फादर कामिल बुल्के जन्म-01-09-1909 - जयंती 01-09-2025
फादर कामिल बुल्के जन्म-01-09-1909 - जयंती 01-09-2025
रामचरितमानस व तुलसीदास से प्रेरित होकर बेल्जियम देश के ईसाई मिशनरी से जुड़े कामिल बुल्के जी को भारत की भूमि से इतना लगाव हो गया की वे यहीं के होकर रह गए।
“धन्य जनमु जगतीतल तासू/ पितहि प्रमोद चरित सुनि जासू।“ (अर्थात- उस बेटे की जीवन सफल है जिसका यश या कीर्ति सुनकर-पिता को आनंद या गर्व हो। ) बाबा कामिल बुल्के जी को भारत/हिन्दुस्तान आने के लिए प्रेरित करने वाली यह चौपाई जो उन्होंने जर्मनी भाषा में सुनी थी उसके पश्चात नके विचार कुछ इस तरह रहेः “अनेक भाषाओं का साहित्य पढ़ा लेकिन पिता-पुत्र के रिश्ते का ऐसा ऊँचा आदर्श किसी भाषा में नहीं मिला। इसने मेरे जीवन की दिशा मोड़ दी और मेरी कर्मभूमि का चुनाव कर दिया। विश्व साहित्य में माता-पिता के संबंधों की बहुत चर्चा हुई है, किन्तु पिता-पुत्र संबंधों की ऐसी व्याख्या भारत के भक्त कवि तुलसीदस ही कर सकते है। ” फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के पश्चिम में स्थित फ्लैण्डर्स प्रांत के रम्सकपैल गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम अदोल्फ और माता का नाम मारिया बुल्के था। बुल्के परिवार मुलतः भूमिधरों का था लेकिन इनके घर यह पहली संतान के रूप में पैदा होते समय परिवार घोर संकटो से गुजर रहा था। पूर्वजों की संपति का नाश उनके फिलिप दादा जी के विलासिता वाली आदतों के कारण खत्म हो चुकि थी। पश्चात रम्सकपैले का घर भी बिक गया। परिवार बिखर गया। पिता अपनी ससुराल के गाँव लिस्सेवेगे आकर बस गए, यहीं पर बुल्के जी का लंबा समय बीता। उनके संन्यास ग्रहण करने के निर्णय से परिवार के लोग उन्हें मनाते रहे की वे ऐसा न करे विशेष कर माँ ने बहुत कहा पर वे अडिग रहे। कामिल चार भाई बहन थे ,उनके सिवाय जूलियन, गैब्रियल और रोबर्ट। प्रथम पुत्र पर माँ का प्रेम बहुत अधिक रहा इस बात के प्रमाण के रूप में उनके पत्रों के अंत मे उनका यह उल्लेख “ माँ, जो तुम्हें कभी भूलती नहीं।” उनके आभाव व संधर्षमय जीवन के अलग अलग पड़ाव से गुजरते हुए उन्होंने जिस रास्ते का चयन किया वह भारत की धरती में आकर समाप्त होती है। परंतु इस यात्रा के पहले उन्होंने जिस संधर्ष के साथ अपनी शिक्षा पूर्ण करने के लिए कई स्थानों पर जाना पड़ा और आखिर में सफलता हाथ लगी जो उनके अदम्य साहस का नतीजा था। बुल्के ने ल्यूवेन विश्वविद्यालय से सिविल इंजनीयरिंग की डिग्री हासिल कर ली थी।1930 में वे एक ग्रेजुएट बन गए। नीदरलैंड के वलकनबर्ग(1932-1934) में अपना दार्शनिक प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद बेल्जियम से भारत के लिए 1934 में निकल गए और 1934 में भारत मुंबई पहुंचे। दार्जिलिंग में एक संक्षिप्त प्रवास के बाद उन्होंने गुमला(वर्तमान झारखंड़) में पाँच साल तक गणित पढ़ाया। वहीं पर हिंदी, ब्रजभाषा व अवधी सीखी। 1938 में सीतागढ़/हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखा। यह था कि इन्होंने हिंदी सीखने के लिए अपना आजीवन जुनून विकसित किया। यह उनके विचार थे जब वे भारत आये वर्ष 1935 में उन्हें यह देखकर आश्चर्य होना स्वाभाविक था और दुख भी हुआ कि अनेक शिक्षित लोग भारत के भारतवासी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से अंजान और इंगलिश मे बोलना गर्व की बात मानते/समझते थे। उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्धारण करते हुए कहते है, कि मैं इन लोगों की भाषा को सिध्द करूंगा। एक ईसाई जो मिशनरी के लिए आया था उनका विश्वास-हिंदी-तुलसी का ऐसा भक्त जिसने भारत को अपनी कर्म स्थली बना ली। फादर कामिल बुल्के, बेल्जियम से भारत एक ईसाई मिशनरी के रूप में आए थे. उन्होंने 1935 में भारत में प्रवेश किया और रांची में बस गए, जहाँ उन्होंने हिंदी, संस्कृत और भारतीय विद्या में महारत हासिल की. उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, भारतीय संस्कृति और हिंदी से जीवन भर प्यार करने वाले फादर कामिल बुल्के बेल्जियम के ईसाई मिशनरी थे. देश में आज भी भाषा के झगड़े हो रहे हैं, लेकिन विदेश से भारत आए फादर कामिल बुल्केम ने हिंदी में वो काम किया, जो किसी हिंदी के विद्वान ने भी नहीं किया. उन्हों ने ‘अंग्रेजी हिंदी शब्द कोश’ ही नहीं बनाया बल्कि विश्वदविद्यालयों में हिंदी में शोध कार्य शुरू करवाए. फादर कामिल बुल्के को भारतीय संस्कृति और भाषाओं से गहरा लगाव था. भारतीय रहन-सहन, भाषा, बौद्धिक संपन्नता के वे कायल थे।
इन्होंने ब्रहमवैज्ञानिक प्रशिक्षण (1939-42) भारत के कुर्सियांग से किया,1940 में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से विशारद की परीक्षा पास की जिसके दौरान इन्हें पुजारी की उपाधि दी गयी (1941 में)। भारत की शास्त्रीय भाषा में इनकी रुचि के कारण इन्होंने कोलकत्ता विश्वविद्यालय से (1942-44) से संस्कृत में मास्टर डिग्री और आखिर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से (1945-49) में हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की, इस शोध का शीर्षक था “राम कथा की उत्पत्ति और विकास ।” इस शोध के दौरान व इसकी प्रस्तुति में जो कठिनाई आई और जिस तरह इसका निराकरण हुआ वह एक इतिहास बना।
1950 में वह पुनःरांची आ गए।संत जैवियर्स महाविद्यालय में इन्हें हिंदी व संस्कृत का विभागाध्यक्ष बनाया गया। सन् 1950 में बुल्के ने भारत की नागरिकता ग्रहण की। इसी वर्ष वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की कार्यकारिणी के सदस्य नियुक्त हुये। सन् 1972 से 1977 तक भारत सरकार की केंद्रीय हिन्दी समिति के सदस्य बने रहे। वर्ष 1973 में इन्हें बेल्जियम की रॉयल अकादमी का सदस्य बनाया गया।
कामिल बुल्के और रामचरितमानस मुख्य लेख:रामकथा उत्पति और विकास पेशे से इंजनीयर रहे बाबा बुल्के का वह ब्यौरेवार तार्किक वैज्ञानिकता पर आधारित शोधसंकलन "रामकथा: उत्पत्ति और विकास" करता है कि राम वाल्मिकि के कल्पित पात्र नहीं, इतिहास पुरूष थे। तिथियों में थोड़ी बहुत चूक हो सकती है। बुल्के के इस शोधग्रंथ के उर्द्धरणों ने पहली बार साबित किया कि रामकथा केवल भारत में नहीं, अंतर्राष्ट्रीय कथा है। वियतनाम से इंड़ोनेशिया तक यह कथा फैली हुई है। इसी प्रसंग में फादर बुल्के अपने एक मित्र हॉलैन्ड के डाक्टर होयकास का हवाला देते थे। डा० होयकास संस्कृत और इंडोनेशियाई भाषाओं के विद्वान थे। एक दिन वह केंद्रीय इंडोनेशिया में शाम के वक्त टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक मौलाना जिनके बगल में कुरान रखी है, इंडोनेशियाई रामायण पढ़ रहे थे। होयकास ने उनसे पूछा, मौलाना आप तो मुसलमान हैं, आप रामायण क्यों पढते हैं। उस व्यक्ति ने केवल एक वाक्य में उत्तर दिया- और भी अच्छा मनुष्य बनने के लिये! रामकथा के इस विस्तार को फादर बुल्के वाल्मीकि की दिग्विजय कहते थे, भारतीय संस्कृति की दिग्विजय! इस पूरे प्रसंग पर विस्तार से चर्चा करते हुए डॉ. दिनेश्वर प्रसाद भी नहीं अघाते। 20 वर्षों तक वह फादर बुल्के के संपर्क में रहे हैं। उनकी कृतियों, ग्रंथों की भूमिका की रचना में डा० प्रसाद की गहरी सहभागिता रही है।
मुख्य प्रकाशन
(हिंदी) रामकथा:उत्पत्ति और विकास, 1949,,हिंदी-अंग्रेजी लघुकोश, 1955,अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश, 1968,,(हिंदी) मुक्तिदाता, 1972,(हिंदी) नया विधान, 1977,,(हिंदी) नीलपक्षी, 1978
फादर कामिल बुल्के ने हिन्दी के विकास में अनेक प्रकार से योगदान दिया। सबसे पहले, उन्होंने हिन्दी साहित्य के ज्ञान में वृद्धि की । उन्होंने राम कथा के आरंभ और विकास पर शोध-ग्रंथ लिखा । उन्होंने हिन्दी में बाइबिल का अनुवाद करके भारतवासियों को ईसाई धर्म पढ़ने का अवसर दिया ।
पहचान-भारत सरकार द्वारा 1974 में इनके साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला तीसरा सर्वोच्च सम्मान है, जो देश के लिये बहुमूल्य योगदान के लिये दिया जाता है। भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों में भारत रत्न, पद्म विभूषण और पदमश्री का नाम लिया जा सकता है।
हिंदी भाषा को जीवन समर्पित करने वाले विदेशी फादर कामिल बुल्के का सफर ,हिंदी भाषा को जीवन भर प्यार देने वाले विदेशी फादर कामिल बुल्के ने वो किया, जो किसी हिंदी प्रेमी ने नहीं किया. फादर कामिल बुल्के ने रांची को बनाया अपनी कर्मभूमि फादर कामिल बुल्के ने झारखंड को अपनी कर्मभूमि बनाया था. फादर कामिल बुल्के का झारखंड से गहरा संबंध था. भारत में उनका ज्यादातर समय झारखंड के रांची में बीता. यहीं उन्होंने हिंदी भाषा, साहित्य, और भारतीय संस्कृति पर अपने महत्वपूर्ण कार्य किए. बेल्जियम से आने के बाद पहले गुमला और फिर बाद में,, रांची आ गए। रांची विश्वविद्यालय में बने प्रोफेसर रांची, जो अब झारखंड की राजधानी है, में उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज में अपनी सेवाएं दीं. यहीं पर हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रति उनका रुझान बढ़ा। रांची में रहते हुए ही उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य की शिक्षा प्राप्त की, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से फादर कामिल बुल्के ने हिंदी में एम.ए. की उपाधि ली. बाद में वह रांची विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर बने। उनका शिक्षण बहुत लोकप्रिय था। छात्र और शिक्षक दोनों उनका सम्मान करते थे। कैसे विकसित हुआ हिंदी भाषा से प्रेम फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम में 1 सितंबर 1909 को बेल्जियम के रैम्सकापेल में हुआ. उन्होंने गणित और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. बाद में, उन्होंने जेसुइट समाज में शामिल होकर ईसाई धर्म का अध्ययन किया। 1935 में वह भारत आए। यहां की सभ्यता-संस्कृति और हिंदी से उनको ऐसा प्रेम हुआ कि फिर वह यहीं के होकर रह गए. फादर बुल्के ने हिंदी साहित्य में उनका योगदान अत्यंत ही प्रभावकारी, उपयोगी और सराहनीय है। हिंदी के प्रति उनका समर्पण अतुलनीय था. उन्होंने हिंदी को बहुत सरल और व्यवस्थित ढंग से सीखा और इसी भाषा में रचनाएं कीं। फादर कामिल बुल्के ने ‘अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश’ की रचना की. यह शब्दकोष आज भी हिंदी सीखने और अनुवाद करने वालों के लिए सबसे बड़ा मददगार है. उन्होंने तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ का गहन अध्ययन किया. ‘रामकथा: उत्पत्ति और विकास’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की जिसमें रामकथा के विभिन्न रूपों के बारे में विस्तार से बताया गया है। यूरोपीय देश बेल्जियम में जन्मे फादर कामिल बुल्के एक शिक्षक थे. भारत के गुमला में करीब 2 साल तक शिक्षक के रूप में काम करने के बाद वे रांची आ गए. बाद में रांची ही उनकी कर्मभूमि बन गई. रांची आज झारखंड की राजधानी है. इन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन1974 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। मेरी जानकारी में विदेश से दो व्यक्ति भारत में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए आये थे, लेकिन उन्होंने इस देश के धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया। एक थे डब्ल्यू एच मैक्ल्योड (न्यूजीलैंड से) और दूसरे फादर कामिल बुल्के (बैल्जियम से)। फ़ादर कामिल बुल्के के बारे में मुझे एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध हुई, जिसे मुझे लगता है कि हम भारतियों की जानकारी में आना बहुत आवश्यक है। उनकी एक विशेष उपलब्धि यह रही कि उन्होंने 1950 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएच डी की थी। उनके शोध का विषय "रामकथा : उत्पत्ति और विकास" था जिसे उन्होंने अंग्रेज़ी में नहीं अपितु हिंदी में लिखा था। फ़ादर कामिल बुल्के की इस साहसिक पहल के कारण इलाहाबाद विश्वविद्यालय को अपने शोध के नियम बदलने पड़े। इसके बाद देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी हिंदी और भारतीय भाषाओं में शोध प्रबंध लिखने की अनुमति प्रदान की जाने लगी। हिन्दी के लिए ऐसे ही योद्धाओं की आवश्यकता है, जिनके कार्य सबके लिए एक मानक बन जायें। उनके अनुसार “मुझे अपनी मातृभाषा फ्लैमिश की तरह ही हिंदी से बहुत प्रेम है। और वे कहते है- मैं संविधान से मान्यता प्राप्त राजभाषा को उसके सिंहासन पर देखना चाहता हूँ। जब तक हिंदी को उसके घर में सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक बाहर भी उसे कोई नहीं पूछेगा आजादी के बाद हिंदी राजनीति का शिकार हो गई है। प्रजातंत्र से सबको अपने अपने वोटों की चिंता है-देश का गौरव कहीं हाशिये पर चला गया है। अँग्रेजी भाषा हिंदी ही नहीं हिन्दुस्तान की सारी भाषाओं का अस्तित्व का संकट बन गई है। “ आज भी इनके कथन की सत्यता प्रमाणित करने की जरूरत नहीं है। 9अगस्त 2018 को विश्व आदिवासी दिवस पर जब मैं हर वर्ष की तरह राँची में उपस्थित था। मेरा यह क्रम विगत चार-पाँच वर्षो से चल रहा था। उस दौरान मुझे मेरे ही एक परम मित्र आदरणीय डॉ.महादेव टोप्पो जी आजकल इनकी जिम्मेदारी में साहित्य अकादमी के सदस्य(झारखंड़) का भी कार्य़भार है। उनके साथ सेंट जैवियर्स महाविद्यालय की एक संक्षिप्त यात्रा का सौभाग्य मिला इस तरह हमें यह भी सौभाग्य मिला की –डॉ.महादेव जी इसी कॉलेज के भूतपूर्व छात्र भी रहे। और उस स्थान पर हमारी मुलाकात आदरणीय डॉ.इम्मानुअल बक्सला जी से मिलने का मौका वहाँ मिला (जिसका एक साक्षात्कार आप यू-ट्यूब के ललनटॉप चेनल में देख सकते है जो ललनटॉप के एक प्रतिनिधि ने लिया था) उनके माध्यम से बहुत सी बातों का पता चला क्यों कि इसी जगह “बुल्के शोध संस्थान” भी है। मैं व्यक्तिगत बहुत सारी जानकारी से अवगत हुआ इनके व्दारा बताए अनेक बातों मे बुल्के जी का हिंदी के प्रति समर्पण उनके शोध ग्रंथ के माध्यम से हम सभी को मिल जाता है । यह शोध थिसिस हिंदी में प्रस्तुत पहली है। जो की हिंदी में लिखी गई है और उसको मान्यता मिली। इसके पहले तक सभी अंग्रेजी में लिखे शोध ग्रंथों को ही मान्यता थी। यह संधर्ष उस कर्मठ व हिंदी प्रेमी बुल्के जी का दृढ़निश्चय ने उसके तब तक के नियम को बदलने के लिए बाध्य होना पड़ा विश्वविद्यालय को जो हिंदी के लिए हम सभी को इस महान व्यक्ति का ऋणी होना चाहिए । इस तरह उनके जीवन में उनके संधर्ष के अनेक आयाम उन्होंने चर्चा की । भारत की नागरिकता के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ा जब उन्हें यह वर्ष1951 में मिली तो वे अतयंत ही प्रसन्न थे। बक्सला जी ने बुल्के जी के चेहरे पर इतनी खुशी देखी जिसकी तुलना वे पद्मभूषण मिलने पर हुई खुशी से करते है। आगे उनके पास जो भी कार्य होता था उसे वे पूरी तत्परता से पूरा करके ही चैन लेते थे। उनकी मृत्यु तक साथ रहे उनके बहुत करीबी डॉ.दिनेश्वर प्रसाद जी को उन्होंने अपनी बाईबल के रूपांतरण को जो वो अपने जीवनकाल में पूरा न कर सके उनको सौंपा क्योकि वे ही सक्षम थे और उन्होने बुल्के जी को शब्दकोष बनाते समय अत्यधिक सहयोग भी दिय़ा था विभिन्न भाषाओं के जानकार का होना इस कार्य में सहयोगी बना साथ डॉ.दिनेश्वर प्रसाद जी का साथ । डॉ.बक्सला जी ने बताया की उनके पास जो कार्य उस समय था । वह 14,000 (चौदह हजार किताबों) की देख रेख जिसे बुल्के जी छोड़ गए थे उनको सूची बध करते हुए पुस्तकालय में रखने का जिम्मा था जिसे उन्हें पूरा करने में 6 महीनों से भी अधिक का समय लगा। । आजकल ये सारी किताबें शोधसंस्थान की शोभा है। जिसमें अनेक बहुमूल्य किताबें भी है जहाँ पर आज भी सभी आकर इसका उपयोग करते है। जिस जगह पर यह पहले थी अब वो जगह जहाँ बुल्के जी बैठा करते थे शोधार्थियों व अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठने वाले परिक्षार्थियों के लिए बैठकर पढ़ने कि लिए बनाया गया है जो सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। वे अपने अनुभव बताते है कि जैसे ही वे सुबह 7 से 7.15 तक अपने कुछ कामों के लिए इसे खोलते है ,छात्र वहाँ पहले सी उपस्थित हो जाते है। मृत्युपर्यन्त हिंदी तुलसी और वाल्मिकि के भक्त रहे। वे कहते थे कि संस्कृत महारानी है, हिन्दी बहूरानी और अंग्रेजी को नौकरानी। उनका योगदान अमर है. फादर कामिल बुल्के मानव मात्र की सेवा और आध्याेत्मिकता के भाव का ऐसा प्रतीक हैं, जिन्हेंम हम श्रद्धा से याद करते हैं. फादर कामिल बुल्के का जीवन भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक है. विदेशी होते हुए भी उन्होंने हिंदी के विकास में योगदान दिया. फादर कामिल बुल्के भारत में 47 वर्षों तक रहे. वे 1935 में बेल्जियम से भारत आए और 1982 में 73 वर्ष की उम्र उनका निधन हो गया. 17 अगस्त 1982 में गैगरीन के कारण एम्स, दिल्ली में इलाज के दौरान मृत्यु हो गयी। फादर कामिल बुल्के का 17 अगस्त 1982 को निधन हो गया। ऐसे महान हिंदी सेवी का हमारी विनम्र श्रध्दांजलि।
चिरंजीव
लिंगम चिरंजीव राव म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892
स्वतंत्र लेखन (संकलन व लेखन)


नियमों को ताक पर रख इलाज, प्रशासन ने कसा शिकंजा
बंगाल में तनाव: सुभेंदु सरकार बोले- गाड़ी पर हमला, जान को खतरा
शिक्षकों के हक में हाई कोर्ट, राज्य सरकार को नहीं मिली राहत
वोट डालने पहुंचे लोग, लेकिन छिड़ गया संघर्ष: बंगाल चुनाव में कई जगह हिंसा और हंगामा
मल्लिकार्जुन खरगे को लेकर BJP सांसद का विवादित बयान, मचा बवाल


