“हमारी भाषा हिंदी के प्रति हम उदासीन क्यों?” “हमारे देश में हिंदी : कल, आज और कल ‘’
“हमारी भाषा हिंदी के प्रति हम उदासीन क्यों?” “हमारे देश में हिंदी : कल, आज और कल ‘’
हमारे देश भारत में सर्वाघिक बोलने समझने वाली भाषा हिंदी है। जिसने विगत अनेक वर्षो से विश्व में अपना स्थान बनाने वाली इस भाषा हिंदी को उसके लिए पैदा होते जा रहे कठिनतम पड़ावों का जिसके कारण भाषा, अपनी प्रतिष्ठा खोती जा रही है। कैसे हम निराकरण के करीब होगे हम सभी पर क्षेत्रीयता का दबाव व अनेक भाषाओं की न्याससंगत माँग ने हमारी अनेकता में एकता की भावना को आहत तो किए पर हमें यह बहुत खुशी भी है की हमारे देश के संविधान में जिन भाषाओं को स्वीकृति दी है और जिस प्रांत में वह बोली जाती है वह उस क्षेत्र की मातृभाषा भी है अतः हमें हिंदी के साथ उस मातृभाषा का सम्मान करना भी जरूरी है। कुछ क्षेत्रीय लोगों ने विवाद खड़ा करने की कोशिश की ऐसा हिंदी का विरोध दुर्भाग्यपूर्ण है, राष्ट्रीय एकता की डोर को मजबूत करने तथा विश्व में भारत की पहचान स्थापित करने में राजभाषा हिंदी का महत्व है। अतः हमारे प्रश्नों को जरूर उचित ऊत्तर मिलेगा हमें इसे आहत न समझ उस स्थान के आमजन की जरूरत समझकर हमें उस प्रांत के लोगों की मातृभाषा का सम्मान करते हुए राजभाषा/ राष्ट्रभाषा का भी सम्मान करना होगा और हमें न राष्ट्रो के बारे में भी घ्यान देने की जरूरत है जहाँ जैसे चीन, जापान, रूस, जर्मनी और फ्रांस आदि अपनी राष्ट्रीय भाषा को सहेजते हुए विकास के नये नये आयाम गढ़े है । हमारे लिए ये भी उचित होगा की हम जिस क्षेत्र में रहते है उस क्षेत्र की भाषा का सम्मान करते हुए हमारे दैनिक उपयोग के लायक बोलना सीखने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए पर किसी दबाव के बगैर जरूर सीखे। समझ नहीं आता आज हम हमारे देश में हिंदी भाषा के प्रति सम्मान कहाँ और क्यों खो रहे है? जिस भाषा ने विश्व में पहचान बनाने की दिशा में सारे संचार माध्यमों के व्दारा हमने अपनी पहचान बनाई है। आज देश के कुछ राज्य अपने प्रांतीय भाषा के लिए शैक्षणिक संस्थाओं का सहारा लेकर उसमें शिक्षा के केन्द्र में अपने अपने प्रांत की भाषा में शिक्षा देने का जोर व हिंदी के प्रति अंग्रेजी की तुलना में उदासिनता एक अलग व गलत माहौल का निर्माण करने में और हिंदी के साथ दूराग्रह पैदा करने के प्रचार प्रसार में लगे हुए है। पहले कभी मणिपुर, मेधालय, तमिलनाडू, कर्नाटका के पश्चात आज महाराष्ट्र से भी इस दिशा में आवाज उठने लगी है। हर दिन कोई न कोई मुद्दा सामने आता जा रहा है। जिसके सफल समाधान के लिए हर दिन वाद-विवाद के मंच इतने ज्यादा सक्रिय होने लगे है। समझ नहीं आ रहा क्यों हमारे देश में इस स्थिति का प्रपंच हमेशा जारी रहता है। इसके कारको व कारणों का समाजीकरण व राजनीतिकरण हमारे देश के लिए एक नासूर बनता जा रहा है जो हमारी भाषा हिंदी की श्रीवृध्दि के लिए रूकावट के सिवाय और कुछ नहीं लगता। राजनीति के आकाओं के व्दारा भाषा का मुद्दा उठाकर प्रान्त में उस प्रान्त की भाषा के सहारे हिंदी के विरोध में जो जहर उगला जा रहा है। इसके प्रमाण अब बहुत ही सहजता से अखबारों व दृष्य माध्यमों के जरीए समाज में व्याप्त असंतोष को हवा दे रही है। पहले मेधालय,मणिपुर, तमिलनाडू, कर्नाटका और महाराष्ट्र की वर्तमान कड़ी के साथ यह सब कुछ जारी है। देश के अनेक राज्यों में हो रहे वारदातों में लगातार इस तरह की बातों का छुट-पुट घटनाओं ने इसके अस्तित्व के प्रचार-प्रसार में बाधा बनने के प्रमाण सामने आते रहे है जैसे एक राज्य की एक प्रतिष्ठित बैंक में प्रंतीय भाषा व हिंदी का संधर्ष, देश के कुछ अदालतो में हिंदी में प्रस्तुत याचिका की सुनवाई में वकील और न्यायाधीश के मध्य बहस, एक राज्य मे सामान्य जन से आटो की सवारी के लिए प्रंतीय भाषा के ना बोलने पर असुविधा का सामना आदि अनेक उदाहरणों के साथ हमारी भाषा हिंदी हत होती रही है। हमारे देश की जनसंख्या के आधे से अधिक कमजोर और गरीब वर्ग के सामने हमेशा यही प्रश्न रहता है। बच्चों को इस देश में शिक्षा के लिए अंग्रेजी का होना अनिवार्य हो गया है, अन्यथा वह हमारे बुढ़ापे का सहारा नहीं बन सकता। और देश की मूल धारा से कट कर परिवार व देश के लिए कुछ करने योग्य ही नहीं रहेगा। आम जनता की भाषा में मातृभाषा के साथ हिंदी भाषा को बोलचाल की भाषा के रूप में सर्वाधिक उपयोग में लाया जाता है। पर शिक्षा के प्रति इस भाषा की स्थिति को अंग्रेजी के अगंद के जमें पाँव ने हमारी आत्मा तक को बंधन बना कर छोड दिया है। हिंदी दिवस हमारे लिए व हमारे देश के लिए उस भाषा की सरलता और सहजता के कारण न सिर्फ अपने देश में आज तो संचार माध्यम के सहारे पूरे विश्व में बाजारवाद को पोषित कर रह है। पर हमारा दुर्भाग्य है कि हम आज भी अपनी हिंदी के प्रति इतने उदासीन क्यों है। यह तो सर्वविदित हो गया है की हिंदी रोजगार दिलानें में अंग्रेजी की अपेक्षा कमजोर है। पर हमारे पास अनेक तरह से इस विषय को समझने के तर्क उपस्थित भी है। परंतु केवल और केवल हमारे लिए हमारी शिक्षा के माध्यम से जो बीज आज से अनेक वर्षो पहले बोया गया है, मैकाले की नीति ने वो आज भी हमारे सामने मौजूद है और फल-फूल रहा है। शिक्षा हमारी आबादी के चंद मुठ्टी भर अंग्रेजी के जानकार लोगों ने भी उसी तरह का माहौल बनाया है जिस तरह हमारे देश में अछूतो को आगे न बढने देने के सकीर्ण विचारधारा के पोषकों ने एक समय बना रखा था। विश्व में भी अंग्रेजी की मान्यता ने हमारी हिंदी भाषा को महज जरूरत की वस्तु मानकर उसकी श्रीवृध्दि के प्रति हर तरफ लाचारी का जो बिगुल बजा दिया है। उसके समर्थकों ने अपने ही देश में इस भाषा के प्रति अजनबीपन का दोहरा मापदंड अपनाए हुए है। संविधान की सूची में भी इस भाषा को आज तक भी स्थान नहीं मिल सका। राजभाषा के रूप में सरकारी दफ्तरों में इस भाषा का कितना अपमान होता आ रहा है यह कहने या लिखने की बात नहीं है। क्षेत्रों के हिसाब से क,ख,ग क्षेत्र और उसमें सरकारी दफ्तरों में उपयोग में आने वाली भाषा हिंदी के प्रति अगर जल्द घ्यान नहीं दिया गया तो आज हिंदी-दिवस महज औपचारिकता बन हमारे लिए आने वाले दिनों में एक बोझ बन रह जाएगा। इस विषय में आये दिन अदालतो के कुछ वकीलों और न्यायाधिशो के मध्य जारी बहस के विडियो जो हमे देखने को मिल रहे है. उससे यह तो लगने लगा है कि आज भी हिंदी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। जो कुछ भी बहस विदेशी भाषा में होती है उसका निर्णय भी उसी भाषा में हो जाता है, और मुकदमा भी वकील और न्यायाधिश के मध्य समाप्त हो जाता है। जिसके आधार पर सजा मिलने वाले को यह नहीं पता चलता की क्या बहस हुई है और उसको किस जुर्म की सजा सुना दी गई। वकील को उस भाषा का ज्ञान होना या नही होना मायने नही रखता। कानून की किताबों की तैयारी हिंदी में हो रही है और आज उपलब्ध भी है कही कही पढी भी जा रही है, पर अदालतों में इसके उपयोग के प्रति और सैकड़ो वर्षो की आवश्यकता की लंबी दौड़ आज भी बाकी है ऐसा प्रतीत होता है। यदाकदा कुछ अच्छे समाचार भी आ जाते है, जिसमें न्यायाधिश व्दारा कविता के माध्यम से निर्णय लिखकर सुनाया गया। कुछ अदालतों में कागजी कार्यवाही हिंदी में हो रही है। अपवाद है अघिकत्तर निर्णय अंग्रेजी में ही होते है, उसका ही बोलबाला है। संविधान निर्माताओं की सोच के प्रति हमारे देश में इस स्थिति की दूरदर्शिता की कमी का अफसोस होता है। हमारी आबादी को यह तो समझ आने लगा है, अंग्रेजी का वर्चस्व हिन्दुस्तान की नियति बन गई है, क्यों कि हमनें इसके माध्यम से रोजगार प्राप्त करने व उसके अवसरों को तलाशने का हर तरह से हमारी पहले की पीढ़ी ही नहीं वर्तमान पीढ़ी इसके बगैर कुछ नहीं हो सकता यह समझ रही है। मातृ भाषा के प्रति कभी भी कोई समस्या नहीं रही। परंतु हमारी बोलचाल की भाषा व संवाद के लिए पूरा राष्ट्र ही नही विश्व के अनेक देशों की पहल हिंदी के साथ ही जुड़ने के लिए सक्षम है जो हमारी आमजन की जरूरत है । हमारा राष्ट्र विविध भाषा से बना देश है, जब हमने हमारे देश को प्रांतीय भाषा के आधार पर राज्यों के निर्माण के अवसर प्रदान कर दिए उसकी जो प्रक्रिया हमारे पूर्वजो व्दारा अपनायी गई लगता है। क्या गलत हुआ? वही से इस विषय को बल मिला और संविधान में हिंदी भाषा की सूची में उपस्थिति न होने का प्रश्नचिन्ह हमेशा रहता है। विश्व के अनेक देशो में हिंदी को हमेशा एक मुकाम हासिल है। वहाँ के कई विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिए हिंदी को अपनाया जाता है .जो इस बात का प्रमाण भी है कि हमारी समृध्द व्याकरण समत देवनागरी लिपि की हिंदी ने जो स्थान विश्व में बनाया है उसकी जितनी भी सराहना की जाए कम है। हम यह भी अच्छी तरह जानते है कि हमारे राष्ट्र को हिंदीमय करने में जितना योगदान हिंदीतर राज्यों का हाथ पहले भी और आज भी है उससे नकारा नहीं जा सकता। हमें यह भी ज्ञात है की हिंदी को हमारे देश में जगह क्यों मिलीः-


“हिंदी को किसी भाषाई श्रेष्ठता के कारण अखिल भारतीय भाषा नहीं बनाया गया, बल्कि इसलिए बनाया गया क्योंकि यह अधिकांश भागों में फैली हुई है।” ( पंडित जवाहर लाल नेहरु) (संसद में राज्यों के पुनर्गठन विधेयक पर बोलते हुए-30-07-1956) हजारो वर्षो की गुलामी में जीते आ रहे हम भारतवासी समय की रफ्तार को न समझ पाए व मैकाली की शिक्षा पघ्दति के शिकार होकर हमारी भाषा को इस अवस्था में आज ला खडा किया है । आज हमें विचार करना होगा की हमारी भाषा हिंदी अपने ही दे में उसकी स्थिति कल, आज और कल प्रगति क्यों नहीं कर पा रही है। हमारे देश व इस देश का हर नागरिक विदेशी भाषा अंग्रेजी का ऐसा गुलाम हो गया की उसे हमेशा अपनी भाषा को पढने ,बोलने व समझने में भी जोर देना पड रहा है ।पर आज हिंदी के इस विशाल वटवृक्ष की शाखाओ ने आजादी के लिए लडी गई लडाई से भी कठिन दौर से गुजरते हुए विश्व मानचित्र में अपनी जगह बनाने में सफलता के परचम बहुत ही सराहनीय नहीं तो विषाद का भी विषय नहीं रहा । विश्व में यह सर्वविदित है,भाषा किसी भी मनुष्य की अव्दितीय उपलब्धि है।इसके माध्यम से यह भावों और विचारो की ये संवाहिका ही नहीं वरन् सांस्कृतिक-संपदा के रूप में इसमें संरक्षक का स्वरूप भी मिलता है ।यह केवल संप्रेषण का माध्यम ही नहीं अपितु अपने व्यवहार क्षेत्र में मानवीय चरित्र की एक प्रमाणिक प्रस्तुति होती है। इस तारतम्य मे भाषा का अत्यधिक महत्व है ये हम नकार नहीं सकते और हमारी हिंदी विश्व भाषा परिवार की एक अव्दितीय धरोहर है।हमारी हिंदी अनंत भविष्य की संवाहिका है। अपरिमित विचार-संपदा,अकूत-साहित्य और अपार विस्तार के त्रिआयामों सें परिपूर्ण सतत विकासरत हिंदी विश्व-भाषा परिवार में निश्चित ही एक विशेष स्थान की सम्रागी है हिंदी का स्वरूप चिर-पुरातन और नित नवीन होता है। वे रूप परिवर्तन के बावजूद अपने वैशिष्ठय में विद्यमान रहती है। यही तथ्य हिंदी के साथ प्रमाणित होता है।हिंदी अपने संसार में सतत संवर्धित होती हुई विश्व परिदृष्य मे अग्रणी है और विश्व मे नित नये आयामों के विस्तार करती जा रही है ‘’सन 1975 विश्व हिंदी सम्मेलन में यूनेस्को के क्षेत्रीय शिक्षा सलाहकार श्री असर डिलायाँन ने यूनेस्को के प्रतिनिधि के रूप में हिंदी के वैश्विक महत्व को रेखांकित करते हुए घोषित किया था कि हिंदी सन् 1947 से ही यूनेस्को में शासकीय कामकाज की भाषा के रूप में हिंदी का प्रचलन बहुत ही सराहनीय रहा है। यूनेस्को के नियमों के अनुसार प्रतिनिधि के आग्रह पर प्रलेखों और भाषणों आदि के अनुवाद सभी शासकीय भाषाओं में उपलब्ध कराए जाते है ।यूनेस्को की प्रमुख पत्रिका ‘यूनेस्को कूरियर’ अन्य महत्वपूर्ण भाषाओं के साथ हिंदी में भी प्रकाशित की जाती है।’’यूनेस्को में हिंदी की यह उपस्थिति वैश्विक परिदृश्य में उसकी उपस्थिति की साक्षी है।आज विश्व हिंदी को 12 वें सम्मेलन की लंबी यात्रा का सौभाग्य वर्ष 2023 के फरवरी माह में फिजी में मिला और यह आयोजन सफलता पूर्वक समपन्न हुआ है। पहले के विश्व हिंदी सम्मेलनों का संक्षिप्त विवरणः-(1)नागपुर-भारत,10-14जनवरी-1975 (2)मारीशस-पोर्टलुई-26-30 अगस्त 1976(3)दिल्ली-भारत-28-30 अक्टूबर 1983(4)मारीशस-पोर्टलुई-02-04 दिसंबर(5)त्रिनिदाद-पोर्टआफस्पेन04-08अप्रैल1906 (6) लंदन-ब्रिटेन14-18सितंबर1999(7)सूरीनाम-पारानिडो05-09जून2003(8)न्यूयार्क-अमेरिका13-15जुलाई 2007(9)जोहनसबर्ग-दक्षिण आफ्रिका-22-24सितंबर2015 (10) भोपाल-भारत 10-12 सितंबर 2015(11)मारीशस-पोर्टलुई18-20 अगस्त2018 (12)फिजी-नाडी-देनाराऊ व्दीप कन्वेंशन सेंटर 15-17फरवरी(13) बाली-इंनेशिया (प्रस्तावित) है। इस तरह विश्व हिंदी सम्मेलनों का आयोजन भी हिंदी के वैश्विक परिदृश्य की एक महत्वपूर्ण कडी है इसके माध्यम से हमें विश्व के अन्य देशों मे उसकी स्थिति वहाँ के परिवेश में जाकर अधिक लाभ मिलता है। इस तरह विश्व हिंदी सम्मेलनों मे अधिकतम विदेशो में ही किए गए उद्देश्य साफ है की हमारी भाषा हिंदी का प्रचार-प्रसार विश्व के अन्य देशो मे भी हो । भारत मे केवल ये तीन जगहों पर ही हुए हैः-नागपुर,दिल्ली और भोपाल में ही हुए । संयुक्त राष्ट्र संध मे हिंदी की अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति से अवगत कराने के लगातार प्रयास चलते रहे है ।जिसमें-स्वर्गीय भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बजपाये जी व्दारा संयुक्त राष्ट्र महासभा के 2013 के अधिवेशन में हिंदी में दिए गये भाषण मे इसके पदचाप मिलने लगे। संयुक्त राष्ट्र महासभा की छह आधिकारिक भाषाएँ है जिसके साथ हिंदी को भी शामील करने के इसके प्रयास का आरंभ 2018 यूएन परियोजना के तहत प्रारंभ हुई । जो वैश्विक संचार विभाग के माध्यम के उपयोग से संभव हुआ। लगभग 70 करोड से ज्यादा लोग हिंदी बोलते है।जिसमें भारतीय गिरिमीटिया मजदूरों का योगदान बहुत अधिक है ।जो रोजी-रोटी के लिए मारिशस, गयाना. सूरीनाम,फीजी जैसे देशों की यात्रा के कारण इनमें हिंदी बोली जाती है ।इसके अलावा अमेरिका,जर्मनी,सिंगापुर,न्युजीलैंड मे भी हिंदी वोलने वाले है भारत के अलावा नेपाल । यूनेस्को 10/11-06-2022 को पारित संकल्प ,संयुक्त राष्ट्र को हिंदी सहित अधिकारिक और गैर-अधिकारिक दोनों भाषाओं मे महत्वपूर्ण सूचनाओं और संदेशों का प्रसार जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करता है । यूएनओ (UNO) बहुभाषावाद के प्रस्ताव की तहत 01-02-1946 के दौरान UNSC का प्रस्ताव था। संयुक्त राष्ट्र महासभा की छह आधिकारिक भाषाएँ है।इनमें अरबी, चीनी(मैंडरिन)अंग्रेजी,फ्रेंच,रूसी और स्पेनिश शामिल है । अंग्रेजी,फ्रेंच कामकाजी भाषा है, इसके सचिवालय की अब इसमें हिंदी को भी शामिल कर लिया गया है। उसके उद्देश्य की संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में यू एन के वेबसाइट पर अब हिंदी उपलब्ध होगी ।इस उपलब्धि पर हमें गर्व है..जो हमारी हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में मददगार रहेगी । विश्व के पाँच महाव्दीपों के अनेक देशों के शीर्षस्त एकाधिक विश्वविद्यालयों/ शिक्षण संस्थाओं मे हिंदी-शिक्षण की निरंतर व्यवस्थाएँ सुचारू रूप से चल रही है। यहाँ हिंदी भाषा और साहित्य का शिक्षण प्रारंभिक(शौकिया) स्तर से लेकर उच्च शोधपरक-तुलनात्मक,व्यतिरेकी व्याकरणिक आदि बिन्दुओं से संबंधित है और गंभीर व व्यवस्थित रूप से किए जा रहे है ।विश्व भाषा हिंदी के पूरे परिदृश्य का अवलोकन करने पर पता चलता है कि, हिंदी न केवल भारतीय और पाश्चात्य विव्दानों का न केवल हिंदी प्रेम महत्वपूर्ण रहा है वल्कि इनके व्दारा किए गए शोधपरक, साहित्यिक, शिक्षणपरक,प्राद्योगिकी आधारित विविध हिंदी सामाग्री का निर्माण इस भाषा के लिए मील के पत्थर साबित हुए है। चाहे वो गार्सा द तासी,जार्ज गियर्सन हो, वारन्निकोव, मारियोला, आँफरुदी,क्यूबा दाई या तामियो मिजोकामी आदि हों। इनके ऐतिहासिक भाषा सर्वेक्षण,व्दिभाषी कोष,अमूल्य हिंदी साहित्यिक कृतियों के सटीक अनुवाद आदि ने हिंदी भाषा और साहित्य को और भी समृध्द बनाया है.। ये सारे प्रयास विश्व मे हिंदी भाषा को उपयोग करने वाले अनेक देशों के लिए बेजोड सहायक बन रहे है। विश्व के अनेक देशों की स्थिति का संक्षिप्त विवरण हिंदी के वैश्विक परिदृष्य की स्थिति को एक सुंदर स्वरूप प्रदान करेंगा। विश्व में इन महाव्दीपों मे –जहाँ हिंदी का शिक्षण होता है प्रमुख संयुक्त राष्ट्र अमेरिका मे हावर्ड ,मिशिगन,येल विश्वविद्यालयों मे हिंदी का शिक्षण होता है। इस समय 35 से भी अधिक विश्वविद्यालयों मे हिंदी विभाग है और उच्च शिक्षा के स्तर पर हिंदी का शिक्षण हो रहा है ।आस्ट्रेलिया और यूरोप के सभी देशों में हिंदी अध्ययन की व्यवस्था है –इंगलैंड-चार–आक्सफोर्ड,लंदन,यार्क और कैंब्रिज मे यहाँ 1940 से ही हिंदी पढाई जा रही है । यार्क का स्थान हिंदी पढने वाली संख्या की दृश्टिकोण से सर्वाधिक है .।इटली यूरोप मे हिंदी का सबसे बडा केन्द्र है-ओरिएंटल,वेनिस,मिलान, रोम,टूरिन विश्वविद्यालय के शिक्षित छात्रों को हिंदी के कार्यक्षेत्र में अधिक पाया है ।नीदरलैंड के लायडन विश्वविद्यालय में हिंदी-शिक्षण उन्नीसवीं शताब्दी से शूरू हो गया था ।एम्सटरडम,यूटरेक्ट और खोनिंगन के विश्वविद्यालयों में भी हिंदी का विस्तार हुआ है ।पोलैंड-वारसा,क्राकूबा और प्रोजनान विश्वविद्यालयों में भी हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन होता है ।रूस –मरक्वा और सेंट पीटर्सवर्ग –हिंदी अध्ययन प्रमुख केन्द्र है।बल्गारिया- सोफिया विश्वविद्यालय में हिंदी शिक्षण का मुख्य केन्द्र है।यहाँ स्वतंत्र तौर पर1966 मे हिंदी विभाग खुला था ।स्वीडन-स्टाकहोम।नार्वे- ओस्लो ।डेनमार्क-कोपेनहेगन ।अन्य देशों मे यथ जर्मनी,फ्रांस,चेक,आस्ट्रिया,रोमानिया,यूक्रेन आदि ।इस तरह हमने पाया का विश्व अनेक देशों ने हिंदी के शिक्षण की महता को आत्मसात किया है।सन 1911 में एल.सी.तेस्सीपेरी ने इटली स्थित ‘’फ्लोरेंस विश्वविद्यालय ‘’की ‘डाक्टर आफ डिविनिटी’’ उपाधि के लिए ‘’इल रामचरितमानस , इल रामायण’’ शीर्षक के शोध-प्रबंध प्रस्तुत किया था । हिंदीभाषा और साहित्य पर सपंन्न यह प्रथम शोधकार्य था ।यूरोप में भारतीय भाषा अध्ययन का पहला विभाग नीदरलैंड स्थित ‘’लायडन विश्वविद्यालय’’ सन 1865 ईसवी मे खुला था ।आज संसार में (अट्ठानवें) 98 देशों के एस सौ अट्ठावन(158)लगभग विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन का कार्य चल रहा है ।तीन सौ से भी अधिक शोध-प्रबंध इन विश्वविद्यालयों में स्वीकृति पा चुके है ।

आज हम इस बात से सहमत होने लगे है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा के साथ-साथ जन-जन की भाषा का दर्जा पाने में धीरे-धीरे अपने कदम बढा तो रही है..।हमारा देश विविध भाषाओं के साथ इसका इतिहास गवाह है,जिस देश में उसकी निज भाषा को पूर्ण सम्मान नहीं मिलता उसकी प्रगति की गति का अवरोध बना ही रहता है ।हमारा देश विभिन्न संस्कृति विभिन्न भाषाओं का हमेशा से ही पोषक रहा है।यहाँ जिसके कारण उसकी अपने देश मे सबसे अधिक बोली जाने वाली अपनी भाषा हिंदी की प्रगति के प्रश्न आज भी ज्यों के त्यों निरूत्तर बने हुए है । प्रगति नहीं हुई ऐसा तो बिल्कुल नहीं है पर जितना होने की संभावनाएं देखी जा रही थी उतनी आज भी नहीं मिल रही है ।इस विशाल देश के विविध प्रान्तो में या राज्यों में हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को आज भी आत्मसात करने मे हमारे देश के कुछ प्रान्तों के सभ्य पढे-लिखे नागरिक अभी भी पूरी तरह से अपने आप को तैयार नही कर पा रहे है।ये विरोध कुछ सिमित दायरे मे हो या फिर राजनीति प्रेरित।कारण केवल उस राज्य की बोलचाल की भाषा व वहाँ की मातृ-भाषा को क्षति न हो जाए ।और हम हमारी सांस्कृतिक धरोहर को आने वाले समय में खो न दे ,क्यों इसे हम अपनाएं , ऐसे कई विचार मन में आने के कारण गैर हिन्दी राज्यों में हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की स्थिति मे अभी भी विभिन्न आयामों मे बहुत ही विस्तार की आवश्यकता है । ऐसा नही की संभावनाएँ नही है।हमेशा हर पहल उस ओर इंगित करती है की हमारे प्रयास होते रहे और लगातार प्रयास करते रहने की भी अति-आवश्यकता होगी ॥हिंदी को समृध्द करने के हर प्रयास उससे जुडी प्रत्येक इकाई के सहयोग के साथ ही संभव है इस तरह हमारे सामने जो भी प्रश्न है उनके ऊत्तर हमारे सामने मौजूद तो है पर उस पर घ्यान देना बहुत जरूरी हो गया है। प्रायः हर गैर हिन्दी राज्यों में जहाँ पर्यटन स्थलो की भरमार है। और प्रत्येक वर्ष वहाँ पर्यटको की आवा-जाही भरमार रहती है ऐसा हम सभी ने देखा और अनुभव किया है ।प्रायः पूरा गैर हिन्दी भाषी क्षेत्र इससे अछूता नहीं और वहाँ पर हम ये कैसे उम्मीद कर सकते है की देश के विभिन्न प्रान्तो से आये सभी लोग वहाँ की भाषा जानते होगें ।अंग्रेजी के अलावा एक भाषा हिन्दी ही है, जो इस समस्या का समाधान बन कर उभर रही है, इसका स्वागत करना हमारा नैतिक कर्तव्य है । इसके अलावा- औधोगिक संस्थान व अन्य ऐसे बहुत से कारण भी समझ में आ रहे है जिसके चलते भारत के विभिन्न प्रान्तो से रोजगार की तलाश में आने वाले बहुतायत लोग हिन्दी भाषी क्षेत्रो से होते है। लोगो का आना अपने साथ अपनी भाषा का भी लाना एक परंपरा है।स्थानीय लोगों से वार्तालाप के दौरान केवल संपर्क भाषा (अंग्रेजी) के माघ्यम से अपनी बात बताना शायद बहुत ही कठिन होने लगता है । अगर इस भाषा के बोल-चाल का ज्ञान दोनो पक्ष को पूरी तरह से हो तब तो ये वरदान साबित होगा वरना यह केवल अभिशाप , गर अर्थ का अनर्थ हो जाए तो समस्या बहुत ही विकराल रूप भी ले सकती है । आज हमारे संचार माघ्यमों मे पत्र-पत्रिकाओं, अखबारो की स्थिति से सभी अवगत हो गये है । अब तो मोबाईल पर अंगुलियों के माध्यम से हिंदी के कई विषयों पर बाते होती रहती है । जिसमें आज मुलतः दूरदर्शन ऐसा सशक्त माघ्यम इसकी दिशा व दशा को सुधारने मे होने लगा है । जिससे आने वाले दिनों में इस बात की संभावनाएँ बहुत ही अधिक लग रही है। जब इन गैर हिन्दी राज्यों में आज वर्तमान पीढी जिस प्रकार हिन्दी को समझने व बोलने लगी है, आगे इसी क्रम में अगली पीढी इस पर अपनी पकड निश्चित ही और मजबूत करेगी ताकि उससे उत्पन्न रोजगार के अवसर व राष्ट्र को एक सूत्र मे बाँधने वाली भाषा हिन्दी का विस्तार इन गैर हिन्दी राज्यों मे भी हो सके। …अगर हम इसे इस क्षेत्र की आवश्यकता या मजबूरी कहे तो भी इसके बगैर इस क्षेत्र के लोगो को अन्य हिन्दी भाषी क्षेत्रो मे फलने फूलने के अवसर गवाँने पडेगें ये इस बात को अब जानने लगे है । गैर हिन्दी राज्यों ने हमारे संविधान में निहित दिशा निदेशो का सहारा लेकर अंग्रेजी को महत्व देते हुए अपनी प्रान्तीय भाषा से जुडे रहने का जो संकल्प ले लिया ।उसी का आज ये परिणाम देखने को मिल रहा की हमारी राष्ट्रभाषा ने इन सभी प्रान्तों के विरोध को सहा है ,और आज भी जब हम विश्व हिन्दी सम्मेलन के 12वें सोपान के मंच पर खडे है। पर अभी भी यह कहने में हिचकिचा रहे है कि ,हमारी राष्ट्रभाषा के भविष्य की दशा व दिशा कैसे निश्चित हो की हमारे देश का सम्मान विश्व के अन्य देशो में हिन्दी के प्रति समर्पित उन विदेशो में बसे करोडो भारतीय लोगो की आशाओं, आकांक्षाओं के अनुरूप हमारे ही देश के लोगो से, इस राष्ट्रभाषा के प्रति उनके समर्पण की जो अपेक्षाए है। ..उसका इन्तजार जारी है । विश्व जगत में -विस्तार व संभावनाएँ .. हमारे प्रयासो के परिणाम खुद ब खुद कह देगे एक आशावादी विचारधारा का सूत्रपात कभी भी अच्छी दिशा में ही होता है जिसका हमे हमेशा इन्तजार रहता है ॥ गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रो के लोगो नि जिस शिद्दत से अग्रेजी को सीखा और अपनाया है।...अगर उसकी तुलना में कुछ मन इस हिन्दी भाषा के लिए भी बना ले तो ये कहना कठिन नही होगा की इसमें लगने वाला समय किसी भी प्रकार से अंग्रेजी सीखने से अधिक नही होगा । साधन सभी उपलब्ध है केवल हाँथ बढाने की देर है। आजादी के सातवे दशक में इस इन्तजार में गुजार कर रह गए की कब हमारी राष्ट्रभाषा को उसके अपने देश में सम्मान मिलेगा। …तब कही हम विश्व के अन्य देशो के सामने इस बात को ताल ठोककर कह सकते है की, हमारी राष्ट्रभाषा अन्य भाषाओ की तरह स्थापित हो गई ।गैर हिन्दी भाषी राज्यो को आज निश्चित ही इस बात का एहसास होने लगा है कि देश के अन्य प्रान्तो में उनकी जरूरत है और उन्हें भी हिन्दी भाषी प्रान्तों के लोगो की जरूरत है ।ये आवश्यकता आपसी मेल मिलाप व भाषा के आदान-प्रदान से ही संभव लगता है ।आज का बाजार जिस रफ्तार से अपने पैर फैला रहा है ।उसकी आवश्यकता मे भाषा की आवश्यकता भी उतनी रफ्तार से लोगो के समझ मे आ रही है ।जिसका परिणाम यह हो रहा है की देश के हर प्रान्त में हिन्दी को बोलने व समझने लगे भले ही लिख पढ नहीं सकते ।हमारी भाषा के विस्तार के लिए शायद यह हमारी पहली आवश्यकता होगी , पश्चात हमारे लिए एक क्रमवार हर भाषा के साहित्य को अपनी राष्ट्रभाषा मे अनुवाद का चरण जिससे हर भाषा को एक सम्मान हर रूप मे चाहे वह उनकी भाषा मे हो या राष्ट्रभाषा में एकरूप मे मिलता रहे ।प्रायः यह कुछ दक्षिण भारतीय गैर हिन्दी भाषी राज्यो मे विरोध का आन्दोलन चला था की हम पर इस भाषा को थोपा जा रहा है इसे हम कभी भी स्वीकार नही करेगें पर अब स्थिति में कुछ सुधार के आसार लगते है ,जिसमें तमिल व मणिपुरी भाषा को लेकर भी कई बार हताहत होना पडा ।उदाहरणो की कमी कहीं भी नही है पर इस यात्रा को इसी तरह जारी रखते हुए मंजिल पाने के आसार भी कुछ कम नहीं । आज भी हमारी जडो में अंग्रेजी का पानी पूरी तरह भरा हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप हर प्रकार के प्रयासो, के बावजूद भी हमारी मानसिकता ने इस भाषा का साथ नहीं छोडा, जिसका फायदा उठाकर आज भी इसी की रोटी सेकने वाले तथाकथित कुछ चन्द लोगो के उपयोग का अस्त्र बना असंख्य लोगो पर अंग्रेजी का राज चल रहा है, जिसमें मुलतः गैर हिन्दी भाषी राज्यो से जुडे लोगो का वर्चस्व ही दिखलाई देता है ।यदाकदा इसका विरोध भी सामने आया इसी प्रकार राष्ट्रभाषा को विभिन्न स्थानो पर मर्यादित करने के प्रयासो में भी बहुत अधिक इन गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रो ने ,उनपर अत्याचार होने की बात कह इस भाषा को जबरदस्ती उन पर थोपने की भी बात कही ,ये सारी बाते लगातार चलती आ रही है ,और शायद चलती रहे ।हमें हर प्रकार से तैयार होकर इस प्रकार की स्थिति पैदा करनी होगी जिससे हमारी राष्ट्रभाषा का और अधिक विस्तार इन गैर हिन्दी राज्यों में जल्द से जल्द स्थापित हो ॥ इस प्रकार सारी स्थिति को एक आईने के सामने रख अगर हम उसकी जाँच करे तो लगता है ,हमने अपने देश को आजाद कराने में जितना समय लगाया ..उसका घ्यान रख गणना करने पर हमारी इस भाषा की लडाई को लडने में और भी बहुत वक्त लग सकता है, ऐसा प्रतीत होता है, पर हमारे संकल्प हमारी जरूरत के अनुकूल हमेशा राष्ट्रहित सर्वोपरि की भावना का संचार ही हमारी भाषा को देश में ही नहीं विश्वपटल पर भी सम्मानित कर गौरवान्वित करेगी यही हमारी अभिलाषा है ।गैर हिन्दी भाषी इस बात को अच्छी तरह जानते भी है कि इस देश में हिन्दी के बगैर हिन्दी प्रान्तों में उनका जीवन कितना कठिन होगा फिर भी विरोध, बात बहुत ही विरोधाभास लिए लगती है इस तरह का वातावरण न बनाए ,हमारा राष्ट्र कई समस्याओं से जूझ रहा है उसमें इस समस्या को और न विस्तार दे अपनी मातृभाषा व क्षेत्रीय भाषा का जितना सम्मान आप कर रहे है उसी तरह हमारे राष्ट्र के सम्मान के प्रश्न को इस तरह बार-बार आधात न मिले इसी आशा का घ्यान रहे । सभी प्रयास अपनी चरम सीमा को पाने के करीब होते हुए भी यह निश्चित नहीं कर पा रहे है की और कितना वक्त लगेगा ।कभी-कभी बहुत ही आशातीत समाचार का संप्रेषण होता है और ठीक उसके कुछ समय पश्चात उसका विरोधाभास भी दिखाई देने लगता है ,शाम की आवाज सुबह आना क्यों बंद हो जाती है, नहीं समझ आता है। लगभग 150 करोड की आबादी वाले इस राष्ट्र को एक राष्ट्रगान-गीत व घ्वज की तरह एक राष्ट्रभाषा का सम्मान महज कुछ गैर हिन्दी भाषी राज्यो के कारण कलंक बन कर रह जाएगा ऐसा कहना उचित नहीं है हम सभी मिलकर इस प्रयास को एक अच्छी दिशा की ओर पूरे तालमेल के सात पूरे राष्ट्र को साथ लेकर चलने के संकल्प के साथ बढना होगा जैसा पहले हमें लगता था परिवर्तन आ रहा है, संविधान के अनुच्छेद में जल्द सुघार की आवशयकता है जिससे इस भाषा को अन्य बोलियों के द्वारा संविधान में स्थान के लिए उठ रही आवाज पर जल्द घ्यान देना होगा ।स्थिति में लगातार सुधार देखे जा रहे है ।आजकल दक्षिण भारतीय राज्यो ने हिंदी के प्रति रूचि रखते हुए उसके प्रचार –प्रसार में भी बढ-चढ कर सहयोग भी कर रही है,और इसके चलते विश्व जगत में हिन्दी का विस्तार व उसकी संभावनाएँ प्रश्नचिन्ह लिए अपने देश पर भारी न पड जाए ऐसी धारणा अब बेमानी लगती है ,प्रायः हम सभी इससे ऊपर उठकर हमारी राष्ट्रभाषा को गौरवान्वित देखना चाहते है ॥ हमारे हर प्रयास इस ओर है कि किस तरह हमारी भाषा हिंदी का सम्मान अपने ही देश में ही नहीं वरन विश्व मे भी इसकी छवि को एक सकारात्मकता मिले जिसके प्रयास लगातार जारी है आशा है हर उपलब्धि को प्राप्त करने में जितना समय लगता है शायद यहीं उसका इंतजार है। देश-विदेश मे जिस तरह हमारी भाषा हिंदी के प्रति रूचि का संचार हो रहा है हमें भी स ओर अपने सकारात्मक कदम रखते हुए अब तक चली आ रही उदासीनता को अलग रखे हर तरह से इसकी श्रीवृध्दि के प्रयासों को सार्थकता प्रदान करना जरूरी है ।
लिंगम चिरंजीव राव,,
म.न. 11-1-21/1,कार्जी स्ट्रीट, इच्छापुरम
श्रीकाकुलम (आ.प्र.)532 312
मो.न. 8639945892
(स्वतंत्र लेखन)


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