुता का आना ऐसे वैवाहिक बंधनों के लिए स्वाभाविक लगने लगता है जब एक सदस्य विवाह-बंधन को विश्वास नहीं करता । ऐसे ही राजेन्द्र यादव जी का प्रेम तो मन्नू भंडारी से था परंतु वे दिल्ली की एक लडकी मीता से भी प्रेम था। उस तरह इस बात को उनके अन्य मित्र साहित्यकार मोहन राकेश के माध्यम से मन्नू जी तक पहुंचाया गया ऐसा कहा जाता है। इस तरह जहाँ तक इनके विवाहोपरांत मतभेद होने के कारण आपस में लड़ाई झगड़ा भी हुआ था। इस तरह उनका वैवाहिक जीवन असफल ही रहा ।  जिससे वे बाद 1980 में वे बिना तलाक लिए अलग हो गई और राजेन्द्र यादव जी का साथ उनकी मृत्यु 2013 तक निभाया उनकी एक बेटी है रचना यादव वो भी एक अच्छी लेखिका है। इस दौर तक उनका जीवन कई तरह के कार्य क्षेत्र के साथ जुडता और अलग होता रहा प्रारंभ में कलकत्ता मे हिंदी व्याख्याता के रूप में काम किया , पहले बालीगंज शिक्षा सदन, एक प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय में और बाद में 1961-1965 तक कलकत्ता के रानी बिरला कॉलेज में पढ़ाया। विवाह के पश्चात अपने पति के साथ दिल्ली जाने के बाद वे  दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाऊस कॉलेज में हिंदी साहित्य की व्याख्याता बन गई। अपने जीवन के ऐसे हर पड़ाव में उनके उत्कृष्ट कार्य के प्रतिफल मिलते ही रहे। वर्ष 1992-1994 तक उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय के उज्जैन स्थित प्रेमचंद सृजनपीठ में मानद निदेशक का पद संभाला। उनकी साहित्य यात्रा के कुछ अनमोल पुष्प जो आज भी अपने गुलदस्ते को महकाने में सक्षम है। साहित्य जगत मे एक विशेष स्थान रखने वाली मन्नू जी की रचनाओं में नारियां अपने-अपने तरीके से संधर्ष करती दृष्टिगोचर होती है। इनके साहित्य को न केवल हिंदी में ही सराहा गया बल्कि देश की अन्य भाषाओं में भी उनके अनुवाद के माध्यम से पाठको तक पहुंचाया गया। जिनमें प्रमुख भाषाएँ गुजराती, पंजाबी, मराठी, बंग्ला, कन्न्ड, मलयालम और सिंधी में भी हुए है।

उनकी लिखी कुछ प्रमुक रचनाएः-  

उपन्यासः- एक इंच मुस्कान( राजेन्द्र यादव जी के साथ मिलकर की गयी रचनाएँ)(1961), आपका बंटी(1971), कलवा(1971), महाभेज(1979) और स्वामी (1982) ।
कहानी संग्रहः- मैं हार गई(1957) ,तीन निगाहों की एक तस्वीर(1959), यही सच है(    ), एक प्लेट सैलाब(1968),  और त्रिशंकु (1974)
नाटक संग्रह—बिना दिवारों का घर(1969), महाभोज(नाट्य रूपांतर) (1983)
आत्मकथाः- एक कहानी यह भी(2007)
बाल साहित्यः- कलवा(1971), आसमाता(1971) और आँखों देखा झूठ(बाल कहानियाँ) (1976)
उनके व्दारा रचित हर एक कृति का अपना एक अलग विषय को लेकर आगे चलना तो बताती है, परंतु उनके जीवन में नारी संधर्ष के अनेक पहलुओं पर भी बात की गई है। उनके लिखी रचनाओं मे ‘’आपका बंटी’’ और ‘’महाभोज’’ की चर्चा बहुत हुई और उसके बाद उनके जीवन की आत्मकथा के रूप में ‘’एक कहानी यह भी’’ के माध्यम से जो कुछ भी पाठको तक आया उससे लेखिका के विषय में किसी भी तरह का वाद-विवाद करने का अवसर नहीं रहा वह एक बहुत सजग और सरल लेखिका जिनकी खूबियों की चर्चा हमेशा से होती रही। यकीनन वे एक सफल लेखिका के साथ एक महान महिला भी थी। बहुत गंभीर न सही पर छोटे छोटे घरों की चारदीवारी के अंदर सिमटी एक आम ऩारी की कहानी और संपूर्ण संसार है। उनकी कहानियों में कहीं भी सीधे-सीधे विद्रोह नहीं,  हां  परंतु संस्कारो के साथ चलते हुए स्वतंत्र होने की छटपटाहट देखाई देती है। 

अब अगर हम उनकी कृति ‘’आपका बंटी’’(1971) उनके व्दारा लिखी दूसरी पुस्तक और पहला एकल उपन्यास पर बात करें तो पाते है साहित्य जगत में यह एक अत्यंत ही संवेदनशील और यथार्थवादी उपन्यास है। इस उपन्यास में न केवल एक परिवार की कहानी कही गई, बल्कि उस समाज का दर्पण भी प्रस्तुत करने का सुंदर प्रयास भी किया गया जहां रिश्तों की नींव डगमगाने लगी है और मनुष्य अपनी भावनाओं से दूर होता नजर आने लगा है। बहुत ही सरल तरह से कहा जाए तो हमें मिलता है कि एक 9 वर्ष के बालक की कहानी जिसका नाम बंटी है , जिसके माता-पिता तलाक के रास्ते का चयन कर अपने रिश्तों से अलग होकर अलग-अलग विवाह के बंधनों मे बंध जाते है। इसके बाद बंटी के बाल मन पर उसका जो प्रभाव पडता है और उस बाल मनोविज्ञान की इतनी गहरी समझ के साथ लिखा जाने वाला यह उपन्यास अपने आप में अव्दितीय है , जिसने हिंदी साहित्य जगत में मील का पत्थर साबित हुआ । इस उपन्यास को सर्वप्रथम एक प्रसिध्द साप्ताहिक पत्रिका ‘’धर्मयुग’’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया जाता रहा उसके बाद उसके पाठको की टिप्पणी और अनेकानेक पत्रों ने इस उपन्यास को इतनी प्रशंसा मिली की बाद मे यह उपन्यास का व्यापक रूप में अनुवाद किया गया जिसमें फ्रेंच, बंगाली, अंग्रेजी और भारत की अन्य भाषाओं में भी अनुवाद शामिल है। “”महाभोज”’ विद्रोह का राजनैतिक उपन्यास है। तंत्र के शिकंजे और जन नियति के व्दन्द की दारूण कथा । जन तंत्र में साधारण जन की जगह कहाँ है राजनीति और नौकरशाही के सूत्रधारों ने सारे ताने-बाने को इस तरह उलझा दिया है कि वह जनता को फाँसने और घोटने का जाल बनकर रह गया है। यह उपन्यास भ्रष्ट भारतीय राजनीति के नग्न यथार्थ को प्रस्तुत करता है। उनके आत्मकथ्य के पहले ही महाभोज की जड़ों का सूत्रपात हो गया था और विद्रोह के बीज व समाज में व्यापत असमानता आदि के साथ बुध्दिजीवियों की सामाजिक कुरूपताओं से तटस्थता और समाज के प्रति पनी जिम्मेदारी की उदासिनता के वि।षय को उजागर किया। यह उपन्यास बिहार में बेलछी नामक स्थान पर दलितों के नरसंहार पर आधारित है। वर्ष 1977 में दलित और अनुसूचित जाति के 11 लोगों को उच्च जाति के जंमीनदारों के एक निजी गिरोह ने पकड़कर, बांधकर , उनकी हत्या कर दी और उनके शवों को जला दिया इसके बाद वे जलती हुई चिता के पास दावत करते रहे। इस घटना का व्यापक जन घ्यान आकार्षित किया। महाभोज जिसका र्थ है दावत। महाभोज अपने समय की ही नहीं बल्कि लिखे जाने के बाद पाँच दशक तक की राजनीतिक विद्रूपताओं को निकालकर सामने लाता है। जाति की राजनीति, भ्रष्टाचार, दल-बदल की राजनीति, नेताओं और अफरशाही के चरित्र, अवसरवादिता और संवेदनहीन होते समाज के चेहरा सामने दिखाई देने लगता है। ऐसी बहुत सी बातों का समावेश इस उपन्यास को बहुत प्रचलित किया और वर्ष 2021 तक इसके 21 वें संस्करणों का प्रकाशन भी हुआ है। उनके तीसरे एकल उपन्यास ‘’महाभोग’’ तक की यात्रा के पहले उन पड़ावों के साथ जब हम गुजरेगे तो उस उपन्यास के लेखन का आधार हमें ढूंढने मे कोई कठिनाई नहीं होगी बल्कि उस धरातल को पाने में व समझने मे सरलता मिलेगी। मन्नू जी के जीवन के भोगे यथार्थ के कारण उनकी कहानियों में प्रायः लैंगिक असमानता से जुड़ी है। इसकी जडें हमें उनके आत्मकथ्य में जो ‘’एक कहानी यह भी’’ के नाम से है। इसमें उनके पिता के अनजाने-अनचाहे किए गए व्यवहार ने जिन ग्रंथियों को जन्म दिया ‘’मैं काली हूँ, बचपन में दुबली और मरियल’’ पिता के गोरे रंग की कमजोरी ने उनकी दो वर्ष की गोरी व स्वस्थ्य बड़ी बहन सुशीला से लगातार तुलना का असर मेरी इन ग्रंन्थियों मे आज तक भी रच बस गयी , आज मेरा नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा के होते हुए भी उससे उभर नहीं पाई? शायद अचेतन की किसी पर्त के नीचे दबी इसी हीन –भावना के चलते मैं अपनी उपलब्धि पर भरोसा नहीं कर पाती...सब कुछ मुझे तुक्का ही लगता है, शहरी वातावरण का असर व परंपरागत पड़ोस-कल्चर जैसे शब्दों से फ्लैट कल्चर को अपनाने का दौर जिससे हमारे अंदर पनपने वाले संकुचित, असहाय और असुरक्षित बना देता है। उस दायरे से बाहर आने के हर प्रयास हमेशा करती रही परंतु मेरी कम से कम दस बारह कहानियों में मेरा पूरा मुहल्ला और वहाँ के आसपास के लोगो को ही मैनें अपनी कहानियों में पाया आज किशोरावस्था से युवावस्था का आरंभ किया था तब तक एक-दो को छोड़कर उनमें से कोई भी पात्र मेरे परिवार का नहीं था। यह जरूर की मैं उनके बीच ही रहकर बड़ी हुई जिसका असर मुझमें जीवन भर रहा और इसी तरह कब महाभोज के दा साहब का प्रवेश या यूं कहे इतने समय बाद जीवित हो गए यह एक आशचर्य का विषय रहा।  आत्मकथ्य में लेखिका की स्वयं की व्याख्या भी सटीक व न्यायसंगत है परंतु अगर उसका शीर्षक ‘’मेरी तेरी बात या मेरी तेरी कहानी’’ होती तो शायद बेहतर होता और इस शीर्षक के माध्यम से बहुत कुछ कह देने की क्षमता दिखाई दे जाती क्योंकि इसमें मन्नू जी के साथ राजेन्द्र जी की भी कहानी है. इसमें कहीं यह समझना बड़ा कठिन है कि उनके प्रति मन्नू जी का क्रोध है या किसी कोने मे छिपा प्यार जो हमारे व्दारा लिखना कठिन है। फिर चाहे यह जुड़ाव भावनात्मक रूप में ही सही नकारात्मक या सकारात्मक रहा हो। मन्नू जी ने इस आत्मकथ्य मे अपना पक्ष या बात पूरी निष्ठा के साथ रखी परंतु लेखिका कहीं न कहीं यह बात स्वीकारती है कि यह बात अलग है कि एक पति के रूप में राजेन्द्र यादव जी से अपेक्षाएं, उन्हें अंदर ही अंदर निरंतर डसती रही, खाती रही, खोखला करती रही। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी(अपरिभाषित व अप्रत्याशित) दूरी का असर हमेशा रहा। जिसे लेखन व्दारा भरने का पूरा प्रयास करती रही जब नहीं सहा गया तो बंधन तोडकर अलग हो गई। उनके स्वयं के शब्दों में “लेखन के कारण ही वे आज तक इतना सहकर भी जीवित है। ” लेखन , मातृत्व और एक औरत की भावनाएं यह तीन कोण मन्नू भंडारी  के मष्तिष्क में चलते रहे वह उनके लेखन मे दिखाई देते रहे। इस आत्मकथ्य का सबसे सशक्त पहलू है शब्द, विचार एवं कथन में सादगी व अपनापन प्रवाह में निरंतरता और लेखकीय आडंबर से दूरी। । मन्नू भंडारी की

उपलब्धियाः- हिंदी साहित्य और शिक्षा में उत्कृष्ट योगदान के लिए मन्नू भंडारी को कई सरकारी गैर सरकारी पुरस्कारों से सम्मानित किया गयाः

1-वर्ष 1981 में महाभोज के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान व्दारा सम्मान।
2-भारतीय भाषा परिषद, कलकत्ता व्दारा वर्ष 1982 में सम्मानितः।
3-वर्ष1982 में नई दिल्ली में कला कुंज सम्मान पुरस्कार से सम्मानित किया गया
4-वर्ष 1983 में भारतीय संस्कृत संस्द कथा समारोह व्दारा पुरस्कृत किया गया।
5-वर्ष 1991 में बिहार राज्य हिंदी साहित्य एकादमी व्दारा सम्मानित किया गया.
6-वर्ष 2004 में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी व्दारा सम्मानित किया गया।
7-वर्ष 2006 में हिंदी अकादमी दिल्ली शलाका सम्मान से सम्मानित किया गया।
8-वर्ष 2007 में मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन मे भावबूति अलंकरण से सम्मानित किया गया
9- के के बिड़ला फाउंडेशन ने उन्हें उनकी आत्मकथाएक कहानी . भी के लिए 18 वां व्यास सम्मान से पुरस्कृत किया। 

इनकी आत्मकथ्य लेखन के बाद  अनेक समस्याओं से जूझती मन्नू जी ने 2007 के पश्चात अस्वस्थ्ता के कारण लेखन को एक लंबा विराम दे दिया था जो हमें इस बात की छटपटाहट आत्मकथा में देखने को मिलती है इस दौरान हमारे बीच एक महान महिला साहित्यकार महाश्वेतादेवी के कथन बहुत प्रासंगिक लगती है,“मन्नू मेरे भीतर गर्व और दुःख दोनों जगाती है। मन्नू सामाजिक, आर्थिक हर तरह से आत्मनिर्भर थी। मन से कमजोर क्यूं पड़ गई? मन्नू बड़ी मुहब्बती, सरल और निश्चल है। ईश्वर उसे स्वस्थ रखे, दोबारा उसे कलम की ताकत से भर दे। दुनिया की तमाम नाइंसाफी, फरेब, पीड़ा का जवाब अपनी कलम से ही दे। बस, वह यूं खामोश न रहे। ” विविधता लिए साहित्य सृजनकर्ता महिला लेखिका का हमारे हिंदी साहित्य को आपका बंटी और महाभोज जैसी असाधारण कृतियों की रचयिता प्रसिध्द मन्नू भंडारी का हमारे बीच से 90 वर्ष की आयु में चले जाना नई कहानी आंदोलन के अग्रदूतों में से एक मन्नू भंडारी का न रहना पुरूषवादी समाज पर चोट करने वाली लेखिका के तौर पर हम उन्हें याद करते है। यह सत्य है की हम पाठकों ने उनके लिखे यथार्थ को अपने आसपास पाया है जो उन्होंने भोगा और देखा है और वही सारी बाते नके उपन्यास व कहानियों का कथानक बना। उनका जाना हिंदी साहित्य का एक अध्याय का पूर्ण होने जैसा लगता है, जिसमें हम हमारे समाज के चेहरे को देखा और पढा जा सकता है। “” अपने व्यक्तिगत दुख-दर्द, अंतर्व्दंद या आंतरिक नाटक को देखना बहुत महत्वपूर्ण, सुखद और आश्वस्तिदायक तो मुझे भी लगता है, मगर जब गर में आग लगी हो तो सिर्फ अपने अंतर्जगत में बने रहना या उसी का प्रकाशन करना क्या खुद की अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील नहीं लगने लगता? संभवतः इस उपन्यास की रचना के पीछे यही प्रश्न रहा हो। इसे मैं अपने व्यक्तित्व और नियति को निर्धारित करनेवाले परिवेश के प्रति ऋण-शोध के रूप में ही देखतची हूँ। बाकी प्रत्याशाएँ और आरोप तो आपके अपने है।   “” (मन्नू भंडारी) महाभोज के विषय में उनकी बात। उनका निधन 15-12-2021 को गुरग्राम हरियाणा में हुआ। 

चिरंजीव
लिंगम चिरंजीव राव
(स्वतंत्र लेखन)संकलन एवं लेखन
म.न. 11-1-21/1, कार्जी मार्ग , इच्छापुरम
श्रीकाकुलम , पिन-532 312 मो.न. 8639945892