राही मासूम रज़ा जन्म:01-09-1927 - जयंती-01-09-2025
राही मासूम रज़ा जन्म:01-09-1927 - जयंती-01-09-2025
(राही मासूम रजा धर्म को संकीर्ण अर्थ में देखने वाले कट्टरपंथियों के हमेशा विरोधी रहे) “मेरी पहचान राही जी से उस समय हुई जब वे दूरदर्शन के महाभारत के पटकथा लेखन ने उन्हें अमर बना दिया उसके साथ प्रसारण का दौर जब सड़कों पर सन्नाटा हो जाता था। “मैं समय हूँ, और आज महाभारत की अमर कथा सुनाने जा रहा हूँ। महाभारत केवल भरतवंश की सीधी सादी कथा नहीं है ये कथा है, भारतीय संस्कृति के उतार-चढ़ाव की, ये कथा है सत्य और असत्य के महाभारत युध्द की” यही संवाद उनकी प्रसिध्दि की गर्जना को चारो तरफ फैला देती है।“ (वे कहते थे मेरी तीन माँ है पहली जन्म देनी वाली नफिसा बेगम दूसरी अलीगढ़ युनिवर्सिटी और तीसरी गंगा-गंगा जो गंगौली में बहती थी।) राही का जन्म गाजीपुर के एक सम्पन्न एवं सुशिक्षित शिया परिवार में हुआ। राही के पिता गाजीपुर की ज़िला कचहरी में वकालत करते थे। जन्म01-09-1927 को ग़ाज़ीपुर के गंगौली गाँव में हुआ था। आरंभिक शिक्षा-दीक्षा ग़ाज़ीपुर में ही हुई। क़िस्सा है कि बचपन में एक बार बीमार पड़े बचपन में पैर में पोलियों/ दमा हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, तो स्कूल जाना छूट गया। पड़े-पड़े घर में मौजूद सारी किताबें पढ़ गए। क़िस्सों से उनका दिल बहलाने के लिए एक मुलाज़िम कल्लू काका भी रखे गए थे। उन्होंने बाद में सुनाया कि कल्लू काका न होते तो उन्होंने शायद कोई कहानी न लिखी होती। राही की प्रारम्भिक शिक्षा ग़ाज़ीपुर में हुई, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ आ गये और उच्च शिक्षाअलीगड मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। अलीगढ़ से उनका बेहद लगाव रहा। अलीगढ़ ‘मजाज़’ का था तो चर्चा में वह भी पीछे न थे। बाद में लिखा था कि उनकी तीन माएँ थीं, नफ़ीसा बेगम, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और गंगा—गंगा जो गंगौली में बहती थी। अलीगढ़ में ही नय्यरा से मिले जो उनकी जीवनसाथी बनीं। अलीगढ़ में ही वह कम्युनिस्ट भी हो गए थे। इतने कम्युनिस्ट कि नगरपालिका चुनाव में भूमिहीन मज़दूर प्रत्याशी कॉमरेड पब्बर राम के पक्ष में न केवल अपने पिता के ख़िलाफ़ प्रचार किया, उन्हें हरवा भी दिया। उनका यह साम्यवादी नज़रिया आगे भी बना रहा। वह वास्तविक अर्थों में ‘सेकुलर’ दृष्टिकोण भी रखते थे। अलीगढ़ में राही के भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास हुआ और वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी बन गये। अपने व्यक्तित्व के इस समय में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों से समाज के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए वे प्रयत्नशील रहे। लेखन का आरंभ उन्होंने शायरी से किया था और शेरो-सुख़न में एक मुक़ाम भी पाने लगे थे। फिर शायरी छोड़ दी और गद्य लिखने लगे। एक साथ कई चीज़ें लिखा करते थे। शाहिद अख्तर, आफाक़ हैदर और आफ़ताब नासिरी उनके ही अलग-अलग नाम थे जो उन दिनों अलीगढ़ में रूमानी और जासूसी नॉवेल में चर्चा पा रहे थे। परिस्थितिवश उन्हें अध्यापन कार्य छोड़ना पड़ा और वे रोज़ी-रोटी की तलाश में मुंबई पहुंच गये। वह बाद में अलीगढ़ छोड़ बंबई चले गए। फ़िल्मों से उन्हें शुरू से ही आकर्षण रहा था। बंबई में संघर्ष लंबा चला। तब उनकी मदद धर्मवीर भारती और कमलेश्वर ने की। बाद में बी.आर.चोपड़ा और राज खोसला की दोस्ती काम आई जो उन्हें फ़िल्में देने लगे थे। ‘महाभारत’ यहीं घटित हुआ जब बी.आर. चोपड़ा ने बाद में बेहद लोकप्रिय हुए इस धारवाहिक का पटकथा-लेखन उनसे कराया।
एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार थे। बी.आर.चोपड़ा द्वारा निर्मित प्रसिद्ध टीवी सीरियल महाभारत की पटकथा भी उन्होंने लिखी थी और1979 में 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' फ़िल्म के लिए फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ संवाद पुरस्कार भी जीता। उर्दू शायरी से अपनी रचना यात्रा आरंभ करने वाले राही मासूम रज़ा ने पहली कृति 'छोटे आदमी की बड़ी कहानी' लिखी थी, जो1965 के भारत-पाक युध्द में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी पर आधारित है।
मुंबई उनके लिए साहित्यिक लेखन के दृष्टिकोण से भी उर्वरा रही जहाँ उन्होंने ‘आधा गाँव’, ‘दिल एक सादा काग़ज़’, ‘ओस की बूँद’, ‘हिम्मत जौनपुरी’ जैसे उपन्यास लिखे थे। ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में नज़्म और ग़ज़ल लिखते रहे थे। उन्होंने उर्दू में एक महाकाव्य भी लिखा था जो बाद में हिंदी में ‘क्रांति कथा’ शीर्षक से छपी। ‘टोपी शुक्ला’, ‘कटरा बी आर्ज़ू’, ‘मुहब्बत के सिवा’, ‘असंतोष के दिन’, ‘नीम का पेड़’ उनके अन्य उपन्यास हैं। ‘नया साल’, ‘मौजे-गुल: मौजे-सबा’, ‘रक्से-मय’, ‘अजनबी शहर के अजनबी रास्ते’, ‘ग़रीबे शहर’ उनके प्रमुख उर्दू काव्य-संग्रह हैं। उनकी उर्दू कविताओं के हिंदी अनुवाद को ‘मैं एक फेरीवाला’, ‘शीशे के मकां वाले’, ‘ग़रीबे शहर’ संकलनों में प्रकाशित किया गया है। ‘हम तो है परदेश में, देश में निकला होगा चाँद’ उनकी बेहद लोकप्रिय नज़्म है जिसे जगजीत सिंह – चित्रा सिंह ने पहली बार गाया था। उन्होंने कई फ़िल्मों और धारवाहिकों के लिए पटकथा और संवाद-लेखन किया था। ‘मैं तुलसी तेरे आँगन की’ फ़िल्म की पटकथा के लिए उन्हें ‘फ़िल्म फ़ेयर’ मिला था। भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया।
जहाँ उन्होंने1960 में एम.ए. की उपाधि विशेष सम्मान के साथ प्राप्त की।1964 में उन्होंने अपने शोधप्रबन्ध तिलस्म-ए-होसरुबा में भारतीय सभ्यता और संस्कृति विषय पर पी.एच.डी करने के बाद राही ने दो वर्ष अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में अध्यापन किया और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले 'बदरबाग' में रहने लगे। यहीं रहते हुए उन्होंने आधा गाँव, दिल एक सादा कागज, ओसकी बूंद, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास व1965 केभारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद' की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी रचनाएँ हिंदी में थीं। के अलावा उनके अन्य उपन्यास हैं- 'टोपी शुक्ला,सीन-75,काटरा बी आर्जू ।इसके अतिरिक्त 'मैं एक फेरीवाला', 'शीशे का मकां वाले' और 'ग़रीबे शहर' उनकी उर्दू नज़म तथा शायरी के तीन संकलन भी हिंदी में प्रकाशित हुए हैं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य '1857' जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिखे चुके थे। राही का कृतित्त्व विविधताओं भरा रहा है। राही ने1946 में लेखन कार्य आरंभ किया। उनका प्रथम उपन्यास 'मुहब्बत के सिवा'1950 में उर्दू में प्रकाशित हुआ। राही कवि भी थे और उनकी कविताएं ‘नया साल मौज-ए-गुल में मौज-ए-सबा', उर्दू में सर्वप्रथम 1954 में प्रकाशित हुईं। उनकी कविताओं का प्रथम संग्रह ‘रक्स-ए-मैं' उर्दू में प्रकाशित हुआ। इससे पहले ही वे एक महाकाव्य अटारह सौ सत्तावन लिख चुके थे जो बाद में 'क्रांति कथा' नाम से प्रकाशित हुआ। इसके बाद उनका बहुचर्चित उपन्यास 'आधा गांव'1966 में प्रकाशित हुआ। राही ने स्वयं अपने इस उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा है - “वह उपन्यास वास्तव में मेरा एक सफर था। मैं ग़ाज़ीपुर की तलाश में निकला हूं लेकिन पहले मैं अपनी गंगोली में ठहरूंगा। अगर गंगोली की हक़ीक़त पकड़ में आ गयी तो मैं ग़ाज़ीपुर का एपिक लिखने का साहस करूंगा”। राही मासूम रज़ा का दूसरा उपन्यास हिम्मत जौनपुरी' था, जो मार्च1969 में प्रकाशित हुआ।1969 में ही राही का तीसरा उपन्यासटोपी शुक्ला' प्रकाशित हुआ। सन्1970 में प्रकाशित राही के चौथे उपन्यास ओस की बूंद' का आधार भीहिंदू-मुस्लिम समस्या है। सन्1973 में राही का पांचवाँ उपन्यास दिल एक सादा कागज' प्रकाशित हुआ। सन् 1977 में प्रकाशित उपन्याससीन -75' का विषय भी फ़िल्मी संसार से लिया गया है। सन्1978 में प्रकाशित राही मासूम रज़ा के सातवें उपन्यास कटरा बी अर्जू का आधार फिर से राजनीतिक समस्या हो गया। राही मासूम रज़ा की अन्य कृतियाँ है - मैं एक फेरी वाला, शीशे का मकां वाले, ग़रीबे शहर, क्रांति कथा (काव्य संग्रह), हिन्दी में सिनेमा और संस्कृति, लगता है बेकार गये हम, खुदा हाफिज कहने का मोड़ (निबन्ध संग्रह) साथ ही उनके उर्दू में सात कविता संग्रह भी प्रकाशित हैं। सन1968 से राही मुंबई रहने लगे थे। वह अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फ़िल्मों के लिए भी लिखते थे जिससे उनकी जीविका की समस्या हल होती थी। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण वह अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। मुम्बई रहकर उन्होंने 300 फ़िल्मों की पटकथा और संवाद लिखे तथा दूरदर्शन के लिए 100 से अधिक धारावाहिक लिखे, जिनमें 'महाभारत' और 'नीम का पेड़' अविस्मरणीय हैं। इन्होंने प्रसिद्ध टीवी सीरियल महाभारत पटकथा भी लिखी है और1979 में 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' फ़िल्म के लिए फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ संवाद पुरस्कार भी जीत चुके हैं। बी.आर.चोपड़ा ने मुस्लिम लेखक राही मासूम रजा को टीवी सीरियल ‘महाभारत’ की कहानी लिखने की जिम्मेदारी दी थी। क्यों? आइए जानते हैं। उनकी लेखनी की व्यस्तता का अंदाजा लगा सकते है वे एक साथ तीन-तीन स्क्रिप्ट लिखा करते थे। साथ ही वे अनेक छदम नामों से भी लेखन करते थे। धर्मवीर भारती जी और कमलेश्वर के वे बहुत शुक्रगुजार थे। राही मासूम रज़ा ने बीआर चोपड़ा के प्रतिष्ठित धारावाहिक महाभारत की पटकथा और संवाद लिखे थे, जिससे यह धारावाहिक हर घर तक पहुंचा। एक मुस्लिम होने के बावजूद, रज़ा ने स्वयं को गंगा का बेटा कहते हुए इस महाकाव्य को लिखने का अपना अधिकार जताया था, क्योंकि उन्हें भारतीय संस्कृति की गहरी समझ थी। हालांकि उन्हें समय की कमी के कारण शुरुआत में मना किया था, लेकिन जब उनके महाभारत लिखने की खबर छपी और विरोध हुआ, तो उन्होंने इसे लिखने का बीड़ा उठाया और अपनी लेखनी से इसे अमर बना दिया। लेकिन जब यह खबर छपी और इस पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई, कि एक मुस्लिम से महाभारत जैसा महाकाव्य कैसे लिखवाया जा सकता है, तो रज़ा का आत्म-सम्मान आहत हुआ। "मैं गंगा का बेटा हूँ": इस विरोध को सुनकर रज़ा ने तुरंत बीआर चोपड़ा से संपर्क किया और कहा, "महाभारत मैं ही लिखूंगा, क्योंकि मैं मां गंगा का बेटा हूँ"। वह अलीगढ़ विश्वविद्यालय और गंगा मां को अपनी तीन माताओं में से एक मानते थे। लिखने का अधिकार: रज़ा अपनी इस बात से दृढ़ थे कि उन्हें भारतीय संस्कृति की गहरी समझ है और मुझसे बेहतर इसे कोई नहीं लिख सकता। उन्होंने यह साबित किया कि धार्मिक आधार पर किसी के काम को आंकना गलत है। लोकप्रियता: उन्होंने महाभारत के संवाद को इतनी शिद्दत से लिखा कि वह आज भी याद किए जाते हैं और घर-घर में पहुंचाए, जिसने भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ा। मैं समय हूं... और आज महाभारत की कथा सुनाने जा रहा हूं'. इन शब्दों को भला कौन भूल सकता है ? 90 के दशक में हिंदुस्तान का कोई ऐसा घर नहीं होगा, जिनके यहां रविवार को ये आवाज न सुनाई दी हो। इस पौराणिक धारावाहिक को लिखा था लेखक राही मासूम रज़ा ने, जिनकी स्याही से लिखे एक-एक अल्फाज का करिश्मा ऐसा था कि ‘महाभारत' लोगों के घरों तक पहुंची. इससे पहले सिर्फ लोगों ने इसके बारे में पढ़ा ही था. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि जिन्होंने दूरदर्शन पर आई ‘महाभारत' को देश के घरों तक पहुंचाने का काम किया उन्होंने इसकी कहानी और डायलॉग लिखने से मना कर दिया था. जी हां, आपने सही पढ़ा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म प्रोड्यूसर और डायरेक्टर बीआर चोपड़ा ने धारावाहिक ‘महाभारत' की कहानी के लिए राही मासूम रज़ा से संपर्क किया था. लेकिन, उन्होंने समय की कमी होने का हवाला देकर इसे ठुकरा दिया था। बताया जाता है कि जब राही मासूम रज़ा को महाभारत लिखने का ऑफर दिया गया. उस दौरान उनकी गिनती इंडस्ट्री के नामी राइटरों में होती थी. उनकी मसरूफियत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि वह एक साथ तीन-तीन कहानियों पर काम करते थे. हालांकि, महाभारत को मना करने के बाद बीआर चोपड़ा के घर चिट्ठियों का अंबार लग गया, जिनमें लिखा गया था कि क्या महाभारत को लिखने के लिए हिंदू लेखक नहीं हैं. हालांकि, जब ये खबर राही मासूम रज़ा तक पहुंची तो उनका पारा चढ़ गया और उन्होंने तुरंत बीआर चोपड़ा को महाभारत की कहानी लिखने के लिए बोल दिया. राही मासूम रज़ा ने बीआर चोपड़ा से कहा था- मैं ही महाभारत लिखूंगा, क्योंकि मैं मां गंगा का बेटा हूं. राही ने ये बात ऐसे ही नहीं कही थी. इसके पीछे एक बड़ी वजह यह थी कि उन्होंने कहा था कि उनकी तीन माएं थीं, नफीसा बेगम, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और गंगा, जो गंगौली में बहती थी। पटकथा और संवाद इन सबके अलावा राही ने फ़िल्मों के लिए लगभग तीन सौ पटकथा भी लिखे थे। इन सबके अतिरिक्त राही ने दस-बारह कहानियां भी लिखी हैं। जब वो इलाहाबाद में थे तो अन्य नामों से रूमानी दुनिया के लिए पन्द्रह-बीस उपन्यास उर्दू में उन्होंने दूसरों के नाम से भी लिखे हैं। उनकी कविता की एक बानगी देखिये जिसे “मैं एक फेरी बाला” से साभार उद्धृत किया गया है- मेरा नाम मुसलमानों जैसा है / मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो। मेरे उस कमरे को लूटो / जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के /कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है / मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,/ मेरे लहू से चुल्लु भर कर
महादेव के मुँह पर फैंको, / और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो, / ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढ़ा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।
राही लगातार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट तथा नियमित स्तंभ भी लिखा करते थे, जो व्यक्ति, राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति और समाज, धार्मिकता तथा मीडिया के विभिन्न आयामों पर केन्द्रित हैं। अपने समय में राही भारतीय साहित्य और संस्कृति के एक अप्रतिम प्रतिनिधि हैं। उनका पूरा साहित्य हिन्दुस्तान की साझा विरासत का तथा भारत की राष्ट्रीय एकता का प्रबल समर्थक है। राही मासूम रज़ा का लिखने का अंदाज हमेशा से ही जुदा रहा. उनकी लिखी ये शायरी “इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई, हम न सोए रात थक कर सो गई”, इस बात को बखूबी बयां करती है। उनके काम के लिए भारत सरकार ने पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है. निधन:15-03-1992 (64 वर्ष की आयु) में मुंबई में हुआ। राही जैसे लेखक कभी भुलाये नहीं जा सकते। उनकी रचनायें हमारी उस गंगा-जमुना संस्कृति की प्रतीक हैं जो वास्तविक हिन्दुस्तान की परिचायक है। उनकी वसीयत में गंगा की गोद में सुला देने वाली बात थी । परंतु उनकी मृत्यू मुंबई में होने के कारण वही पास एक छोटी नदी के सूपुर्द कर दिया है यह कह कर की मैं तुम्हारी गोद में खुद को सौपने आया हूँ ।
चिरंजीव
लिंगम चिरंजीव राव म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)


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