दुष्यंत कुमार त्यागी जन्म 01-09-1933 - जयंती 01-09-2025

(समय की माँग का शायर..। समाज की नब्ज पहचानता शायर..। हिंदी की गज़लों का शायर..।अपनो का शायर..।दोस्तों का शायर..। ऐसा था अपने हिंदुस्तान का ये शायर.।) “”आम आदमी के हक के सरोकार के हिंदी गजलकार”” आपका जन्म 01/09/1933 को बिजनौर जिले के राजपुरनवाद गाँव ,उत्तरप्रदेश मे हुआ था । जब तक जिए शान से जिए हर त्यौहार उनके मौज-मस्ती के लिए कम पडती थी। होली से उनका विशेष लगाव था । सत्ता के गुमान से टकराने वाले शायर दुष्यंत कुमार की आज जयंती है । आज ही के दिन 1933 में जन्मे दुष्यंत ने ग़ज़ल को नया तेवर दिया और आम लोगों की समझ में आने वाली जुबान में शायरी की । हिंदी ग़ज़ल में उनकी उपस्थिति इतनी सशक्त रही है कि हिंदी ग़ज़ल का वर्गीकरण दुष्यंत से पहले और दुष्यंत के बाद के रूप में होता है । दुष्यंत मूलतः हिंदी कवि थे और उनके तीन कविता संग्रह सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे और जलते हुए वन का वसंत में उनकी कविताएं हैं । एक कंठ विषपायी उनका प्रसिद्ध काव्य नाटक है ।अत्यंत ही बहुचर्चित “साये में धूप” उनकी ग़ज़लों का संग्रह है जिसने उन्हें अपार लोकप्रियता दी और हिंदी साहित्य के दस सबसे लोकप्रिय किताबों में से एक है। वर्तमान हिंदी ग़ज़ल दुष्यंत से प्रभावित रही है। और आज भी प्रेरणा के लिए उन्हीं की ओर देखती है । बेलाग लिखना और बेबाक बोलना दुष्यंत की ख़ासियत थी और बयालीस वर्ष की आयु में उनका जाना एक रचनाकार का असमय अंत था लेकिन उनकी लिखी हुई कई काव्य पंक्तियां आज मुहावरा बन चुकी हैं और जिन्हें पढ़ते सुनते पीढियां जवान हो रही हैं ।
“कौन कहता है आसमाँ में सुराख़ नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों ।“
अक्सर इन पंक्तियों को हम सुनते हैं या बोलते हैं बग़ैर जाने कि यह दुष्यंत कुमार का लिखा है या फिर।।
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए /  इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
ये पंक्तियां किसी भी सभा, जलसे या जुलूस में दोहराई जाती हैं । बहरहाल साहित्य में दुष्यंत
कुमार की वैचारिक उपस्थिति आज भी उतना ही प्रासंगिक और उतनी ही प्रभावी जितनी उनके जीवनकाल में थी । जबकि 1975 में उनका निधन हुआ । उनकी दो गजलें जो मुझे अच्छी लगती हैः
(1)
एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है

कल नुमाइश में मिला चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला हिंदुस्तान है

सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर
झोले में उसके पास कोई संविधान है

मसलहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत तू अभी इंसान है

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो
एक अँधेरी कोठरी में रोशनदान है

मुझ में रहते हैं करोड़ो लोग चुप कैसे रहूँ
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

(2)
तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़ुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर
तु इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं

ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं

                      

दुष्यंत कुमार

आम इंसान के सरोकार की दुनिया मे जीने के हर अंदाज निराले रहा करते थे ऐसे ही शायर दुश्यंत कुमार का एक छोटा सा जीवन लम्बें समय के अनुभव छोड गया हर एक शेर उनका आजकल हर जगह गुंजने लगा है। और कई संदर्भों मे इनके उपयोग का चलन तो एक आम बात हो गई है। इस शायर के जीवन के अनेक पहलुओं से गुजरने का मौका उनकी जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम भोपाल में उनके संग्रहालय में मिला जहाँ उनकी पांडुलिपियों को आम जन के लिए प्रदर्शित किया गया था देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहीं उनके परिवार जनों से भी मुलाकात हुई।  समय की माँग का शायर..। हिंदी की गज़लों का शायर..।अपनो का शायर..।दोस्तों का शायर..। ऐसा था अपने हिंदुस्तान का ये शायर.। हिंदी के लोकप्रिय कवि-नाटककार-लेखक ।अपनी गजलों के लिए बहुत मशहूर हुए। इनकी गजलो की खास बात यह थी की उनकी जो गजले आम जनता के दर्द को समेटते हुए चलती है। संघर्ष, विडंबना, विद्रुपता, सामाजिक व राजनीतिक विसंगतियों को अत्यंत ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता रखती है। जिसका सीधा असर पाठक के मनोमश्तिष्क पर गहरा असर छोडता है । यथार्थ में उनके जीवन के कटु अनुभव ही उनकी गजल के अंग बनकर उभरते है। इन सभी बातो के पीछे उनकी मात्र भावुकता ही नहीं वर्ना बौध्दिक नजरिया भी था। प्रगतिशील धारा के प्रमुख कवि जिनके जीवन के आयामों लेखन को मिला बहुत ही कम समय जिसमें उनकी कृतियों में प्रमुख हैः-सूर्य का स्वागत, आवाजो के घेरे, जलते हुए वन का बसंत और ‘’साये मे घूप’’ जिसने हिंदी गजल की दुनिया में इतनी शौहरत पायी उतनी शायद ही किसी नें आधुनिक साहित्यकारों मे बहुत से नाम आज भी चर्चीत है । उपन्यासों में छोटे-छोटे सवाल, दुहरी-जिंदगी, आँगन में एक वृक्ष इसके अलावा उनका एक बहुचर्चीत एकाकी संग्रह ‘’मन के कोण’’ भी है। ऐसा कहा सुना जाता है कि, हिंदी मे इनकी ग़ज़ल से पहले भी कुछ साहित्यकारों ने लिखा था पर कोई खास नहीं और वे सभी अपने लेखन क्षेत्र के एक मुकम्मल मुकाम तक पहले ही से आ गये थे पर हिंदी मे उनके ग़ज़लो की दखल ने बहुत कुछ नहीं दिया। यह क्रम चलता रहा पर। दुष्यंत कुमार जी की एक किताब जब प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था “साये मे घूप” हिंदी गजल की एक बहुत ही ख्यातिलब्ध कृति मानी जाने लगी। इस कृति ने यह भी साबित कर दिया गजल केवल रूमानियत या श्रृंगारिता के लिए नही बनी है। गजलकारों ने सपनो की व्याख्या के साथ दुख, दर्द को लेकर भी लोगों तक पहुँचने की उत्कंठा थी। फिर अपने तेवर के साथ सामाजिक सरोकारों से परिपूर्ण हिंदी गजल को नये आयाम देते हुए भाषिक विशिष्ठता भावगत आधुनिकता और शिल्पगत नव्यता के साथ लेखन होने लगा नये-नये प्रयोग। गजलकार दुष्यंत जी सत्तर अस्सी के दशक मे परंपरा के साथ एक नये संबंघ की स्थापना की जिसमें मानवीय सम्बंधों के साथ सच्चाई की सूक्ष्मता को प्रमुखता देते हुए जिस आकर्षण को तैयार किया था वो आज भी अपनी विरासत के साथ इनकी देन मानी जा सकती है ।इन्होंने मनुष्य जीवन के यथार्थ से जोडने का काम किया जिसमें राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यक्तिगत, नैतिक विषयों को अपनी गजल का हिस्सा बनाया और यह प्रयोग उस समय की माँग भी थी जिसमें वे सफल रहे ।समाज के अंदर पनप रही बौखलाहट में चेतना का संचार हुआ । इनके हर ऐसे प्रयोगों ने एक मिसाल कायम करते हुए गजल को जिस ऊचाँई तक लाकर उसे आम इंसान की वाज बनाया तारीफेकाबिल रही । ‘’कहाँ तो तय था चरागाँ हर घर के लिए / कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए ।’’कुछ इस तरह की बातों का समावेश उनकी लेखनी मे होने लगा जो तब भी और आज भी सामाज की बदलती परिस्थितियां आजादी के बाद राजनेताओं के झूठे वादे जनता का मोहभंग करती स्थिति को उजागर करती आ रही है। इस तरह इनके अंदाज मे जो तेवर मिलते है इससे इनके आम आदमी के सरोकार के गजलकार ही नजर आते है । 
‘’हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए / इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।‘’
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो / हो कहीं तो आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।“
कितना सहेगा इंसान की उसको ऐसी सौगातों से नवाजा जाए ताकि वो जीने के अरमान सजा के रखे -साथ ही सामान्य जनता अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। हर दिन की घुटन से घुटता जा रहा और उस स्थिति को समझने वाला कोई नही है, इन लाईनों में सामाजिक क्रांति के लिए एक दिशा मिलती है और उम्मीद के नये व्दार का आगाज महसूस होता है। ऐसे अनेको संधर्षो से जूझते आम इंसान को समाज के अंदर जिस तरह जीने को मजबूर होना पड रहा था उसकी बातों को इनकी गजलों ने बहुत कुछ कह डाला। जिस तरह कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के दौर के उपन्यासों मे पूंजी वादी वर्ग के साथ मजदूरों का शोषण के विरूध संधर्ष मिलता रहा, उसी तरह ,युवा भारत में भी आजादी के बाद की स्थिति में भी इसको देखना हमारे लिए कितना शर्मनाक होगा। आजादी के बाद की सामाजिक स्थिति के बारे में पूंजीवादी वर्ग व्दारा मजदूरों का जो शोषण हो रहा था का एक यथार्थ चित्रण, सामाजिक व्यव्स्था के दूषित वातावरण का प्रभाव जो समाज में पूंजीवादी व्यव्स्था के कारण शोषित और शोषक वर्ग का निर्माण जिसके कारण विकास की जगह पतन दिखाई दे रहा थाः-
‘’यहाँ दरख्तो के साये में घूप लगती है / चलो यहाँ से और उम्र भर के लिए।‘’
अपनी गजलों में वे राजनीति के चरित्र पर प्रहार करते है ,जिसमें छल है धोखा है,फरेब है ,वादा खिलाफी है, अंधेरगर्दी है, झूठ ही झूठ का साम्राज्य पनप रहा है। सच तो यह है कि अपनी गजलों में इन्होने अच्छे खासे पैतरे अपनाते रहे , कभी सीधे तो कभी उलटे, कभी छाती ठोक के जैसेः-
‘’ मत कहो आकाश मे कुहरा धना है / यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
 इस सडक पर इस कदर कीचड बिछी है / हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।‘’
उस दौर में आपात काल की स्थिति का भी सामना देश में यहाँ की जनता ने जो सहा जिसके हिस्से मे इतना अधिक आया वह तो आम आदमी ही था। और जिसने देखा महसूस किया था । उसका असर भी इनकी गजलों मे उस समय के तेवर भी हमें दिखाई देते है। दुष्यंत कुमार ने हर नब्ज का आकलंन व हर नयी परिस्थितियों से उत्पन्न नये यथार्थ को भी पहचानते रहे और अपनी बात को कहने में कभी भी नहीं चुकते थे और ,नये मानव के साथ उपजे उमंगों को आत्मसात कर आत्मविश्वास को बढाने का काम किया। एक सजग और संधर्षशील गजलकार होने के नाते उन्होंने सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों को और उससे निर्मित परिस्थितियों को पूरी ईमानदारी से अपनी गजलों में रखा है। उनका नजरिया एक सामाजिक विश्लेषक की तरह बहुत ही करीब से जानने और सोचने के कारण उनकी गजलों में इसके कारण जीवन की यथार्थता को महत्व देते हुए अनकी गजलों मे हमेशा आशावादी दृष्टिकोण भी रहा हैः-‘’केवल हँगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं / मेरी कोशिश है की सूरत बदलनी चाहिए’’ दुष्यंत कुमार एक अकेले गजलकार है ,जिनके शेरों और गजलों में बच्चों जैसी मासूमियत, बेपनाह निश्छलता और सहज मानवीय रिश्तों की सोंधी-सोंधी खुशबू रहती है। इनकी गजलों में जीवन के ठोस यथार्थ से परिचय हुआ ।दुष्यंत कुमार ने अपनी गजलों मे जो यथार्थ की नींव रखी वो धीरे-धीरे पुख्ता होने लगी आज भी अनेक गजलकारों के शेरों में यथार्थ के झुकाव को देखा जा सकता है। सामाजिक विद्रुपताओं और राजनीतिक छल प्रपंच को काव्यरूप दिया जा रहा है । दुष्यंत के यहाँ प्रश्न ही प्रश्न है, अंतरव्दंव्दो के विराट रूप से साक्षात्कार होता है। जीवन के संधर्ष है, ताप है। उनकी कवितायें ही इसका प्रमाण है। कुअंर बैचेन के शब्दों में कहा जा सकता है कि ‘’वास्तव में दुष्यंत कुमार की गजलो मे जो आग है वह उस व्यक्ति की आग है जो सामाजिक विसंगतियों एवं विद्रुपताओं को घ्यान से देखकर अपने समाज के बीच रहकर उसकी पीडा को पूरी तरह समझते हुए भीतर ही भीतर सुलग रही है।“ खुद दुष्यंत का आत्मालोकन अगर हम देखते है तो पाते है(जलते हुए वन का बसंत की भूमिका से) ‘’मेरे पास कविताओं के मुखौटे नहीं है ।अंतर्राष्ट्रीय मुद्रायें नहीं है और अजनबी शब्दों का लिबास नहीं है ।मैं एक साधारण आदमी हूँ और इतिहास और सामाजिक स्थितियों के संदर्भ मे साधारण आदमी की पीडा, उत्तेजना, दबाव, अभाव और उसके संबंधों की उलझनों को जीता और व्यक्त करता हूँ।’’
साये में घूप के चंद शेरः- जिसमे इनकी लेखनी के तेवर से हमारी मुलाकात होती है ।

‘’यहाँ तो सिर्फ गुंगे और बहरे लोग बसते है/खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा।‘’

‘’कैसी मशाले ले के चले तीरगी मे आप / जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही।‘’

‘’हाथों मे अंगारे को लिए सोच रहा था / कोई मुझे अंगारो की तासीर बताए।‘’ 

“”यहाँ कौन देखता है,यहाँ कौन सोचता है,/कि ये बात क्या हुई है जो मैं शेर कह रहा हूँ””    

“’मेरे दिल पे हाथ रक्खों मेरी बेबसी को समझो/ मैं इधर से बन रहा हूँ मैं इधर से ढह रहा हूँ’’ इनके जीवन के संधर्ष के बहुत से उदाहरण है ,पर इन्होंने इसे कभी अपने पर कहीं असर होने नहीं दिया बिंदास जीवन जीने वाले त्यागी जी मशहूर त्यौहार होली तो उनका बहुत ही प्रिय त्यौहार रहता था । इनका महाप्रयाण 30-12-1975 को हुआ बहुत ही छोटी उम्र में हमें छोडकर चले गये ।सादर नमन के साथ विनम्र श्रध्दांजलि।

चिरंजीव (लिंगम चिरंजीव राव0 
म.न.11-1-21/1 ,कार्जी मार्ग ,इच्छापुरम, 
श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)532 312
स्वतंत्र लेखन(संकलन व लेखन)