“शिक्षकों को विश्वामित्र, द्रोणाचार्य, वेदव्यास, परशुराम, रामकृष्ण परमहँस और चाण्क्य की तरह सरलता लिए अत्याधिक कठोर ही नहीं बल्कि सद्ग्रथों की तरह भी बनना होगा। सदग्रंथ ऐसे शिक्षक होते है जो बिना बेंत मारे और कटु शब्द कहे हमें ऊँची शिक्षा प्रदान कर हमारे जीवन को अच्छे भविष्य के साथ राष्ट्रीयता, नैतिकता,सामाजिकता, भाईचारे के सभी संस्कार-गुणों का संचार करते हुए । हमारे अपने देश में वैचारिक असहिष्णुता, वर्गभेद, जातिगत भावनाएँ, धार्मिक कट्टरता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, ऊंच-नीच की विषैली प्रवृतियों और राष्ट्र विरोधी नेतृत्व से हम दूर रहे।“ शिक्षक दिवस हर वर्ष 5 सितंबर के दिन हमारे प्रिय भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर मनाया जाता है जो दिवस के रूप में जाना जाता है। उनके कथनानुसारः-“”सच्चे शिक्षक वे है जो हमें अपने लिए सोचनें में मदद करते है। शिक्षक के तौर पर यह सजगकता के साथ समझना होगा कि शिक्षा का अंतिम-उत्पाद एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति ही होना चाहिए”” वे भारतीय सामाजिक संस्कृति से ओतप्रोत एक महान शिक्षाविद्, माहान दार्शनिक, वक्ता और एक आस्थावान हिंदू विचारक थे। उनके जीवन के 40 वर्ष एक शिक्षक के रूप में उप-राष्ट्रपति और राष्ट्रपति बनने से पहले और बनने के बाद भी वे केवल भारत में ही नहीं वरन विदेश के भी प्रसिध्द शैक्षणिक संस्थाओं में गुजरे वे एक आदर्श शिक्षक थे, उनके कुछ छात्रो के कहने पर अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस का नाम दिया। इस तरह इस दिवस की यादों को एक साकार रूप देने के लिए जब शिक्षा की गुणवत्ता घटती जा रही है और गुरु-शिष्य संबंधों की पवित्रता को ग्रहण लगता जा रहा है। उनका स्मरण नयी चेतना का संचार करने मे सक्षम होगा। आज के इस परिवर्तित समयकाल के साथ शिक्षक के लिए शिक्षा के आयुध को भी आज बदलने की आवश्यकता महसूस हो रही है। विश्व के अधिकतम देश (100) से अधिक युनेस्को 1994 के वर्ष मे 5 अक्टूबर का चयन अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस के लिए चुना गया था। इसके अलावा अन्य देशों में भी इस दिवस को मनाने की प्रथा है और अलग-अलग दिवसो पर मनाते है।  भारतीय इतिहास के पन्नों में दर्ज उन पाँच गुरुओं की शिक्षा नीति को हम आज भी प्रासंगिक पाते है जिसकी जरूरत आज के समय की माँग बन गई है, क्रमशः(1)गुरु वशिष्ठ राजा दशरथ के चारो पुत्रों को विश्वामित्र के पास शिक्षा के लिए भेजा बहुत ही महान,   (2) द्रोणाचार्य-कौरवों और पांडवों के गुरु,(3) महर्षि वेदव्यास-त्रेता युग के अंत मे पैदा होने से लेकर व्दापर युग के अंत तक रहे, महाभारत के रचयिता,(4) परशुराम पराक्रम के प्रतीक,विष्णु के अवतार, अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाले और अंतिम (5) चाणक्य(कौटिल्य)-चाणक्य नीति के लिए प्रसिध्द है जिन्होंने चनंद्रगुप्त मौर्य को तैयार कर मिसाल कायम की। वर्तमान समयानुसार आज ऐसे ही गुरुओं की आवश्कता की परिस्थितियाँ हर दिन निर्मित होती जा रही है। और यह बेहद जरूरी भी होने लगी है।                                                                              

वर्तमान समय में अखबारों के अनेक पृष्ठो पर शिक्षको के बारे में बहुत सी बातों का जिक्र अच्छाई भी बुराई भी पढ़ने को मिलता रहता है। क्या यह शिक्षको के लिए शर्मनाक नहीं है।  जहाँ वे अपना सब कुछ लुटाकर छात्रों के लिए अपनी भूमिका निभाने में कभी पीछे नही हटते वहीं कुछ ऐसे शिक्षको के व्दारा शर्मनाक कृत्यो का लेखा-जोखा सामने आता है तो बहुत कठिन होता है। परंतु इतना सब कुछ होते रहने के साथ शिक्षकों के सम्मान में कही कमी नही है जो गलती करते है वे निश्चित ही गलत मानसिकता के शिकार है। ऐसे शिक्षकों को सजा मिलनी चाहिए। शिक्षा का विस्तार तो बहुत होता जा रहा है अब तो छात्रों के पास इतने विषयों की भरमार है कि छात्र अपने भविष्य को संवारने के लिए खुद को संशय की स्थिति में पाते है विषय के चयन करने की मश्कत के लिए भी सलाहकारों की जरूरत पाता है जो मुलतः शिक्षक ही होते है। छात्रो को अपने भविष्य की दिशा निर्धारित करने के लिए हमेशा कुछ न कुछ करते रहने की सलाह देते हुए उनका भविष्य संवारने में मदद करते है। सबके जीवन में कई बार ऐसे मोड़ या लोग आते है जिनके कारण से उन्हें नई दिशा मिलती है. और जीने का सही मकसद मिलता है । शिक्षक की जिम्मेदारी छात्रों के शिक्षित करने के लिए अपनी क्षमताओं को हमेशा विकसित करने की जरूरत तो होती ही है, इसके अलावा वे मात्र एक गाइड नहीं, एक अभिभावक और एक दोस्त की तरह बर्ताव जरूरी है जो छात्रो के लिए उनके अंदर विकसित प्रश्नों को बेजिझक प्रस्तुत करने के दिशा प्रशस्त करती रहे । शिक्षा के विषय में कुछ महान लोगों के कथन निम्मनानुसार हैः “हमारी शिक्षा को विज्ञान एवं आत्म विधा के आदान प्रदान पर संस्कृतियों के सौहार्दपूर्ण समन्वय की नींव पर खड़ा करना आव्श्यक है।“– कविवर रविन्द्रनाथ ठाकुर(15-8-1921)
“शिक्षा का अर्थ मनुष्य की आत्मा को स्वतंत्र करना है न कि उसे निश्चित ढ़ाँचे मे कैद करना।“(15-8-1948)- पंडित जवाहर लाल नेहरु
”हर वस्तु चाहे वह उधोग हो, कृषि हो अथवा कोई भी जो हमारे लिए महत्वपूर्ण हो, तभी समुचित रूप से विकसित हो सकती है, जब उसके पीछे शिक्षा की पृष्ठभूमि हो।“(10-11-1963)
(शिक्षा मंत्री सम्मेलन में बोलते हुए)---पंड़ित जवाहर लाल नेहरू “शिक्षा समाज के सभी वर्ग के लोगों के लिए आवश्यक है। हम केवल तभी समान रूप से  विकास कर सकते है, जब वे लोग, जो किसी भी कारण से शिक्षा से वंचित है, अन्य. लोगों के बराबर आ जाँए। “अखिल भारतीय मुसलिम शिक्षा सम्मेलन(7वें) उदघाटन के समय—श्रीमती इंदिरा गांधी “हर व्यक्ति में दिव्यता का अंश है, कुछ विशेषता है और शिक्षा का यही कार्य है कि उसे खोज निकाला जाए, विकसित किया जाए और प्रयोग में लाया जाए। “—महर्षि अरविंद
 भोजप्रबंध श्लोक-74
विप्रो ड पि यो भवेन्मूखः स पुरादूवहिरस्तु मे । 
कुम्भकारो ड पि यो विद्वान्स तिछतु पुरे सम॥ 
अतः कोडपि. न मूर्खोभूद्धारानगरे। तदनंतर
एक बार राजा ने मुख्य मंत्री से कहा--: ब्राह्मण भी यदि मूर्ख हो, तो . मेरी पुरी के .बाहर रहे और कुम्हार भी  यदि विद्वान हो तो मेरे नगर में निवास करे । ; अतः घारा नगर में कोई मूर्ख नहीं रहा । हमारे देश में व हमारी संस्कृति शिक्षा के प्रति कितनी सचेत रही है यह इससे प्रमाणित होता है।

                                             

“अनुभवहीन माता-पिता की सबसे बड़ी गलती यह होती है कि वे हर प्रकार के नैतिक प्रवचनों पर भरोसा करते है। और वे माँग करते है कि उनके बच्चे को उसी ‘शैक्षिक जंजीर’ से बांध दिया जाये जिसके बिना वे अपने बच्चे का लालन-पालन नहीं कर सकते। ”—अन्तोने मकारेंको( विश्व प्रसिध्द शिक्षाशास्त्री) “”वह व्यक्ति जो छात्रों से केवल क्लास में मिलता है-मेज के एक तरफ शिक्षक और दूसरी तरफ छात्र-वह बाल-हृदय की गहराइयों को नहीं जानता और जो बच्चों को नहीं जानता वह उनका चरित्र-निर्माण नहीं कर सका ।” वसीली सुखोम्लीन्स्की (विश्व प्रसिध्द शिक्षाशास्त्री) “”हमारे युग के शिक्षाशास्त्री दार्शनिक इलहामों के जरिये नहीं, बल्कि धैर्यपूर्वक और निरंतर सार्वत्रिक प्रयोगों के जरिये ही आगे बढ़ सकता है। अध्यापक को दार्शनिक शिक्षक और नूतन शैक्षिक सिध्दांत का अविष्कार नहीं, वरन ऐसा ईमानदार तथा लगनशील प्रेक्षक होना चाहिए, जो प्रेक्षणों से दूसरों को अवगत कराना भी जानता हो।“” लियो टॉल्सटॉय— महात्मा गांधी (बापू) 22-10-1937 (शिक्षा मंड़ल की रजत जयंती के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए ) कहा थाः- “हमें उन्हें (छात्रों को) अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता और हमारे राष्ट्र की प्रतिभा का सच्चा प्रतिनिधि बनाना है। “इसी के आधार पर महामहीम स्वर्गीय शंकरदयाल शर्मा जी कहते हैः-
मैं समझता हूं कि ऐसे प्रतिनिधि तभी तैयार किये जा सकते है जबकि छात्रों के नैतिक विकास की ओर घ्यान दिया जाए। आध्यात्मिक और नैतिक विकास से ही छात्रों में परस्पर समन्वय की समझ और सदभाव का गुण आता है। ये गुण भारत जैसी बहुभाषी तथा विभिन्न धर्म और जाति वाले देश के लिए अत्यंत आवश्यक भी है। हमें यह याद रखना होगा किताबी ज्ञान न तो छात्रों के भविष्य के लिए और न ही राष्ट्र के भविष्य के लिए पर्याप्त हो सकता है। उस ज्ञान में नैतिकता और मानवता पर आधारित जीवन-मुल्यों को सामिल करना होगा। ”इसी बात को डॉ.राजेन्द्र प्रसाद भूतपूर्व राष्ट्रपति जी कुछ इस तरह कहते हैः” मेरे विचार से (समझ से) किसी छात्र के लिए आगे चलकर केवल बौध्दिक उपलब्धि के बजाय मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास का महत्व है।“ इसी के साथ-साथ शिक्षा पाने में सभी का समान अधिकार है,इसके विषय में आगे नारी को शिक्षा की जरूरत “मेरा यह दृढ विश्वास है कि एक बार पुरूष शिक्षा की अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन स्क्षी-ळिक्षा की अपेक्षा करना न तो संभव है और न मुनासिब।“ (पं.जवाहर लाल नेहरू) इसी क्रम मे स्वामी विवेकानंद जी ने नारी की प्रगति के प्रति सजगता के लिए कहते है-“पहले अपने यहाँ की महिलाओं को शिक्षित करो और उन्हें उन पर छोड़ दो। इसके बाद वे तुम्हें बताएँगी कि न्हें किस प्रकार के सुधारों की जरूरत है।“ और नारी शिक्षा की विशेषता आदि अनेक बातों से हमारी शिक्षा के विषयों पर अनेकों बातों से हम सभी लगातार अवगत होते जा रहे है। और वर्तमान स्थिति में इसके सुधार के दरवाजे भी बहुत अधिक बढ़ गए है। आज हम शिक्षक दिवस पर शिक्षक और समाज में आधुनिकता के प्रश्न और उनके उचित जवाबों की प्रतिक्षा व समाधान ढूंढने का जो दौर कई वर्षों से जारी है। आधुनिकता और वैश्विक परिदृश्य और हमारी पंरपरा के अनेक आयाम हमारी शिक्षा को आज भी आजादी के लंबे अंतराल के बाद भी उचित परिवर्तन के साथ आज तक रोजगारोन्मुख बनाने में हम कितना सक्षम हो पाये है यह हम सब जानते है। आज हमारे देश की आबादी को हम सस्ती या मँहगी शिक्षा तो दे पा रहे है पर उनको हम अपने देश में रोजगार के अवसर नहीं दे पाने के कारण उनका पलायन विकसित देशों की ओर होने के कारण शिक्षा का लाभ उन देशो को मिल रहा है और वे देश मनमानी करते हुए जब कभी कोई राजनीतिक उथल-पथल होती है उनको वापस अपने राष्ट्र लौटना पड़ता है। संभावनाओं के संधर्ष जारी तो है आगे क्या हो सकता है इसकी छानबीन व रोजगार के रास्ते ढूंढना जारी है। यह प्रश्न लगातार हमारे लिए हमारे ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रख पाने की बेबसी से भी कठिन होता जा रहा है। शिक्षक की जिम्मेदारी के विषय में प्रायः यह कहा जाता है कि शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता कहा गया है। देश के भावी नागरिकों के बालपन से उनके सर्वागिण विकास कर उनके व्यक्तित्व में निखार ला सके। शिक्षा बालक की प्राथमिक अवस्था से  युवा अवस्था तक का सफर उसके अस्तित्व का ऐसा स्पष्ट दर्पण होना चाहिए जो उसके भविष्य के निर्माण के साथ राष्ट्र के निर्माण की धरोहर बने। अब प्रश्न यहाँ यह है कि क्या हमारी शिक्षण व्यवस्था मे जुडे शिक्षको को ऐसा वातावरण उपलब्ध हो रहा है । आज की स्थिति पर हम घ्यान दे तो हम इस सच से अलग नहीं हो सकते की हमारी सरकारी मशीनरी की अनगिनत जिम्मेदारियों के भार तले शिक्षकों की रचनात्मकता भी दब कर रह जाती है। इसका खामियाजा जो शिक्षा के सहज प्रवाह में रूकावट पैदा करता है जिसका असर केवल छात्रों पर ही नहीं बल्कि शिक्षा के लिए निहित उद्देश्य पर पड़ता है। अन्य विभागों की तुलना मे कहीं यह भी समझ आता है की शिक्षक जैसे कर्मठ व ईमानदार व सरकारी कामों को अंजाम देने में व सांख्यकी से संबंधित आंकड़ो (चुनाव में जनगणना,मिड-डे-मिल योजना का लेखा-जोखा, हो या स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े जुटाना, वोटर सूची तैयार करना आदि) को इकट्टा करने के दौरान होने वाली अनेक गलतियों की संभावनाएं बहुत कम रहेगी ऐसा मेरा मानना है। पर इससे होने वाले नुकसान से छात्रों के शिक्षा के प्रति  मात्र औपचारिकता ही रह जाती है जिससे वे पाठ्यक्रम पूरा कर सके। आज राष्ट्र के सामने इन प्रश्नों के निराकरण की जरूरत है ताकि शिक्षक अपना दायित्व निभा सके। शिक्षको की उपलब्धता पर घ्यान भी कम दिया जाता है। इसके काऱण शिक्षा के स्तरीयता में लगातार कमी आ रही है। आज भी शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षको का आभाव भी देखा गया है। इस बात का प्रतिरोध तो हो रहा है कि शिक्षकों को शिक्षा के अलावा अन्य कार्यों मे अलग रखा जाए, पर फिर भी पूरी तरह नहीं रूका है। आज हमारे सामने एक अलग तरह की समस्या के असर के कारण गाजर घास की तरह प्राइवेट संस्थानों ने इसका लाभ उठाया जिसके चलते सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या का कम होना ही नहीं पाठशालाओं/संस्थाओं का पूरी तरह बंद होने के समाचारों ने बहुत कुछ कहा है। हर बड़े शहर शैक्षणिक संस्थाओं में शिक्षण की व्यवस्था में कमी का लाभ उठाकर छात्रों को कोचिंग संस्थाओं की ओर आकर्शित कर रहे है, जो अभिभावको के साथ अन्याय व छात्रों पर अत्यधिक दबाव जिसके कारण उत्पन्न समस्याओं के अनेक उदाहरण रोज अखबारों के पन्नों मे मिलते है।  इस दिवस अध्ययन को सम्मान देते हुए शिक्षको को भी सम्मानिक किया जाता है पर अब आवश्यकता यह है कि प्रतिकवाद से आगे बढ़कर शिक्षक समुदाय तक पहुँचना होगा। शिक्षक दिवस के अर्थ को चरितार्थ करने के साथ राष्ट्र के सभी छात्रों के लिए शिक्षक दिवस एक ऐसा दिवस होना चाहिए कि छात्रों को उनके अस्तित्व के संधर्ष को हमेशा एक निश्चित दिशा के लिए तत्पर शिक्षकों का जो श्रमसाध्य प्रयास है उसका उचित पतिफल भी मिले। शैक्षणिक योग्यता के आधार पर बहुत से लोगों के पास इतनी अधिक डिग्रियाँ तो होती है पर शिक्षक होना और इस गौरवपूर्ण पद पर कार्य करने का भाग्य व उसकी गरिमा को निभाने का सौभाग्य जिन्हें मिलता है और जो इसे पूरी ईमानदारी से निभाने में सक्षम होते है। ऐसे शिक्षकों के प्रति छात्रों का मात्र विश्वास ही नहीं उनके संपूर्ण जीवन का संबंध छात्रों की आत्मा की गहराई तक बन जाता है और यह सम्मान मात्र शिक्षक होने से नहीं उसे उन्हें अर्जित करना पड़ता है।। आज शैक्षणिक संस्थाएं डिग्री पाने के व्यापारिक हथकंडों जैसा हो गया है । शिक्षा का बाजार बाहर इतना फैल गया है कि हमें हर तरह से सुविधा के साथ शिक्षा प्रदान करने के लिए मौजूद है। उच्च शिक्षा में, कुछ तो आपको आने वाले जीवन में स्थायित्व प्रदान करने के लिए नौकरी का भी बंदोबस्त करने में काबिल है। और यह प्रलोभन का तरीका सफल भी होता है जो केंपस सेलेक्शन के साथ नौकरी में भर्ती हो जाते है। उनकी क्षमता और ज्ञान का पर्दा बाद में खुलता है। उसे उचित न्याय दिलाते हुए जरूरी संसाधन के साथ भविष्य के निर्माण मेँ अध्ययन फिर से न्यायसंगत प्रतिफल देने वाला पेशा बने। अन्य सफलता व असफलता की गाथा के साथ शिक्षा के क्षेत्र की विशिष्ठ सफलता गाथा की जरूरत है जिससे आमजन के लिए शिक्षा सुगम व सरल व रोजगारोन्मुखी लगे।वर्तमान में शिक्षकों को देशकाल परिस्थितियों पर विचार करते हुए मंथन करने की जरूरत है। जिसके सहारे हमारी आने वाली युवा पीढ़ी को आपके वैचारिक अमृत पान के साथ वर्तमान समय की माँग को भी पहचान सके और उसके साथ भविष्य के रास्तों के लिए संघर्ष करते हुए आगे बड़े और उसे एक सफल नागरिक बने इसके लिए शिक्षकों का सहयोग मिलना जरूरी। हम सब यह जानते है कि छात्रों के आभाव में विद्यालय में उपस्थिति लगातार कम होने लगी है। हमनें कोरोना के दौर में जिन परिस्थितियों को अनुभव किया उसका गहरा असर शिक्षा पर पड़ा जरूर पर अब तो सब कुछ लौट गया है। पर आज हमारे छात्र तकनीकी माध्यम से आनलाईन कक्षाओं के प्रति आकर्षित हो गये है। उनका जुड़ाव व संपर्क लगातार शिक्षको से तो होता ही रहता है। आज भी छात्र अपने माता-पिता और अभिभावक के स्थान पर अपने शिक्षकों की सलाह को प्राथमिकता देता है। अतः आज शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षकों को आने वाली पीढ़ी के लिए यह संकल्प लेना होगा कि वह अपने छात्रों में राष्ट्रीयता, नैतिकता, सामाजिकता और भाईचारे के सभी संस्कार विकसित करने मे सहायक बनेगे जिससे वर्तमान में अपने देश भारत में वैचारिक असहिष्णुता, वर्गभेद, जातिगत भावनाएँ, धार्मिक कट्टरता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, ऊँच-नीच की विषैली प्रवृतियाँ और राष्ट्र विरोधी नेतृत्व उभर रहा है, उसका सघन प्रतिकार कर के छात्रों में अपने देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठता पूर्वक समरसता की धारा प्रवाहित करने मे सहायक बने। इसके लिए हमे ज्ञात है कि छात्र, शिक्षक और विद्यालय की आवश्यकता अपरिहार्य है। जहां छात्र और शिक्षक के बीच जिस तरह के शैक्षणिक वातावरण का निर्माण होता है और उसके माध्यम से हमारे शिक्षको को ऐसे वैचारिक संवादों के साथ छात्रों में राष्ट्रप्रेम की भावना को विकसित करना होगा। क्योकि राष्ट्र अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। जिसमें पड़ोसी देशो का शत्रू राष्ट्रों में परिवर्तन होना हमारे देश को हानि पहुँचाने के लगातार आतंकी व अन्य प्रयासों को हम सभी जानते और अनुभव कर चुके है इसके अलावा भारतीय समाज के राजनीति में सत्ता प्राप्ति की तीव्र अनैतिक लालसा में धृष्ठतापूर्वक राष्ट्र विरोधी शक्तियों से गठबंधन जैसी अराजक, घातक एवं विस्फोटक परिस्थितियों का सूत्रपात भविष्य को सुरक्षित व प्रतिष्ठित बनाने में शिक्षकों को एक राजकीय लोकसेवक के साथ गुरुत्तर दायित्वों को ग्रहण करते हुए बहुत कुछ करना होगा। हमारी आज की जरूरत के अनुसार अगर शिक्षक को विश्वामित्र बनकर अपनी गुप्त शक्तियाँ, शक्तिशाली मंत्र, यंत्र और शक्तियों को आज के छात्रों मे राम पैदा कर शक्तियों को उनमें हस्तांतरित करनी होगी। आजादी के परवानों की तरह भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद और हमारे ए.पी.जे,अब्दुल कलाम जैसे देशभक्त तैयार करना होगा। चाणक्य की तरह चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे चक्रवर्ती सम्राट, द्रोणाचार्य के अर्जुन की तरह लक्ष्य केन्द्रित जैसे शिष्यों को  तैयार करने होगें और परशुराम जैसे पराक्रम के प्रतीक, प्रतापी गुरु का बीड़ा उठाना होगा, विवेकानंद को मिले गुरु रामकृष्ण की तरह बनना होगा। इसके लिए शिक्षकों को भागीरथ बन प्रयास कर अपने अपने विद्यालयों का नाम व अपनी क्षमताओं के साथ एक उदाहरण बनना होगा । ऐसी उग्रतावादी राष्ट्रीयता को भले ही समर्थन न मिले पर आज हमारे देश के अंदर-बाहर में मंडराते हुए संकट शिक्षकों को न केवल अपने पाठ्यक्रम और पुस्तकों के ज्ञान की सीमा में रहना ही नही बल्कि हमारे देश के अनेक उन उदाहरणों से छात्रों को अवगत कराते हुए गौरवमयी इतिहास के साथ उन महापुरूषों के प्रसंगों को छात्रों तक पहुंचाना होगा जिससे देश का आने वाला भविष्य इन सारी अंदरूनी और बाहरी ताकतो के षड़यंत्रो की बातों से विचलित न होते हुए एक समर्थ राष्ट्र के नागरिको का दायित्व निर्वाह कर प्रतिकार करने की क्षमता को विकसित कर सके। यही हमारे इस शिक्षक दिवस की सार्थकता और हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के प्रति सच्ची श्रध्दांजलि होगी।

चिरंजीव(लिंगम चिरंजीव राव)
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)