‘ कितना सुखद! कितना भविष्य के लिए चिंताजनक ?’’

राजीव खंडेलवाल। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास)
30 जुलाई 2026.

‘‘ भूमिका ’’

जंतर-मंतर पर ‘‘घोषित उद्देश्यों’’ की प्राप्ति तक चलने वाला अनिश्चितकालीन आंदोलन अंततः 36 दिनों बाद समाप्त हो गया। आंदोलन के प्रवक्ताओं ने केंद्रीय मंत्रियों जे.पी. नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में संयुक्त प्रेस वार्ता कर आंदोलन समाप्ति की घोषणा की। देश ने राहत की सांस ली। छत्रपति संभाजी नगर (महाराष्ट्र) के एक युवा अभिजीत दिपके द्वारा सोशल मीडिया मंच ‘‘इंस्टाग्राम’’ पर शुरू किया गया यह अभियान आरंभ से लेकर समापन तक अनेक अप्रत्याशित घटनाओं, विचित्रताओं, आशंकाओं, नेतृत्व परिवर्तन, जनसमर्थन और राजनीतिक बहसों का केंद्र बना रहा। इस आंदोलन ने न केवल अनेक स्थापित धारणाओं को चुनौती दी, बल्कि लोकतांत्रिक आंदोलनों की भाषा, परिभाषा व वेशभूषाएं बदलने की दिशा में अग्रसर हुआ। 

‘‘ घटनाक्रम क्रमवार ’’ 

1 ‘‘चिंगारी’’

उच्चतम न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश न्यायाधिपति सूर्यकांत के द्वारा 15 मई को एक फर्जी लॉ डिग्री और सीनियर एडवोकेट पदनाम से जुड़ी सुनवाई के दौरान युवाओं पर की गई मौखिक टिप्पणी बेरोजगार ‘‘कॉकरोच’’ की तरह होते हैं, जिन्हें नौकरी नहीं मिलती है, वे मीडिया, सोशल मीडिया व ‘‘आरटीआई एक्टिविस्ट’’ बनकर सिस्टम पर हमला खड़ा करते हैं’’ ने बवंडर खड़ा कर दिया। फलस्वरुप अगले दिन 16 तारीख को एक युवा दलित अभिजीत दिपके ने ‘‘व्यंग्यात्मक ऑनलाइन मूवमैंट’’ शुरू करने के लिए विशुद्ध गैर राजनीतिक ‘‘कॉकरोच जनता पार्टी’’ (ब्श्रच्) के गठन की घोषणा की। ‘‘विश्व इतिहास में सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर बनी सीजेपी पहली पार्टी’’। 

2 ‘‘ऐतिहासिक समर्थन’’ 

जस्टिस सूर्यकांत द्वारा उक्त टिप्पणी से उत्पन्न बवाल होने के बाद दिए गए स्पष्टीकरण के बावजूद ‘‘कॉकरोच’’ कहने पर प्रतिक्रिया स्वरूप एक भारतीय नागरिक अभिजीत दिपके द्वारा अमेरिका के बोस्टन शहर से 16 मई को इंस्टाग्राम पर किए गए आवाहन की अनुक्रिया (रिस्पांस) में ऐतिहासिक 2 करोड़ 80 लाख लोगों का समर्थन, शायद विश्व में पहली बार ‘‘इंस्टाग्राम’’ पर हुआ।

3 ‘‘दिल्ली आगमन’’

3 जून को भारत वापस लौटकर पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर मंतर पर 6 जून को प्रदर्शन करने की घोषणा की।  

4 ‘‘नेतृत्व परिवर्तन’’

20 जून से जनता मंतर पर आंदोलन प्रारंभ होने के बाद ‘‘अचानक’’ 28 जून को  लद्धाख के प्रसिद्ध पर्यावरणविद, शिक्षा सुधारक, सामाजिक कार्यकर्ता व अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त सोनम वांगचुक के स्वःप्रेरणा से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक ‘‘अनशन’’ पर बैठने से आंदोलन को ‘‘गति’’ मिली और वांगचुक इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता हो जाते हैं। प्रारंभ में आंदोलन मात्र तीन चार हजार लोगों तक ही सीमित रहा। 5 सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने पर 16 जुलाई को एक याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की आती है, जिसमें ‘‘चिकित्सा हस्तक्षेप’’ की मांग की गई। तथापि इसे ‘‘शंका की निगाहों’’ से देखा जाता है। 

5 ‘‘अस्पताल में भर्ती’’

वांगचुक की तबियत बिगड़ने से 18 जुलाई को अचानक सुबह 6.00 बजे पुलिस द्वारा उन्हें सफेद चादर में लपेटकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया। इससे आंदोलन को और तीव्र गति मिलती है। 21 जुलाई को सोनम की पत्नी गीतांजलि की याचिका पर न्यायालय के आदेश से वांगचुक को निजी अस्पताल मेदांता में स्थानांतरित किया गया। 

6 ‘‘राजनेताओं का प्रवेश’’

19 जुलाई को 20 तारीख को प्रारंभ होने वाले संसद के घेराव का ऐलान। विपक्षी दलों के नेतागण, फिल्म हस्तियां व अन्य सेलीब्रेटीज धरना स्तर पर आकर सोनम वांगचुक से मिलते हैं। अरविंद केजरीवाल, मनोज झा, कीर्ति आजाद, प्रशांत भूषण, स्वरा भास्कर, कुणाल कामरा, प्रकाश राज आदि।

7 ‘‘बल प्रयोग’’

दिल्ली में पहली बार किसी आंदोलन पर ‘‘पैलेट गन’’ का इस्तमाल रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) ने किया। साथ ही सादे कपड़े में पुलिस वाले लाठियां ‘‘भूंज’’ रहे थे।

8 ‘‘पुनः नेतृत्व परिवर्तन’’

अचानक 21 जुलाई को राहुल गांधी की नेतृत्व में कांग्रेस सहित विपक्ष के सांसद गण प्रधानमंत्री आवास के सामने पहुंचकर धरने पर बैठ जाते हैं और इस प्रकार चल रहा आंदोलन का नेतृत्व छणिक राहुल गांधी के हाथों में आ जाता है। तत्पश्चात आंदोलन, युवा शक्ति व नागरिकों के हाथों में आ जाता है। इस प्रकार आंदोलन में ‘‘तीन बार’’ उपरोक्तानुसार नेतृत्व परिवर्तन होने के बावजूद नेतृत्व किसी ‘‘रजिस्टर्ड नेता’’ के हाथ नहीं जाता है, जो आंदोलन को अपने आप में ऐतिहासिक बना देता है।

‘‘आंदोलन के दो ‘‘अंतराल’’-दो रूप’’

 भाजपा को इस आंदोलन को दो अंतराल के दो रूप को देखकर उसके ‘‘अंतर’’ को समझना होगा। प्रारंभिक चरण में 20 जुलाई के लाठी चार्ज से पहले तक आंदोलन देशव्यापी होने के बावजूद विशुद्ध रूप से विपक्षी दलों का रहा, जिसमें सामान्य निष्पक्ष नागरिकों की भागीदारी ‘‘अल्प’’ थी। लेकिन लाठी-चार्ज धक्का मुक्की, लडकियों के साथ दुर्व्यवहार के वीडियो वायरल होने पर भाजपा का बड़ा समर्थक वर्ग, जो अभी तक ‘‘काॅकरोच आंदोलन’’ में शामिल नहीं था और जो श्री राम मंदिर चढ़ावा कांड से भी बहुत नाखुश नहीं हुआ था, वह भी विचलित होकर आंदोलन में शामिल हो गया। इसका एक संकेत ‘‘जोमैटो’’ ‘‘स्विगी’’ कम्पनी द्वारा देश भर से जंतर-मंतर तक इतनी मात्रा में खाना पहुंचाया गया कि आंदोलनकर्ताओं को मना करना पड़ा। आंदोलनों के इतिहास में यह पहली बार हुआ। सामान्यतः ऐसी व्यवस्था स्थानीय स्तर पर ही होती रही हैं।
तीखे सवाल । 

1 ‘‘खलनायक केजरीवाल’’

अरविंद केजरीवाल द्वारा अपने साथियों से राहुल गांधी के प्रधानमंत्री निवास पर धरने की आलोचना करवा कर खलनायक बन बैठे? चूंकि हमारी फिल्मों में खलनायक काफी लोकप्रिय रहते है, जैसे ‘‘संजय दत्त’’ खलनायक फिल्म के नायक रहे है। शायद इसीलिए केजरीवाल ने ‘‘खलनायक’’ बनना पसंद किया?  

2 ‘‘अभिजीत’ कही भस्मासुर तो नहीं’’सिद्ध होगे?’’

जिस दिन अभिजीत दिल्ली एयरपोर्ट पर उतर रहे थे और सरकार ने जिस तरह से ‘‘रेड़ कारपेट’’ बिछाकर हाथो हाथ उनके हाथ में आंदोलन की अनुमति पत्र देकर स्वागत किया, तबसे ही राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा का विषय गर्म था कि श्री राम जन्मभूमि मंदिर चढ़ावा गबन कांड से जनता का ध्यान भटकाने के लिए कहीं भाजपा ने इस ‘‘केजेपी आंदोलन’’ की रचना तो नहीं रची? सोनम वांगचुक का आंदोलन में अचानक आना व फिर केन्द्रीय मंत्रियों के हाथों से, केजेपी छात्रों की अनुपस्थिति में जूस पीकर भूख हड़ताल समाप्त करने की घटना, उक्त कथित आरोप को बल देती है। पुलिस द्वारा लाठी-चार्ज करने से आंदोलन का उग्र रूप होकर मंदिर चढ़ावा गबन कांड से पूरी तरह ध्यान हट जाना, क्या संकेत करता है? लेकिन सफलता प्राप्त होने के बाद कही आगे अभिजीत ‘‘भस्मासुर’’ तो साबित नहीं होने वाले है? यह आशंका अभिजीत के वे अगले आंदोलन की घोषणा पर निर्भर करेगी।  

3 ‘‘गीतांजलि द्वारा राहुल गांधी की आलोचना’’

सोनम की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने राहुल गांधी की प्रधानमंत्री निवास के सामने धरने को राजनीतिक स्टंट बताते हुए यह कहकर आलोचना की कि उन्हें जंतर मंतर पर आना चाहिए था। पेपर लीकेज को लेकर राष्ट्रीय छात्र युवा संगठन और युवा कांग्रेस द्वारा सबसे पहले किए गए आंदोलन में क्या वांगचुक ने भागीदारी की थी? इस प्रश्न के पत्नी के उत्तर में जवाब शामिल है? 

आंदोलन के परिणाम! खाता-बही! क्या खोया-क्या पाया? 

कुछ मिथक टूटे। कुछ नए बने

‘‘ पाया’’

1 डिजिटल जनक्रांति। जमीन पर अभी तक कोई संगठन नहीं? न ही बनाने के कोई संकेत?
2 विश्व के इतिहास में पहली बार इंस्टाग्राम पर सफल आंदोलन का आह्वान। 2 करोड़ 80 लाख लोगों का समर्थन। प्रधानमंत्री की अपील से ज्यादा रिस्पांस।
3 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ‘‘इंस्टाग्राम’’ का अधिक उपयोग करने लग गये। 
4 राजनाथ सिंह का कथन ‘‘एनडीए सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं,’’ यह मिथक टूटा।
5 अभिजीत के भारत में एयरपोर्ट पर उतरते ही रेड कारपेट जैसा स्वागत कर उनके हाथों में जंतर मंतर पर प्रदर्शन आंदोलन की अनुमति देना अभूतपूर्व। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा शायद पहली बार।
6 अभूतपूर्व उदारता। अनुमति की अवधि समाप्त होने के बावजूद प्रदर्शनकरियों को प्रदर्शन स्थल से खदेड़ा नहीं गया। इतनी उदारता न तो अंतरराष्ट्रीय पदक प्राप्त महिला पहलवानों के साथ बरती गई और न ही उसके पूर्व।
7 ‘‘एकीकरण।’’ सांप्रदायिकता, धर्म, लिंग, जाति, भाषा, स्थान आदि का भेद इस आंदोलन में मिटा।
8 देश के विभिन्न अंचलों से अकेली आई लड़कियों ने पूरी तरह से स्वयं को सुरक्षित महसूस किया।  
‘‘ खोया ’’। 

1 भाजपा

पिछले 12 वर्ष से जो ‘‘दबाव’’, ‘‘डर’’, ‘‘इकबाल’’, और ‘‘औरा’’ भाजपा ने मेहनत से बनाया था, वह एक ‘‘झटके में छिटक’’ गया। तथापि विपक्ष को चिढ़ाने के लिए, धर्मेन्द्र प्रधान का संसद भवन के ‘‘मकर द्वार’’ पर और गृह प्रदेश उड़ीसा पहुंचने पर भव्य स्वागत करवाकर नेतृत्व के अहंकार को बनाए रखा? अथवा होश में जोश के साथ शक्ति प्रदर्शन किया? यह देखना होगा। 
दूसरा नुकसान, मूल पहचान हिंदुत्व पर ‘‘युवाओं के मुद्दों’’ को हावी होने दिया। 

2 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राम जन्मभूमि तीर्थ न्यास (सरकारी ट्रस्टियों को छोड़कर) और एनटीए में संघ की विचारधारा के लोग व स्वयंसेवक ही थे। उनकी कार्य अकुशलता व तथाकथित गबन ने शताब्दी वर्ष में कहीं न कहीं संघ की साख पर कुछ दाग छोड़ दिए, जो एक चिंता का विषय संघ के लिए होना चाहिए।

3 मैंनस्ट्रीम मीडिया को सबक

मेंनस्ट्रीम मीडिया जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है, का आंदोलनकारी ने न केवल बहिष्कार किया है, बल्कि उनके साथ बदसलूकी की। कदापि दुव्र्यहार को उचित नहीं कहा जा सकता। 

4 निम्न स्तर की गालियां और मींस

नई प्रकृति के इस आंदोलन का सबसे दुखद और पूरे आंदोलन पर काली पोतने वाला पहलू कुछ युवाओं द्वारा प्रधानमंत्री को निम्न स्तर की गलियां देना और स्तरहीन मींस बनाना तथा पुलिसकर्मियों पर हमला है। सीजीपी द्वारा इनकी आलोचना न करना और आंदोलन में भागीदार नागरिकों द्वारा भी इस चुप्पी पर कुछ न कहना, आंदोलन का सबसे बड़ा नुकसान है। सामाजिक व्यवस्था में नैतिकता का स्तर युवा वर्ग में कितने नीचे तक जा सकता है, उक्त संकेत अत्यंत चिंता का विषय है।

‘‘ उपसंहार ’’ 

प्रसिद्ध गजलकार दुष्यंत कुमार का यह कथन ‘‘कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।’’ रामधारी सिंह दिनकर ने भी कहा था सिंहासन खाली करो कि जनता ’आती है। नेतृत्व पीछे छूट गया। जनता-जनार्दन आगे बढ़ गई। यही नए भारत का नया अंदाज है।

अनुत्तरित प्रश्न?

क्या यह आंदोलन सिर्फ एक घटना थी या भविष्य के जन आंदोलनों का नया प्रारूप? राजनीतिक दलों से निकलकर सीधे जनता व डिजिटल मंचों के हाथ में चला जाएगा?