‘‘लोकतांत्रिक स्वतंत्रता’’ से ‘‘गणतंत्र’’ तक का सफर। ‘‘आदिम’’ (आदमी) से ‘‘इंसान’’ तक का सफर
राजीव खण्डेलवाल (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार)
‘‘लोकतांत्रिक स्वतंत्रता’’ से ‘‘गणतंत्र’’ तक का सफर। ‘‘आदिम’’ (आदमी) से ‘‘इंसान’’ तक का सफर
संविधान की आवश्यकता क्यों?
आज ही हमने 76 वां गणतंत्र दिवस हर्षोल्लास से मनाया हैं, जिस सफर का प्रारंभ 15 अगस्त 1947 को हुआ, जब भारत स्वतंत्र होकर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की स्थापना हुई। ऐसा नहीं कि स्वतंत्रता के पूर्व देश में लोकतंत्र नहीं था। कुछ लोकतांत्रिक स्वरूप जरूर था। परंतु वह ब्रिटिश हुकूमत (क्वीन) के गुलाम देश का तथाकथित लोकतंत्र था। उस समय देश की स्थिति को देखकर यह कहा जाता था कि ‘‘अंग्रेजी राज, न तन को कपड़ा, न पेट में नाज’’। देश जब स्वाधीन हुआ, तत्समय देश के कर्णधारों ने यह सोचा की देश को आगे बढ़ाने में भारत की स्वतंत्रता की लंबी लड़ाई के बाद प्राप्त स्वतंत्रता पूर्ण लोकतांत्रिक स्वरूप देने में देश की स्वतंत्रता कहीं ‘‘स्वच्छंद’’ होकर स्वतंत्रता पर कोई रुकावट न आ जाए, तो इसके लिए जरूरी हो गया की उक्त स्वतंत्रता की स्वच्छंदता की स्पष्ट आशंका के कारण उस पर कुछ न कुछ प्रतिबंध लगाना जरूरी है। इसके लिए इसे संहिताबद्ध (कोडिफाइड) कर सीमा में बांधा जाए। इस प्रकार एक संविधान की आवश्यकता पड़ी, जिसकी चार दीवारी में देश का ‘‘तंत्र’’, ‘‘गण’’ द्वारा चलाया जा सके। क्योंकि ‘‘संविधान ही किसी देश का आधार होता है’’। ‘‘आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है’’ के सिद्धांत ने उक्त उद्देश्य की पूर्ति हेतु एक संविधान बनाए जाने की आवश्यकता महसूस की जाकर नया संविधान बनाया जाकर 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, और तब देश लोकतंत्र से गणतंत्र की और चलकर गणतांत्रिक भारत देश बना। यद्यपि ब्रिटिश इंडिया में भी ब्रिटिश सल्तनत द्वारा बनाए गए कानून जैसे भारत सरकार अधिनियम 1935 लागू थे। परन्तु वे हमारे लिये ‘‘कष्ट खलु पराश्रयः’’ अर्थात ‘‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’’ के समान थे।
स्वयं के तथा स्वयं द्वारा लागू संविधान का पालन कितना?
महत्वपूर्ण उल्लेखनीय बात यहां यह है कि हमारा संविधान हम पर किसी ने थोपा नहीं है। यह हमारे नेतृत्व द्वारा गहन अध्ययन और मौजूद तत्कालीन परिस्थितियों तथा स्वाधीनता के लंबे संघर्ष के अनुभव से निकले निष्कर्ष को समावेश करते हुए उचित प्रतिबंधों के साथ संविधान बनाया, ताकि देश की लोकप्रिय सरकार जनहित में निर्णय ले सके। ‘‘संविधान लोकतंत्र का मंदिर और देश का अभिमान ही नहीं, बल्कि अधिकारों का बंधन और कर्तव्यों का ज्ञान है’’। परंतु दुर्भाग्य वर्ष आज हम जब हमारे स्वयं के द्वारा लागू संविधान में वर्णित अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अपनी भूमिका अर्थात अपनी ‘‘पेट्रियोटिक ड्यूटी’’ को वहन करने पर अंतर्मन से गहन विचार करते हैं, तो हमारा अंतर्मन हमें कहीं न कहीं कचोट कर झकझोर देता है कि हम उस संविधान का पालन नहीं कर रहे हैं, ‘‘जो हमें सत्यमेव जयते का नारा देता है’’। जिसे न केवल हमने बनाया, बल्कि गुजरते समय की आवश्यकताओं के अनुरूप इसमें समय-समय पर आवश्यक संशोधन भी किये। ‘‘संविधान का पूर्णरूपेण पालन करना ही संविधान और राष्ट्र के प्रति हमारा पहला कर्तव्य है’’। ‘‘एक देशभक्त की सांस्कृतिक विरासत उसे अपने राष्ट्र के प्रति पूर्ण निष्ठा रखना सिखाती है’’, इसलिए आज का यह दिन हमें अपने को अंदर से गहराई से ‘‘खंगालने’’ का एक अवसर प्रदान करता है। क्या हम इस अवसर का सदुपयोग कर अगले साल इसी समय सीना ठोक कर यह दावा कर सकेंगे की हां हमने अपनी कमियों को दूर किया है और बदलाव लाया है, संविधान के प्रति अपने निष्ठा को अधिकार व कर्तव्यों को लागू करके? ‘‘राजपथ से कर्तव्य पथ पर’’ गणतंत्र परेड की आकर्षक भव्य झांकी तो जरूर ले गए हैं, परंतु क्या वास्तव में कर्तव्य की ओर भी चलने का क्रम बढ़ाया है, तेजी लाई है या सिर्फ नामांकरण हुआ है? इस पर आप स्वयं ही विचार करें तो ज्यादा अच्छा होगा।
नागरिक अधिकार नागरिकता का अवमूल्यन?
15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 में सिर्फ यही एक अंतर नहीं है, कि 15 अगस्त को स्वतंत्रता मिली और 26 जनवरी को संविधान लागू हुआ। बल्कि मूलभूत महत्वपूर्ण अंतर यह है कि कि हम ‘‘स्वतंत्रता से गणतंत्र की दिशा में चले’’। अनसिविलाइज जीवन से सिविलाइज जीवन की ओर बढ़े। मतलब ‘‘इस सृष्टि में आदमी से आदमियत, और मनुष्य से मनुष्यता का प्रसंस्कृत रूप ही इंसानियत है’’। इंसानियत का जज्बा पैदा कर इंसान बनने के लिए आदमी को अपने जीवन को व्यवस्थित रूप में सामाजिक, संवैधानिक, कानूनी सीमा के भीतर जीना होता है, कुछ करना होता है और तब वह व्यक्ति ‘‘इंसान’’ बन पाता है। 15 अगस्त को हम स्वतंत्र जरूर हुए। परंतु हम नागरिक बने जब 26 सितंबर 1949 को संविधान स्वीकार हुआ, लेकिन तब वह लागू नहीं हुआ था। देश स्वतंत्र होने के बाद भी राष्ट्र के प्रति ‘‘हमारे कर्तव्य तो थे, लेकिन अधिकार नहीं थे’’। संविधान लागू होने पर हमें अपने अधिकार मिले। उस दिन इस देश में रहने वाले समस्त भारतीय को संवैधानिक रूप से 26 जनवरी 1950 को नागरिक अधिकार प्राप्त हुए। इस प्रकार स्वतंत्रता का अधिकार 15 अगस्त को प्राप्त हुआ तो नागरिकता का अधिकार 26 जनवरी को प्राप्त हुआ। यह ‘‘संविधान देता है हमें समानता का अधिकार, अब आदमी नहीं कर सकता इंसान का तिरस्कार’’। परंतु सबसे बड़े इस ‘‘नागरिक अधिकार’’ का पालन, सम्मान उपयोग हम कितना कर रहे हैं? इसी पर राष्ट्र की सफलता निर्भर है।
‘‘अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का इस गणतंत्र दिवस पर प्रभाव’’
अंत में इस गणतंत्र दिवस को यदि हम अंतरराष्ट्रीय परिपेक्ष में देखे, तो हमारे गणतंत्र पर एक चिंता की लकीर आकर बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी आ जाती है। 20 जनवरी को विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के तुरंत बाद उन्होंने 78 आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इसमें से भारत की दृष्टि से एक ‘‘बर्थ राइट सिटिजनशिप’’ को समाप्त कर दिया जिससे अन्य लोगों के साथ प्रवासी भारतीयों के मूल की नागरिकता पर भी रोक लग गई। यद्यपि अमेरिका की न्यायालय ने तुरंत ही बिना नोटिस दिये उक्त एक्जीक्यूटिव आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी है। विश्व का सबसे झूठा व्यक्ति कहलाने वाला व्यक्ति ट्रंप जिसे सबसे बड़ा नौटंकीबाज भी माना जाता है, ने अमेरिकन फस्ट की घोषित पॉलिसी की आड में इस तरह के निर्णय लिये उसने लगभग 7 लाख भारतवासियों की अमेरिकन नागरिकता पर खतरा मंडरा गया है। इसलिए ‘‘इंडिया फस्ट’’ को आगे बढ़ाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मजबूत कंघों में महती जिम्मेदारी आ जाती है। ‘‘माय फ्रेंड ट्रंप’’ व ‘‘अबकी बार ट्रंप’’ के कथन को सार्थक कर भारतवंशी के अधिकारों की रक्षा करें, अन्यथा उसी अंदाज में ट्रंप को जवाब दें, जिसके वे आदी हैं।


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