महाश्वेता देवी जन्म 14-01-1926 -- जयंती 14-01-2026

“खाने से ज्यादा मैंने किताबें पढ़ी है, लिखना मेरे लिए जिंदा रहने की तरह है।“ “मैंने कोई थ्योरी नहीं पढ़ी मैंने सिर्फ इंसानों को पढ़ी है ” (महाश्वेता देवी भारतीय साहित्य के उन लेखकों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनके लिए लेखन एक आंदोलन है, सतत चलने वाला आंदोलन। उन्होंने अपने लेखन के ज़रिये भारतीय समाज में परंपरागत तौर पर चलने वाले शोषणतंत्रों को बेनकाब करने की कोशिश की है। इस शोषण तंत्र में सदियों से दमित आबादी ही इनके लेखन का प्रस्थान-बिंदु है।) “उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ (जंगल के दावेदार)को 1979 में जब इस किताब पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो आदिवासियों ने जगह-जगह ढाक बजा-बजाकर गाया था- ‘हमें साहित्य अकादमी मिला है।’ तब मुंडा नाम से ही उनमें असीम गौरव बोध जगा था। जो मुंडा भूमिज नाम से सरकारी रेकार्ड में दर्ज थे, उन्होंने उपने को मुंडा नाम से दर्ज करने की प्रशासन से दरखास्त की थी। साहित्य अकादमी मिलने पर मुंडाओं ने महाश्वेता का अभिनंदन करने के लिए उन्हें अपने यहाँ (मेदिनीपुर में) बुलाया।1979 की उस सभा में आदिवासी वक्ताओं ने कहा था- "मुख्यधारा ने हमें कभी स्वीकृति नहीं दी। हम इतिहास में नहीं थे। तुम्हारे लिखने से हमें स्वीकृति मिली।" साहित्य अकादमी पाने पर महाश्वेता को जितनी खुशी नहीं हुई, उससे ज्यादा इन आदिवासियों की प्रसन्नता से हुई। महाश्वेता को लगा, आदिवासियों के बारे में उनका दायित्व और बढ़ गया है। उन्होंने आदिवासियों के लिए यथासंभव काम करते जाने और उनके बारे में और भी जानने की कोशिश जारी रखी। ““मैं औरत को वर्गीय दृष्टिकोण से देखती हूँ” शहरी मध्यवर्गीय औरतों के बीच काम करना आसान है और कुछ औरतों के लिए यह एक शुध्द धंधा भी बन गया है, वहीं महाश्वेता देवी अपने उम्र के अंतिम दौर में भी उन वंचित वर्गों के बीच सक्रिय है जहां काम करना सचमुच बहुत कठिन है। और लेखिका आदिवासियों के बीच रहकर भी उतनी सक्रिय रही।  महाश्वेता देवी हमारे देश भारत की महान प्रसिध्द सामाजिक कार्यकर्ता और एक संवेदनशील तथा वैचारिक लेखिका थी। उनके लेखन में उपन्यास ,कहानियाँ आदि विशेष है। स्त्री अधिकारों, दलितों तथा आदिवासियों के हितों के लिए उन्होंने जूझते हुए व्यवस्था से संघर्ष किया तथा इनके लिए सुविधा तथा न्याय का रास्ता बनाती रहीं। महाश्वेता जी ने कम उम्र में ही लेखन कार्य शुरू कर दिया था औविभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 14 जनवरी, 1926 को महाश्वेता देवी का जन्म अविभाजित भारत के ढाका  जिंदाबहार लेन में हुआ था। उनके जन्म के समय माँ धरित्री देवी मायके में थीं। माँ की उम्र तब 18 वर्ष और पिता मनीष घटक की 25 वर्ष थी। पिता मनीष घटक ख्याति प्राप्त कवि और साहित्यकार थे। माँ धरित्री देवी भी साहित्य की गंभीर अध्येता थीं। वे समाज सेवा में भी संलग्न रहती थीं। महाश्वेता ने जब बचपन में साफ-साफ बोलना शुरू किया तो उन्हें जो जिस नाम से पुकारता, वे भी उसी नाम से उसे पुकारतीं। पिता उन्हें 'तुतुल' कहते थे तो ये भी पिता को तुतुल ही कहतीं। आजीवन पिता उनके लिए 'तुतुल' ही रहे। बचपन से ही महाश्वेता मातृभक्त रहीं। थोड़ी बड़ी हुईं तो ढाका के 'इंडेन मांटेसरी स्कूल' में भर्ती कराया गया। चार वर्ष की उम्र में ही बांग्ला लिखना-पढ़ना सीख गई थीं। पिता को नौकरी मिल गई थी। कई बार बदली हुई। तबादले पर उन्हें ढाका, मनमनसिंह, जलपाईगुड़ी, दिनाजपुर और फरीदपुर जाना पड़ा। ढाका के जिंदाबहार लेन में महाश्वेता का ननिहाल था और नतून भोरेंगा में पिता का गाँव। ननिहाल आना-जाना लगा रहता था। दुर्गा पूजा की छुट्टियाँ तो ननिहाल में ही कटतीं। बचपन में महाश्वेता नटखट थीं। इतनी कि एक बार ननिहाल में रहते हुए भोरेंगा की दुर्गा पूजा देखने गई थीं। चार भाई-बहनों के साथ। भाई बहनों को लेकर वे एक स्नान घाट से उतरीं।स्नान करने और तैरने का मज़ा काफूर हो गया, जब चारों बच्चे डूबने से बचे। उस दिन सप्तमी  की पूजा थी। घर आईं तो खूब डाँट पड़ी थी, ऐसे और भी उनके नटखट पन के और भी प्रसंग है। 1935 में महाश्वेता जी के पिता का तबादला मेदिनीपुर हुआ तो महाश्वेता का वहाँ के मिशन स्कूल में दाखिला कराया गया, लेकिन उसके अगले वर्ष ही मेदिनीपुर से नाता टूट गया; क्योंकि उन्हें शांतिनिकेतन  भेजने का फैसला किया गया। तब वे दस वर्ष  की थीं। शांतिनिकेतन के नियमानुसार लाल रंग के किनारे वाली साड़ी, बिस्तर, लोटा, गिलास वगैरह ख़रीदा गया। शांतिनिकेतन में मिली नई जगह, सुंदर भवन, लाइब्रेरी आदि में महाश्वेता को उन्मुक्त प्रकृति मिली। नई सहेलियाँ मिलीं। आश्रम की दिनचर्या ऐसी थी कि सभी छात्र सुबह से देर रात तक व्यस्त रहते। शिक्षा का माध्यम बांग्ला होने के बावजूद  अंग्रेजी अनिवार्य थी। शांतिनिकेतन में महाश्वेता का जल्दी ही मन लग गया। वहाँ उन्हें श्रेष्ठ शिक्षक मिले। बकौल महाश्वेता, आचार्य हजारीप्रसाद व्दिवेदी हिंदी पढ़ाते थे। सभी आश्रमवासी उन्हें 'छोटा पंडित' जी कहते थे।1937 में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी बांग्ला की कक्षा ली थी। तब सातवीं कक्षा की छात्रा महाश्वेता के लिए यह अविस्मरणीय घटना थी। गुरुदेव ने पाठ परिचय से बलाई पढ़ाया था। इसके पहले 1936  में बंकिम शत-वार्षिकी समारोह में रवींद्रनाथ का भाषण सुना था महाश्वेता ने वह उनके जीवन की एक अनमोल उपलब्धि थी। फिर कुछ परिवर्तन आ गया उन्हें लौटकर कोलकत्ता आना पड़ा,,महाश्वेता देवी शांतिनिकेतन में मात्र तीन साल ही रह सकीं, क्योंकि1939 में उन्हें कोलकत्ता बुला लिया गया। शांतिनिकेतन जाने पर वे जितना रोई थीं, उससे ज्यादा उसके छूटने पर रोई थीं। 1939 में शांतिनिकेतन से लौटने के बाद कलकत्ता के 'बेलतला बालिका विद्यालय' में आठवीं कक्षा में महाश्वेता का दाखिला हुआ। उसी साल उनके काका ऋत्विक घटक भी घर आकर रहने लगे। वे1941 तक यहाँ रहे।1939 में बेलतला स्कूल में महाश्वेता की शिक्षिका थीं अपर्णा सेन। उनके बड़े भाई खेगेंद्रनाथ सेन ‘रंगमशाल’ निकालते थे। उन्होंने एक दिन रवींद्रनाथ की पुस्तक ‘छेलेबेला’ देते हुए महाश्वेता से उस पर कुछ लिखकर देने को कहा। महाश्वेता ने लिखा और वह ‘रंगमशाल’ में छपा भी। यह महाश्वेता की पहली रचना थी। स्कूली जीवन में ही महाश्वेता ने राजलक्ष्मी और धीरेश भट्टाचार्य के साथ मिलकर एक अल्पायु स्वहस्तलिखित पत्रिका निकाली – ‘छन्नछाड़ा।’

                                                    

घर पर ही पारिवारिक माहौल था पढ़ने लिखने का नानी, दादी व माँ ने महाश्वेता को अच्छे साहित्य पढ़ने के संस्कार रोपित किए। कोई क़िताब पढ़ने के बाद कोई प्रसंग दादी माँ पूछ भी लेती थीं। बचपन में दादी की लाइब्रेरी से ही लेकर महाश्वेता ने ‘टम काकार कुटीर’ पढ़ा था। घर का पूरा माहौल ही शिक्षा और संस्कृतमय था। इसलिए लिखने-पढ़ने का एक नियमित अभ्यास छुटपन में ही हो गया। हेम-बंधु-बंकिम-नवीन-रंगलाल को उन्होंने 12 वर्ष की उम्र में ही पढ़ लिया। माँ देश प्रेम और इतिहास की पुस्तकें पढ़ने को देतीं और कहतीं- "अभी इन पुस्तकों को पढ़ना ज़रूरी है। बाद में अपनी इच्छा से पढ़ना।"पिता की भी बड़ी समृद्ध लाइब्रेरी थी। तब के 'नोबेल पुरस्कार' प्राप्त कई लेखकों की रचनाएँ महाश्वेता ने पिता की लाइब्रेरी से ही लेकर पढ़ी थीं।1939-1944 के दौरान महाश्वेता के पिता ने कलकत्ता में सात बार घर बदले।1942 में घर के सारे कामकाज करते हुए महाश्वेता ने मैट्रिक की परीक्षा पास की। उस वर्ष (1942) 'भारत छोड़ो आंदोलन ' ने महाश्वेता के किशोर मन को बहुत उद्वेलित किया। 1943 में अकाल पड़ा। तब 'महिला आत्मरक्षा समिति' के नेतृत्व में उन्होंने राहत और सेवा कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। अकाल के बाद महाश्वेता ने कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘पीपुल्स वार’ और ‘जनयुद्ध’ की बिक्री भी की थी, पर पार्टी की सदस्य वे कभी नहीं हुईं। लेखिका बनने से पहले महास्वेता देवी जी एक सामाज सेविका रही। परिवार का एक स्थान से दूसरे स्थान का जाना भारत विभाजन के बाद के समय किशोर अवस्था में ही उनका पश्चिम बंगाल में आकर रहने लगा था। इसके उपरांत उन्होंने अपनी शिक्षा विश्वभारती विश्वविद्यालय , शांतिनिकेतन से बी.ए. अंग्रेजी विषय में किया  फिर कोलकत्ता विश्वविद्यालय से एम. ए. भी अंग्रेजी में किया, फिर शिक्षक व पत्रकार की भूमिका में जीवन का आरंभ किया। 
किशोरवय में ही कंधे पर आ चुके पारिवारिक दायित्व को निभाने के प्रति भी महाश्वेता सदा सजग रहतीं।माँ  के जीवन के आखिरी वर्षों में महाश्वेता ने पुरानी सिलाई मशीन चलाकर कपड़ों की सिलाई की। 1944 में महाश्वेता ने कलकत्ता के 'आशुतोष कॉलेज' से इंटरमीडिएट किया। पारिवारिक दायित्व से कुछ मुक्ति मिली यानी वह भार छोटी बहन मितुल ने सँभाला तो महाश्वेता फिर शांतिनिकेतन गईं कॉलेज की पढ़ाई करने। वहाँ ‘देश’ के संपादक सागरमय घोष आते-जाते थे। उन्होंने महाश्वेता से ‘देश’ में लिखने को कहा। तब महाश्वेता बी.ए. तृतीय वर्ष में थीं। उस दौरान उनकी तीन कहानियाँ ‘देश’ में छपीं। हर कहानी पर दस रूपये का पारिश्रमिक मिला था। तभी उन्हें बोध हुआ कि लिख-पढ़कर भी गुजारा संभव है। उन्होंने शांतिनिकेतन से1946 में अंग्रेजी में ऑनर्स के साथ स्नातक किया।
उसके साल भर बाद1947 में प्रख्यात रंगकर्मी विजन भट्टाचार्य से उनका विवाह हुआ।1948 में पदमपुकुर इंस्टीट्यूशन में अध्यापन कर महाश्वेता ने घर का खर्चा चलाया। उसी वर्ष पुत्र नवारुण भट्टाचार्य का जन्म हुआ।1949 में महाश्वेता को केंद्र सरकार के डिप्टी एकाउंटेट जनरल, पोस्ट एंड टेलीग्राफ ऑफिस में अपर डिवीजन क्लर्क की नौकरी मिली। लेकिन एक वर्ष के भीतर ही, चूँकि पति कम्युनिस्ट थे, सो उनकी नौकरी चली गई। महाश्वेता अतुल गुप्त के पास गईं। उनकी नोटिस के दबाव में महाश्वेता की फिर बहाली हुई लेकिन इस बार महाश्वेता की दराज में मार्क्स और लेनिन की किताबें रखकर कम्युनिस्ट होने का आरोप लगाकर और अस्थायी होने के चलते दुबारा नौकरी से उन्हें हटा दिया गया। नौकरी जाने के बाद जीवन-संग्राम ज्यादा कठिन हो गया। महाश्वेता ने कपड़ा साफ करने के साबुन की बिक्री से लेकर ट्यूशन करके घर का खर्चा चलाया। यह क्रम1957 में रमेश मित्र बालिका विद्यालय में मास्टरी मिलने तक चला। विजन भट्टाचार्य से विवाह होने से ही महाश्वेता जीवन संग्राम का यह पक्ष महसूस कर सकीं और एक सुशिक्षित, सुसंस्कृत परिवार की लड़की होने के बावजूद स्वेच्छा से संग्रामी जीवन का रास्ता चुन सकीं। साठ का दशक महाश्वेता के जीवन के लिए बड़ा उथल-पुथल वाला रहा।1962 में विजन भट्टाचार्य से उनका विवाह-विच्छेद हो गया। असीत गुप्त से दूसरा विवाह हुआ। किंतु उनसे भी 1975 में विवाह-विच्छेद हो गया। उसके बाद उन्होंने लेखन और आदिवासियों के बीच कार्य कर हमेशा सृजनात्मक कार्यों में अपने को व्यस्त रखा। यह भी गौर करने योग्य है कि महाश्वेता कभी कर्तव्य से च्युत नहीं हुईं। घर में बेटी, दीदी, पत्नी, माँ और दादी माँ की भूमिका उन्होंने बखूबी निभाई। महाश्वेता आरंभ से ही अलग किस्म की महिला रहीं। इसलिए दो-दो बार विवाह-विच्छेद होने के बावजूद उनके सम्मान पर कोई आँच नहीं आई। वे वही महाश्वेता रहीं। महाश्वेता का उनके पति भी बहुत सम्मान करते थे। इसलिए विवाह-विच्छेद के बाद भी विजन या असीत ने महाश्वेता के विरुद्ध या महाश्वेता ने उन दोनों के विरुद्ध कभी कुछ नहीं कहा। विजन की मुत्यु के बाद महाश्वेता दिन भर वहाँ रहीं। वहाँ महाश्वेता की उपस्थिति को बहुत सम्मान दिया गया। बहुत संधर्ष के बाद कोलकत्ता विश्वविद्यालय में अंग्रेजी व्याख्याता के रूप में अपने नौकरी प्राप्त कर ली। सन 1984  में उन्होंने सेवानिवृत्ति ले ली। 

                                                                 

'झाँसी की रानी' की रचना --संघर्ष के इन दिनों ने ही लेखिका महाश्वेता को भी तैयार किया। उस दौरान उन्होंने खूब रचनाएँ पढ़ीं। विश्व के मशहूर लेखकों-चिंतकों की रचनाएँ, इलिया एरेनबर्ग, एलेक्सी टॉलस्टॉय, मैक्सिम गोर्की, चेख़व, सोल्झेनित्सिन, मायकोवॅस्की औररू,रूस के कई अन्य लेखकों की पुस्तकें पढ़ीं। उसी समय विजन भट्टाचार्य को एक हिंदी फ़िल्म कीकहानी लिखने के सिलसिले में मुंबई जाना पड़ा। उनके साथ महाश्वेता भी गईं। मुंबई में महाश्वेता के बड़े मामा सचिन चौधरी थे। मामा के यहाँ ही महाश्वेता ने पढ़ा – वी.डी. सावरकर, 1857। उससे इतनी प्रभावित हुईं कि उनके मन में भी इसी तरह का कुछ लिखने का विचार आया। तय किया कि 'झाँसीर रानी' (झाँसी की रानी) पर वे किताब लिखेंगी। उन पर जितनी किताबें थीं, सब जुटाकर पढ़ा। मुंबई से आने के बाद ट्यूशन वगैरह तो चल ही रहा था, लेखन को भी जीविका का साधन बनाने का विचार दृढ़ होता गया।महाश्वेता ने प्रतुल गुप्त को अपने मन की बात बताई कि वे झाँसी की रानी पर लिखना चाहती हैं। महाश्वेता ने झाँसी की रानी के भतीजे गोविंद चिंतामणि से पत्र व्यवहार शुरू किया। सामग्री जुटाने और पढ़ने के साथ-साथ उत्साहित होकर महाश्वेता ने लिखना भी शुरू कर दिया। फटाफट चार सौ पेज लिख डाले। पर इतना लिखने के बाद उनके मन ने कहा – यह तो कुछ भी नहीं हुआ। उन्होंने उसे फाड़कर फेंक दिया। झाँसी की रानी के बारे में और जानना पड़ेगा। तो इसके लिए छह वर्ष के बेटे नवारुण भट्टाचार्य और पति को कोलकत्ता में छोड़कर अंततः झाँसी ही चली गईं। तब न पति के पास नौकरी थी और न ही उनके पास। जैसे-तैसे शुभचिंतकों से पैसे लेकर वे1954 में झाँसी की यात्रा पर निकलीं। अकेले उन्होंने बुंदेलखंड के चप्पे-चप्पे को अपने कदमों से नापा। वहाँ के लोकगीतों को क़लमबद्ध किया। तब झाँसी की रानी की जीवनी लिखने वाले वृन्दावनलाल वर्मा झाँसी कंटोनमेंट में रहते थे। उनसे भी वे मिलीं। उनके परामर्श के मुताबिक़ झाँसी की रानी से जुड़े कई स्थानों का दौरा किया। बुंदेलखंड से लौटकर महाश्वेता ने नए सिरे से ‘झाँसी की रानी’ लिखी और ‘देश’ में यह रचना धारावाहिक छपने लगी। न्यू एज ने इसे पुस्तक के रूप में छापने के लिए महाश्वेता को पाँच सौ रुपये दिए। इस तरह महाश्वेता की पहली क़िताब1956 में आई। झाँसी की रानी’ (1956) के बाद महाश्वेता की दूसरी पुस्तक ‘नटी’ 1957 में आई। उसी कड़ी में ‘जली थी अग्निशिखा’ आई। ये तीनों किताबें 1857 के महासंग्राम पर केंद्रित हैं। ह्यूरोज ने ही कहा है कि- "समय और युग की सभी रूढ़ियों को तोड़कर लक्ष्मीबाई ने अपने को एक योग्य व सक्षम सेनानायक सिद्ध किया था।" ह्यूरोज के इस कथन को महाश्वेता ने ‘जली थी अग्निशिखा’ में भी उद्धृत किया है। अपने उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ (जंगल के दावेदार) में महाश्वेता देवी समाज में व्याप्त मानवीय शोषण और उसके विरुद्ध उबलते विद्रोह को उम्दा तरीके से रखांकित करती हैं। ‘अरण्येर अधिकार’ में उस बिरसा मुंड़ा  की कथा  है, जिसने सदी के मोड़ पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनजातीय विद्रोह का बिगुल बजाया। मुंड़ा जनजाति में समानता, न्याय और आजादी के आंदोलन का सूत्रपात बिरसा ने अंग्रजों के खिलाफ किया था। ‘अरण्येर अधिकार’ आदिवासियों के सशक्त विद्रोह की महागाथा है जो मानवीय मूल्यों से सराबोर है। महाश्वेता ने मुख्य मुद्दे पर उँगली रखी है। मसलन बिरसा का विद्रोह सिर्फ अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध नहीं था, अपितु समकालीन सामंती व्यवस्था के विरुद्ध भी था। बिरसा मुंडा के इन पक्षों को सहेजकरसाहित्य और इतिहास में प्रकाशित करने का श्रेय महाश्वेता को ही है। ‘अरण्येर अधिकार’ लिखने के पीछे की कहानी ये है कि1974 में फिल्म निर्माता शांति चौधरी ने महाश्वेता सेबिरसा मुंड़ा पर कुछ लिखकर देने को कहा। श्री चौधरी, बिरसा पर फिल्म बनाना चाहते थे। बिरसा पर लिखने के लिए महाश्वेता ने पहले तो कुमार सुरेश सिंह की किताब पढ़ी। फिर दक्षिण बिहार गईं, वहाँ के लोगों से मिलीं। कई तथ्य संग्रह किए। फिर लिखा ‘अरण्येर अधिकार’। 1979 में जब इस किताब पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो आदिवासियों ने जगह-जगह ढाक बजा-बजाकर गाया था- ‘हमें साहित्य अकादमी मिला है।’ तब मुंडा नाम से ही उनमें असीम गौरव बोध जगा था। जो मुंडा भूमिज नाम से सरकारी रेकार्ड में दर्ज थे, उन्होंने उपने को मुंडा नाम से दर्ज करने की प्रशासन से दरखास्त की थी। साहित्य अकादमी मिलने पर मुंडाओं ने महाश्वेता का अभिनंदन करने के लिए उन्हें अपने यहाँ (मेदिनीपुर में) बुलाया।1979 की उस सभा में आदिवासी वक्ताओं ने कहा था- "मुख्यधारा ने हमें कभी स्वीकृति नहीं दी। हम इतिहास में नहीं थे। तुम्हारे लिखने से हमें स्वीकृति मिली।" साहित्य अकादमी पाने पर महाश्वेता को जितनी खुशी नहीं हुई, उससे ज्यादा इन आदिवासियों की प्रसन्नता से हुई। महाश्वेता को लगा, आदिवासियों के बारे में उनका दायित्व और बढ़ गया है। उन्होंने आदिवासियों के लिए यथासंभव काम करते जाने और उनके बारे में और भी जानने की कोशिश जारी रखी। महाश्वेता देवी ने विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं आदि का योगदान दिया। उनका प्रथम उपन्यास 'नाती'1957 में प्रकाशित किया गया था। 'झाँसी की रानी' महाश्वेता देवी की प्रथम रचना है, जो1956 में प्रकाशित हुई। उन्होंने स्वयं ही अपने शब्दों में कहा था कि- "इसको लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।" इस पुस्तक को महाश्वेता जी नेकोलकत्ता में बैठकर नहीं, बल्कि सागर, जबलपुर,पूना,इन्दौर और ललितपुर के जंगलों; साथ ही झाँसी , ग्वालियर और कालपी में घटित तमाम घटनाएँ यानी 1957-1958 में इतिहास के मंच पर जो कुछ भी हुआ, सबको साथ लेकर लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रांति के तमाम अग्रदूतों और यहाँ तक किअंग्रेज अफ़सर तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। महाश्वेता जी कहती थीं- "पहले मेरी मूल विधा कविता थी, अब कहानी औरउपन्यास हैं।" उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ', 'जंगल के दावेदार' और '1084 की माँ', 'माहेश्वर' और 'ग्राम बांग्ला' आदि हैं। पिछले चालीस वर्षों में उनकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और सौ उपन्यासों के क़रीब प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कृतियों पर फिल्में भी बनीं।1968 में 'संघर्ष',1993 में 'रूदाली',1998 में 'हजार चौरासी की माँ', 2006 में 'माटी माई'।

महाश्वेता देवी की कुछ प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

लघुकथाएँ - मीलू के लिए, मास्टर साब
कहानियाँ - स्वाहा, रिपोर्टर, वान्टेड
उपन्यास - नटी, अग्निगर्भ, झाँसी की रानी, मर्डरर की माँ, 1084 की माँ, मातृछवि, जली थी अग्निशिखा, जकड़न
आत्मकथा उम्रकैद, अक्लांत कौरव
आलेख - कृष्ण द्वादशी, अमृत संचय, घहराती घटाएँ, भारत में बंधुआ मज़दूर, उन्तीसवीं धारा का आरोपी, ग्राम बांग्ला, जंगल के दावेदार, आदिवासी कथा
यात्रा संस्मरण - श्री श्री गणेश महिमा, ईंट के ऊपर ईंट
नाटक - टेरोडैक्टिल, दौलति
महाश्वेता देवी ने अपने कई उपन्यासों की तरह अपनी अनेक कहानियों में भी सदियों से मुख्यधारा से बाहर धकेली गई आदिवासी अस्मिता के प्रश्न को शिद्दत से उठाया है। महाश्वेता की कई कहानियाँ आदिवासियों की प्रामाणिक संघर्ष गाथाएँ हैं बल्कि उन्हें महागाथाएँ कहना ज्यादा उचित होगा। इन महागाथाओं में आदिवासी समाज की चिंता कदाचित पहली बार बेचैनी के साथ प्रकट हुई। अपनी कथाकृतियों में हाशिए पर धकेले गए आदिवासी को नायक बनाकर महाश्वेता देवीहिंदी मेंप्रेमचद्र तो बांग्ला में ताराशंकर बंद्योपाध्याय और मानिक बंद्योपाध्याय से भी आगे निकल गईं। प्रेमचंद और ताराशंकर किसान को नायक बना चुके थे तो मानिक बाबू मछुआरों को। उससे काफ़ी आगे जाकर महाश्वेता ने जनजातियों और आदिवासियों के विद्रोही नायकों को अपनी कथाकृतियों का नायक बनाया। महाश्वेता अपनी कहानियों में समाज को शोषण, दोहन और उत्पीड़न से मुक्त कराते संघर्षशील नायकों का संधान करती हैं। इन संघर्षशील आदिवासी नायकों का संधान महाश्वेता की कहानी ‘बाढ़’ में बागदी के रूप में ‘बांयेन’ में डोम ‘शाम सवेरे की माँ’ में पाखमारा ‘शिकार’ में ओरांव ‘बीज’ में गंजू ‘मूल अधिकार और भिखारी दुसाध’ में दुसाध ‘बेहुला’ में माल या ओझा और ‘द्रौपदी’ में संथाल के रूप में सहज ही हो जाता है। सन1984 में प्रकाशित अपने श्रेष्ठ गल्प की भूमिका में महाश्वेता देवी ने लिखा है- "साहित्य को केवल भाषा-शैली और शिल्प की कसौटी पर रखकर देखने के मापदंड गलत हैं। साहित्य का मूल्यांकनइतिहास के परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। किसी लेखक के लेखन को उसके समय और इतिहास के परिप्रेक्ष्य में रखकर न देखने से उसका वास्तविक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। मैं पुराकथा पौराणिक चरित्र और घटनाओं को वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में फिर से यह बताने के लिए लिखती हूँ कि वास्तव में लोक-कथाओं में अतीत और वर्तमान एक अविच्छिन्न धारा के रूप में प्रवाहित होते हैं। यह अविच्छिन्न धारा भी वायवीय नहीं है बल्कि जात-पांत खेत और जंगल पर अधिकार और सबसे ऊपर सत्ता के विस्तार तथा उसके कायम रखने की पद्धति को केंद्र में रखकर निम्न वर्ग के मनुष्य के शोषण का क्रमिक इतिहास है।" कहानियों के विषय-महाश्वेता की कहानियों में सामंती ताकतों के शोषण, उत्पीड़न, चल-छद्म के विरुद्ध पीड़ितों और शोषितों का संघर्ष अनवरत जारी रहता है। संघर्ष में वह मार भी खाता है पर थककर बैठ नहीं जाता। क्रूरता और बर्बरता में भी पीड़ित तबका टिके रहता है। कई उपन्यासों की तरह उनकी कहानियों में भी आदिम जनजातीय स्रोतों से प्राप्त कथा तो है ही, जीवन और समाज के दूसरे ज्वलंत मुद्दों को भी उन्होंने साधिकार स्पर्श किया है। ‘रुदाली’ कीकहानी में महाश्वेता ने औरत की अस्मिता का प्रश्न उम्दा तरीके से उठाया तो ‘अक्लांत कौरव’ में विकास और छद्म प्रगतिवाद की तीखी आलोचना की।

                                                         

उनकी कुछ प्रमुख लेखन के विषय मेंम कुछ बातेः

1- भूख---अंग्रेज़ों से राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी देश का एक बड़ा हिस्सा किस तरह परंपरागत तौर पर सामाजिक और आर्थिक गुलामी में जीने को मजबूर है उसे महाश्वेता देवी के लिखे उपन्यास ‘भूख’ में देखा जा सकता है। झारखंड की पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस उपन्यास में उस सामाजिक ढांचे को देखा जा सकता है जिसमें वंचित तबके के लोग मरते दम तक जीने को मजबूर हैं।

2- 1084वें की मां---महाश्वेता देवी का उपन्यास ‘1084वें की मां’ एक औरत के संघर्ष और विद्रोह पर आधारित है। यह एक ऐसी मां की कहानी है जो सालों बाद राजनीतिक उथल- पुथल में अपने बेटे की हत्या के बाद भी हिम्मत नहीं हारती है।

3- चोटी मुंडा और उसका तीर---यह उपन्यास भारत के आदिवासी समाज और उनके जीवन के संघर्ष की कहानी पर आधारित है। महाश्वेता देवी ने इस उपन्यास में नायक चोटी मुंडा के संघर्ष से भरे जीवन के जरिए मुंडा समुदाय के शोषण, उत्पीड़न को दिखाया है।

4- जंगल के दावेदार--महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ में बिरसा की लड़ाई सिर्फ आर्थिक शोषण के खिलाफ और भूमि आंदोलन से ही नहीं जुड़ी है बल्कि हर तरह के वर्चस्ववाद के खिलाफ़ भी है। बिरसा की लड़ाई जहां एक ओर ब्रिटिश हुकुमत और साम्राज्यवाद से है, वहीं दूसरी ओर शोषणतंत्र, सामंतवाद, ज़मींदारी व्यवस्था और धार्मिक छलावे से भी है।

5- द्रौपदी--इस कहानी में द्रौपदी एक आदिवासी महिला है जिसे सेनानायक ने पकड़ लिया है और उस सेनानायक के आदेश पर सेना द्वारा उसका बलात्कार किया जाता है। यह कहानी नक्सल आंदोलन और बांग्लादेश लिबरेशन युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। महाश्वेता देवी ने इस कहानी में एक ऐसी महिला को दिखाया है जो यौन हिंसा और सामाजिक मानकों का विरोध करती है।

6- पंचकन्या--महाश्वेता देवी की पंचकन्या की कहानी पांच विधवा महिलाओं के जीवन के इर्द- गिर्द घूमती है। जिनके पति कुरुक्षेत्र के युद्ध में मारे जाते हैं। इस कहानी में महाश्वेता देवी यह दिखाती हैं कि कैसे कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद महिलाएं पितृसत्तात्मक समाज का शिकार बन जाती हैं। वर्तिका' का सम्पादन-पलामू के बंधुआ मजदूरों के बीच काम करते हुए महाश्वेता ने कई तथ्य एकत्रित किए थे।

उसी के आधार पर निर्मल घोष के साथ मिलकर उन्होंने ‘भारत के बंधुआ मजदूर’ नामक पुस्तक लिखी थी। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आदिवासी अंचलों के सुख-दु:ख के बारे में उन्होंने समय-समय पर जो लिखा, वे भी संकलित होकर पुस्तक रूप में छाप चुकी हैं- ‘डस्ट आन रोड’। महाश्वेता की टिप्पणियों के इस संकलन को मैत्रेई घटक (महाश्वेता के छोटे भाई) ने संपादित किया है।1980 में उन्होंने पत्रिका ‘वर्तिका’ का संपादन शुरू किया था। उसके पहले उनके पिता मनीष घटक उसे संपादित करते थे। पिता का1979 में निधन हो गया तो महाश्वेता ने पत्रिका का चरित्र ही बदल डाला। वर्तिका एक ऐसा मंच बन गया, जिसमें छोटे किसान, खेत मजदूर, आदिवासी, कारखानों में काम करने वाले मजदूर, रिक्शा चालक अपनी समस्याओं और जीवन के बारे में लिखते। अब भी लिखते हैं। ‘वर्तिका’ में मेदिनीपुर के लोधा और पुरुलिया के खेड़िया शबर आदिवासियों ने बहुत कुछ लिखा। इसके जरिए आदिवासियों ने जीवन में पहली बार किसी प्रकाशन में लिखा। पहली लोधा स्नातक लड़की चुनी कोटाल ने भी 1982 में वर्तिका में लिखा था अपने जीवन संघर्ष के बारे में। इस तरह वर्तिका के जरिए महाश्वेता ने बांग्ला  में वैकल्पिक साहित्यिक पत्रकारिता की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किए। महाश्वेता ने बंधुआ मजदूर, किसान, फैक्टरी मजदूर, ईंट भट्ठा मजदूर, आदिवासियों को जमीन से बेदख़ल किए जाने और बंगाल के हरेक आदिवासी समुदाय पर वर्तिका के विशेष अंक निकाले। उन्होंनेबांग्ला देश और अमेरिका के आदिवासियों पर भी विशेष अंक निकाले। वर्तिका ने अपनी गहरी संपादकीय दृष्टि और संपादकीय विवेक का परिचय दिया।

इनको मिले विभिन्न पुरस्कारः

(1)मेगेसेसे पुरस्कार 1977
(2)साहित्य अकादमी पुरस्कार 1979
(3)पद्मश्री 1986
(4)ज्ञानपीठ पुरस्कार 1996
(5) पद्म विभूषण2006

महाश्वेता देवी कहती है कि लेखन ही मेरी आय का स्त्रोत है। और मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे बंधुआ मजदूरों, जनजातियों का समर्थन मिला। शायद हिंदुस्तान मे मैं अकेली औरत हूँ जिसे जनजातियों और गैर जनजातियों का विश्वास प्राप्त हुआ। रचनात्मक लेखन की कोशिश करती हूँ और जो भी मेरे पास कोलकत्ता में आता है, मैं उसकी मदद करती हूँ, अगर मैं कर सकने की हालत में हूँ । मैं इतनी पावरफूल नहीं हूँ।मैं सांसद नहीं हूँ, एम.एल.ए भी नहीं हूँ, लेकिन मैने देखा है कि अगर आप सिंसियरली किसी के लिए काम करें तो आपको सफलता मिलती है। महाश्वेता देवी (1926-2016) बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों की भारत की अग्रणी साहित्यिक हस्तियों में से एक थीं—एक लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनका योगदान सर्वथा सराहनीय था। अनेक उपन्यासों, निबंधों और लघु कथाओं की लेखिका महाश्वेता देवी को 1996 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें 1997 में 'कला और सक्रियता के माध्यम से आदिवासी लोगों को भारत के राष्ट्रीय जीवन में न्यायसंगत और सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए किए गए करुणापूर्ण अभियान' के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। महाश्वेता देवी का निधन 18 जुलाई 2016, को कोलकत्ता में हुआ। उन्हें 22 मई को कोलकाता के बेल व्यू नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। उनके शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। दिल का दौरा पड़ने के बाद उनका निधन हो गया।
ऐसी विलक्षण प्रतिभा को हमारा सादर नमन और विनम्र श्रध्दांजलि। 

चिरंजीव (स्वतंत्र लेखन) संकलन व लेखन
लिंगम चिरंजीव राव
म.न. 11-1-21/1 , कार्जी मार्ग 
इच्चापुरम, श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिन532 312, मो. न. 8639945892