राय कृष्णदास जन्म- 13 नवम्बर 1892 - जयंती 13-11-2025
राय कृष्णदास जन्म- 13 नवम्बर 1892 - जयंती 13-11-2025
राय कृष्णदास की चित्रकला, मूर्तिकला एवं पुरातत्व के मर्मज्ञ थे। अज्ञेय जी ने 'स्मृति लेखा' में इन्हें 'स्मरण का स्मृतिकार' कहा है।
“भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई के बेटे राय कृष्णदास भी अपने हिंदी लेकन एवं अटूट हिंदी-प्रेम के लिए प्रसिध्द है। राय कृष्णदास साहित्य के अलावा चित्रकला,मुर्तिकला एवं पुरातत्व के क्षेत्र में भी बहुत सक्रियता एवं अदिकार के साथ लिखते ते. बनारस में उन्होंने कला-बवन स्थापित किया जिसकी अपनी ख्याति है, महता है। गद्य कार्य के रचयिता के रूप मे आपने साहित्य-संसार में कदम रखे। उनकी पहली पुस्तक के रूप में ‘’साधना’’प्रतिष्ठित कृति हैः भाव-पऊर्णता, कलात्मकता एवं स्वानुभूति जैसी विशिष्ठताओं, प्रसाद गुण और भाषा की स्वछ्छता ने उन्हें एक महत्वपूर्ण रचनाकार के रूप में स्थापित कर दिया।‘’ राय कृष्णदास जन्म- 13 नवम्बर 1892 वाराणसी, उत्तर प्रदेश, इनका उपनाम स्नेही था। राय कृष्णदास हिंदी कहानी सम्राट प्रेमचन्द्र के समकालीन कहानीकार और गद्य गीत लेखक थे। कहानीकार तथा गद्य गीत लेखक थे। राय साहब के पिता राय प्रह्लाददास हिन्दी प्रेमी थे। राय साहब बारह वर्ष के ही थे, तभी उनके पिता का असमय निधन हो गया। अतः इनकी स्कूली शिक्षा बाधित हो गयी। इन्होंने स्वाध्याय से ही हिन्दी, अंग्रेजी और बंगला भाषा-साहित्य का गहन अध्ययन किया। राय साहब अद्भुत स्मरणशक्ति सम्पन्न थे। अज्ञेय जी ने 'स्मृति लेखा' में इन्हें 'स्मरण का स्मृतिकार' कहा है। इन्होंने भारत कला भवन की 1950 स्थापना की थी, जो आगे चलकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का अंग हो गया या काशी हिंदू विश्वविद्यालय को दे दिया गया।। कला के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के कारण राय कृष्णदास जी को जब भी याद किया जाता है जो कि आज 'भारत कला भवन' शोधार्थियों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है। राय कृष्णदास को 'साहित्य वाचस्पति पुरस्कार' तथा भारत सरकार द्वारा 'पद्म विभूषण' की उपाधि प्रदान की गयी। राय कृष्णदास का जन्म वाराणसी के प्रतिष्ठित राय परिवार में हुआ था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से पारिवारिक सम्बन्ध होने के कारण राय साहब का परिवार साहित्य और कलाप्रेमी था, जिसका राय साहब पर गहन प्रभाव पड़ा। । जयशंकर प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त से निकट सम्पर्क के कारण राय साहब आठ वर्ष की अवस्था से ही कविता रचने लगे थे।

राय साहब ने कविता, निबंध,गद्यगीत, कहानी कला इतिहास आदि सभी विषयों पर ग्रन्थों की रचना की। उनका बहुत बड़ा योगदान चित्रकला और मुर्तीकला के क्षेत्र में है। उनकी लिखित ‘भारत की चित्रकला’ और ‘भारतीय मूर्तिकला’ अपने विषय के मौलिक ग्रन्थ हैं। उन्होंने अपने निजी व्यय से एक उच्चकोटि के कला भवन का निर्माण किया। यह चित्रकला और मूर्तिकला आदि का अपने ढंग का एक विशाल संग्रहालय है। अब यहकाशी हिंदू विश्वविद्यालय का एक विभाग है और प्राचीन भारतीय कला-संस्कृत के अध्ययन का प्रमुख केन्द्र है रचनाएँ :-राय कृष्णदास की महत्त्वपूर्ण रचनाओं में से 'साधना' कहानी संग्रह(1919 ई.), 'अनाख्या' (1929ई.), 'सुधांशु' (1929 ई.) मुख्य हैं। 'प्रवाल' गद्य गीतों का संग्रह है, जो 1929 ई. में प्रकाशित हुआ। भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला पर वैसे तो पाश्चात्य विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा है, किन्तु हिन्दी में विशेष अभिरुचि और विश्लेषण के साथ राय कृष्णदास की पुस्तकों ने हिन्दी साहित्य को सर्वांगपूर्ण बनाने में सहायता दी है। काव्य संग्रह- ब्रजरज(ब्रजभाषा), भावुक(खड़ीबोली), सागर और मेध(गद्य गीत), आनंद की खोज (गद्य गीत), पागल पथिक(गद्य गीत)। कला- भारत की चित्रकला, भारत की मूर्तीकला, गद्य गीत- साधना(1916), छायापथ(1929) प्रवाह(1931), संवादात्मक निबंध- संलाप(1925), प्रवाल(1929)। कहानी संग्रह- अनाख्या, सुधांशु, आँखों की थाह,रमणी का रहस्य(कहानी),कला और कृत्रिमता, सम्राट का स्वत्व। अनुवाद- खलील जिब्रान के दि मैड मैन का पागल शीर्षक से हिंदी अनुवाद. राय कृष्णदास की चित्रकला, मूर्तिकला एवं पुरातत्व में विशेष रुचि थी। ये ललिल कला अकादमी' के सदस्य थे। आप राजा पटनीमल के वंशज थे। 'राय' की उपाधि इनकी आनुवंशिक थी, जो मुगल दरबार से मिली थी। राय कृष्णदास बनारस के मान्य परिवार के हैं।जयशंकर प्रसाद के घनिष्ठ मित्रों में से ये एक थे। राय कृष्णदास 'भारती भण्डार' (साहित्य प्रकाशन संस्थान) और 'भारतीय कला भवन' के संस्थापक थे। भावुक लेखक -राय कृष्णदास की कहानियों में भारतीय जीवन के सामाजिक व्यंग्य एवं सरसता दोनों समान रूप से वर्तमान हैं। भावुक लेखक होने के नाते शिल्प के कथ्य और कलात्मक रचना की अपेक्षा आदर्श और यथार्थ के संघर्ष की अच्छी झाँकियाँ वर्तमान हैं। इनकी भाषा प्राजंल और अनुभूति नितान्त रागात्मक, दृष्टि मूलत: आदर्शवादी है। इसीलिए गद्य गीतों में भावुकता इनकी शैली की एक सजीव एवं सप्राण प्रतीक बन गयी है। छायावादी रागात्मकता इनके गद्य गीतों की जान है। मानवीय भावनाओं को भावुक एवं कोमल पक्ष इनकी रचनाओं में विशेष रूप से चित्रित हुआ है। गद्य गीतकारों में माखनलाल चतुर्वेदी और रावी के साथ यदि किसी का भी नाम लिया जा सकता है, तो वह हैं- राय कृष्णदास। कला प्रेमी-इन साहित्यिक रुचियों के अतिरिक्त शोधपरक कार्यों के लिए मूल रचनाओं की प्रमाणिक हस्त प्रतियाँ प्राप्त करना, नये लेखकों की मूल पाण्डुलिपियों का संग्रह करना, प्राचीन चित्र और मूर्तियों को संचित करना, पुरानी विभिन्न भारतीय शैलियों के चित्रों को संग्रहीत करना राय साहब की विशेष रुचि है। इनके विषय में एक साक्षात्कार के दौरान कुछ बाते उनके परिवार के जीवन महाकाव्य राय आनंद कृष्ण(रायकृष्णदास के जीवन और कृतित्व पर उनके पुत्र और जाने माने कला इतिहासकार राय आनंद कृष्ण के साथ की गयी यह बातचीत दरअसल रायकृष्णदास की जीवनी ही लगती है) और व्योमेश शुक्ल की बातचीत के कुछ अंश जो रायकृष्णदास जी के जीवन को एक विस्तृत आकार देने में सहयोगी है ।महान कलावंत रायकृष्णदास के जीवन और कृतित्व पर उनके पुत्र और जाने माने कला इतिहासकार राय आनंद कृष्ण के साथ की गयी यह बातचीत दरअसल रायकृष्णदास की जीवनी की तरह पढ़े जाने के लिये शुरू हुई थी. लेकिन यह अपनी आरंभिक प्रतिश्रुतियों से भटकते हुए – कभी दूर और कभी पास का सफर करते हुए चरितार्थ हो रही है. यह इसी तरह संभव था क्योंकि रायकृष्णदास रायकृष्णदास-जैसी शख़्सियतों को उनकी सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है. इसलिये यहाँ सभ्यता का जीवन व्यक्ति की ज़िंदगी की तरह उपस्थित है. इसलिये यहाँ विविध और विस्तृत आवागमन है. जन्म से मृत्यु तक की एक रेखीयता को न मानने की जिद भी यहाँ अपना काम कर रही है तो इतिहास और घटनाओं के क्रमानुक्रम का अनुकरण इस मनमानेपन के साथ बेमेल लगता इसलिये उसे रहने दिया गया है। स्मृति यहाँ केन्द्रीय है और स्मृति के आह्वान की भिन्न भिन्न पद्धतियाँ. युगानुकूल पॉलिटिकल करेक्टनेस के तंग सुविधाजनक दायरे इस बातचीत में दूर तक भुला दिये गये हैं और जो याद करने योग्य है – उसी को याद करने में, उसी को शब्द देने में यह संवाद व्यस्त है।(व्योमेश शुक्ल) अपने पिता के जीवन को एक महाकाव्य सरीख़ा है कहा। भगवान ने उन्हें लम्बी आयु दी और अंतिम दिन तक वह लेखन में सक्रिय थे. उनकी स्मृति अद्भुत थी। यदि हम उनके पहले की दुनिया को भी, उन तत्वों को भी जानते हुए चलें जिनमें से वे उभरे तो क़रीब सौ-सवा सौ बरस का इतिहास सामने खड़ा हो जाता है। काशी की संस्कृति का, काशी के वैभव का, उदात्तता का और साथ-साथ साहित्यिक अभियान का इतिहास – जिसके प्रणेता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे। किसी हद तक हम राज शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ को भी ले सकते हैं, लेकिन भारतेन्दु के व्यक्तित्व के सामने कोई नहीं टिकता। इस अवसर का उपयोग यह जानने में हो सकता है कि काशी भारतेन्दु युग में, उसके पहले के युगों में क्या थी और किस प्रकार के सांस्कृतिक स्पन्दन हो रहे थे. उसकी कुछ झलकियाँ अब तक दिखाई-सुनाई देती रही हैं।

ऐसे बहुत से आन्दोलन हो रहे थे जिनका ठीक-ठाक पता होना नामुमकिन है। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का प्रभाव भारतेन्दु पर था ही। भारतेन्दु बराबर उनसे पत्र- व्यवहार में मार्गदर्शन लेते थे. इतिहास को देखने की नई दृष्टि बन रही थी। उसमें भारतेन्दु ने भी किया। इस मोर्चे पर उनके गुरु कविराज श्यामलाल थे जो उदयपुर राज्य के विद्वान थे। हलचलें बहुत मच रही थीं। इसका समवेत प्रभाव उस युग में प्रकट होता है जब एनी बसेंट यहाँ आकर नई शिक्षा प्रणाली का आह्वान करती हैं। अंग्रेज़ियत की ओर उन्मुख शिक्षा प्रणाली का मुँह उन्होंने आत्मगौरव, देशोत्थान और उन्मुक्त चिन्तन की ओर मोड़ दिया। सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज और सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल उसी अभियान की परिणति हैं। इस उल्लेख का विशेष महत्त्व है क्योंकि रायकृष्णदास की आरंभिक शिक्षा यहीं हुई। अब रायकृष्णदास की प्रारंभिक शिक्षा का हाल सुनिये।
एक तो बात यह थी कि हमारे बाबा राय प्रह्लाददास जी एक बहुत बड़े मुक़द्दमें में फंस गये थे. मिल्कियत के मुक़द्दमें में, सरासर बेईमानी से हम हार भी गये। लेकिन इस मुक़द्दमें के चलते राय प्रह्लाददास की घनिष्ठता पंडित मोतीलाल नेहरू से हो गयी। बहुत घनिष्ठता, यह चर्चा इसलिए कि उनके व्यक्तित्त्व का भी बहुत प्रभाव रायकृष्णदास पर पड़ा। मालवीयजी भी उस समय वक़ील थे। पिता के ननिहाल से उनका अत्यन्त घनिष्ठ, रोज़ का संबंध था। ये सभी व्यक्तित्व उन्हें प्रकारान्तर से प्रभावित कर रहे थे। मुक़द्दमें के कारण इलाहाबाद में बहुत रहना था. वहीं बाबा को देहान्त भी हुआ। और भी बहुत से लोग थे. उनमें से मैं दो नाम लेना चाहता हूँ. पहले थे रामानन्द चटर्जी – एक बंगाली सज्जन – जो कायस्थ पाठशाला के हैडमास्टर थे – वह बहुत प्रबल व्यक्ति थे – रवीनद्रनाथ की टक्कर का व्यक्तित्व. वह एक शक्ति थे। इलाहाबाद का एक छोटा-सा अभिजात समाज था। उसमें परस्पर संबंध थे. इसका लाभ पिता को मिला. रामानन्द चटर्जी ने इलाहाबाद में ‘प्रदीप’ नामक एक साहित्यिक पत्र निकाला था. उसके प्रेरणास्रोत थे उन्हीं की पाठशाला के बालकृष्ण भट्ट. उन्होंने ‘हिन्दी प्रदीप’ निकाला था. ‘हिन्दी प्रदीप’ में जो बालकृष्ण भट्ट ने लिखा है।, उस ओज का लेखन दुबारा कभी हुआ ही नहीं। वह पत्रकारिता में मालवीयजी महाराज के भी गुरु थे। रामानन्द बाबू के ही द्वारा पिताजी का परिचय अवनीनद्रनाथ टैगोर से हुआ. वह अलग गाथा है. जब बार-बार पितामह दो-दो, चार-चार, छह-छह महीने के लिए इलाहबाद चले जाते थे तो यहाँ पिताजी की पढ़ाई का क्रम टूट जाता था. इलाहाबाद में कौन पढ़ाता था, यह तो नहीं पता, लेकिन गुणीजनों के सानिध्य से उनके चरित्र का अद्भुत विकास हुआ. जबकि ख़ुद आठ से दस साल के रहे होंगे. यहाँ की पढ़ाई बार-बार छूट जाती थी. उसी बीच एक विलक्षण घटना हुई. हमारे परिवार की एक शाखा पटना में रहती है. असल में हम लोग हरियाणा से पटना आये और मुग़ल दरबार में पाँच हज़ारी मनसबदार हुये. उसका ख़लीता कला भवन में है. बड़े भाई बनारस चले आये और छोटे भाई का परिवार वहीं चला आ रहा है. बड़ा एका था तब. वहाँ के बाबा जी यहाँ आया करते थे. यहीं टिकते थे. उन्होंने कहा कि ‘बच्चा (रायकृष्णदास) बड़ा कमज़ोर है, इसकी पढ़ाई बन्द कर दो, इससे और क्षीण होता है.’ यह हमारे बाबा के देहान्त के बाद की बात है. हमारी दीदी ने बन्द कर दिया. शायद छह या सात में थे. इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के नतीजे निकले. पढ़ाई बन्द होने के बाद स्वयं इन्होंने जो उपार्जित किया वह बहुत ज्यादा था। इन्हीं कठिनायों से सब आगे-पीछे. कभी इलाहबाद. कभी बनारस. 'भारत की चित्रकला (1929 ई.), और 'भारतीय मूर्तिकला' (1939 ई.) यह इनके मौलिक ग्रन्थों में से हैं। राय कृष्णदास के इस अध्ययन और योजना के कारण आज 'भारतीय कला भवन' का एक ऐतिहासिक महत्त्व है। शायद यही कारण है कि इधर राय साहब साहित्यिक रचनाओं की अपेक्षा भारतीय चित्रों और मूर्तियों को पहचानने, काल निर्धारित करने में अधिक समय देने लगे थे। पुरस्कार-राय कृष्णदास को भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया था। महाप्रयाण- राय कृष्णदास जी की मृत्यु सन् 1985 ई. में हुई थी। महान चित्रकला व मूर्तीकला के उपासक को हमारी विनम्र श्रध्दांजलि।
चिरंजीव(लिंगम चिरंजीव राव)
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग, इच्छापुरम
श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश) पिन 532-312
स्वतंत्र लेखन(संकलन व लेखन)
मों न. 8639945892




