नेताजी सुभाष चंद्र बोस (देशभक्त,नेतृत्व-क्षमता व साहस का पर्याय रहे नेताजी)
128 वीं जयंती-23-01-2025                                  जन्म-23-01-1897 

“”तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा””
“”जनता के मध्य नेताजी अपने विचार रखते हुए कहते है कि- ‘दासता ‘ से बढ़कर कोई अभिशाप नहीं हो सकता और अन्याय व अत्याचारों को सहन करने से बढ़कर कोई अपराध नहीं हो सकता,यदि किसी कौम को जीवित रखना है तो उसे जीवन न्यौछावर करने के लिए तैयार रहना होगा “”
[‘’आजाद हिंद फौज का गठन”, “”जय हिंद” व’ ‘दिल्ली चलो ‘का नारा देन रही””]

इस महान स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी के लिए गिरफ्तारी और रिहाई पूरे जीवन भर एक खेल सा लगने लगा अंग्रेजों को इनकी गिरफ्तारी से भय होने लगा और जो कुछ हुआ वो हम सभी जानते है । भारत की स्वतंत्रता के अग्रणी तथा निर्भीक सबसे बडे नेता थे।“”तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा””इसी नारे के सहारे जो उस समय बहुत अधिक प्रचलन मे आया, भारत वासी उन्हें नेताजी के नाम से भी संबोधित करते है।इस तरह हमेशा गिरफ्तारी व रिहाई  व जेल मे संपर्क मे आये वरिष्ठ क्रांतिकारियों के परामर्श के कारण सुभाष जी को लगा की अंग्रेजी सरकार किसी न किसी बहाने मुझे जेल मे आजीवन रख कर मौत से साक्षात्कार करा ही देगी ।भारत की स्वाधीनता की लडाई मे मेरा सहयोग क्या रहेगें मेरे मंसूबे पर पानी फिर जाएगा.अंततः 1941 में नजरबंद की अवस्था मे अपने दोनों भतीजों व अन्य सहयोगियों की मदद से अंग्रेजों को चकमा देकर वे पेशावर,काबुल ,मास्को के रास्ते बर्लिन पहुंच गए ।फिर इन्होंने विदेशों मे रहकर अपनी लडाई लडते रहे एक मिसाल कायम की ।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी सन् 1897 को ओड़िशा के कटक शहर में हिंदू बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। पिता श्री जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। पहले वे सरकारी वकील थे मगर बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उन्होंने कटक की महापालिका में लम्बे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे।अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें उस समय  रायबहादुर का खिताब दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को  कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 सन्तानें थी जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष उनकी नौवीं सन्तान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरद चन्द्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थे। सुभाष उन्हें मेजदा कहते थे। शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था।
बचपन की स्थिति उस समय मिशनरी स्कूल मे प्रारंभिक शिक्षा के लिए भर्ती किया गया पंरतु वहाँ के शिक्षक व शिक्षिकाएं अंग्रेजी व ईसाई बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करते हुए जातीय भेद भाव मे शिक्षा ग्रहण करने का बहुत गहरा प्रभाव पडा।एक अध्यापक के कहने के कारण 14 वर्ष की आयु मे ही वे ओडिशा के जाजपुर नामक जगह पर हैजा फैला जानकर उनकी मदद के लिए अन्य साथियों के साथ चल पडे और असहाय रोगियों की सेवा बिना डर के करते रहे।  उसी दौरान जब भी विश्राम का मौका मिलता अध्यापक महोदय अंग्रेजो के अत्याचार की व देशभक्तों के बलिदानों की दासता सुनाया करते ,जिसका असर इन पर होने लगा और उन्होंने एक प्रण किया की मातृभूमि को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने का प्रयत्न आजन्म करते रहेंगें ।शिक्षा का क्रम हर हाल मे जारी रखते हुए और हमेशा प्रथम श्रेणी मे उतीर्ण होते थे।
हाईस्कूल के पश्चात प्रसिडेंसी कॉलेज ,स्काटिश कॉलेज से दर्शन शास्त्र मे स्नातक उनके पढ़ने में कांट , हेगेल , बर्गसन और अन्य पश्चिमी दार्शनिक शामिल थे फिर पिताजी के कहने पर आ.सी.एस की परीक्षा के लिए ब्रिटेन चले गए।केम्ब्रीज युनिवर्सिटी में 9 विषयों के अध्ययन व पूरे युनिवर्सिटी मे 8 माह मे श्रेष्ठता के कारण चौथे स्य़ान पर रहे ।परंतु अंग्रेजी प्रशासन के प्रति वफादारी की शपथ लेने से विरोध कर दिया ,उन्होंने कहा यह तो दासता का प्रतीक है और डिग्री लौटा कर कहा, मैं किसी शर्त पर डिग्री नहीं लूंगा ।अंग्रेजी प्रशासन चौकना हो गया ,उन्हें सुभाष मे विद्रोही पन दिखाई दिया । भारतीय सिविल सेवा के साथ न जुडने का जो पत्र उन्होंने अपने भाई शरत बाबू को लिखा वो कुछ इस प्रकार थाः-“”लेकिन मेरे जैसे स्वभाव के व्यक्ति के लिए जो ऐसे विचारों पर पल रहा है जिन्हें सनकी कहा जा सकता है-कम से कम प्रतिरोध की रेखा का अनुसरण करना सबसे अच्छी रेखा नहीं है...जीवन की अनिश्चितताएँ उस व्यक्ति के लिए भयावह नहीं है जिसके दिल में सांसारिक महत्वाकाक्षाएँ नहीं है।इसके अलावा,अगर कोई सिविल सेवा से बंधा हुआ है तो अपने देश की सबसे अच्छी और पूर्ण सेवा करना संभव नहीं है। “” 
वे भारत लौटकर आये व गाँधी जी से उनकी मुलाकत हुई पर उनकी नीति से अपने विचारों मे भिन्नता होने के कारण कोलकाता आकर वे चितरंजन दास जी के सानिध्य मे आ गए।1922 मे आये बंगाल के विनाशकारी बाढ़ मे उन्हेनें “”बाढ़ रक्षा समिति”” का गठन कर बाढ़ पीडितों की सहायता करने लगे।1923 मे फार्वड नामक पत्रिका का प्रकाशन किया ।इसी दौरान चितरंजन दाय जी कोलकाता कार्पोरेशन चुनाव मे जीतकर मेयर नियुक्त हुए और सुभाष जी को कार्यकारिणी अधिकारी बनाया गया ।फिर कोलकाता की राजनीति के साथ जुडने लगे इसी दौरान 26 अक्टूबर1924 को मिस्टरर डे की हत्या के षड़यंत्र में संदेह के कारण सुभाष को गिरफ्तार कर लिया गया ।इसी तरह किसी न किसी बात पर गिरफ्तारी व रिहाई होती रही । दिसंबर 1928 के कांग्रेस के 43वें अधिवेशन मे कोलकाता मे वहाँ के क्रांतिकारियों को भी इसमे सम्मलित होने का अनुरोध महात्मा गांधी जी व्दारा करने व उदेश्य यह रहा की सभी मिलकर देश की आजादी के लिए प्रयास करे स्थानीय कांग्रेस व्दारा निमंत्रण मिला और अंगेजी सरकार से अनुरोध भी किया गया की गिरफ्तार प्रमुख क्रांतिकारियों को रिहा कर दिया जाए। देशबंधु चितरंजनदास जी ने इस अधिवेशन की सुरक्षा का कार्य कांग्रेस युवा सेवा दल को सौपा ,जिसके प्रधान युवा सहयोगी सुभाषचन्द्र बोस को बुलाकर दायित्व सौंपा।और यह बहुत ही प्रशंसनीय रहा वहाँ के पुलिस और जनता व्दारा ।इसी दौरान सुभाष की नेतृत्व प्रतिभा से अंग्रेजी सरकार सोचने लगी कहीं यह हमारे विरूध बैठा तो हमारी नींव तक हिल जाएगी, सोचते हुए उनकी गिरफ्तारी के अवसर की तलाश मे लग गए।बस अवसर भी प्रतीक्षा कर रहा था ‘’साइमन कमीशन’’ के रूप में और वे गिरफ्तार कर लिए गये जब वे अन्य के साथ “”साइमन गो बैक’’ के नारे लगा रहे थे।1927 के बाद  सुभाष जी व काँग्रेस की नीतियों से तथा गाँधी जी व नेहरू जी और अनेक सुधारवादी विचारकों के विचारों मे मतभेद बढ़ गया था,उन्हें वह विचार संपूर्ण स्वतंत्रता के मार्ग मे बाधा उत्पन्न करने वाले लगे थे। 1929 का कांग्रेस अधिवेशन लाहौर मे स्वराज्य का अर्थ डोमेनियन स्टेट स्वीकार किया गया तो सुभाष जी ने इसका खुला विरोध किया,और स्वतंत्रता शब्द पर बल देते हुए कहा-काँग्रेस का लक्ष्य देश में समानान्तर सरकार कायम करना होना चाहिए ,अतः हमें इसके लिए मजदूरों किसानों और नौजवानो को संगठित करना चाहिए।प्रस्ताव पास न होने के कारण सुभाष व्दारा “’काँग्रेस डिमोक्रेटिक पार्टी”” का तत्क्षण स्थापना -गठन हो गया। इनके जीवन काल मे 1922 से 1932 तक कई बार गिरफ्तार हुए और रिहा होते रहे ।परंतु इनकी रिहाई परंतु 1932 की रिहाई सशर्त हुई जिसमें उन्हें भारत छोडकर कहीं अन्यत्र चले जाने की मंशा रही रिहाई 03-02-1933 को यह रिहाई हुई।अप्रत्क्ष रूप से नेताजी भी यह चाहते थे फिर वे अनेक देशों की यात्रा के लिए निकल पड़े और उन देशों मे भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए माहौल बनाते कई भाषण दे डाले और कई पत्र-पत्रिकाओं मे लेख लिख डाले।फिर इटली के एक जहाज मे बैढकर वापस भारत आ गये।फिर गिरफ्तार कर लिए गये व 19-03-1937 को रिहा हुए । इसके पश्चात लगातार कांग्रेस अधिवेशन हरिपुरा 16 जनवरी 1938 व जबलपुर के अध्यक्ष चुने गये परंतु परिस्थियाँ कुछ विपरीत चल पडी क्यों कि गाँधी जी पट्टाभिसीता रम्मैया को अध्यक्ष बनाना चाहते थे ,दुबारा मतदान हुआ जिसमे फिर नेताजी का चयन हुआ 1376 की तुलना मे नेताजी को 1575 वोट मिले ,इस हार को गाँधी जी अपनी हार मानकर अलग हो गये साथ जवाहरलाल व अन्य कुछ लोग अलग हो गये इसके बाद स्वयं ही नेताजी ने त्यागपत्र देकर अलग हो गये और एक अलग स्वयं “”फार्वड ब्लॉकदल”” का गठन कर डाला।

परंतु गिरफ्तारी और रिहाई के क्रम इनका पीछा नहीं छोडी उसी दौरान ‘’हावेल’’ की स्टेच्यू को हटाने के शांतिपूर्ण आंदोलन में अंग्रेजों ने फिर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया बडा ही सौभाग्य शाली पल इनके लिए रहे क्यों की यहाँ पर और भी वरिष्ठ क्रांतीकारियों कि उपस्थिति और उनसे वार्तालाप का अनुभव मिला और उनके परामर्श के कारण उनके मन मे ये बात घर कर गई की देश की आजादी का आंदोलन इस देश से बाहर अन्य देशों मे रहकर करना उचित होगा उन लोगों ने रासबिहारी बोस का उदाहरण उनके समक्ष रखा।नेताजी ने इस तरह जेल मे भूख हडताल करने लगे की उन्हें अकारण ही गिरफ्तार कर लिया गया अंग्रेजी सरकार ने उन्हें रिहा कर दिय़ा । पिताजी के लिए जॉन मिल्टन , विलियम काउपर , मैथ्यू अर्नोल्ड  और शेक्सपियर का हेमलेट उनके पसंदीदा में से थे; उनके कई बेटे उनके जैसे अंग्रेजी साहित्य के उत्साही बन गए हिंदू धर्मग्रंथों के विचार भी पढ़ाए जाते थे, जो आमतौर पर घर पर नहीं सीखे जाते थे। हालाँकि उनकी पश्चिमी शिक्षा तेजी से जारी रही, फिर भी उन्होंने भारतीय कपड़े पहनना और धार्मिक चिंतन में संलग्न होना शुरू कर दिया। अपनी माँ को उन्होंने लंबे पत्र लिखे, जिनमें बंगाली रहस्यवादी रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद के विचारों और बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ से उनका परिचय प्रदर्शित हुआ , जो उस समय युवा हिंदू पुरुषों के बीच लोकप्रिय था। अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने, प्रतिस्पर्धा करने और परीक्षाओं में सफल होने की क्षमता प्रदर्शित करने में सक्षम । उसी दौरान विश्वयुध्द का बिगुल बज चुका था ।नेताजी एक भाषण मे अपने विचारों को लोगों के मध्य रखते हुए कहाः-“”‘’दासता  ‘’ से बढ़कर कोई अभिशाप नहीं हो सकता और अन्याय व अत्याचार से बढ़कर कोई अपराध नहीं हो सकता ,यदि किसी कौम को जीवित रहना है तो उसे जीवन न्यौछावर करने के लिए भी तैयार रहना होगा ।  “” इस तरह के उग्र विचारों से अंग्रेजी सरकार काँप उठी परंतु उन्हें इस बार गिरफ्तार करने का साहस न कर सकी और उन्हें 38/2 एल्गिन रोड पर स्थित बंगले मे नजर बंद करके बाहर सख्त पहरा लगा दिया ।सुभाष इन सभी स्थियों को समझ कर भागने की योजना बनाने लगे और अपने दो भतीजो की मदद से सफल भी हो गये ।एक मुसमान(जियउद्दीन) का वेश बनाकर अंग्रेजी सरकार को चकमा देकर बर्लिन पहुंच गए।इस कष्टकारी ढाई महीनें की यात्रा मे कई सहयोगियों राष्ट्र भक्तों का साथ रहा .कोलकता-धनवाद-गोमा-गाजियाबाद-पेशावर(ट्रेन से)-यहाँ अकबर शाह ने उन्हें भगतराम तलवार से मिलाया-जमरूद-गढ़ी तक  पैदल भारतीय सीमा पार कर लिया-एक ट्रक मे सवार हो काबुल(उत्तमचन्द मल्होत्रा) के पास पहुंच गये यहाँ कई दिनों तक रूकते हुए जर्मनी,रूस,जापान, इटली आदि दूतावासों से संपर्क बनाते रहे।इटली दूतावास ने अपने कर्मचारी के रूप मे इनकी मदद करते हुए बर्लिन तक पहुँचाने मे मदद की ।नाम परिवर्तन का क्रम भी जारी रहा कभी ‘लैंड’ कभी ‘जोट्टा’ के छद्म नामों से तीन जर्मनी व्यक्तिओं के साथ कार मे सवार होकर मास्को होते हुए हवाई जहाज से बर्लिन पहुचें।यह कष्टकारी यात्रा 02अप्रैल1941 को समाप्त हुई।1933 के समय जब वे विदेश गये थे तभी इटली के राष्ट्राध्यक्ष मुसोलिनी ने उन्हें साहयता का आश्वासन दिया था –परंतु वे इटली की जासूसी गतिविधियों से परिचित थे ।पर जर्मनी मे ऐस्लेनेड होटल मे रूके ।यहां जासूसी का कम खतरा था,और इस जगह भारतीय क्रांतिकारियों  की उपस्थिति से भी परिचित थे।उन्होंने इस दौरान जर्मनी सरकार को एक गुप्त पत्र लिखा जिसमे न्होंने ब्रिटिश सरकार के प्रति भारत का रव्वैया दर्शाते हुए धुरी राष्ट्र जर्मनी,इटली और जापान की विजय से उनके साथ-साथ भारत को भी लाभ मिलेगा या भारत की भी स्वतंत्रता इसी के साथ सबके सहयोग से यहाँ आजाद हिंद फौज के गठन की अनुमति व मुख्यालय के लिए स्थान के साथ अनुदान का भी अनुरोध था।इसके पश्चात उनकी एक महिला मित्र एमिली शैंकल जिनके साथ उन्होंने कालांतर मे गुप्त विवाह भी किया और बच्ची के पिता बने उस बच्ची का नाम  के साथ स्वतंत्र विएना जाकर इम्पीरियल होटल में रूके और इनकी मदद से जर्मनी के विदेश मंत्री रिबेन ट्राप से भेंट की और लंबी वातालाप के पश्चात इन्होंने रेडियो प्रसारण तथा सैंटा सगठन के लिए मदद का वचन दिया ।आगे इस पर कार्यवाही होते होते एक लंबा समय लग गया पर बहुत ही अच्छे से सारी व्यवस्था पूर्ण हुई।2नवंबर1941 को आजाद हिंद की पहली बैठक हुई ।अभिवादन ‘’जय हिंद’’,राष्ट्र नायक के रूप में सुभाष को-‘’नेताजी’’ कहकर पुकारा जाने लगा.रविन्द्र नाथ ठाकुर के गान ‘’जन गण मन’’ को राष्ट्रगान व ‘’हिन्दोस्तानी’’ राष्टभाषा माना जाए ..यह निर्णय हुआ।रेडियो प्रसारण मे जो शार्ट वेव 1820 मिक्रोवेव से प्रसारण पहले-45 मिनट व बाद में 230 मिनट यह स्वाधीनता संग्रम का अनूठा गौरवपूर्ण प्रयास था ।प्रसारण हिंदी,अंग्रेजी,बंगला,तमील,तेलुगु व मराठी मे होता था प्रारंभ बहादुर शाह जफर के शेर-“” गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमानकी, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदोस्तान की।“” और प्रसारण का अंत मे कहा जाता था-मजा आएगा जब हमारा राज देखेंगे।कि अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा शहीदों की चिताओं पर लगेगे हर बरस मेले,मरने वालों का यहीं निशां होगा।विचारों के साथ लगातार हो रहे खिलवाडों का दौर जारी रहा।हिटलर से उनकी उम्मीद कम हो गई व जर्मनी छोड पूर्व एशिया की ओर जाना चाहते है..इस काम मे उनकी मदद हिटलर ने बडी मुश्किल से की पंनडुब्बी के सहारे कष्टप्रद यात्रा को धुरी शक्तियों के साथ दृढ़ता से पहचान करते हुए , बोस फरवरी 1943 में एक जर्मन पनडुब्बी में सवार हुए।  मेडागास्कर के पास, उन्हें एक जापानी पनडुब्बी में स्थानांतरित कर दिया गया। अंजाम देते हुए जापान पहुँचे , जिससे वे मई 1943 में जापानी कब्जे वाले सुमात्रा में उतरे।
वहाँ रासबिहारी बोस से मुलाकात हुई।वहाँ से रासबिहारी बोस के साथ 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर आ गये।   
सुभाष एक भारतीय राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने भारत में ब्रिटीश सत्ता की अवज्ञा की , जिससे वे कई भारतीयों के बीच नायक बन गए, लेकिन नाजी जर्मनी और इंपीरियल जापान के साथ उनके युध्दकालीन गठबंधन ने एक ऐसी विरासत छोडी जो अधिनायकवाद ,यहूदी विरोधी और सैन्य विफलता से पीड़ित थी । सम्मानजनक 'नेताजी' (हिंदुस्तानी  : "सम्मानित नेता") पहली बार 1942 की शुरुआत में जर्मनी में बोस के लिए इस्तेमाल किया गया था - भारतीय सेना के भारतीय सैनिकों और बर्लिन में भारत के लिए विशेष ब्यूरो में जर्मन और भारतीय अधिकारियों द्वारा । अब इसका इस्तेमाल पूरे भारत में किया जाता है।  अप्रैल 1941 में बोस नाजी जर्मनी पहुंचे, जहां नेतृत्व ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अप्रत्याशित लेकिन अस्पष्ट सहानुभूति पेश की।  बर्लिन में एक फ्री इंडिया सेंटर खोलने के लिए जर्मन फंड का इस्तेमाल किया गया । बोस के अधीन सेवा करने के लिए इरविन रोमेल के अफ्रिका कोर द्वारा पकड़े गए भारतीय युद्धबंदियों में से 3,000-मजबूत फ्री इंडिया लीजन की भर्ती की  यद्यपि अपने मुख्य लक्ष्यों से परिधीय, जर्मनों ने 1941 के दौरान भारत पर भूमि आक्रमण पर अनिर्णायक रूप से विचार किया। 1942 के वसंत तक, जर्मन सेना रूस में फंस गई थी और बोस दक्षिण-पूर्व एशिया में जाने के इच्छुक हो गए, जहां जापान ने अभी-अभी त्वरित जीत हासिल की थी ।उनकी पत्नी,  या साथी,  एमिली शैंकल ने एक बच्ची को जन्म दिया जिसका नाम अनिता बोस फाफ था। चुकिं इनके साथ बोस जी का विवाह गुप्त था जब वो जर्मनी छोड रहे थे उन्होंने अपने परिवार वालो को पत्र के माध्यम से इसकी सूचना दी थी । जापानी समर्थन से, बोस ने भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) का पुनर्गठन किया, जिसमें ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय युद्धबंदी शामिल थे, जिन्हें सिंगापुर की लड़ाई में जापानियों ने पकड़ लिया था ।  जापानी कब्जे वाले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर स्वतंत्र भारत की एक अंतिम सरकार की घोषणा की गई और नाममात्र रूप से बोस की अध्यक्षता में इसका गठन किया गया।  यद्यपि बोस असामान्य रूप से प्रेरित और करिश्माई थे, जापानी उन्हें सैन्य रूप से अकुशल मानते थे, और उनका सैनिक प्रयास अल्पकालिक था। 1944 के अंत और 1945 की शुरुआत में, ब्रिटिश भारतीय सेना ने भारत पर जापानी हमले को उलट दिया। लगभग आधे जापानी बल और भाग लेने वाले आईएनए दल के आधे लोग मारे गए ।  बोस ने सोवियत संघ में भविष्य तलाशने के लिए मंचूरिया भागने का फैसला किया, जिसके बारे में उनका मानना था कि वह सोवियत संघ ब्रिटिश विरोधी हो गया था।
बोस की विरासत मिश्रित है। भारत में कई लोगों के बीच, उन्हें एक नायक के रूप में देखा जाता है, उनकी गाथा एक चौथाई सदी से अधिक समय तक पुनर्जागरण, बातचीत और सुलह की कई कार्रवाइयों के लिए एक संभावित प्रतिपक्ष के रूप में काम करती है, जिसके माध्यम से भारत की स्वतंत्रता हासिल की गई थी।जापानी फासीवाद और नाजीवाद के साथ उनके सहयोग ने गंभीर नैतिक दुविधाएँ पैदा कीं, विशेष रूप से 1938 के बाद से जर्मन यहूदी-विरोधीवाद की सबसे बुरी ज्यादतियों की सार्वजनिक रूप से आलोचना करने या इसके पीड़ितों को भारत में शरण देने की उनकी अनिच्छा। । नेता जी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' (सर्वोच्च सेनापति) के रूप में सेना को सम्बो धित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा  सहित  इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया। 21 अक्टूबर 1943 को बोस ने आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से  स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे  जर्मनी,जापान,फिलीपीन्स, कोरिया, चीन,इटली,मान्चुको और तआयरलैड सहिशों की सरकार ने मान्यता दी थी। । जापान ने अण्डमान और निकोबार व्दीपसमूह इस अस्थायी सरकार को दे दिए। सुभाष उन द्वीपों में गए और उनका नया नामकरण किया।1944 को आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युध्द 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उनका आशीर्वाद और शुभ कामनाएँ मांगी। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु के विषय मे बहुत सारी बाते है जो हमारे लिए आज कहना कठिन होगा की इनकी मृत्यु की सही तिथि किसे माने जबकी हर वर्ष जापान मे 18-अगस्त को उनका शहीदी दिवस धूमधाम से मनाते है।कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से सहायता लेने का प्रयास किया था, तो ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों को 1941 में उन्हें खत्म करने का आदेश दिया था। वहीं भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत 1945 में नहीं हुई। वे उसके बाद रूस में नज़रबन्द थे। यदि ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से संबंधित दस्तावेज अब तक सार्वजनिक नहीं किए क्योंकि नेता जी की मृत्यु नहीं हुई थी।16 जनवरी 2014 (गुरुवार) को कोलकाता उच्च न्यायालय ने नेता जी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए विशेष पीठ के गठन का आदेश दिया। 18 अगस्त 1945 को जापानी ताइवान में उनके विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद बोस की थर्ड-डिग्री जलने से मृत्यु हो गई। कुछ भारतीयों को विश्वास नहीं हुआ कि दुर्घटना हुई थी,  उन्हें उम्मीद थी कि बोस भारत की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए वापस आएंगे। भारतीय राष्ट्रवाद के मुख्य साधन, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बोस की देशभक्ति की प्रशंसा की, लेकिन उनकी रणनीति और विचारधारा से खुद को दूर कर लिया। को कभी भी आईएनए से गंभीर खतरा नहीं था, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना के मुकदमों में 300 आईएनए अधिकारियों पर राजद्रोह का आरोप लगाया , लेकिन अंततः कांग्रेस के विरोध के सामने पीछे हट गए, और भारत में तेजी से उपनिवेशीकरण के लिए ब्रिटेन में एक नई मनोदशा। इस महान व्यक्तित्व के बारे मे अनगिनत साहित्य देश मे और विदेशों मे भी प्रकाशित हुए है।इन सभी मे बहुत सी अनसुनी बातों का जिक्र भी है ।अनेक तथ्यों को जानने के बाद इनके जीवन के संधर्ष से जो परिचय मिलता है वह अत्याधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी होने के प्रमाण है। जिन्होंने अपनी संप्रेषण की क्षमता से विश्व के अनेक राष्ट्राध्यक्षों व राजनायको के साथ जो वार्तालाप किया वे सब स्वाधीनता आंदोलन व एक देशभक्त की मातृभूमि से प्रम का पर्याय थे। अनततः मुसोलीनि,हिटलर जैसे और भी नाम है उनके व्यक्तित्व व उद्देश्य से प्रभावित थे , कुछ ने सहयोग दिया कुछ ने स्पष्ट तौर पर मना भी किया इन सभी बातों के साथ इनके संधर्ष की रूप रेखा को बहुत अधिक विस्तार मिला धैर्य और सयंम् से विचारों का अदभुत समन्वय रहा जो इनके जीवन को व उनकी विचारधारा को बहुत सही दिशा मिली-1942 के दौरान महात्मा गांधी जी के ‘’करो या मरो ‘’ के नारे ने व अंग्रेज भारत छोडो के आह्वाहन ने इनको इस बात का दुख रहा कि मैं इस समय वहाँ क्यों नही रहा ।      
उनके संधर्षपूर्ण जीवन पर एक फिल्म भी तैयार 2004 मे श्याम बेनेगल ने जीवनी पर आधारित फिल्म “”नेताजी सुभाष चंद्र बोसःद फॉरगॉटन हीरो”” का निर्देशन किया जिसमें नाजी जर्मनी(1941-1943),जापानी कब्जे वाले एशिया(1943-1945)मे उनके जीवन और आजाद हिंद फौज के गठन की ओर ले जाने वाली घटनाओं को दर्शाया गया है।फिल्म को बीएफआई लंदन फेस्टिवल मे आलोचकों की प्रशंसा मिली,और राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और उसी वर्ष के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रोडक्शन डिजाइन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रप्त हुआ। यह फिल्म एक स्रराहनीय प्रयास व नेताजी के जीवन का सुंदर चित्रण बेनेगल जी के निर्देशन जो सभी के दिलों मे बस गई।हर भारतीय को एक बार जरूर देखने का मन करेगा । इसके अलावा डॉक्यूमेंटरी फिल्में,”” द मिस्ट्री””-इकबाल मल्होत्रा की2016 की फिल्म जो सुभाष बोस की मौत से जुडे षड्यंत्र के सिध्दांतो पर आधारित है।आदि अनेक टी.वी सिरियल आदि ।
नेताजी का संपूर्ण जीवन अत्यन्त ही प्रेरणादायायी रहा है।बचपन से कुछ यूं ढ़ल रहा था की देखने वालों को उनका भविष्य स्पष्ट दिखाई दे रहा था ।कोई भी जीवनी साहित्य अपने आप मे पूर्ण नहीं मानी जाती है।प्रत्येक साहित्यकार व्यक्तिगत रूचि के आधार पर प्रसंगों का चयन करता है।आलेख की रसात्मकता भी उसी प्रकार परिवर्तनीय होती है ।कभी लेखन शैली बहुत रोचक तो कभी उबाऊ भी हो जाती है ।
पिताजी की चुनौती””यह क्यों नहीं कहते तुम मे आई.सी.एस. तीर्ण करने की क्षमता ही नहीं है।तब तुमसे उनकी बराबरी की क्षमता ही नहीं है तो किस दम पर अंग्रेजों का सामना करोगे ।“” स्वीकार करते हुए जब उन्होंने इस परीक्षा को पास भी किया ,सुभाष बहुत ही स्वाभिमानी थे। सुभाष अंग्रेजों की नौकरी करके उनकी सेवा करना नहीं चाहते थे। इतिहास बताता है कि साम्राज्य निर्माण होते है ,फैलते है और नष्ट होते है।अंग्रेजी साम्राज्य अब तीसरी स्थिति मे है ।उनके राज्य की समाप्ति हमारी एकता,दृढ़ता, पराक्रम तथा त्याग पर निर्भर है ।स्वराज्य प्राप्ति के लिए हमें क्रांतिकारी कदम उठाने ही होंगे । उनकी देशभक्ति ,समर्पण के निष्ठा भाव इन शब्दों के माध्यम से हम समझ सकते है,जो इस प्रकार हैः-“”मैं सदैव भारत का सेवक रहूँगा और अपने अडतीस करोड भाई-बहनों के शुभचिंतन को अपना कर्तव्य समझबँगा।आजादी अर्जित कर लेने के पश्चात् भी भारत की आजादी की रक्षा के लिए अपने खून की आकरी बूँद भी बहाने के लिए तैयार रहूँगा ।“” बस यह हमारा दुर्भाग्य था की इस देशभक्त ने आजादी के संधर्ष को अपनी दिशा देकर आजादी के पहले ही हम सब को छोड चले गये। 23 जनवरी 2021 को नेताजी की 125वीं जयंती है जिसे भारत सरकार के निर्णय के तहत  “”पराक्रम दिवस”” के रूप में मनाया गया ।8 सितम्बर 2022 को नई दिल्ली में राजपथ, जिसका नामकरण कर्तव्यपथ किया गया है ,और वहाँ पर नेताजी की विशाल प्रतिमा का अनावरण किया गया ।उनका जीवन अदम्य साहस के अनगिनत प्रसंगो से भरा पडा है ,उनका उत्साह और उनकी कुशलता का जितना भी बखान किया जाए कम ही होगा ।व्दितीय विश्वयुध्द के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिए, उन्होंने जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज का गठन किया था। और चलो दिल्ली का नारा भी ।इस तरह एक संक्षिप्त विवरण उनके जीवन पर विस्तार तो उनकी अनेक किताबों मे उपलब्ध रहेगी।उनके साहस व भारतीय स्वाधीनता के अग्रणी नेता अदम्य साहस ,नेतृत्व की अदभुत क्षमता के हमारे महान देश भक्त नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी ने जिस शिद्दत के साथ भारत की स्वाधीनता की लडाई को अंजाम दिया था अविस्मरणीय व अत्यधिक सराहनीय भी ऐसे महान नेता को इस देश ने आवश्यकता के समय खो दिय़ा ।हमारा इनको कोटि कोटि नमन।
चिरंजीव
संकलन व लेखन
लिंगम चिरंजीव राव
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग
इच्छापुरम ,श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिनः532 312 मो.न.8639945892