पंडित प्रतापनारायण मिश्र जन्म-24-09-1856 - जयंती 24-09-2025
पंडित प्रतापनारायण मिश्र जन्म-24-09-1856 - जयंती 24-09-2025
मिश्रजी हिंदी, हिन्दू, हिन्दुस्थान के कट्टर समर्थक रहे
प्रति-भारतेंदु और व्दितीय हरिश्चंद्र के नाम से पुकारे जाने वाले भारतेंदु मण्डल के प्रमुख लेखक, कवि और पत्रकार थे पंडित प्रतापनारायम मिश्रजी । वह भारतेंदु निर्मित एवं प्रेरित हिंदी लेखकों की सेना के महारथी, उनके आदर्शो के अनुगामी और आधुनिक हिंदी भाषा तथा साहित्य के निर्माणक्रम में उनके सहयोगी थे। प्रतापनारायण मिश्र जन्म 24 सितंबर, 1856 - मिश्र जी उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के अंतर्गत बैजे गाँव बेथर के निवासी थे, पं॰ संकठा प्रसाद मिश्र के पुत्र थे। बड़े होने पर वह पिता के साथ कानपुर में रहने लगे अक्षरारंभ के पश्चात उनसे ही ज्योतिष पढ़ने लगे ऐसा पिताजी की इच्छा थी, पिताजी उन्हें ज्योतिष का पंडित बनाना चाहते थे, किंतु ज्योतिषि की ओर इनकी कोई रूचि नहीं थी। । किंतु उधर रुचि न होने से पिता ने उन्हें अंग्रेजी स्कूल में भरती करा दिया वहाँ भी उनका मन नही लगा । तब से कई स्कूलों का चक्कर लगाने पर भी वह पिता की लालसा के विपरीत पढ़ाई-लिखाई से विरत ही रहे और पिता की मृत्यु के पश्चात् 18-19 वर्ष की अवस्था में उन्होंने स्कूली शिक्षा से अपना पिंड छुड़ा लिया। इस प्रकार मिश्रजी की शिक्षा अधूरी ही रह गई। किंतु उन्होंने प्रतिभा और स्वाध्याय के बल से अपनी योग्यता पर्याप्त बढ़ा ली थी। वह हिंदी, उर्दू और बँगला तो अच्छी जानते ही थे, फारसी, अँगरेजी और संस्कृत में भी उनकी अच्छी गति थी। मिश्र जी छात्रावस्था से ही "कविवचनसुधा" के गद्य-पद्य-मय लेखों का नियमित पाठ करते थे, जिससे हिंदी के प्रति उनका अनुराग उत्पन्न हुआ। लावनी गायकों की टोली में आशु रचना करने तथा ललितजी की रामलीला में अभिनय करते हुए उनसे काव्यरचना की शिक्षा ग्रहण करने से वह स्वयं मौलिक रचना का अभ्यास करने लगे। इसी बीच वह भारतेंदु के संपर्क में आए। उनका आशीर्वाद तथा प्रोत्साहन पाकर वह हिंदी गद्य तथा पद्य रचना करने लगे। इसी बीच वह भारतेंदु के संपर्क में आए। उनका आशीर्वाद तथा प्रोत्साहन पाकर वह हिंदी गद्य तथा पद्य रचना करने लगे। 1882 के आसपास "प्रेमपुष्पावली" प्रकाशित हुई और भारतेन्दु जी ने उसकी प्रशंसा की तो उनका उत्साह बहुत बढ़ गया । हिंदी साहित्य में पंडित प्रतापनारायण मिश्रजी का स्थान साहित्य मर्मज्ञों से छिपा नहीं है. भारतेंदु-युग के प्रतिभाशाली साहित्यकार है। आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रथम उत्थान काल भारतेंदु हरिश्चंद, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र से ही गौरवान्वित है। मिश्रजी की हिंदी साहित्य की सेवीओं को कबी भुलाया नहीं जा सकता। उनका साहित्य जितना वैविध्यपूर्ण है, उनका जीवन और व्यक्तित्व उतना ही विराट, बहुरंगा विविधताओं और विचित्रताओं से परिपूर्ण था। इस तथ्य को उनके समकालीन और परवर्ती सबी विव्दवानों ने माना है। सांसकृतिक चेतना की दृष्टि से प्रतापनारायण मिश्र का साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन दिनों भारत में अंग्रेजी शासन था, भारतीय जनता पाश्चात्य संस्कृति की ओर मोहित हो रहे थी, प्रतापनारायण मिश्र ने अपनी साहित्य व्दारा बारतीय संस्कृति का महत्व उजागर किया, तथा जनता को इस ओर आकर्षित किया। इनके विषय में यह बात प्रचलित है कि वे न तो भारतेंदु की तरह किसी अभिजात वर्ग या कुल में पैदा हुए और न उनके बालकृष्ण भट्ट जी की तरह किसी संस्कृत साहित्य के संस्कार थे पर अधूरी शिक्षा के साथ अपनी क्षमताओं को जिस तरह उन्होंने बढ़ाया और स्वयं को साहित्य के क्षेत्र में तैयार किया अदभुत रहा। उन्नाव से कानपुर आकर बस गये थे। अजब की सरलता और मस्ती गाँवों की भाती रही व स्वछन्द भी रहे। वे भारतेंदु जी का सम्मान करते थे।15 मार्च 1883 को, होली के दिन, अपने कई मित्रों के सहयोग से मिश्रजी ने "ब्राह्मण" नामक मासिक पत्र निकाला। यह अपने रूप-रंग में ही नहीं, विषय और भाषाशैली की दृष्टि से भी भारतेंदु युग का विलक्षण पत्र था।भारतेन्दु मंडल|, के प्रमुख लेखक, कवि और पत्रकार थे। भारतेंदु पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी, वह अपने आप को उनका शिष्य कहते तथा देवता की भाँति उनका स्मरण करते थे। भारतेंदु जैसी रचनाशैली, विषयवस्तु और भाषागत विशेषताओं के कारण मिश्र जी "प्रति-भारतेंदु" और "द्वितीय हरिश्चंद्र" कहे जाने लगे थे। सजीवता, सादगी, बाँकपन और फक्कड़पन के कारण भारतेंदुकालीन साहित्यकारों में जो स्थान मिश्रजी का था, वही तत्कालीन हिंदी पत्रकारिता में इस पत्र का था, किंतु यह कभी नियत समय पर नहीं निकलता था। दो-तीन बार तो इसके बंद होने तक की नौबत आ गई थी। इसका कारण मिश्रजी का व्याधिमंदिर शरीर और अर्थाभाव था। रामदीन सिंह आदि की सहायता से यह येन केन प्रकारेण संपादक के जीवनकाल तक निकलता रहा। उनकी मृत्यु के बाद भी रामदीन सिंह के संपादकत्व में कई वर्षों तक निकला, परंतु पहले जैसा आकर्षण उसमें न रह। सन 1889 में मिश्र जी 25 रू. मासिक पर "हिंदोस्थान" के सहायक संपादक होकर कालाकाँकर आए । उन दिनों पं॰ मदनमोहन मालवीय उसके संपादक थे। यहाँ बालमुकुंद गुप्त ने मिश्रजी से हिंदी सीखी। मालवीय जी के हटने पर मिश्रजी अपनी स्वच्छंद प्रवृत्ति के कारण वहाँ न टिक सके। कालाकाँकर से लौटने के बाद वह प्राय: रुग्ण रहने लगे। फिर भी समाजिक, राजनीतिक, धार्मिक कार्यो में पूर्ववत रुचि लेते रहे और "ब्राह्मण" के लिए लेख आदि प्रस्तुत करते रहे। 1891 में उन्होंने कानपुर में "रसिक समाज" की स्थापना की। कांग्रेस के कार्यक्रमों के अतिरिक्त भारतधर्ममंडल, धर्मसभा, गोरक्षिणी सभा और अन्य सभा-समितियों के सक्रिय कार्यकर्ता और सहायक बने रहे। कानपुर की कई नाट्य सभाओं और गोरक्षिणी समितियों की स्थापना उन्हीं के प्रयत्नों से हुई थी। मिश्रजी जितने परिहास प्रिय और जिंदादिल व्यक्ति थे उतने ही अनियमित, अनियंत्रित, लापरवाह और काहिल थे। रोग के कारण उनका शरीर युवावस्था में ही जर्जर हो गया था। तो भी स्वास्थ्यरक्षा के नियमों का वह सदा उल्लंघन करते रहे। इससे उनका स्वास्थ्य दिनों-दिन गिरता गया। 1892 के अंत में वह गंभीर रूप से बीमार पड़े और लगातार डेढ़ वर्षो तक बीमार ही रहे। प्रतापनारायण मिश्र भारतेंदु के विचारों और आदर्शों के महान प्रचारक और व्याख्याता थे। वह प्रेम को परमधर्म मानते थे। हिंदी, हिंदू, हिदुस्तान उनका प्रसिद्ध नारा था। समाजसुधार को दृष्टि में रखकर उन्होंने सैकड़ों लेख लिखे हैं। बालकृष्ण भट्ट की तरह वह आधुनिक हिंदी निबंधों को परंपरा को पुष्ट कर हिंदी साहित्य के सभी अंगों की पूर्णता के लिये रचनारत रहे। एक सफल व्यंग्यकार और हास्यपूर्ण गद्य-पद्य-रचनाकार के रूप में हिंदी साहित्य में उनका विशिष्ट स्थान है। मिश्र जी की मुख्य कृतियाँ निम्नांकित हैं : नाटक: गो संकट, भारत दुर्दशा, कलिकौतुक, कलिप्रभाव, हठी हम्मीर। जुआरी-खुआरी (प्रहसन)। संगीत शाकुंतल (कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुंतम्' का अनुवाद)। निबंध संग्रह निबंध नवनीत, प्रताप पीयूष, प्रताप समीक्षा अनूदित गद्य कृतियाँ: राजसिंह, अमरसिंह, इन्दिरा, राधारानी, युगलांगुरीय, चरिताष्टक, पंचामृत, नीतिरत्नमाला,बात कविता : प्रेम पुष्पावली, मन की लहर, ब्रैडला स्वागत, दंगल खंड, तृप्यन्ताम्, लोकोक्तिशतक, दीवो बरहमन (उर्दू)। मिश्रजी के निबंधों में विषय की पर्याप्त विविधता है। देव-प्रेम, समाज-सुधार एवं साधारण मनोरंजन आदि मिश्रजी के निबंधों के मुख्य विषय थे। उन्होंने 'ब्राह्मण' मासिक पत्र में हर प्रकार के विषय पर निबंध लिखे। जैसे - घूरे के लत्ता बीने-कनातन के डोल बांधे, समझदार की मौत है,आप, बात, मनोयोग, बृद्ध, भौं, मुच्छ, ह, ट, द आदि। मिश्रजी 'हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान' के कट्टर समर्थक थे, अतः उनकी रचनाओं में इनके प्रति विशेष मोह प्रकट हुआ है। भाषा खड़ीबोली के रूप में प्रचलित जनभाषा का प्रयोग मिश्रजी ने अपने साहित्य में किया। प्रचलित मुहावरों, कहावतों तथा विदेशी शब्दों का प्रयोग इनकी रचनाओं में हुआ है। भाषा की दृष्टि से मिश्रजी ने भारतेंदु का अनुसरण किया और जन साधारण की भाषा को अपनाया। भारतेंदुजी के समान ही मिश्रजी भाषा की कृतिमता से दूर रहे। उनकी भाषा स्वाभाविक है। उसमें पंडिताऊपन और पूर्वीपन अधिक है तथा ग्रामीण शब्दों का प्रयोग स्वच्छंदता पूर्वक हुआ है। संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेज़ी, आदि के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग है। भाषा विषय के अनुकूल है। गंभीर विषयों पर लिखते समय भाषा और गंभीर हो गई है। कहावतों और मुहावरों के प्रयोग में मिश्रजी बड़े कुशल थे। मुहावरों का जितना सुंदर प्रयोग उन्होंने किया है, वैसा बहुत कम लेखकों ने किया है। कहीं-कहीं तो उन्होंने मुहावरों की झड़ी-सी लगा दी है।


शैली मिश्रजी की शैली वर्णनात्मक, विचारात्मक तथा हास्य-व्यंग्यात्मक है
विचारात्मक शैली- साहित्यिक और विचारात्मक निबंधों में मिश्रजी ने इस शैली को अपनाया है। कहीं-कहीं इस शैली में हास्य और व्यंग्य का पुट भी मिलता है। इस शैली की भाषा संयत और गंभीर है। 'मनोयोग' शीर्षक निबंध का एक अंश देखिए-
(इसी से लोगों ने कहा है कि मन शरीर रूपी नगर का राजा है। और स्वभाव उसका चंचल है। यदि स्वच्छ रहे तो बहुधा कुत्सित ही मार्ग में धावमान रहता है।) व्यंग्यात्मक शैली - इस शैली में मिश्रजी ने अपने हास्य-व्यंग्यपूर्ण निबंध लिखे हैं। यह शैली मिश्रजी की प्रतिनिधि शैली है, जो सर्वथा उनके अनुकूल है। वे हास्य-विनोद प्रिय व्यक्ति थे। अतः प्रत्येक विषय का प्रतिपादन हास्य और विनोदपूर्ण ढंग से करते थे। हास्य और विनोद के साथ-साथ इस शैली में व्यंग्य के दर्शन होते हैं। विषय के अनुसार व्यंग्य कहीं-कहीं बड़ा तीखा और मार्मिक हो गया है। इस शैली में भाषा सरल, सरस और प्रवाहमयी है। उसमें उर्दू, फारसी, अंग्रेज़ी और ग्रामीण शब्दों का प्रयोग हुआ है। लोकोक्तियों और मुहावरों के प्रयोग के कारण यह शैली अधिक प्रभावपूर्ण हो गई है। एक उदाहरण देखिए- (दो-एक बार धोखा खाके धोखेबाज़ों की हिकमत सीख लो और कुछ अपनी ओर से झपकी-फुंदनी जोड़ कर उसी की जूती उसी का सर कर दिखाओ तो बड़े भारी अनुभवशाली वरंच 'गुरु गुड़ ही रहा और चेला शक्कर हो गया' का जीवित उदाहरण कहलाओगे।) समालोचना- कवि होने के साथ-साथ उच्चकोटि के मौलिक निबंध लेखक और नाटककार थे। हिंदी गद्य के विकास में मिश्रजी का बड़ा योगदान रहा है। ’’’ आचार्य शुक्ल जी ने पं॰ बालकृष्ण भट्ट के साथ मिश्र जी को भी महत्व देते हुए अपने हिंदी-साहित्य के इतिहास में लिखा है- पं० प्रतापनारायण मिश्र और पं० बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी गद्य साहित्य में वही काम किया जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडीसन और स्टील ने किया।

मिश्र जी के बारे में लिखते हुए बच्चन सिंह (हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास) में लिखते है कि ये न तो भारतेंदु की तरह अभिजात कुल में पैदा हुए थे और भट्टजी की भांति उन पर संस्कृत साहित्य का संस्कार था। उनमें गाँव की सरलता और मस्ती थी। वे पूरे तौर पर स्वच्छनंद थे। ऐसा देखा गया की वे भारतेंदु जी का सम्मान हमेशा करते थे , इस विषय में कि वे ब्राहम्ण होते हुए भारतेंदु को प्रणाम करते थे यह बात महावीरप्रसाद व्दिवेदी जैसे ब्राहम्णों को नागावरा लगता था. उन्होंने अपने विचारों के प्रकाशनार्थ ब्राहम्ण पत्रिका निकाली थी। यह भी कहा गया की उनका स्वर भारतेंदु जी के स्वर से मेल खाता था, पर व्यंग्य की पैनी धार उनकी अपनी ही होती थी। एक उदाहरण- “उचितवक्ता भाई पूछते है, क्या प्रयागराज में अंग्रेजी राज्य नहीं है ? क्यों, क्या वहाँ चुंगी नहीं है ? क्या वहाँ उर्दू नहीं है ? क्या वहाँ दरिद्र नहीं है ? कान्यकुब्ज प्रकाश से कहो, रैडरोना बंद करे। जल्दी समाज का ढ़चर बदल डालिए। जल्दी कीजिए, नहीं निश्चय कुशल नहीं है। “ बहुत ही कडवी बात सरल शब्दों में कहना । प्रतापनारायण मिश्र ने भी भारतेंदु की तरह श्रृंगारिक और देश-प्रेम की कविताएँ लिखी है। यदि भारतेंदु की लोकोक्तियाँ ‘’ऊँची दुकान फीकी मिठाई’’ , ‘’हाय सखी इन हाथन सों अपने पग आप कुठार मैं दीनों’’ –ठाकुर की याद दिलाती है, तो प्रतापनारायण मिश्र की कविताएँ भारतेंदु की। मिश्रजी की श्रृंगारिक कविताओं में कुछ समस्यापूर्तियाँ बहुत ही प्रसिध्द है-जैसे-
सिर चोटी गुथावती फूलन सीं, मेहंदी रची हाथन पाँवन में।
परताप त्यों चूनरी सुही सजी, मन मोहती हावन भावन में।।
निस द्धौस वितावति पीतम के संग, झूलन में औ झुलावत में।
नहीं को सुहावन लागत है, धुरवान की धावन सावन में ।।
तत्कालीन साहित्य स्थिति का प्रभाव भी इन पर बहुत पड़ा, हिंदी में हो रही गिरावट के प्रति वे बहुत चिंतित रहे। उन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए तन, मन धन की बाजी लगा दी। उनके अनुसार –“हिंदी का पूर्ण प्रचार के बिना हिन्दुओं का उद्दार असंभव है।‘ “ राष्ट्र के विकास के लिए हिंदी का विकास जरूरी है इसके महत्व को समझाते हुए कहते हैः-
देव नागरिहि गरे लगाओ, पैहो मोद महान।
रहो निशंक प्रेम मद माते, श्री परताप समान।।
धनि है वह धन धनि वे प्रान। जे इन हेत होहिं कुरबान।
यही तीन सुख सुगति निधान। हिंदी, हिन्दू , हिन्दुस्तान।।
इस तरह प्रतापनारायम मिश्र जी ने हिंदी के प्रति अपनी बात कही और सबी से निवेदन भी किया की हिंदी भाषा को समृध्द बनाने में हर तरह से सहयोग करते रहे। इसी बीच एक प्रसंग राजभाषा परिवार के पटल पर पढ़ने को मिला जो कुछ इस प्रकार है जिससे प्रतापनारायण जी के स्वाभीमान व उनके कर्तव्यपरायणता के साथ हाजिरजवाबी व स्नेहभरा द्रवित भाव भी मिला । सब कुछ मुझे ऐसा लगा की शायद हम सभी इस तरह की परिस्थियों में कैसे संयमित रह सकते है सीखने योग्य है। यह एक मुलाकात थी लाला श्रीनिवास व पंडित प्रतापनारायण मिश्र के बीच-“ एक बार भारतेंदुयुगीन लेखक लाला श्रीनिवासदास जी कानपुर के ब्राहम्ण पत्र के संपादक पंडित प्रतापनारायण मिश्र जी से मिलने ब्राहम्ण कुटीर पहुँचे। जब लाला श्रीनिवास दास भेंट कर वापस लौटने लगे तो उन्होंने पंडित प्रतापनारायण मिश्र जी को एक मोहर नजर करनी चाही। इस पर पंडित प्रतापनारायण मिश्र जी बेतरह बिगड़ उठे और बोले आप हमारे पास धन की गरूरी दिखलाने आए हो। इस बात पर लाला श्रीनिवासदास जी ने बड़ी नम्रता के साथ हाथ जोड़कर कहा कि नहीं महराज, मैं तो मातृ भाषा के मंदिर पर अक्षत चढ़ाता हूँ। इस बात पर पंडित जी द्रवित होकर लाला श्रीनिवासदास को गले लगा लेते है ।‘’ ऐसे जीवन के अनेक प्रसंगों की गठरी हमारे साहित्यकारों के पास मौजूद होती है। इनके जीवन काल में मात्र 12 वर्ष ही इनकी लेखनी को मिला जिसमें इन्होंने जो कुछ लिखा वह साहित्य जगत के लिए बहुत ही परिमार्जित साहित्य था जिसका सब कुछ ब्राहम्म पत्र के माध्यम से हर तरह की विभिन्न विधाओं पर इनकी पकड़ रही । बहुत कुछ इनकी कविताओं के माध्यम से हर पहलुओं को हम जान सकते है । आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास का आरंभ कहीं से भी हुआ हो, परंतु स्पष्ट तौर पर इसकी स्थापना का श्रेय जहाँ भारतेंदु हरिश्चन्द को जाता है, तो वहीं प्रतापनारायण मिश्र का योगदान भी इस क्षेत्र में कुछ कम नहीं है, इसी कारण विव्दवानों ने उन्हें विदितीय भारतेन्दु के नाम से पुकारा. वे इस युग के पथ-प्रदर्शक थे और हिंदी भाषा के सच्चे हितैशी। इनके जीवन मे आर्थिक तौर पर परेशानी के बावजबद ब्राहम्ण पत्र के माध्यम से हिंदी के अतुलनीय योगदान को हमारा नमन,,उनका साहित्य हमें सदैव प्रेरणा देता रहेगा। महाप्रयाण-38 वर्ष की आयु में 6 जुलाई 1894 को दस बजे रात में भारतेंदु मंडल के इस नक्षत्र का अवसान हो गया।हमारा नमन व विनम्र श्रध्दाजंलि ।
चिरंजीव(लिंगम चिरंजीव राव)
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग, इच्चापुरम
श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश) पिन 532-312
स्वतंत्र लेखन(संकलन व लेखन)
मों न. 8639945892


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