विश्व महिला दिवस पर विशाखापटनम की संस्था सृजन की 
ऑनलाइन विशेष काव्य साहित्य चर्चा संपन्न
                                             

विशाखापटनम।  आज विश्व महिला दिवस के अवसर पर विशाखापटनम की हिंदी साहित्य संस्था सृजन ने अपने 167 वें  कार्यक्रम के रूप में सदस्यों की काव्य रचनाओं पर साहित्य चर्चा का ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजन किया। सृजन के रचनाकारों ने नारी को केंद्र में रखकर लिखी कविताएं प्रस्तुत की जिस पर सदस्यों द्वारा विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम का आरंभ सृजन की वरिष्ठ सदस्या सीमा वर्मा के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने सभी उपस्थित रचनाकारों का स्वगत किया और कहा सृजन संस्था केवल काव्य-पाठ और विमर्श का मंच नहीं, बल्कि वह सृजनात्मक यात्रा है जहाँ शब्दों को संस्कार मिलते हैं, विचारों को दिशा मिलती है और साहित्य सामाजिक उत्तरदायित्व का स्वरूप ग्रहण करता है। इस मंच से अनेक रचनाकार साहित्य के मूल्यों को आत्मसात करते हुए संवेदनशील समाज के निर्माण में अपना सृजनात्मक योगदान दे रहे हैं।कार्यक्रम का संचालन सृजन के स्थापना सचिव डॉ टी महादेव राव  ने अपनी विशेष शैली में सफलतापूर्वक किया। कार्यक्रम की शुरुआत हुई सरस्वती वंदना से जिसे लिखा और प्रस्तुत किया डॉ श्रद्धा सिंह यादव ने। सबसे पहले डॉ मधुबाला कुशवाहा (विशाखापटनम) ने वर्तमान में बदलती स्त्री की दशा और दिशा पर और सशक्त होते उसके आत्मविश्वास पर कविता सुनाई “मैं एक नई कहानी हूं”। डॉ आरती सिंह (विशाखापटनम) ने नई जागृति की भावना को समेटी आधुनिक नारी पर प्रभावी कविता सुनाई “मौन नहीं अब गरजना है” जिसमें नारी के स्वाभिमान की कथा थी। समर्पण की मूर्ति नारी पर रचना सुनाई डॉ के अनीता (विशाखापटनम) ने जिसमें नारी के विविध गुणों की चर्चा बखूबी किया गया ममता, स्नेह, पीड़ा सहने में धरती, बहन, मां, बीवी, बेटी की भूमिका निभाती “नारी” । डॉ शकुंतला बेहुरा (भुबनेश्वर ओड़ीशा) ने मिट्टी के बंटवारे, देश की एकता और सांप्रदायिक मेल-जोल पर कविता “बस एक लकीर” का पाठ किया जिसमें वर्तमान में एकाकी होते मानवीय संबंधों पर कटाक्ष था। “वजूद” शीर्षक कविता में सीमा वर्मा (बेंगलूरु) ने  आधुनिक नारी के सशक्त होने का सकारात्मक एहसास को शब्दों में पिरोया। उन्होंने बताया बेटी के और बेटे के जन्म के बाद किस तरह लोगों की सोच बदलती है, आज जरूरत है उसे सोच को समान करने बराबर करने की। वारणसी रमणी (हैदराबाद) ने नारी के विविध रूपों को समेटते हुए कविता पाठ किया शीर्षक था “नारी”। स्त्री और रचनाकार के बीच की के अंतर को “स्त्री और सृजन” शीर्षक कविता में सुनाया डॉ श्रद्धा सिंह यादव (भोपाल, मध्यप्रदेश) ने, जिसमें रचनाकार और स्त्री को शिल्पी, पथिक और सर्जक के रूप में बखूबी दर्शाया, एक काया से रचना करती तो एक शब्दों से संसार रचाता। पारसनाथ यादव (भरूच गुजरात) ने “सशक्तिकरण” शीर्षक कविता में बराबरी का अधिकार ही है सबसे भारी कहते हुए आधुनिक नारी पर होते यातना और बराबरी का हक न देने के प्रयासों का खुलासा किया। “महिला दिवस” के नाम पर केवल एक दिन देकर हम महिलाओं के साथ जो व्यवहार करते हैं, उससे जुड़ी वास्तविकताओं और औपचारिकताओं पर सुंदर और सशक्त कविता पढ़ा वीरेंद्र राय (चंडीगढ़ पंजाब) ने। सृजन के वरिष्ठतम सदस्य राम प्रसाद यादव (विशाखापटनम) ने दो छोटी-छोटी कविताएं "एक आंचल आसमान" और "वसंत गीत" प्रस्तुत किया जिसमें मुट्ठी भर ख्वाब और ख़्वाहिशों की फसल को प्रतीक बनाते हुए स्त्री का, पुरुष के जीवन में महत्व को बखूबी पेश किया।  वसंत  गीत में बमबारी होते हैं, मलबे और लाशों के बीच कोई अंतर न होने की युद्ध की स्थितियों पर उनका प्रश्न होता है क्या तुम अभी वसंत गीत लिख लेते हो? सुंदर रचनाओं के साथ उनकी अभिव्यक्ति प्रशंसनीय  रही। नारी और पुरुष में जिन गुणों का समावेश वर्तमान समय में है, उसका खुलासा अपनी कविता "इस युग की नारी"  कविता में एसवीआर नायडू (हैदराबाद) ने पेश किया। नारी विषय पर दो सामयिक मुक्तक प्रस्तुत करने के बाद ने एल चिरंजीवी राव (चेन्नई) ने युद्ध और आतंक का चित्रण अपनी कविता में किया जो कि वर्तमान समय का एक दस्तावेज कहा जा सकता है। सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव (विशाखापटनम) ने "नारी कल और आज" कविता में प्रेमिका के रूप में नारी के महत्व और पति के रूप में उसके नकारने की स्थितियों का प्रभावी वर्णन अपनी कविता में किया। इसके साथ ही नारी को नदी का रूप मानते हुए नदी और नारी में समानता दर्शाते हुए एक अच्छी कविता "नदी और नारी" का भी उन्होंने पाठ किया जिसमें नदी के थपेड़े और अंत में समुद्र से मिलने के बीच की यात्रा को मनोहरी ढंग से प्रस्तुत किया गया।  कार्यक्रम के अंत में डॉ  के अनीता ने पूरे कार्यक्रम का सार संक्षेप प्रस्तुत किया और सभी का आभार माना। सूचना दी गई की सृजन का अगला कार्यक्रम 12 अप्रैल को होगा।

डॉ टी महादेव राव, सचिव सृजन , विशाखापटनम