चंदबरदाई जन्म 30-9-1148/49 - जयंती 30-09-2025

पृथ्विराज रासो हिंदी-प्रथम महाकाव्य- वीरता, प्रेम, और बलिदान की जीवंत गाथा के रचयिता-चन्दबरदाई। चंदवरदाई को ब्रजभाषा हिंदी आदिकाल, प्रथम महाकवि माना जाता है। चंदबरदाई का जन्म लाहौर वर्तमान पाकिस्तान  में संवत 1205 तदानुसार 30-09-1148/49 ई.हुआ था। बाद में वह अजमेर-दिल्ली  के सुविख्यात हिंदू  नरेश पृथ्वीराज का सम्माननीय सखा, इनका वास्तविक नाम बलिद्ध्य था। राजकवि और सहयोगी हो गए थे। हिंदी साहित्य के आदिकालीन कवि  तथा पृथ्वीराज चौहान के मित्र थे। उन्होने पृथ्वीराज रासो नामक प्रसिद्ध हिंदी ग्रन्थ की रचना की। इससे उसका अधिकांश जीवन महाराजा पृथ्वीराज चौहान  के साथ दिल्ली में बीता था। वह राजधानी और युद्ध क्षेत्र सब जगह पृथ्वीराज के साथ रहते थे उनका सान्निध्य राजा को बहुत भाता था और वे उनके विश्वासपात्र भी थे। उसकी विद्यमानता का काल 13वीं-14वीं-15वींया16वीं सदी का है(यह विवाद है)। चंदवरदाई का प्रसिद्ध ग्रंथ "पृथ्वीराजरासो" है। इसकी भाषा को भाषा-शास्त्रियों ने पिंगल कहा है, जो राजस्थान में ब्रजभाषा  का पर्याय है। इसलिए चंदवरदाई को ब्रजभाषा हिंदी के का प्रथम महाकवि माना जाता है। 'रासो' की रचना महाराज पृथ्वीराज के युद्ध-वर्णन के लिए हुई है। इसमें उनके वीरतापूर्ण युद्धों और प्रेम-प्रसंगों का कथन है। अत: इसमें वीर और शृंगार दो ही रस है। चंदबरदाई ने इस ग्रंथ की रचना प्रत्यक्षदर्शी की भाँति की है लेकिन शिलालेख प्रमाण से ये स्पष्ट होता है कि इस रचना को पूर्ण करने वाला कोई अज्ञात कवि है जो चंद और पृथ्वीराज के अन्तिम क्षण का वर्णन कर इस रचना को पूर्ण करता है। इनके जन्म को लेकर अनेक किम्विदंतियाँ प्रचलित हैं, कुछ लोग इनका जन्म वर्ष 1205 मानते हैं तो कुछ विद्वानों के अनुसार सन 1148 में लाहौर में इनका जन्म हुआ था। मान्यता यह भी है की चंदबरदाई और उनके परम मित्र पृथ्वीराज चौहान का जन्म व प्राणांत एक ही दिन हुआ था। चंदबरदाई का वास्तविक नाम ‘बलिद्ध्य’ था। इनके पिता अजमेर के चौहानों के पुरोहित थे। यही कारण है की राजकुल से इनका सदैव संपर्क रहा। चंद बाल्यकाल से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे। दिल्ली-अजमेर के सुविख्यात नरेश पृथ्वीराज से मित्रता होने के कारण, चंदबरदाई ने अपना अधिकाँश जीवन दिल्ली में ही व्यतीत किया। राजधानी से लेकर युद्ध क्षेत्र तक ये हर स्थान पर पृथ्वीराज के साथ ही रहते थे। चंद न केवल सम्राट पृथ्वीराज के मित्र थे परन्तु साथ ही उनके दरबार में एक सामंत तथा राजकवि के रुप में प्रसिद्ध थे। चन्द्रबरदाई का नाम हिंदी साहित्य के पृष्ठों में हिंदी भाषा के प्रथम कवि के रूप में अंकित है। इनकी जीवन गाथा के साथ अनेको बार पृथ्वीराज चौहन का नाम जुडता है। क्योकि चन्द्रबरदाई जी इनके घनिष्ट मित्र. साहसी वीर राज कवि थे। और यह भी कहा जाता है कि इनका जन्म भी उसी तिथि को हुआ है जिस तिथि को पृथ्वीराज चौहान का हुआ था। यही बात मृत्यु के विषय में भी बताई जाती है. रासो में इस बात का उल्लेख मिलता है कि गजनी में पृथ्वीराज चौहान और चंद्रबरदाई एक दूसरे को कटार मारकर मर गए थे। अतःएक साथ मृत्यु भी हुई परंतु इतिहास में कहीं इस घटना का कोई उल्लेख नहीं मिला। परंतु इस बात का अवश्य उल्लेख मिलता है कि पृथ्वीराज चौहान का संबंध चंद्रबरदाई से बहुत अधिक धनिष्ट था और सभी महत्वपूर्ण जगहो पर राजा उन्हें अपने साथ रखते थे। पृथ्वीराज रासो के अनुसार चन्द्रबरदाई के पूर्वज लाहौर के निवासी ब्रह्म भट्ट जाति के जागत नामक गोत्र के थे । पृथ्वीराज रासो एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति है इसमें पृथ्वीराज चौहान की शौर्य-गाथा का विस्तृत वर्णन मिलता है। 
चन्द्रबरदाई जी व्याकरण, काव्य, साहित्य, पुराण आदि के धुरंधर विव्दवान थे। ऐसा भी कहा जाता रहा है कि चन्द्रबरदाई जी को जालंधरी देवी का इष्ट था। उसके वरदान स्वरूप वह अदृष्य काव्य भी कर सकते थे। चन्द्रबरदाई ने 69 समय(अध्याय) में एक महाकाव्य लिखा था। इस विषय में यह कहा जाता है कि वे इसे अपने जीवन काल में समाप्त न कर सके उसे उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र जल्हन के व्दारा समाप्त किया गया । इसका उल्लेख पृथ्वी राज रासो मे भी आया हैः-

‘’पुस्तक जल्हन हत्थ दै चलि गल्जन नृप काज”’

चंद्रबरदाई को पऋथ्वीराज रासो का रचयिता माना जाता है। उन्होंने 14वीं शताब्दी के पूर्व में पृथ्वीराज चौहान पर यह काव्य रचा था। पृथ्वीराज रासो का यह 69 अध्याय में लिखा गया महाकाव्य अत्यंत ही प्रशंनीय है। उस समय की परिश्थितियों में इस काव्य की रचना व इसमें उपयोग में लायी गई प्रचीन प्रतलित छंदों का समावेश इसकी विशिष्टता का ऐसा स्वरूप है जिसे आज भी हमारे साहित्य की ऐसी अव्दितीय व अदभुत धरोहर है, इसमें उपयोग में लाए गये छंद कवित्त, दोहा, तोमर, त्रटोक, गाह और आर्या आदि का प्रयोग किया गया है। इस महाकाव्य मे पृथ्वीराज चौहान के जन्म से उनके पकड़े जाने तक का विस्तृत वर्णन मौजूद है। इसकी भाषा अपभ्रंश, राजस्थानी, ब्रज और खड़ी बोली के मिश्रण से बनी लगती है। पश्चात इसकी प्रमाणिकता पर प्रश्न रहे जिसमें कुछ साहित्कारों के मतानुसार इसे अप्रमाणिक मानने वालों में पंडित गौरीशंकर, हीराचन्द्र ओझा, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ.रामकुमार वर्मा है। इस वि,य में जो बाते सामने आयी उसमे हीराचंद्र ओझा ने तो जयावक कवि व्दारा रचित” पृथ्वीराज विजय के आधार पर रासो मे दिए गए नाम, संवत आदि को असत्य बताया है। उनका मत है कि यह सौलहवीं अथवा सत्रहवीं शताब्दी में लिखा, किसी अन्य कवि का ग्रंथ है। इसी प्रकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी और डॉ.रामकुमार वर्मा भी इनकी बात अपनी सहमति देते है। डॉ.रामकुमार वर्मा, श्यामसुंदर दास, मिश्रबंधु इसे पूर्णतः अप्रमाणिक नहीं मानते है। उनके कथनानुसार इसकी प्रमाणिकता के विषय में तथ्य खोजे जा रहे है। मोहनलाल विष्णुलाल पंडया तथा दशरथ शर्मा इसो पूर्णरूप से प्रमाणिक मानते है। उनका कथन है कि रासो मे दिए हुए संवत तथा विक्रम संवत में 90 वर्षो का अंतर है। इस विषय में यह भी अनुमान लगाते हुए कहा गया कि चंद्रबरदाई ने किसी अन्य संवत का प्रयोग किया हो क्योंकि और सभी घटनाएँ और नाम वही है। अप्रमाणिक सिध्द करने वालों का कथन है, कि रासो के नाम व तिथियाँ ऐतिहासिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती। अरबी और फारसी के शब्दों का प्रयोग तथा अव्यवस्थित भाषा मे रासो की प्रमाणिकता में संदेह उत्पन्न करती है। रासो की भाषा का उदाहरण

अवलोकनार्थ –

प्रिय पृथ्वीराज न जोग लिखि कग्गार दिन्नों।
लगन वरग न रूचि सरव दिन व्दादश ससि लिन्नों ।।
सौ ग्यारह अस तीस, साष सम्वत् परमानह।
जो पित्री-कुल शुध्द वरन् वरि रक्खहु आननि।।    

हिन्दी के पहले कवि चंदबरदाई के विषय में जानकारी का कुछ आभाव तो है जिसको हम हिंदी का पहला कवि मानते है परंतु नके विषय में उनके ग्रंथ व समय काल को लेकर बहुत से मतभेद और उनकी रचना पृथ्वीराज रासो को हिंदी की पहली रचना होने का सम्मान प्राप्त है।पृथ्वीराज रासो  हिंदी का सबसे बड़ा काव्य-ग्रंथ है। इसमें 10,000 से अधिक छंद  हैं और तत्कालीन प्रचलित 6 भाषाओं का प्रयोग किया गया है। इस ग्रंथ में उत्तर भारतीय क्षत्रिय समाज व उनकी परंपराओं के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है, इस कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका बहुत महत्व है। वे भारत के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के मित्र तथा राजकवि थे। पृथ्वीराज ने 1165 से 1192 तकअजमेर व दिल्ली पर राज किया। यही अवधि का समय कवि चंदबरदाई का रचनाकाल भी था। बही (ऐतिहासिक पुस्तक) चंदबरदाई जिन्हें चन्द्र भट्ट के नाम से भी जाना जाता है चंदबरदाई ने अपनी बही (इतिहास लेखन) में पृथ्वीराज तृतीया ( राय पिथौरा ) के जीवन का इतिहास संयोजित किया है और अजमेर में आये मुस्लिम सन्त ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और राय पिथौरा से सम्बंधित इतिहास का भी उक्त बही में उल्लेख मिलता है, राय पिथौरा की एक दासी थी जिसका नाम मीना था जो भील जाती से थी और बहुत ही सुन्दर कन्या थी चंदबरदाई लिखते हैं की इस मीना नामक स्त्री से राय पिथौरा को कई सन्तान हुई जो की अनौरस सन्तान थी इसी वजह से उन्हें पिता पृथ्वीराज तृतीया ( राय पिथौरा ) का उपनाम न मिल सका और माता की भील जाती से ही जाने गये, इन सन्तानों में दो पुत्र जिनका नाम लाखा भील व टेका भील था वह ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती से प्रभावित होकर मुसलमान बनकर उनके चेले बन गये और लाखा भील ने अपना नाम फखरुद्दीन तथा टेका भील ने अपना नाम मोहम्मद यादगार रख लिया इन्होने ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की बहुत सेवा करी, लाखा भील व टेका भील जो मुसलमान बन गये थे इन दोनों भाइयों के वंशज आज तक ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में सेवा (ख़िदमत) करते हैं, जैसे जैसे समय गुजरता गया लाखा भील व टेका भील के वंशजों को अपने पूर्वजो के इतिहास पर शर्म आने लगी और वो कई सो सालों से खुद को सैयद और सादात साबित करने के षड्यंत्र रचने लगे ज्यादा चढ़ावा और ज्यादा सम्मान प्राप्त करने के लालच में इन्होने खुद के नाम में सैयद, चिश्ती , काज़मी, संजरी, मोईनी, शैखज़ादा, सैयदज़ादा, गद्दीनशीन, सज्जदानाशीन, दीवान आदि जोड़ लिया और खुद को इस्लाम के अंतिम पैग़म्बर मोहम्मद साहब के परिवार से जोड़ने लगे जिससे की इन्हें समाज में ऊँचा दर्ज़ा मिले और लोग इन्हें अधिक सम्मान और नज़राना दें, चन्द्र भट्ट की उक्त बही (पौथी) अजमेर में चले विभिन्न प्राचीन अदालती वाद में प्रस्तुत की जा चुकी है और ब्रिटिश कालीन अदालतें दस्तावेजों के आधार पर इस बात पर मोहर लगा चूँकि है की ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के समस्त खादिम (सेवक) इन लाखा भील व टेका भील के वंशज है जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद अपना नाम फखरुद्दीन तथा मोहम्मद यादगार रख लिया था । गौरी के वध में सहायता इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिला हुआ था कि अलग नहीं किया जा सकता। युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में, सदा महाराज के साथ रहते थे और जहाँ जो बातें होती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे। पृथ्वीराज चौहान ने चंदबरदाई को कई बार लाख पसाव, करोड़ पसाव, अरब पसाव, देकर सम्मानित किया था, यहाँ तक कि मुहम्मद गोरी के द्वारा जब पृथ्वीराज चौहान को परास्त करके एवं उन्हे बंदी बना करके गजनी ले जाया गया तो ये भी स्वयं को वश में नहीं कर सके एवं गजनी चले गये। ऐसा माना जाता है कि कैद में बंद पृथ्वीराज को जब अन्धा कर दिया गया तो उन्हें इस अवस्था में देख कर इनका हृदय द्रवित हो गया एवं इन्होंने गोरी के वध की योजना बनायी। उक्त योजना के अंतर्गत इन्होंने पहले तो गोरी का हृदय जीता एवं फिर गोरी को यह बताया कि पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण चला सकता है। इससे प्रभावित होकर मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज की इस कला को देखने की इच्छा प्रकट की। प्रदर्शन के दिन चंदबरदाई गोरी के साथ ही मंच पर बैठे। अंधे पृथ्वीराज को मैदान में लाया गया एवं उनसे अपनी कला का प्रदर्शन करने को कहा गया। पृथ्वीराज के द्वारा जैसे ही एक घण्टे के ऊपर बाण चलाया गया गोरी के मुँह से अकस्मात ही "वाह! वाह!!" शब्द निकल पड़ा बस फिर क्या था चंदबरदाई ने तत्काल एक दोहे में पृथ्वीराज को यह बता दिया कि गोरी कहाँ पर एवं कितनी ऊँचाई पर बैठा हुआ है। वह दोहा इस प्रकार था:
चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान ।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान ॥
इस प्रकार चंद बरदाई की सहायता से से पृथ्वीराज के द्वारा गोरी का वध कर दिया गया। इनके द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो हिंदी भाषा का पहला प्रामाणिक काव्य माना जाता है।पृथ्वीराज रासो हिंदी भाषा में लिखा एकमहाकाव्य है, जिसमें सम्राट पृथ्विराज चौहान के जीवन और चरित्र का वर्णन किया गया है। इसके रचयिता चंदरबरदाई पृथ्वीराज के बचपन के मित्र और उनके राजकवि थे और उनकी युद्ध यात्राओं के समय वीर रस  की कविताओं से सेना को प्रोत्साहित भी करते थे। 1165 से 1192 के बीचपृथ्वीराज चौहान का राज्यअजमेर से दिल्ली तक फैला हुआ था। पृथ्वीराज रासो और पृथ्वीराज काव्य के अनुसार पृथ्वीराज का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था पृथ्वीराजरासो ढाई हजार पृष्ठों का बहुत बड़ा ग्रंथ है, जिसमें 69 समय (सर्ग या अध्याय) हैं। प्राचीन समय में प्रचलित प्रायः सभी छन्दों  का इसमें व्यवहार हुआ है। मुख्य छन्द हैं-कवित्य(छप्पय), दूहा(दोहा),तोमर गोत्र(त) त्रोटक, गाहा और आर्या। जैसे कादम्बरी के संबंध -  में प्रसिद्ध है कि उसका पिछला भागबाम भट्ट राव के पुत्र ने पूरा किया है, वैसे ही पृथ्वीराज रासो के पिछले भाग का भी चंद के पुत्र जल्हण भट्ट राव द्वारा पूर्ण किया गया है। रासो के अनुसार जबसहाबुद्दीन गोरी पृथ्वीराज को कैद करके गजनी  ले गया, तब कुछ दिनों के उपरान्त चंद भी वहीं गए। जाते समय कवि ने अपने पुत्र जल्हण के हाथ में रासो की पुस्तक देकर उसे पूर्ण करने का संकेत किया। जल्हण के हाथ में रासो को सौंपे जाने और उसके पूरे किए जाने का उल्लेख रासो में है -
पुस्तक जल्हण हत्थ दै चलि गज्जन नृपकाज।
रघुनाथनचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि।
पृथिराजसुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि॥ "
पृथ्वीराज रासो में दिए हुए संवतों का अनेक स्थानों पर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ मेल न खाने के कारण अनेक विद्वान पृथ्वीराज  के समसामयिक किसी कवि की रचना होने में संदेह करते है और उसे 16वीं शताब्दी में लिखा हुआ ग्रंथ ठहराते हैं।  इस रचना की सबसे पुरानी प्रति बीकानेर के राजकीय पुस्तकालय मे मिली है, कुल 3 प्रतियाँ है। रचना के अन्त मे पृथ्वीराज द्वारा शब्द-भेदी बाण चला कर ग़ोरी को मारने की बात भी की गयी है।

                  

पृथ्वीराजसो रासक परम्परा का एक काव्य है। जैसा इसके नाम से ही प्रकट है, दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट् पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओं को लेकर लिखा गया हिंदी का एक ग्रंथ जो चंदवरदाई राव का लिखा माना जाता रहा है। पहले इस काव्य के एक ही रूप से हिंदी जगत्‌ परिचित था, जो संयोग से रचना का सबसे अधिक विशाल रूप था, इसमें लगभग ग्यारह हजार रूपक आते थे। उसके बाद रचना का एक उससे छोटा रूप कुछ प्रतियों में मिला, जिसमें लगभग साढ़े तीन हजार रूपक थे। उसके भी बाद एक रूप कुछ प्रतियों में प्राप्त हुआ जिसमें कुल रूपक संख्या बारह सौ से अधिक नहीं थी। तदनन्तर दो प्रतियाँ उसकी ऐसी भी प्राप्त हुई जिनमें क्रमशः चार सौ और साढ़े पाँच सौ रूपक ही थे। ये सभी प्रतियाँ रचना के विभिन्न पूर्ण रूप प्रस्तुत करती थीं। रचना के कुछ खंडों की प्रतियाँ भी प्राप्त हुई हैं, जिनका संबंध उपर्युक्त प्रथम दो रूपों से रहा है। अत: स्वभावतः यह विवाद उठा कि उपर्युक्त विभिन्न पूर्ण रूपों का विकास किस प्रकार हुआ। कुछ विद्वानों ने इससे सर्वथा भिन्न मत प्रकट किया। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा रूप ही रचना का मूल रूप रहा होगा और उसी से उत्तरोत्तर अधिकाधिक छोटे रूप संक्षेपों के रूप में बनाकर प्रस्तुत किए गए होंगे। इन्होंने इसका प्रमाण यह दिया कि रचना का कोई रूप, यहाँ तक कि सबसे छोटा रूप भी, अनैतिहासिकता से मुक्त नहीं है। किंतु इस विवाद को फिर यहीं पर छोड़ दिया गया और इसको हल करने का कोई प्रयास बहुत दिनों तक नहीं किया गया। इसका प्रथम उल्लेखनीय प्रयास 1955 में हुआ जब एक विद्वान ने पृथ्वीराज रासो के तीन पाठों का आकार संबंध (हिंदी अनुशीलन, जनवरी-मार्च 1955) शीर्षक लेख लिकर यह दिखाया कि पृथ्वीराज और उसके विपक्ष के बलाबल को सूचित करनेवाली जो संख्याएँ रचना के तीन विभिन्न पाठों : सबसे बड़े (बृहत्‌), उससे छोटे (मध्यम) और उससे भी छोटे (लघु) में मिलती हैं उनमें समानता नहीं है और यदि समग्र रूप से देखा जाय तो इन संख्याओं के संबंध में अत्युक्ति की मात्रा भी उपर्युक्त क्रम में ही उत्तरोत्तर कम मिलती है। यदि ये पाठ बृहत्‌मध्यमलघुलघुतम क्रम में विकसित हुए होते, तो संक्षेप क्रिया के कारण बलाबल सूचक संख्याओं में कोई अंतर न मिलता। इसलिये यह प्रकट है कि प्राप्त रूपों के विकास का क्रम लघुतमलघुमध्यमबृहत्‌ है। प्रबंध की दृष्टि से यदि हम रचना की उक्ति-शृंखलाओं और छंद-शृंखलाओं तथा प्रसंग-शृंखलाओं पर ध्यान दें तो वहाँ भी देखेंगे कि ये शृंखलाएँ लघुतम-लघु-मध्यम-बृहत्‌ क्रम में ही उत्तरोत्तर अधिकाधिक टूटी हैं और बीच-बीच में इसी क्रम से अधिकाधिक छंद और प्रसंग प्रक्षेपकर्ताताओं के द्वारा रखे गए हैं। 'पृथ्वीराजरासो' की कथा संक्षेप में इस प्रकार है : पृथ्वीराज जिस समय दिल्ली के सिंहासन पर था कन्नौज के राजा जयचन्द  नेराजसूय यज्ञ  करने का निश्चय किया और इसी अवसर पर उसने अपनी कन्या संयोगिता  का स्वयंवर भी करने का संकल्प किया। राजसूय का निमंत्रण उसने दूर दूर तक के राजाओं को भेजा और पृथ्वीराज को भी उसमें सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया। पृथ्वीराज और उसके सामन्तों को यह बात खली कि बहुराजाओं के होते हुए भी कोई अन्य राजसूय यज्ञ करे और पृथ्वीराज ने जयचंद का निमंत्रण अस्वीकार कर दिया। जयचन्द ने फिर भी राजसूय यज्ञ करना ठानकर यज्ञमण्डप के द्वार पर द्वारपाल के रूप में पृथ्वीराज की एक प्रतिमा स्थापित कर दी। पृथ्वीराज स्वभावत: इस घटना से अपमान समझकर क्षुब्ध हुआ। इसी बीच उसे यह भी समाचार मिला कि जयचंद की कन्या संयोगिता ने पिता के वचनों की उपेक्षा कर पृथ्वीराज को ही पति रूप में वरण करने का संकल्प किया और जयचंद ने इसपर क्रुद्ध होकर उसे अलग गंगातटवर्ती एक आवास में भिजवा दिया। इन समाचारों से संतप्त होकर वह राजधानी के बाहर आखेट में अपना समय किसी प्रकार बिता रहा था कि उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उसके मंत्री कैवास ने उसकी एक करनाटी दासी से अनुचित संबंध कर लिया और एक दिन रात को उसके कक्ष में प्रविष्ट हो गया। पट्टराज्ञी को जब यह बात ज्ञात हुई, उसने पृथ्वीराज को तत्काल बुलवा भेजा और पृथ्वीराज रात को ही दो घड़ियों में राजभवन में आ गया। जब उसे उक्त दासी के कक्ष में कैंवास को दिखाया गया, उसने रात्रि के अंधकार में ही उन्हें लक्ष्य करके बाण छोड़े। पहला बाण तो चूक गया किंतु दूसरे बाण के लगते ही कैंवास धराशायी हो गया। रातों-रात दोनों को एक गड्ढे में गड़वाकर पृथ्वीराज आखेट पर चला गया, फिर दूसरे दिन राजधानी को लौटा। कैंवास की स्त्री ने चंद से अपने मृत पति का शव दिलाने की प्रार्थना की तो चंद ने पृथ्वीराज से यह निवेदन किया। पृथ्वीराज ने चंद का यह अनुरोध इस शर्त पर स्वीकार किया कि वह उसे अपने साथ ले जाकर कन्नौज दिखाएगा। दोनों मित्र कसकर गले मिले ओर रोए। पृथ्वीराज ने कहा कि इस अपमानपूर्ण जीवन से मरण अच्छा था और उसके कविमित्र ने उसकी इस भावना का अनुमोदन किया। कैंवास का शव लेकर उसकी विधवा सती हो गई।

                                                               

चंद के साथ थवाइत्त (तांबूलपात्रवाहक) के वेष में पृथ्वीराज ने कन्नौज  के लिए प्रयाण किया। साथ में सौ वीर राजपूत सामंतों सैनिकों को भी उसने ले लिया। कन्नौज पहुँचकर जयचन्द के दरबार में गया। जयचंद ने उसका बहुत सत्कार किया और उससे पृथ्वीराज के वय, रूप आदि के संबंध में पूछा। चंद ने उसका जैसा कुछ विवरण दिया, वह उसके अनुचर थवाइत्त में देखकर जयचंद कुछ सशंकित हुआ। शंका निवारणार्थ उसने कवि को पान अर्पित कराने के बहाने अन्य दासियों के साथ एक दासी को बुलाया जो पहले पृथ्वीराज की सेवा में रह चुकी थी। उसने पृथ्वीराज को थवाइत्त के वेष में देखकर सिर ढँक लिया। किंतु किसी ने कहा कि चंद पृथ्वीराज का अभिन्न सखा था, इसलिये दासी ने उसे देख सिर ढँक लिया और बात वहीं पर समाप्त हो गई। दूसरे दिन प्रात: काल जब जयचंद चंद के डेरे पर उससे मिलने गया, थवाइत्त को सिंहासन पर बैठा देखकर उसे पुन: शंका हुई। चंद ने बहाने करके उसकी शंका का निवारण करना चाहा और थवाइत्त से उसे पान अर्पित करने का कहा। पान देते हुए थवाइत्त वेषी पृथ्वीराज ने जो वक्र दृष्टि फेंकी, उससे जयचंद को भली भाँति निश्चय हो गया कि यह स्वयं पृथ्वीराज है और उसने पृथ्वीराज का सामना डटकर करने का आदेश निकाला। इधर पृथ्वीराज नगर की परिक्रमा के लिये निकला। जब वह गंगा में मछलियों को मोती चुगा रहा था, संयोगिता ने एक दासी को उसको ठीक-ठीक पहचानने तथा उसके पृथ्वीराज होने पर अपना (संयोगिता का) प्रेम-निवेदन करने के लिये भेजा। दासी ने जब यह निश्चय कर लिया कि वह पृथ्वीराज ही है, उसने संयोगिता का प्रणय निवेदन किया। पृथ्वीराज तदनंतर संयोगिता से मिला और दोनों का उस गंगातटवर्ती आवास में पाणिग्रहण हुआ। उस समय वह वहाँ से चला आया, किंतु अपने सामंतों के कहने पर वह पुन: जानकर संयोगिता का साथ लिवा लाया। जब उसने इस प्रकार संयोगिता का अपहरण किया, चंद ने ललकार कर जयचंद से कहा कि उसका शत्रु पृथ्वीराज उसकी कन्या का वरण कर अब उससे दहेज के रूप में युद्ध माँग रहा था। परिणामत: दोनों पक्षों में संघर्ष प्रारंभ हो गया।
दो दिनों के युद्ध में जब पृथ्वीराज के अनेक योद्धा मारे गए, सामंतों ने उसे युद्ध की विधा बदलने की सलाह दी। उन्होंने सुझाया कि वह संयोगिता को लेकर दिल्ली की ओर बढ़े और वे जयचंद की सेना को दिल्ली के मार्ग में आगे बढ़ने से रोकते रहें जब तक वह संयोगिता को लेकर दिल्ली न पहुँच जाए। पृथ्वीराज ने इस स्वीकार कर लिया और अनेक सामंतों तथा शूर वीरों योद्धाओं की बलि के अनंतर संयोगिता को लेकर दिल्ली गया। जयचंद अपनी सेना के साथ कन्नौज लौट गया। दिल्ली पहुँचकर पृथ्वीराज संयोगिता के साथ, विलासमग्न हो गया। छह महीने तक आवास से बाहर निकला ही नहीं, जिसके परिणामस्वरूप उसके गुरु, बांधव, भृत्यों तथा लोक में उसके प्रति असंतोष उत्पन्न हो गया। प्रजा ने राजगुरु से कष्ट का निवेदन किया तो राजगुरु चंद को लेकर संयोगिता के आवास पर गया। दोनों ने मिलकर पृथ्वीराज को गोरी के आक्रमण की सूचिका पत्रिका भेजी और संदेशवाहिका दासी से कहला भेजा : 'गोरी रत्त तुअ धरा तू गोरी अनुरत्त।' राजा की विलासनिद्रा भंग हुई और वह संयोगिता से विदा होकर युद्ध के लिये निकल पड़ा। शहाबुद्दीन इस बार बड़ी भारी सेना लेकर आया हुआ था। पृथ्वीराज के अनेक शूर योद्धा और सामंत कन्नौज युद्ध में ही मारे जा चुके थे। परिणामत: पृथ्वीराज की सेना रणक्षेत्र से लौट पड़ी और शाहबुद्दीन विजयी हुआ। पृथ्वीराज बंदी किया गया और गजनी ले जाया गया। वहाँ पर कुछ दिनों बाद शहाबुद्दीन ने उसकी आँखें निकलवा लीं। जब चंद को पृथ्वीराज के कष्टों का समाचार मिला, वह गजनी अपने मित्र तथा स्वामी के उद्धार के लिये अवधूत के वेष में चल पड़ा। वह शहाबुद्दीन से मिला। वहाँ जाने का कारण पूछने पर उसने बताया कि अब वह बदरिकाश्रम जाकर तप करना चाहता था किंतु एक साध उसके जी में शेष थी, इसलिये वह अभी वहाँ नहीं गया था। उसने पृथ्वीराज के साथ जन्म ग्रहण किया था और वे बचपन में साथ साथ ही खेले कूदे थे। उसी समय पृथ्वीराज ने उससे कहा था कि वह सिंगिनी के द्वारा बिना फल के बाध से ही सात घड़ियालों को एक साथ बेध सकता था। उसका यह कौशल वह नहीं देख सका था और अब देखकर अपनी वह साध पूरी करना चाहता था। गोरी ने कहा कि वह तो अंधा किया जा चुका है। चंद ने कहा कि वह फिर भी वैसा संधानकौशल दिखा सकता है, उसे यह विश्वास था। शहाबुद्दीन ने उसकी यह माँग स्वीकार कर ली और तत्संबंधी सारा आयोजन कराया। चंद के प्रोत्साहित करने पर जीवन से निराश पृथ्वीराज ने भी अपना संघान कौशल दिखाने के बहाने शत्रु के वध करने का उसका आग्रह स्वीकार कर लिया। पृथ्वीराज से स्वीकृति लेकर चंद शहाबुद्दीन के पास गया और कहा कि वह लक्ष्यवेध तभी करने को तैयार हुआ है जब वह (शहाबुद्दीन) स्वयं अपने मुख से उसे तीन बार लक्षवेध करने का आह्वाहन करे। शहाबुद्दीन ने इसे भी स्वीकार कर लिया। शाह ने दो फर्मान दिए, फिर तीसरा उसने ज्यों ही दिया पृथ्वीराज के बाण से विद्ध होकर वह धराशायी हुआ। पृथ्वीराज का भी अंत हुआ। देवताओं ने उस पर पुष्पवृष्टि की और पृथ्वी ने म्लेच्छ ग़ोरी से त्राण पाकर हर्ष प्रकट किया। यहाँ पर 'पृथ्वीराजरासो' की कथा समाप्त होती है। पृथ्वी राज रासो का प्रकाशन मोहनलाल विष्णुपाल पंडया और श्यामसुंदर दास के संपादन में नागरी प्रचारणी सभा व्दार इस महाक्व्य को दो खंड़ों में प्रकाशित किया। 1993 में मानव संसाधन और विकास मंत्रालय के सहयोग से इसका पुनमुद्रर्ण किया गया।  इस तरह चंद्रबरदाई की लेखन यात्रा में कई उतार-चढ़ाव रहे केन्द्र पर पृथ्वीराज चौहान व उनसे संबंधित कृति पृथ्वीराज रासो। चंदबरदाई भारतीय साहित्य में एक अमिट नाम हैं। उनकी रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ वीरता, प्रेम, और बलिदान की जीवंत गाथा है। यद्यपि इसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर बहस है, फिर भी यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति और साहित्य की एक अनमोल धरोहर है। चंदबरदाई का जीवन और काव्य आज भी पाठकों को प्रेरित करता है। मृत्यु: संवत 1249 तदनुसार 1192 ई० गज़नी निधन :तौंसा शरीफ़, पंजाब आदिकाल के महान कवि को सादर नमन के साथ हमारी श्रध्दांजलि।

चिरंजीव (लिंगम चिरंजीव राव)
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