गजानन माधव ‘’मुक्तिबोध’’ जन्म 13-11-1917 - जयंती 13-11-2025
गजानन माधव ‘’मुक्तिबोध’’ जन्म 13-11-1917 - जयंती 13-11-2025
जीवन का बोध-‘मुक्तिबोध’ अज्ञेय जी के तारसप्तक के प्रथम कवि “कालहिनता और क्षण भंगुरता के वाह्य बोध से मुक्त कर हमें उस आंतरिक भाव बोध की ओर ले जाते, जो तमाम संकीर्ण विचारों से मुक्त कर मनुष्यता को बचाए रखने के प्रयास मे एक कदम आगे बढ़ाता है, जीवन और कविता के संबंध का बोध कराते मुक्तिबोध हमारी संवेदनाओं को जगाते है, अभिव्यक्ति के खतरे उठाते है, और अपने समय को झकझोरने के शब्द सिखलाते है। ” गजानन माधव 'मुक्तिबोध' का जन्म 13 नवंबर 1917 को श्योपुर (शिवपुरी) जिला मुरैना, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। आपके पिता का नाम माधवराव और माता का नाम पार्वती बाई था। पिता थानेदार रहकर उज्जैन में इन्स्पेक्टर पद से रिटायर हुए। पूजापाठ के प्रति आस्तिक विचार, निर्भीक, न्यायनिष्ठ और घोर रिश्वत-विरोधी होने के कारण जब रिटायर हुए तब खाली हाथ थे। मुक्तिबोध की प्रारंभिक शिक्षा उज्जैन में हुई। 1938 में बी० ए० पास करने के पश्चात आप उज्जैन के मॉर्डन स्कूल में अध्यापक हो गए । आपने अनेक स्थानों पर अध्यापन कार्य किया और अर्थ-संकट भी भोगा। 1954 में एम० ए० करने पर राजनाँदगांव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक पद पर नियुक्त हुए। मुक्तिबोध का विवाह माता-पिता की इच्छाओं के विरूद्ध हुआ था, किंतु पत्नी के साथ उनका वैचारिक अनुकूलता नहीं हो पाई। पत्नी को मुक्तिबोध के कवि-व्यक्तित्व की अपेक्षा सम्पन्नता और सुविधापूर्ण जीवन में अधिक रुचि थी। लाड-प्यार से पले मुक्तिबोध का शेष जीवन अभाव, संघर्ष और विपन्नता में कटा। हिंदी साहित्य की स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे। हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। इनके पिता पुलिस विभाग के इंस्पेक्टर थे और उनका तबादला प्रायः होता रहता था। इसीलिए मुक्तिबोध जी की पढाई में बाधा पड़ती रहती थी। सन 1930 में मुक्तिबोध ने मिडिल की परीक्षा उज्जैन, से दी और फेल हो गए। कवि ने इस असफलता को अपने जीवन की महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में स्वीकार किया है। उन्होंने 1943 में साहित्य रचना का कार्य प्रारम्भ किया और सन १९३९ में इन्होने शांता जी से प्रेम विवाह किया। 1942 के आस-पास वे वामपंथी विचारधारा की ओर झुके तथा शुजालपुर में रहते हुए उनकी वामपंथी चेतना मजबूत हुई। आधुनिक हिंदी की बीसवीं शताब्दी काव्यधारा में स्पष्ट रूप से तीन मोड़ हमें दिखाई देते है। क्रमशःछायावादी,प्रगतिवादी और प्रयोगवादी । जिसमें प्रयोगवादी व प्रगतिवादी कवियों में बहुत ऐसे कवि है जो दोनों साहित्यिक धारों में सक्रिय रहे है। प्रयोगवाद का आरंभ 1943 ई.के तारसप्तक के प्रकासन से माना जाता है. यह सर्वविदित है इसके इसके संपादक अज्ञेय ने सात कवियों की कविताओं को तारसप्तक में स्थान दिया जिनमें प्रथम तारसप्तक के कवियों में प्रगतिवादी व प्रयोगवादी कवि मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे, इनका काव्य अपने समय का जीवित इतिहास है। जन पक्षधरता मुक्तिबोध के काव्य की मूल संवेदना थी । मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार 'तार सप्तक' के माध्यम से सामने आई, लेकिन उनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हो पाया। मृत्यु के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल 'एक साहित्यिक की डायरी' प्रकाशित की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ। ज्ञानपीठ ने ही 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' प्रकाशित किया था। इसी वर्ष नवंबर1964 में नागपुर के विश्वीभारती प्रकाशन ने मुक्तिबोध द्वारा 1963 में ही तैयार कर दिये गये निबंधों के संकलन नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध' को प्रकाशित किया था। परवर्ती वर्षो में भारतीय ज्ञानपीठ से मुक्तिबोध के अन्य संकलन 'काठ का सपना', तथा 'विपात्र' (लघु उपन्यास) प्रकाशित हुए। पहले कविता संकलन के 15 वर्ष बाद,1980 में उनकी कविताओं का दूसरा संकलन 'भूरी भूर खाक धूल' प्रकाशित हुआ और 1985 में 'राजकमल' से पेपरबैक में छ: खंडों में 'मुक्तिबोध रचनावली' प्रकाशित हुई, वह हिंदी के इधर के लेखकों की सबसे तेजी से बिकने वाली रचनावली मानी जाती है।
इसके बाद मुक्तिबोध पर शोध और किताबों की भी झड़ी लग गयी।1975 में प्रकाशित अशोक चक्रधर का शोध ग्रंथ 'मुक्तिबोध की काव्यप्रक्रिया' इन पुस्तकों में प्रमुख था। कविता के साथ-साथ, कविता विषयक चिंतन और आलोचना पद्धति को विकसित और समृद्ध करने में भी मुक्तिबोध का योगदान अन्यतम है। उनके चिंतन परक ग्रंथ हैं- एक साहित्यिक की डायरी, नयी कविता का आत्मसंघर्ष और नये साहित्य का सौंदर्य शास्त्र। भारत का इतिहास और संस्कृति इतिहास लिखी गई उनकी पुस्तक है। काठ का सपना तथा सतह से उठता आदमी उनके कहानी संग्रह हैं तथा विपात्रा उपन्यास है। उन्होंने 'वसुधा', 'नया खून' आदि पत्रों में संपादन-सहयोग भी किया।
लेखन - आपने कहानी, कविता, निबंध, आलोचना, इतिहास विधाओं में साहित्य सृजन किया
कविता संग्रह : चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी भूरी खाक धूल तथा तारसप्तक में रचनाएं प्रकाशित
कहानी संग्रह : काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी।
उपन्यास: विपात्र
आलोचना : कामायनी : एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ
आत्माख्यान: एक साहित्यिक की डायरी
इतिहास : भारत : इतिहास और संस्कृति
रचनावली : मुक्तिबोध रचनावली (सात खंड)


मुक्तिबोध अत्यन्त अध्ययनशील थे। आर्थिक संकट कभी भी उनकी अध्ययनशीलता में बाधा नहीं बन पाए। राजनाँदगाँव उनका अध्यापन-क्षेत्र ही नहीं, अध्ययन- क्षेत्र भी था। यहाँ रहते हुए उन्होंने अँग्रेज़ी, फ्रेंच तथा रूसी उपन्यासों के साथ जासूसी उपन्यासों, वैज्ञानिक उपन्यासों, विभिन्न देशों के इतिहास तथा विज्ञान-विषयक साहित्य का गहन अध्ययन किया। इस अध्ययन के फलस्वरूप 1962 में उनकी अन्तिम रचना, 'भारत इतिहास और संस्कृति' प्रकाशित हुई। इसके प्रकाशित होते ही तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार उनसे चौकन्नी हो गुई और मुक्तिबोध भीतर तक चोट पहुँचाई और इससे उनके हृदय पर ऐसी गहरी चोट पहुँची कि अकस्मात् 17 फरवरी 1964 को पक्षाघात ने इन्हें धर दबोचा। भोपाल के हमीदिया अस्पताल में उनका उपचार हुआ परंतु जब दशा और अधिक बिगड़ गई तो मुक्तिबोध को देहली के ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में भरती करवाया गया। इनके जीवन की अनेक बातें साहित्यकार की विशेषताओं का अंग रही है। महाकवि नीराला के बाद गजानन माधव मुक्तिबोध निर्विवाद रूप से अकेले कवि है जिन्हें अवलान के पश्चात साहित्य की दुनिया में असाधारम ख्याति मिली। हमारी विड़बना है कि हम किसी साहित्यकार की ख्याति के विषय में गरीबी और उपेक्षा को मानक बना लिया है, और यह व्यक्ति की अनुपस्थिति या न रहने की स्थिति में नके बारे में बढ़ा चढ़ाकर बोलने की आदतो से लाचार और उसे साबित करने का प्रयास रहता जो यह निरूपित करता है कि वे इस वजह से महान है। समाज के आम लोगों का इस मानक के आधार पर ऐसा करना समझ आता है परंतु साहित्य समाज के लोग भी लेखक के महत्व की कसौटी को लेखक की गरीबी मान लेना कहाँ सही है।और यह सार्वजनिक मानक इन्हीं के सात नहीं वरन् नीराला, मुक्तिबोध और पहले के दौर मे मिशीं प्रेमचंद के साथ भी रहा। जबकि वास्तविकता तो यह है कि ये तीनों लेखक महान और कालजयी कृतियों के कारण है। उनके जीवन मे उनका स्वाभिमानी होना गरीबी और आभाव के लिए उत्तरदायी रहा। नीराला और मुक्तिबोध ने कभी समझौता नहीं किया और न कभी भौतिक-राजनीतिक तौर पर ताकतवर लोगों के सामने कभी झुके। यहाँ मैं मुक्तिबोध के साथ नीराला जी के प्रसंगों पर जो बाते लिख रहा हूं । ऐसा करने के पीछे मेरी मंशा केवल यही है की वे दोनों अपने जीवन में अनेक ऐसे समान प्रसंगों के दौर से गुजरे है जो हमें उनके ऐसे सभी प्रसंग एक दूसरे के पूरक प्रतीत होते है। दोनों के प्रसंगों में खासतौर पर यह उल्लेखनीय है कि दोनों ने व्यक्तिगत जीवन में बार-बार हार का सामना किया, टूट गए, पर झुके नहीं। दोनों ने अपनी कविताओं में जनता के स्वाभिमान को जिवित रखा, एक छायावाद दूसरे नई कविता दोनों के भीतर कविता के प्रतिमान मौजूद रहे। यह कहना उचित होगा कि इन दोनों का काव्य संधर्ष उनके जीवन संधर्ष से अलग नहीं है, बल्कि सामाजिक संधर्ष की ही उपज है। मुक्तिबोध की जन्मशताब्दी के दौरान उनके बचे हुए मित्रों के साथ साहित्य की तीन-चार पीढियों ने मुक्तिबोध के जीवन ,धर्ष और नके काव्य संधर्ष को समझने के प्रयास किए । ऐसे ही प्रयासों मे से दो के प्रयासों के कुछ अंश आप सभी के लिए । हिंदी की कथाकार कृष्णा सोबती जो वर्तमान मे हमारे बीच नहीं रही , उनके व्दारा मुक्तिबोध को पढ़ते ‘’मुक्तिबोधः एक व्यक्तित्व सही की तलाश में’’ और दूसरे उनके मित्र नामवर सिंह का ‘’संधर्ष का तापः मुक्तिबोध’’ शीर्षक से महावीर अग्रवाल की बातचीत पर एकाग्र पुस्तक मुक्तिबोध के कवि व्यक्तित्व के साथ उनके जीवन संधर्ष को जानने समझने का साधन है। एक विस्तृत बातचीत है। मुक्तिबोध के समय में हिंदी साहित्य की आलोचना व्यक्तिकेन्द्रित और समाजिकता के दो परस्पर विरोधी धाराओं में बटी हुई थी। मुक्तिबोध के अनुसार या उनकी दृष्टि में आलोचको का प्रथम पक्ष व्यक्ति स्वातंत्र्य को अंतिम सत्य मानने लगता था। जबकि दूसरा पक्ष मुक्ति संधर्ष , राष्ट्र प्रेम, प्रकृतिक सौंदर्य, नारी सौंद्र्य, यथार्थ, आलोचन-भावना, आशा, उत्साह और तत्समान भावों को ही प्रगतिशील समझता रहा। मुक्तिबोध ने इन परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों के बीच कोई सामन्वय स्थापित करने प्रयास नहीं किया । उसके स्थान पर उन्होंने रचना सी सम्रग परख का आग्रह किया। इसलीए आलोचना के प्रति उनके दृष्टिकोण को समग्रतावाद कहा जा सकता है। रचना और आलोचना दोनों ही क्षेत्रों मे मुक्तिबोध सजगता को अत्यंत महत्व देते है। मुक्तिबोध की कविताएः- इनकी प्रयोगवादी कविताओं में एक प्रकार के बौध्दिक व्यक्तिवाद और मानसिक प्रत्याधातों का विलक्षण, विशिष्ठ लेकिन जटिल संयोजन देखा जा सकता है। उनके काव्य संग्रह , एक समर्पित रचनाकार के खुरदरे अनुभव के बावजूद अपने वर्तमान में गहराई से धँसी इनकी रचनाएँ समकालीन कविता के पाठकों के लिए एक अनिवार्य जगह बनाती है।
ओ सूर्य, तुझ तक पहुँचने की
मूर्खता करना नहीं मैं चाहता ( मर जाऊँगा )
पक्षी और दीमक
बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बंद खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ, दीवार से लग कर, काँटेदार बेंत की हरी-घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़ कर फैल गई है और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखने वालों को लगेगा कि वे उस बेल के फूल नहीं, वरन बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं। मुक्तिबोध जी की एक किताब ‘’एक साहित्यिक की डायरी’’ मुक्तिबोध की आलोचना की सबसे अच्छी किताब है। मुक्तिबोध का अंतर्व्दव्द भी भीतरी और बाहरी संवाद का दूसरा रूप है। सहज संवाद की भाषा है। यह डायरी एक व्यापक अर्थ में रचना प्रक्रिया का ग्राफ चित्र भले ही हो, वस्तुतः वह उत्तर शती की जटिल जीवन प्रक्रिया का जीवंत दस्तावेज है। यह एक किताब नहीं बल्कि यह ने साहित्य के सरोकारों और लेखक के दायित्वबोध की दभुत किताब है. नामवर सिंह कहते हैः “अकूत प्रतिभा के धनी मुक्तिबोध की सतत आत्मसजगता, सतर्कता और संवाद की पारदर्शिता के कारण ही पाँच दशकों से एक साहित्यिक की डायरी जीवंत बहस का सर्जनात्मक दस्तावेज बन सकी है। नयापन और मौलिकता उसकी आंतरिक शक्ति है। डायरी का यह रचना संसार ताजगी और नयापन से ओत-प्रोत है। उनकी मौलिकता अपनी तरह की मौलिक और अव्दितीय है. आधुनिक चेतना और गहरे चिंतन की एक महान उपलब्धि है एक साहित्यिक की डायरी’’।“ कहना न होगा कि मुक्तिबोध की यह कृति नए साहित्य का प्रस्तान बिंदु है, जो साहित्य की सभी विधाओं में धीरे-धीरे प्रस्फुटित होता है। मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि को समझने की कुंजी तो है ही, यह नए लेखकों की जनगीता भी है। मुक्तिबोध के जीवन संधर्ष में उनकी बदलती हुई नौकरियाँ, छूटते हुए शहर और मृत्यु के कुच समय पूर्व राजनांदगाँव के दिग्विजय कॉलेज में हिंदी प्राध्यापिकी का दौर। दौ सौ रूपये प्रतिमाह वेतन, निम्न मध्यवर्गीय जीवन के कष्ट निरंतर बने रहे। कॉलेज की नौकरी के दौरान उनका मकान भी जर्जर हालत मे था. बाल्टी से पानी बाहर से लाना पड़ता था फिर भी उनके चेहरे पर शिकन नहीं। ऐसे संधर्षशील समय उनके व्दारा लिखा दिल्ली नेमिचंद जैन जी को पत्र लिखे जो आज भी उनकी पारिवारिक परिस्थितियों का गवाह है। नेमि जी उन्हें दिल्ली में चाहते थे और कहते थे की वे परिवार के साथ लेकर या छोड़कर दिल्ली आ जाए, इस उधेड़बुन में वे नेमिचंद को अपनी मजबूरी बयाँ करते हुए लिखते हैः”नेमिबाबू मेरी जिंदगी की कहानी बेहद उदास है। बास कुछ दिनों जब वे दिल्ली पहुँचे, बाद की स्थिति “ क्या विड़बना है कि मुक्तिबोध जीवन के अंत में नीम बेहोशी में ट्रेन व्दारा शांताबाई और हरिशंकर परसाई की गोद में दिल्ली पङुँचते है, जहाँ के एम्स में जीवन की आखरी घड़ियों तक बदस्तूर रहते है, पर वे बेहोशी के हालत से बाहर नहीं निकल पाए और अततः जग से ओझल हो गए। लगभग आठ महीने तक मृत्यु से जूझते हुए 11-09-1964 को मुर्छा की अवस्था में ही रात में ही आपका देहांत हो गया। ऐसे महान कवि को सादर नमन के साथ विनम्र श्रध्दांजलि।
चिरंजीव(लिंगम चिरंजीव राव)
म.न.11-1-21/1, कार्जी मार्ग, इच्छापुरम
श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश) पिन 532-312
स्वतंत्र लेखन(संकलन व लेखन)
मों न. 8639945892




