आशापूर्णा देवी जन्म 08-01-1909 -जयंती-08-01-2026
आशापूर्णा देवी जन्म 08-01-1909 -जयंती-08-01-2026
“ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित पहली महिला साहित्यकार”
“मैं तो माँ सरस्वती की स्टेनो हूँ।”
(उनका यह कथन उनकी रचनाशीलता का परिचय देता है।)
“पुरूष की बड़ी से बड़ी कमजोरी समाज पचा लेता है लेकिन नारी को उसकी थोड़ी सी चूक के लिए भी पुरूष समाज उसे कठोर दंड देता है जबकि इसमें उसकी लिप्सा का अंश कहीं अधिक होता है। वास्तव में नारी अपने मूल अधिकारों से तो वंचित है, लेकिन सारे कर्तव्य और दायित्व उसके हिस्से मढ़ दिए गए है।” आशापूर्णा देवी का यह कथन समाज का असली रूप हमारे सामने पेश करता है। उनके अनुसार नारी का जीवन अवरोधों और वंचना में ही कट जाता है, जिसे उसकी तपस्या कहकर हमारा समाज गौरवांवित होता है। किसी लेखक या लेखिका का परिचय उसके साहित्य के माध्यम से होना ही उसका सम्मान होता है। भाषा की बात कहे तो बहुत से लेखक और लेखिका अपनी मातृभाषा में लेखन करते है परंतु कलांतर में उनकी प्रसिध्दि विश्व के अनेक देशों में उनकी कृतियों के अनुवाद के माध्यम से अन्य भाषा के लोगो तक उनकी बात पहुँचती है। इसी प्रकार की एक लेखिका जिन्होंने अपने जीवनकाल में बांग्ला जानने वाली आशापूर्णादेवी की लगभग 135 उपन्यासो और 225 से अधिक साहित्यक कृतियों की रचना। दृश्य दृश्यांतर(उपन्यास) अधिकतम व प्रमुख रचनाओं का दुनिया की भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसी क्रम में इनकी रचनाओं का अनुवाद हिंदी भाषा में भी होने के कारण उनको पढने व समझने का अवसर मिला। आशापूर्णा देवी का जन्म 08जनवरी 1909 पश्चिम बंगाल के पोटोलड़ागा स्थान पर कोलकता के पास हुआ था। पिता जी जिनका नाम हरिनाथ गुप्त एक चित्रकार थे और माँ का नाम सरोला सुंदरी था। माता को बांग्ला साहित्य से बहुत लगाव था। उसके साथ उनके तीन भाई भी थे। कट्टरपंथी परिवार, दादी पुराने विचारों की पित्रसत्तात्मक व्यवस्था की पक्षधर थी। जिसके फलस्वरूप उनको पढाई के लिए स्कूल और कॉलेज जाने का सौभाग्य नहीं मिला, परंतु बाल्यकाल से उनमें शिक्षा के प्रति अत्याधिक लगाव था। और मेरा यह मानना है कि उन्हें यहीं से वो सारी बातें उनके मनोमस्तिष्क मे घर कर गई । परिवार में पिताजी के चित्रकार व माता जी का साहित्य के प्रति अनुराग उनकी इच्छा शक्ति को और बलवती करती जाती रही होगी। घर का माहौल एक तरह से कलात्मक व साहित्यिक रहा जिसके कारण घर में बांग्ला साहित्य के अखबार व अनेक पत्र-पत्रिकाओं का आना जिसमें प्रमुख प्रवासी, भारतवर्ष, भारती, मानसी ओ मर्मवानी, अर्चना, साहित्य, सबूत पत्र आदि उपलब्ध होती रहती थी। आशापूर्णा देवी को बचपन से ही किताबें पड़ने का शौक था। उन्हें किताबों से बहुत लगाव था, लेकिन घर के बाहर जाकर पढ़ने पर उनके घर कि लड़कियों पर सख्त पाबंदी थी। इसलिए आशापूर्णा देवी ने घर के भीतर ही किताबों एंव पत्र-पत्रिकाओं से जो घर पर उपलब्ध हो जाया करती थी उससे बाहरी जगत का ज्ञान इन्हीं झरोखों से बटोरना शुरू किया और परिवार में भाई जब पढ़ाई करने बैठते थे वहीं से चुपके-चुपके उन्होंने थोड़ा बहुत पढ़ना सीखा। पिता के चित्रकार होने और माता का बांग्ला साहित्य मे रूचि का होना आशापूर्णा देवी को उस समय के कलाकारों व साहित्यकारों के साथ भी परिचय होना स्वभाविक था। जिसका प्रभाव पड़ा और जिसका लाभ उन्हें उनकी लेखनी में मिला। उनके परिवार में पढ़ाई लिखाई के लिए जो कुछ भी अवसर मिले उन्हें सजोकर रखते हुए उनको धीरे-धीरे अपने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या सुविधाएँ प्राप्त होती रही। मात्र 13 वर्ष की उम्र में लेखन का आरंभ हो गया जो आजीवन चलता रहा। इस उम्र मे उनकी पहली कविता उस समय के ‘’शिशु साथी’’ में छपी। पत्रिका के संपादक राजकुमार चक्रवर्ती व्दारा सराहना उस कविता की और उनके आग्रह पर उनका साहित्यिक सफर शुरू हुआ। विवाह 15 वर्ष की उम्र में कालिदास गुप्त जी से हुआ जो एक सुलझे व्यक्ति थे उन्होंने आशापूर्णा जी का साथ दिया और फिर यात्रा चल पड़ी, सांसारिक(गृहस्थ) जीवन के सारे दायित्व को निभाते हुए उन्होंने एक तरह से साहित्य सृजन के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप दो सौ से भी अधिक कृतियोंका सृजन किया और बहुभाषी भारत ही नहीं विश्व में इनकी कृतियों के अनुवाद ने उनको अमर कर दिया। उन्हीं अनुदित साहित्य को पढ़ने के कारण उन्हें व उनके साहित्य लेखन को समझने का और उनकी प्रतिभा को जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके व्दारा लिखे आरंभिक साहित्य में मुलतः वह सारा साहित्य बच्चों से संबँधित हुआ करता था। उनका 27 वर्ष की उम्र मे लिखी गई पहली कहानी व्यस्कों के लिए थी जिसका शीर्षक था “पत्नी और प्रयोशी” जो आनन्द बाजार पत्रिका मे प्रकाशित हुई थी। फिर क्रम चल पड़ा।


उनके सृजन में चुकिं, उनके एक नारी होने के कारण बहुत सी कृतियों में मूलतः नारी जीवन के विभिन्न पक्ष पारिवारिक जीवन की समस्याएँ, समाज की कुंठा और लिप्सा अत्यंत ही पैनेपन के साथ उजागर है। उनके साहित्यिक जीवन की कर्मभूमि पश्चिम बंगाल है और उनके सृजन में इस क्षेत्र की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। उनका पहला कहानी संग्रह “जल और आगुन” (1940 बंगला में) उसके प्रकाशन के साथ साहित्य जगत मे एक ऐसे नक्षत्र का अविर्भाव हुआ जिसने दीर्ध काल तक समाज की कुंठा, संकट, संधर्ष, जुगुप्सा और लिप्सा सबको समेटकर सामाजिक संबंधो के हर्ष, उल्लास और उत्कर्ष को नया आकाश प्रदान किया या यह कहे की प्रदान करने में सक्षम रही। लेखिका अपनी विशिष्ठ शैली, चरित्रों का रेखांकन और उनके मनोभावों को व्यक्त करते समय यथार्थवादिता को बनाये रखती थी। आशावादी दृष्टिकोण के साथ हमेशा ही निर्भीकता से सच को सामने लाना उनका उदेश्य रहा। सारी विशेषताओं के साथ नारी मन को पढ़ने की क्षमता उनकी लेखनी में देखा गया । अगर हम उनकी कथाओं की विशेषताएँ पर सोचने से हमें मिलेगा की हम उन्हें तीन प्रमुख विशेषताओं में विभाजित कर सकते है(1) व्यक्तव्य प्रधान(2) समस्या प्रधान (3)आवेग प्रधान। इस तरह उनकी कथाएं हमारे घर संसार का विस्तार लगती है। जिसे वे कभी नन्ही बेटी, एक किशोरी तो कभी ममत्व से पूर्ण माँ के रूप में नवीन जिज्ञासा के साथ देखती है। सीधे और सरल शब्दो में बात को ज्यों का त्यों कह देना उनकी लेखनी की प्रमुखता है। पूर्वाग्रह से रहित उनका दृष्टिकोण अपने नाम के अनुरूप आशावादी था। वे मानव प्रेमी थी। विद्रोहिणी भी थी। रचनाओं के माध्यम से उन्होंने समाज के विभिन्न पक्षों को उजागर किया। उन्होंने उपन्यास, अनेक कविताएं और कहानियां लिखी जो प्रासंगिकता की दृष्टि से आज भी महत्वपूर्ण स्थान बनाए हुए है। इनकी कहानियों में पित्रसतात्मक व्यव्स्था का भरपूर विरोध ही नहीं वरन् एक नई सामाजिक व्यवस्था के निर्माण के प्रति गहरा आग्रह भी दिखाई देता है। उनके लेखन में नारी जीवन को और अधिक सामर्थ्यवान देखने की लालसा हमेशा से रही जिसके लिए उनके विचारों मे आज की नारी घर-बाहर दोनों क्षेत्रों को संभाल रही है, इसी के साथ अन्य बहुत से कार्यों को अंजाम दे सकती है। गृहस्थी जीवन भी संभालते हुए। उनकी लेखनी के माध्यम से उन्होंने कहानियों में रूढिवादी धारणा पर अनेकानेक प्रश्न चिन्ह लगाए है, जो हमारे समाज के हर वर्ग को झकझोरती है। उनकी कथा का लक्ष्य सामाजिक पात्रों के आत्म संधर्ष का सजीव चित्रण है। एक स्त्री होने के साथ उन्होंने स्त्री मन की गहराईयों का जिस सुक्षमता से अध्ययन किया और अपनी लेखनी के माध्यम से हम सभी के समक्ष रखा है अत्यंत ही सराहनीय है। आशापूर्णा देवी के संधर्षमय जीवन के बचपन से लेकर अपने जीवन काल में लगातार साहित्य के प्रति उनका समर्पण अत्यंत ही विशिष्ट रहा। उनकी लेखनी बांग्ला में मूलतः होने के कारण उनके हिंदी अनुवाद के सहारे जब हमारा परिचय इनके साहित्य से हुआ तब से वर्तमान समय तक उनके साहित्य के विषय में जब भी कोई चर्चा होती है, तो उनके व्दारा जिन महत्वपूर्ण बातों से उनके लेखन से परिचय हुआ बहुत ही श्रमसाध्य भी रहा।


उनके रचनाओं की त्रयी –प्रथम प्रतिश्रुति( आशापूर्णा देवी की यह सर्वश्रेष्ठ रटना मानी जाती है इसकी कहानी एक नारी के जीवन में बाल विवाह 8 वर्ष में जिसका नाम सत्यवती है उस समय के सामाजिक मानदंड़ो को बनाए रखने रखने के लिए कर दिया जाता है और उसे ब्रहम्णवादी नियमों की कड़ी निगरानी में रखा जाता है), सुवर्णलता ( प्रथम प्रतिश्रुति की अगली कड़ी इस उपन्यास में निसंदेह लेखिका का दृष्टिकोण एक बहुआयामी विद्रोहिणी की तरह दिखाई देता है), बालुककथा(आज के उन्मुक्त समाज का विवरण है) इनका हिंदी अनुवाद बहुत चर्चा में रहा। इन तीनों उपन्यास को जब हम पढ़ते है तो पाते है कि एक नारी की स्थिति दो शताब्दियों में धीरे धीरे बदलती सामाजिक संघटना और बदलते परिवेश में स्त्रीयों के उत्थान का व्यापक चित्रण देखने को मिलता है। इसी तरह उनकी अन्य कृतियों में किर्चियाँ, न जाने कहाँ कहाँ, यह जीवन है, प्रारब्ध और दृश्य से दृश्यांतर आदि। इसी तरह उनका प्रथम कथा संग्रह जल और आगुन। इसके अलावा हिंदी मे उपलब्ध अन्तः तरंग और मन का चेहरा । ऐश्वर्य, पद्मलता का स्वप्न, बे-आसरा, वहम, नागन की पूँछ, अभिनेत्री, डॉट पेन जैसी कहानियों को हम तक पहुँचाने वाले उनके हिंदी अनुवादक आदरणीय रणजीत कुमार साहा जी ने उनके अधिकतम कृतियों का हिंदी अनुवाद किया है जो हिंदी भाषीय लोगों के लिए एक प्रशंसनीय कार्य है। आशापूर्णा देवीः महिलाओं की वह आवाज, जिनका संधर्ष भी अथक और सृजन भी। आज की तारीख मे उनकी ज्यादातर कृतियाँ प्रायः सारी भारतीय भाषाओं मे अनुदित होकर उपलब्ध है, और उन्हें बांग्ला साहित्य का जेन ऑस्टिन माना जाता है। उनके विषय में उनका करिश्मा जितना उनके सृजन में है, उतना ही उनके संधर्ष मे भी देखा गया था। अपनी विद्रोहणी व्यक्तित्व के साथ पूरा न्याय करती हुई वे एक तरफ कोमलहृद्या पारंपरिक पारिवारिक महिला बनी रही वहीं अपने हृदय की स्त्रीसुलभ कोमलता पर कभी आँच नहीं आने दी। सात दशको से ज्यादा के साहित्यिक जीवन मे उनकी एक और बड़ी उपलब्धि के रूप हमने पाया की वे अपनी जड़ों के प्रति ईमानदार और सामाजिक अन्याय पर सवाल उठाने को हमेसा जागरूक और तत्पर रहती थी ।आलोचको के मतानुसार वे बंकिम जी, टैगोर जी और शरद जी के बाद के दौर की पहली ऐसी बांग्ला साहित्यकार है, जिन्होने मध्यवर्गीय बंगाली समाज में महिलाओं के उत्थान के लिए बेबाकी से कलम चलाते हुए समाज को जागृत करने का बीड़ा उठाया। उनके जीवन में कई उतार चढ़ाव आये और कभी भी विचलित न होते हुए अपने जीवन की लंबी यात्रा के अंतिम पड़ाव तक आते-आते लगभग 1500 से ऊपर लधु कथाएँ और लगभग 250 पूर्णकाय और लधु उपन्यास लिखे। उनके 37 लधुकथा संग्रह और 62 बच्चों की पुस्तकें प्रकाशित हुई है।
उनको मिले विभिन्न पुरस्कारो की सूची में कुछ प्रमुख पुरस्कारो का विवरण नीचे दिया गया हैः-
(1) लीला पुरस्कार, कोलकत्ता विश्वविद्यालय(1954)
(2) टैगोर पुरस्कार(1964)
(3) भूटान मोहनीदासी स्वर्ण पदक(1966)
(4) बूंद मेमोरियल पुरस्कार(पश्चिम बंगाल सरकार(1966)
(5) पद्मश्री (1976)
(6) ज्ञानपीठ-प्रथम प्रतिश्रुति के लिए(1976)
(7) हरनाथ घोष पदक, बंगीय साहित्य परिषद(1988)
(8) जगतरानी स्वर्णपदक कोलकत्ता विस्वविद्यालय(1993)
इनके कहानियों और उपन्यासों पर कई फिल्में भी बनी है जिनमें कुछ प्रमुख शोतोबोटी ट्रिलाजी की फिल्में जैसे प्रथम प्रतुश्रुति(1971) और हिंदी फिल्में जैसे अग्नि परीक्षा(1954), छोटी सी मुलाकात(1967),छाया सूर्य(1963), तपस्या(1976) और अननदिता(1972) जो भारतीय समाज में महिलाओं के जीवन और संधर्षो को दर्शाती है। ऐसे विपुल साहित्य भंड़ार की स्वामिनी आशापूर्णा देवी ने वर्ष 1995 की 13 जुलाई को 86 वर्ष की अवस्था में उन्होंने कोलकत्ता में ही इस संसार को अलविदा कहा तो हमने महिलाओं की आजादी की एक ऐसी रहनुमा को खोया, जिसने रहनुमाई की जिम्मेदारी तो खूब निभाई, लेकिन अपने रहनुमा होने का एहसास कभी नहीं होने दिया। आशापूर्णा देवी साहसिक और क्रांतिकारी लेखन का सशक्त हस्ताक्षर है। अदभुत प्रतिभा की स्वामिनी आशापूर्णा देवी को समाज के आधी आबादी के एक ऐसे वर्ग के साथ हो रहे अन्याय पर उनकी अनवरत लेखनी को नमन के साथ नको विनम्र श्रध्दांजलि।।
चिरंजीव (स्वतंत्र लेखन)
संकलन व लेखन
लिंगम चिरंजीव राव
म.न.11-1-21/1 ,कार्जी मार्ग
इच्छापुरम , श्रीकाकुलम (आन्ध्रप्रदेश)
पिन 532 312 मों न. 8639945892




