छिंदवाड़ा। बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच में भगवान शंकर की पूजा करने के बाद पास में ही पत्थरों के बीच से एक सुरंग है जिसमें जाना मुश्किल लगता है। लेकिन फिर भी लोग बारी-बारी से अंदर जाते हैं, और दूसरी तरफ निकलते हैं।चेहरे पर ऐसी खुशी होती है जैसे कोई जंग जीत ली हो।खुशी इसलिए होती है माना जाता है कि जो इन चट्टानों के बीच से सही सलामत बाहर आ जाता है उसके मन में किसी तरह का पाप नहीं होता है।आईए जानते हैं क्या होती है पाप और पुण्य की परीक्षा।

चट्टानों के बीच गुजरकर देते हैं पाप और पुण्य का टेस्ट

छिंदवाड़ा के पेंच टाइगर रिजर्व के किनारे से लगे गांव सांख के जंगल की इस जगह को लोग डोंगरदेव के नाम से जानते हैं। यहां पर दो ऐसी चट्टाने हैं जिनके नीचे से गुजर कर लोग अपने पाप और पुण्य की परीक्षा देते हैं। लोगों का कहना है कि जो इन चट्टानों के बीच से बनी सुरंग से आसानी से निकल जाता है ऐसा माना जाता है कि उसके मन में किसी तरह का पाप नहीं है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति के विचार खराब हो और मन में किसी तरह का पाप हो तो वह इन चट्टानों के बीच में फंस जाता है। फिर यहां के पंडे और भूमका पूजा पाठ करने के बाद उन्हें निकालते हैं। कार्तिक पूर्णिमा से 15 दिनों तक लोग यहां पर इन चट्टानों के बीच से गुजरने के लिए पहुंचते हैं।

शेर की गुफा और चट्टान में पैरों के निशान

डोंगरदेव में पाप और पुण्य की परीक्षा देने पहुंचे ऋतिक सुलखिया ने बताया कि, ''दो बड़ी चट्टानों के बीच में छोटी सी सुरंग है यहां से निकलना मुश्किल होता है इसी के बगल में एक गुफा भी है। कहा जाता है कि मेले के दौरान रात में बाघ यहां पर आता है, साथ ही एक बड़ी चट्टान में बाघ के पैरों के निशान भी दिखाई देते हैं।हालांकि पेंच टाइगर रिजर्व से सटे होने की वजह से बाघ और दूसरे जंगली जानवर का यहां आना-जाना आम बात है।सुरक्षा लिए बाकायदा वन विभाग की टीम भी तैनात रहती है. इस साल तो वन विभाग ने मेले की अनुमति भी देरी से दी है. क्योंकि एक बाघिन का मूवमेंट शावकों के साथ यहां पर देखा गया था।

जंगल के देवता माने जाते हैं डोंगरदेव

साजपानी गांव से डोंगरदेव पहुंचे बृजेश रघुवंशी ने बताया कि, ''डोंगरदेव का मतलब पहाड़ों का देवता होता है और जंगलों में रहने वाले लोग प्रकृति के पुजारी होते हैं।इसलिए जंगल और पहाड़ों के देवता डोंगरदेव की पूजा साल में एक बार उत्सव के रूप में की जाती है।ताकि साल भर जंगल में वे प्रकृति और जानवरों के बीच में भाईचारे के साथ रह सकें, इसलिए यहां डोंगरेदेव की पूजा की जाती है।जंगली जानवर और जंगल में रहने वाले पशु पक्षियों को जंगल के आसपास रहने वाले लोग अपना मित्र मानते हैं. पेंच पर बनी चट्टान बताती है कौन कितना पापी ।

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पांडवों ने बिताया था अज्ञातवास

गांव की ही महिला मौसमी रघुवंशी ने बताया कि, ''डोंगरदेव का इतिहास महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि जब चौपड़ में पांडव हार गए थे तो उन्हें अज्ञातवास में रहना था, इस अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां पर आकर रह रहे थे और उनकी मां कुंती ने शिवलिंग का निर्माण कर भगवान शंकर की पूजा की थी। पास से ही पेंच नदी गुजरती है जहां का पानी लाकर वे शिवजी का जलाभिषेक करती थीं। तब से ही इस स्थान पर भगवान शंकर की प्रतिमा विराजित है इसलिए इसका अलग महत्व है।

डोंगर देव के पुजारी रामलाल कुमरे ने बताया 

कई सालों से यहां पर मेला लगता है, लोग अपनी आस्था के साथ यहां आते हैं और चट्टानों के बीच से निकलते हैं। कई लोग तो यहां पर मन्नत भी करते हैं और फिर जब मन्नत पूरी हो जाती है तो भंडारा भी करते हैं। पाप और पुण्य की परीक्षा यहां होती है। क्योंकि कई बार देखा जाता है कि कुछ लोग इन सुरंग से नहीं निकल पाते हैं, तो फिर उनके लिए पूजा पाठ की जाती है।