राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ' जन्म-23-09-1908 - जयंती-23-09-2025
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ' जन्म-23-09-1908 - जयंती-23-09-2025
जनता की वाणी, राष्ट्र मुखरित, युग दृष्टा स्वर के वाहक- दिनकर 'दिनकर' जी का जन्म 24सितंबर1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास राजनीति विज्ञान में बी ए किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेंजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये।1934 से1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया।1950 से 1952 तक लंगट सिंह कालेज मुजफ्फरपुर में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर 1963 से 1965 के बीच कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने। हिंदी के एक प्रमुख लेखक,कवि व निबंधकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता को इनके काव्य की मूल-भूमि मानते हुए इन्हे 'युग-चारण' व 'काल के चारण' की संज्ञा दी गई है। 'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओं में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल शृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है। उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। उनकी पुस्तक “संस्कृति के चार अध्याय “ के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया इस पुस्तक के विषय में हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने लिखा है कि ”..यह संभव है कि संसार में जो बड़ी-बड़ी ताकते काम कर रही है, उन्हें हम पूरी तरह न समझ सकें लेकिन इतना तो हमें समझना ही चाहिए कि भारत क्या है और कैसे इस राष्ट्र ने अपने सामाजिक व्यक्तित्व का विकास किया हैष उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू कौन-से है और उसकी सुदृढ़ एकता कहाँ छिपी हुई है। भारत में बसने वाली कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि भारत से समस्त मन और विचारों पर उसी का एकाधिकार है। भारत जो कुछ है, उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है।यदि हम इस बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो फिर हम भारत को भी समझने में असमर्थ रहेंगे। और यदि भारत को हम नहीं समझ सके तो हमारे भाव, विचार और काम, सब-के-सब अधूरे रह जाएँगें और हम देश की ऐसी कोई सेवा नहीं कर सकेंगे, जो ठोस और प्रभावपूर्ण हो।” इस पुस्तक में इन्हीं बातों को समझाने की कोशिश की गई है। (उर्वशी)इस किताब पर अनेको चर्चाए होती रही इसी किताब की भूमिका से पहला पैरा’’ पुरूरवा और उर्वशी की कथा कई रूपों में मिलती है और उसकी व्याख्या भी कई प्रकार से की गई है।‘’ उर्वशी की उतपत्ति को लेकर दो अनुमान है। एक तो यह कि जब अत-मंथन के समय समुद्र से अप्सराओं का जन्म हुआ, तब उर्वशी भी उन्हीं के साथ जन्मी थी। दूसरी यह नारायण ऋषि की तपस्या में विध्न डालने के निमित्त जब इन्द्र ने उनके पास अनेक अप्सराएँ भेजी, तब ऋषि ने अपने ऊरू को ठोंककर उसमें से एक ऐसी नारी उत्पन्न कर दी, जो उन सभी अप्सराओं से अधिक रूपवती थी। यही नारी उर्वशी हुई और उर्वशी नाम उसका इसलिए पड़ा कि वह ऊर से पैदा हुई थी। तथा “उर्वशी” के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे। द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित उनके प्रबन्ध काव्य कुरूक्षेत्र को विश्व के100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में74 वाँ स्थान दिया गया। 1947 में देश स्वाधीन हुआ और वह बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मुजफ्फरपुर पहुँचे। 1952 में जब भारत की प्रथम संसद का निर्माण हुआ, तो उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया और वह दिल्ली आ गए। दिनकर 12 वर्ष तक संसद-सदस्य रहे, बाद में उन्हें सन 1964 से 1965 ई. तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। लेकिन अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 ई. तक अपना हिन्दी सलाहकार नियुक्त किया और वह फिर दिल्ली लौट आए। फिर तो ज्वार उमरा और रेणुका, हुंकार, रसवंती और द्वंद्वगीत रचे गए। रेणुका और हुंकार की कुछ रचनाऐं यहाँ-वहाँ प्रकाश में आईं और अग्रेज प्रशासकों को समझते देर न लगी कि वे एक ग़लत आदमी को अपने तंत्र का अंग बना बैठे हैं और दिनकर की फ़ाइल तैयार होने लगी, बात-बात पर क़ैफ़ियत तलब होती और चेतावनियाँ मिला करतीं। चार वर्ष में बाईस बार उनका तबादला किया गया। रामधारी सिंह दिनकर स्वभाव से सौम्य और मृदुभाषी थे, लेकिन जब बात देश के हित-अहित की आती थी तो वह बेबाक टिप्पणी करने से कतराते नहीं थे। रामधारी सिंह दिनकर ने ये तीन पंक्तियाँ पंडित जवाहरलाल नेहरू के विरुद्ध संसद में सुनायी थी, जिससे देश में भूचाल मच गया था। दिलचस्प बात यह है कि राज्यसभा सदस्य के तौर पर दिनकर का चुनाव पंडित नेहरु ने ही किया था, इसके बावजूद नेहरू की नीतियों का विरोध करने से वे नहीं चूके।
देखने में देवता सदृश्य लगता है
बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है।
जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा हो
समझो उसी ने हमें मारा है॥
सन 1962 में चीन से हार के बाद संसद में दिनकर ने इस कविता का पाठ किया जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू का सिर झुक गया था. यह घटना आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास की चुनिंदा क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है।
रे रोक युद्धिष्ठिर को न यहां जाने दे उनको स्वर्गधीर
फिरा दे हमें गांडीव गदा लौटा दे अर्जुन भीम वीर॥
इसी प्रकार एक बार तो उन्होंने भरी राज्यसभा में नेहरू की ओर इशारा करते हए कहा- "क्या आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा इसलिए बनाया है, ताकि सोलह करोड़ हिंदी भाषियों को रोज अपशब्द सुनाए जा सकें?" यह सुनकर नेहरू सहित सभा में बैठे सभी लोग सन्न रह गए थे। किस्सा 20 जून 1962 का है। उस दिन दिनकर राज्यसभा में खड़े हुए और हिंदी के अपमान को लेकर बहुत सख्त स्वर में बोले। उन्होंने कहा- देश में जब भी हिन्दी को लेकर कोई बात होती है, तो देश के नेतागण ही नहीं बल्कि कथित बुद्धिजीवी भी हिन्दी वालों को अपशब्द कहे बिना आगे नहीं बढ़ते। पता नहीं इस परिपाटी का आरम्भ किसने किया है, लेकिन मेरा ख्याल है कि इस परिपाटी को प्रेरणा प्रधानमंत्री से मिली है। पता नहीं, तेरह भाषाओं की क्या किस्मत है कि प्रधानमंत्री ने उनके बारे में कभी कुछ नहीं कहा, किन्तु हिन्दी के बारे में उन्होंने आज तक कोई अच्छी बात नहीं कही। मैं और मेरा देश पूछना चाहते हैं कि क्या आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा इसलिए बनाया था ताकि सोलह करोड़ हिन्दीभाषियों को रोज अपशब्द सुनाएँ? क्या आपको पता भी है कि इसका दुष्परिणाम कितना भयावह होगा?
यह सुनकर पूरी सभा सन्न रह गई। ठसाठस भरी सभा में भी गहरा सन्नाटा छा गया। यह मुर्दा-चुप्पी तोड़ते हुए दिनकर ने फिर कहा- 'मैं इस सभा और खासकर प्रधानमन्त्री नेहरू से कहना चाहता हूँ कि हिन्दी की निन्दा करना बन्द किया जाए। हिन्दी की निन्दा से इस देश की आत्मा को गहरी चोट पहुँचती है।' दिनकर जी के जीवन के बारे में अगर हम लिखे तो हमें यह प्रतीत होता है कि वैचारिक आंदोलन की प्रतिबध्दता है। लेखनी और रचना प्रकिया में उनकी लेखनी पौराणिक चरित्र और ऐतिहासिक पात्रों के महत्व का एक विशिष्ट और अतिमहत्वपूर्ण दस्तावेज है। प्रमुख कृतियाँ-उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया। उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथ और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है। उर्वशी को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है।


भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है
ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती है। उर्वशी स्वर्ग परित्यक्ता एक अप्सरा की कहानी है। वहीं, कुरुक्षेत्र, महाभारत के शान्ति-पर्व का कवितारूप है। यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है। वहीं सामधेनी की रचना कवि के सामाजिक चिन्तन के अनुरुप हुई है।संस्कृति के चार अध्याय में दिनकरजी ने कहा कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है। क्योंकि सारी विविधताओं के बाद भी, हमारी सोच एक जैसी है। निबंध संग्रह-मिट्टी की ओर (1946ई०),,अर्द्धनारीश्वर (1952ई०),रेती के फूल (1954ई०),हमारी संस्कृति (1956ई०),उजली आग (1956ई०),वेणुवन (1958ई०),राष्टभाषा और राष्ट्रीय एकता (1958ई०),धर्म नैतिकता और विज्ञान (1959ई०),वट पीपल (1961ई०),साहित्य मुखी (1968ई०),आधुनिकता बोध (1973ई०),चेतना की शिखा – 1973,,विवाह की मुसीबतें - 1974

अन्य लेखकों के विचारः-
आचार्य हजारी प्रसाद व्दिवेदी- ने कहा था "दिनकरजी अहिंदीभाषियों के बीच हिन्दी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे और अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे।"
हरिवंश राय बच्चन- ने कहा था "दिनकरजी को एक नहीं, बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिन्दी-सेवा के लिये अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिये।"
हरिवंश राय बच्चन-रामवृक्ष बेनपुरी- ने कहा था "दिनकरजी ने देश में क्रान्तिकारी आन्दोलन को स्वर दिया।"
नामवर सिंह- ने कहा है "दिनकरजी अपने युग के सचमुच सूर्य थे।"
काशी नाथ सिंह- के अनुसार "दिनकरजी राष्ट्रवादी और साम्राज्य-विरोधी कवि थे।"
रचनाओं के कुछ अंश
किस भांति उठूँ इतना ऊपर?
मस्तक कैसे छू पाउँ मैं?
ग्रीवा तक हाथ न जा सकते,
उँगलियाँ न छू सकती ललाट
वामन की पूजा किस प्रकार,
पहुँचे तुम तक मानव विराट?
रे रोक युधिष्ठर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर
पर फिरा हमें गांडीव गदा, लौटा दे अर्जुन भीम वीर --(हिमालय से)
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो;
उसको क्या जो दन्तहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो। -- (कुरूक्षेत्र से)
वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो,
चट्टानों की छाती से दूध निकालो,
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो,
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो, ...(वीर से)
पत्थर सी हों मांसपेशियाँ, लौहदंड भुजबल अभय;
नस-नस में हो लहर आग की, तभी जवानी पाती जय। -- (रश्मिरथ से)
हटो व्योम के मेघ पंथ से, स्वर्ग लूटने हम जाते हैं;
दूध-दूध ओ वत्स तुम्हारा, दूध खोजने हम जाते है।
सच पूछो तो सर में ही, बसती है दीप्ति विनय की;
सन्धि वचन संपूज्य उसी का, जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है;
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।"
दो न्याय अगर तो आधा दो, पर इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम।--(रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 3)
जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।(रश्मिरथी /तृतीय सर्ग /भाग 3)
रश्मिरथ में स्वयं कर्ण के मुख से निकला हैः-
मैं उनका आदर्श, कहीं जो व्यथा न खोल सकेंगें,
पूछेगा जग, किन्तु, पिता का नाम न बोल सकेगें;
जिनका निखिल विश्व में कोई कहीं न अपना होगा,
मन में लिये उमंग जिन्हें चिर-काल कलपना होगा।
दिनकर सही मायने में महाकवियों की परंपरा के रचनाकार रहे। जिनके लिए काव्य और अंह के बीच जो व्दन्द होता है उसके लिए कहीं जगह नहीं थी। उनके अनुसार-“ कविता में जब एक स्थिति वह भी आती है कवि को अपने अहं का लोप करना पड़ता है, अथवा समाधि की स्थिति में देर तक टिके रहने से कवि के अहं का आप से आप लोप हो जाता है। तब तो भूमि रिक्त रह जाती है, वहाँ कहीं से स्रस्त होकर कविता खुद-ब-खुद उतर आती है।“ कवि दिनकर ने इसी समाधि-भूमि पर टिके रहकर सृजन किया, किंतु उनकी यह भूमि जीवन और समाज से परे किसी वानप्रस्थी की भूमि नहीं थी. वे तमाम विसंगतियों और विद्रुपताओं से घिरे युग परिवेश में संधर्ष करते हुए इस भूमि पर पहुँच थे। जाहिर है, दिनकर जी का आत्मसम्मान पूर्वक यह संधर्ष अन्य कवियों की तुलना में कहीं अधिक पैना, नुकीला और धारदार था। भारत के अतीत का गुणगान करने वाले कवि को जब यह कहने के लिए बाध्य होना पड़े हो तो उनके कारण समझे जाने चाहिएः-
धन पिशाच की विजय दर्म की पावन ज्योति अदृष्य हुई
दौडो बोधिसत्व! भारत में मानवता अस्पृश्य हुई ।(बेधिसत्व)
दिनकर जी के काव्य में सामाजिक पीड़ा , सामाजिक चिंताओं की विविधायामी अभिव्यक्ति हुई है। आम आदमी की पीड़ा और सामाजिक विशमता को लेकर उन्होंने गहरा असंतोष, अपनी कविताओं में दर्ज किया है। स्वतंत्र्य-पूर्व भारत की पीड़ा रही हो अथवा आजाद भारत के राजनैतिक-सामाजिक जीवन मे व्यापती विसंगतियां-दिनकर ने सब को अपने दृष्टपथ में रखा। वे तटस्थ रहने वाले रचनाकार नहीं थे और न ही एकागीं दृष्टि से युग-जीवन को देखने वाले कलाकार। उनके पास हर तरह के तीर तरकस में मौजूद थे। वस्तुतः साहित्य की आयुष्मानता को लेकर उनका यह आदर्श स्वयं उन्हीं के रचनाकर्म मे भी प्रतिपलित हुआ है, “ कवि-कल्पना और सामाजिक जीवन के बीच सामंजस्य स्थापित किए बिना साहित्य आयुष्मान नहीं हो सकता। छोटी-छोटी, क्षणिक और हल्की भावनाओं का गीत-प्रणयन ही अपनी जगह मूल्य रखता है, किंतु कलाकारों में श्रेष्ट तो वही गिना जाता है, जो जीवन के किसी महान प्रश्न पर महान् रूप से कला का रंग छिड़क सकता है….।” व्यक्तिगत रूप से मुझे दिनकर जी की साहित्य अकादमी से सम्मानित कृति “संस्कृति के चार अध्याय” पुस्तक ने बहुत प्रभावित किया उनके व्दारा लिखी यह पुस्तक हर साहित्य प्रेमी को जरूर पड़नी चाहिए। इतिहास तथ्यों का संकलन मात्र नहीं होता, इसका लेखन किसी वैचारिक परिपेक्ष्य से होता है। कवि दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय ग्रंथ की रचना जब की थी उस समय हमारा देश पराधीनता की दासता से ग्रसीत था और आजादी के लिए स्वाधीनता आंदोलन के सहारे हर एक दिशा मे संधर्षरत था। इस ग्रंथ के माध्यम से दिनकर जी ने स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ में उभरने वाले मुल्यों के प्रति अपनी वेदना से हमें परिचय कराया। वे संस्कृति के राष्ट्रीय इतिहासकार रहे। राष्ट्रीय इतिहास-दर्शन को उनके पहले जिन महान स्थापित इतिहासकारों ने अपनी बातें रखी उनकी ही बातों को आगे बढ़ाते हुए, उसी इतिहास-दर्शन का विनियोग दिनकर जी ने संस्कृति के क्षेत्र में किया। स्वाधीनता आंदोलन के प्रसंग में विकसित होने वाले मूल्य ही इस ग्रंथ के परिपेक्ष्य में निर्धारित है। वे मुल्य उपनिवेशवाद, विरोधी दृष्टि, धर्मनिर्पेक्षता और सामाजिक संस्कृति की अवधारणा। दिनकर राष्ट्रवादी इतिहासकार है। एक प्रश्न पर की आर्य बाहर से आये है, आर्यों व द्रविड के विषय में लिखते है..” आर्य और द्रविड़, दोनों प्रकार के लोग, इस देश में अनंत काल से रहते आए है और हमारे प्रचीनतम साहित्य में इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं मिलता हे कि ये दोनों जातियाँ बाहर से आई है और इन दोनों के बीच कभी लड़ाई भी हुई थी। आर्यो का संधर्ष दास और असुर जाति के लोगो से हुआ था, इसका थोड़ा प्रमाण है, किंतु ये दास और असुर कौन थे, इस विषय में हमारे पास सुनिश्चित प्रमाण नहीं है।” इस तरह के अनेक प्रसंग इस पुस्तक को विशिष्ट बनाती है और हमारे लिए साहित्य को समझने के लिए एक दिशा मिलती है। दिनकर ओज के कवि माने जाते है। इनकी भाषा अत्यंत प्रभावपूर्ण, ओजस्वी और सरल है। दिनकर की सबसे बड़ी विशेषता है अपने देश और युग के सत्य के प्रति सजगता. दिनकर में विचार और संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। इनकी कुछ कृतियों में प्रेम और सौंदर्य का भी चित्रण मिलता है। 1999 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मन्त्री प्रियरंजन दास मुंशी ने उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर रामधारी सिंह दिनकर- व्यक्तित्व और कृतित्व पुस्तक का विमोचन किया। महाप्रयाण- 24 अप्रैल 1974 को महाकवि दिनकर जी का निधन चिन्नई तमिलनाडु में हुआ था। महान देशभक्त और सामाजिक विषयों व समाज के हर तबके के लोगों के प्रति संधर्ष करने वाले कवि और हमारे देश की राजनीति के साथ भी जुड़े रहे ऐसे व्यक्तित्व को हमारा सादर नमन और विनम्र श्रध्दाजंलि।
चिरंजीव(लिंगम चिरंजीव राव)
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग, इच्चापुरम
श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश) पिन 532-312
स्वतंत्र लेखन(संकलन व लेखन)
मों न. 8639945892


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