वाराणसी के लमही गाँव में 31 जुलाई, 1880 को जन्मे धनपत राय, जिन्हें संपूर्ण विश्व मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानता है, महज़ एक कथाकार नहीं थे, वे भारतीय समाज के एक ऐसे दूरदर्शी,समाजशास्त्री, इतिहासकार और मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से भारत की आत्मा को गहराई से उकेरा है। उनका साहित्य आज की इस इक्कीसवीं सदी के जटिल और बहुआयामी भारतीय समाज में भी उतना ही प्रासंगिक और मार्गदर्शक है, जितना वह अपने समय में था। ब्रिटिश राज का शिकंजा, सामंती व्यवस्था का क्रूर दमन, महाजनों और ज़मींदारों द्वारा किसानों का आर्थिक शोषण, छुआछूत और जातिगत भेदभाव का अभिशाप तथा समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति- ये वे तमाम ज्वलनशील मुद्दे थे, जिन्होंने प्रेमचंद के संवेदनशील मन को बेचैन किया। उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत 'नवाब राय' के नाम से उर्दू में की थी और बाद में 'सोज़-ए-वतन' जैसी उनकी शुरुआती रचनाओं को राष्ट्रविरोधी मानकर ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतियाँ जलाई जाने की घटना ने उनके भीतर छिपे विद्रोही लेखक को पूरी तरह जगा दिया। इसके बाद उन्होंने मुंशी प्रेमचंद के रूप में जिस विराट कथा-संसार की रचना की, उसने हिंदी और उर्दू कथा-साहित्य को महकते हुए महलों और दरबारों से निकालकर सीधे आम जनता की झोपड़ियों, खेतों-खलिहानों और गलियारों तक पहुँचाने का ऐतिहासिक कार्य किया। प्रेमचंद का यथार्थवाद समय के साथ और अधिक परिपक्व और कठोर होता गया। अपने शुरुआती लेखन के दौर में प्रेमचंद 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' के प्रबल समर्थक थे। इस वैचारिक दृष्टिकोण के अंतर्गत वे अपने कथा साहित्य में समाज की कुरूप सच्चाइयों, अन्याय और अत्याचारों का सजीव चित्रण तो करते थे, लेकिन कथा के अंत में वे किसी न किसी पात्र के हृदय परिवर्तन के माध्यम से एक नैतिक और सकारात्मक समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास करते थे। उस दौर में प्रेमचंद को यह विश्वास था कि मानवीय अंतःकरण मूल रूप से अच्छाई की तरफ झुकता है और यदि समाज को सही दिशा दिखानी है, तो साहित्य में आदर्श का एक ऊँचा मानक रखना अनिवार्य है। किंतु, जैसे-जैसे समय बीतता गया, देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ अधिक जटिल होती गईं और प्रेमचंद का जीवन-अनुभव भी गहरा होता गया, वैसे-वैसे उनका यह आदर्शवाद यथार्थ की तीखी और कठोर वास्तविकताओं के सामने विरल होने लगा। उन्होंने यह महसूस किया कि जीवन हमेशा नैतिक समझौतों और हृदय परिवर्तन के जादुई क्षणों से नहीं चलता, बल्कि समाज में कई बार व्यवस्था की क्रूरता इतनी गहरी होती है कि व्यक्ति उसमें पिसकर पूरी तरह नष्ट हो जाता है। उनका महानतम उपन्यास 'गोदान' और उनकी अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी 'कफ़न' इसी कठोर, नग्न और समझौताहीन यथार्थवाद के सर्वोच्च स्मारक हैं। 'गोदान' का नायक होरी  भारतीय किसान की उस सनातन संस्कृति, उसकी मर्यादा, उसकी सहिष्णुता और उसकी बेबसी का जीवंत प्रतीक है, जो जीवन भर ईमानदारी से पसीना बहाने के बाद भी केवल ऋण, अपमान और अंततः मृत्यु को ही प्राप्त होता है। प्रेमचंद यहाँ कोई कृत्रिम या सुखद अंत नहीं गढ़ते, बल्कि वे भारतीय ग्रामीण जीवन के उस खौफनाक और विदारक सच को बिना किसी पर्दादारी के पाठक के सामने लाकर खड़ा कर देते हैं, जो आज भी हमारे विवेक को झकझोर देता है। आज के इस इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत में, जहाँ हम डिजिटल क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतरिक्ष विज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, प्रेमचंद के ये तमाम प्रसंग हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हमारा समाज वास्तव में उस बुनियादी मानवीय संकट से उबर पाया है, जिसका चित्रण प्रेमचंद ने किया था? यदि हम समकालीन संदर्भों में भारतीय कृषि क्षेत्र की स्थिति का गहराई से अवलोकन करें, तो हमें 'गोदान' का होरी आज भी हमारे चारों ओर जीवित दिखाई देता है। आज भले ही कृषि के आधुनिक उपकरण आ गए हों, हरित क्रांति के चरण पार हो चुके हों और नीतियां कागजों पर बड़ी-बड़ी दिखती हों, लेकिन आज भी देश का एक बड़ा किसान वर्ग महाजनी व्यवस्था के आधुनिक और अधिक जटिल स्वरूपों (भारी बैंक ऋण, अनियोजित माइक्रोफ़ाइनेंस, साहूकारों का शिकंजा और जलवायु परिवर्तन से बर्बाद होती फसलों) के बीच बदहाली की ज़िंदगी जीने को विवश है। आज भी जब हम अखबारों में किसानों की आत्महत्या की खबरें पढ़ते हैं या अपनी पैतृक ज़मीन से बेदखल होकर महानगरों की गंदी बस्तियों में दिहाड़ी मज़ूरी करने वाले विस्थापित किसानों को देखते हैं, तो हमें यह अहसास होता है कि प्रेमचंद का 'होरी' केवल एक काल्पनिक चरित्र नहीं, बल्कि भारतीय कृषि व्यवस्था की वह शाश्वत त्रासदी है, जिसका समाधान आज भी पूरी तरह से नहीं खोजा जा सका है। प्रेमचंद ने अपनी प्रसिद्ध चर्चित कहानी 'कफ़न' के माध्यम से जिस प्रकार उपभोक्तावादी और संवेदनहीन मानसिकता का पर्दाफ़ाश किया था, वह आज के अति-आधुनिक और स्वार्थी समाज पर एक करारा व्यंग्य है। यह कहानी सतही तौर पर भले ही दो अत्यंत लाचार और अकर्मण्य पात्रों की कथा लगे, लेकिन यदि हम इसके अंतर्निहित समाजशास्त्रीय अर्थ को समझें, तो यह उस निर्दयी व्यवस्था पर प्रहार है, जो जीवित मनुष्य को दो वक्त की सूखी रोटी और बुनियादी इलाज मुहैया नहीं कराती, लेकिन मरने के बाद उसके नाम पर बड़े-बड़े आडंबर और दिखावे करने का पाखंड करती है। आज के इस उपभोक्तावादी और बाज़ार-प्रधान युग में, जहाँ मनुष्य केवल अपने स्वार्थ, भौतिक सुखों और उपभोग की वस्तुओं को ही सब कुछ मान बैठा है और दूसरे के दुख-दर्द या पीड़ा के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन हो चुका है, 'कफ़न' कहानी हमें हमारी उस खोती हुई सामूहिक चेतना और मानवीय करुणा की सबसे बड़ी चेतावनी के रूप में याद आती है। नारी स्वतंत्रता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुधारों के मोर्चे पर भी प्रेमचंद के विचार अपने समकालीन युग से बहुत आगे और क्रांतिकारी थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में महिलाओं को कभी भी केवल पुरुष की छाया, अबला या करुणा की पात्र के रूप में चित्रित नहीं किया, बल्कि उन्हें सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाली, आत्म-सम्मान से परिपूर्ण और नैतिक रूप से सशक्त स्वायत्त इकाइयों के रूप में गढ़ा। उन्होंने अपने कथा साहित्य में लिंग समानता, महिला अधिकारों और उनके आर्थिक स्वावलंबन जैसे मुद्दों की जो वैचारिक नींव एक सदी पहले रखी थी, वह आज भी हमारे लिए सबसे बड़ा वैचारिक संबल प्रदान करती है। सांप्रदायिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और मानवतावाद प्रेमचंद के संपूर्ण चिंतन का एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य आधार स्तंभ था। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही यह भाप लिया था कि भारत की बहुसंस्कृति और विविधता को यदि कोई सबसे बड़ा खतरा है, तो वह धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर लोगों को आपस में बाँटने वाली संकीर्ण राजनीतिक ताकतें हैं। उन्होंने अपने कथा साहित्य के माध्यम से यह संदेश दिया कि सच्चा धर्म किसी बाहरी कर्मकांड, पाखंड, या एक-दूसरे के प्रति नफ़रत फैलाने में नहीं है, बल्कि वह विशुद्ध रूप से मानवीय प्रेम, सहिष्णुता, सेवा और भाईचारे में निहित है। आज के इस दौर में जब हमारे समाज में विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास की खाई को चौड़ा करने के प्रयास किए जाते हैं, जातिगत अस्मिताओं के नाम पर विद्वेष फैलाया जाता है और धर्म को वैमनस्य का हथियार बनाया जाता है, तब प्रेमचंद का यह मानवतावादी दृष्टिकोण और उनकी यह अंतर्दृष्टि हमें एकजुट रखने के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक और आवश्यक औषधि बन जाती है। प्रेमचंद की भाषा-शैली उनकी सबसे बड़ी और अचूक शक्ति थी। उन्होंने कभी भी अपने कथा साहित्य में किसी क्लिष्ट, दुर्बोध,पांडित्य-प्रदर्शन करने वाली भाषा का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने हमेशा आम जनमानस की उस जीवंत भाषा को अपनाया जिसे 'हिंदुस्तानी' कहा जाता है। उनकी भाषा किसी कृत्रिम व्याकरणिक अनुशासन से बँधी होने के बजाय सीधे खेतों, बाजारों, चौपालों और घरों की बोलचाल की जीवंत धड़कनों से जुड़ी हुई थी। प्रेमचंद की यह सरल हिंदुस्तानी भाषा शैली हमें यह सिखाती है कि महान साहित्य वही है, जो विद्वानों की चार दीवारों तक सीमित न रहकर आम जनता की भाषा बनकर उनके सुख-दुख का सच्चा साथी बन सके। प्रेमचंद केवल एक कालखंड के रचनाकार नहीं थे, बल्कि वे भारतीय चेतना के एक ऐसे अमर हस्ताक्षर हैं, जो हर युग में प्रासंगिक रहेंगे। जब तक इस देश की ज़मीन पर आर्थिक असमानता की खाई गहरी बनी रहेगी, जब तक मेहनत करने वाले किसान और श्रमिक को उसकी पसीने की सही कीमत और सामाजिक गरिमा नहीं मिलेगी, जब तक महिलाओं को पुरुष-प्रधान समाज में पूर्ण बराबरी और न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और जब तक मानव को धर्म, जाति या वर्ग के नाम पर बाँटने की साजिशें होती रहेंगी, तब तक मुंशी प्रेमचंद का एक-एक शब्द, उनका प्रत्येक उपन्यास और उनकी प्रत्येक कहानी हमारे सामने एक जलती हुई मशाल की तरह खड़ी मिलेगी। प्रेमचंद ने बहुत पहले यह स्पष्ट कर दिया था कि "साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली वह मशाल है, जो रास्ते को रोशन करती है," और उनकी यह मशाल आज भी उतनी ही प्रखरता, तेजस्विता और ऊर्जा के साथ जल रही है, जो हमें एक अधिक न्यायपूर्ण, समतावादी, मानवीय और सुंदर समाज के निर्माण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती रहेगी।
     — प्रो. सुशील कुमार शर्मा, वरिष्ठ आचार्य, हिंदी विभाग संकायाध्यक्ष, मानविकी एवं भाषा, संकाय मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईजोल- 796004

        विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास रायगढ़ ( छत्तीसगढ़) से संबद्ध डॉ. सुशील कुमार शर्मा को हिन्दी के महान कथाकार प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर उक्त लेख को प्रासंगिक और प्रेरक बताते हुए डॉ. मीनकेतन प्रधान ने बधाई दी है ।

प्रेषक-
डॉ. मीनकेतन प्रधान
पूर्व प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष - हिन्दी, किरोड़ीमल शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, रायगढ़ (छ.ग.)भारत 

पूर्व अध्यक्ष- हिन्दी अध्ययन मंडल, शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़,

संस्थापक 
विश्व हिन्दी अधिष्ठान रायगढ़ (छ.ग.)